हमारे गाँव #पाचन_कुई_के एक सच्चे सेवाभावी और प्रेरणास्रोत व्यक्ति श्री #पुसाराम_जी_खटाणा पिछले 25–30 वर्षों से एक अद्भुत परंपरा निभा रहे हैं। वे हर सुबह ठीक 7:00 बजे, अपना निजी काम छोड़कर, गाँव के मंदिर परिसर में मोरों को दाना डालने अवश्य पहुँचते हैं। यह कार्य उनके लिए कोई दिखावा नहीं, बल्कि जीवन का एक पवित्र कर्तव्य बन चुका है। इतने लंबे समय तक बिना रुके, बिना थके, एक ही समय पर इस सेवा को निभाना उनके अनुशासन, समर्पण और जीवों के प्रति करुणा को दर्शाता है। मोर जैसे सुंदर और संवेदनशील पक्षियों के प्रति उनका यह प्रेम केवल दाना डालने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और संस्कृति से जुड़े उनके गहरे संस्कारों को भी प्रकट करता है। पुसाराम जी खटाणा का यह निरंतर प्रयास हमें सिखाता है कि सच्ची सेवा वही है जो निस्वार्थ भाव से, नियमित रूप से और बिना किसी अपेक्षा के की जाए। उनका यह कार्य नई पीढ़ी के लिए एक जीवंत उदाहरण है कि इंसान अगर ठान ले, तो छोटे-छोटे कर्म भी समाज और प्रकृति के लिए बहुत बड़ा योगदान बन सकते हैं। ऐसे व्यक्तित्व हमारे गाँव की पहचान और गौरव हैं। उनका यह समर्पण न केवल मोरों के जीवन को संबल देता है, बल्कि हम सभी को मानवता, अनुशासन और प्रकृति-प्रेम का अमूल्य संदेश भी देता है। वास्तव में, पुसाराम जी खटाणा जैसे लोग ही समाज की असली ताकत होते हैं। 🌿🦚 गोरधन खटाणा ग्राम पंचायत बावड़ीखेड़ा
हमारे गाँव #पाचन_कुई_के एक सच्चे सेवाभावी और प्रेरणास्रोत व्यक्ति श्री #पुसाराम_जी_खटाणा पिछले 25–30 वर्षों से एक अद्भुत परंपरा निभा रहे हैं। वे हर सुबह ठीक 7:00 बजे, अपना निजी काम छोड़कर, गाँव के मंदिर परिसर में मोरों को दाना डालने अवश्य पहुँचते हैं। यह कार्य उनके लिए कोई दिखावा नहीं, बल्कि जीवन का एक पवित्र कर्तव्य बन चुका है। इतने लंबे समय तक बिना रुके, बिना थके, एक ही समय पर इस सेवा को निभाना उनके अनुशासन, समर्पण और जीवों के प्रति करुणा को दर्शाता है। मोर जैसे सुंदर और संवेदनशील पक्षियों के प्रति उनका यह प्रेम केवल दाना डालने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और संस्कृति से जुड़े उनके गहरे संस्कारों को भी प्रकट करता है। पुसाराम जी खटाणा का यह निरंतर प्रयास हमें सिखाता है कि सच्ची सेवा वही है जो निस्वार्थ भाव से, नियमित रूप से और बिना किसी अपेक्षा के की जाए। उनका यह कार्य नई पीढ़ी के लिए एक जीवंत उदाहरण है कि इंसान अगर ठान ले, तो छोटे-छोटे कर्म भी समाज और प्रकृति के लिए बहुत बड़ा योगदान बन सकते हैं। ऐसे व्यक्तित्व हमारे गाँव की पहचान और गौरव हैं। उनका यह समर्पण न केवल मोरों के जीवन को संबल देता है, बल्कि हम सभी को मानवता, अनुशासन और प्रकृति-प्रेम का अमूल्य संदेश भी देता है। वास्तव में, पुसाराम जी खटाणा जैसे लोग ही समाज की असली ताकत होते हैं। 🌿🦚 गोरधन खटाणा ग्राम पंचायत बावड़ीखेड़ा
- भगवान महावीर की निर्वाण स्थली पावा पूरी बिहार राज्य में यहां जाने का मौका मिला3
- कोटा के रेलवे कॉलोनी थाना क्षेत्र में एक 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा द्वारा आत्महत्या करने का प्रयास किए जाने का मामला सामने आया है। घटना के समय छात्रा घर पर थी, तभी उसकी मां ने स्थिति को भांपते हुए तुरंत हस्तक्षेप किया और परिजनों की मदद से उसे तत्काल एमबीएस अस्पताल पहुंचाया गया। फिलहाल छात्रा का अस्पताल में उपचार जारी है और उसकी हालत स्थिर बताई जा रही है।1
- बकाया भुगतान की मांग को लेकर 18 फरवरी से कोटा कलेक्ट्रेट पर धरने पर बैठे जेके फैक्ट्री के मजदूरों के आंदोलन को गुरूवार को को 353 दिन पूरे हो चुके हैं। इस बीच 13 मजदूरों की मौत हो चुकी है। लेकिन सरकार की तरफ से कोई सुनवाई नहीं हो रही...मंगलवार को धरने के 351 वें दिन तीनों संचालकों से बातचीत...1
- सोशल मीडिया फ्रेंड ने जन्मदिन का बहाना बनाकर सूरत बुलाया, नशा देकर दुष्कर्म का आरोप, दो गिरफ्तार जिले की 21 वर्षीय युवती के साथ गुजरात के सूरत में दुष्कर्म का गंभीर मामला सामने आया है। पीड़िता का आरोप है कि उसे जन्मदिन मनाने के बहाने सूरत बुलाया गया और करीब 20 दिनों तक अलग-अलग होटलों में रखकर उसके साथ बार-बार दुष्कर्म किया गया। इस दौरान उसके साथ मारपीट, मानसिक प्रताड़ना और नशे के इंजेक्शन लगाने का भी आरोप लगाया गया है। पुलिस ने मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार कर उनका पुलिस रिमांड लिया है।1
- आज हम बात कर रहे हैं UGC के नए नियमों की, जिन्हें कई संगठन और छात्र “काला कानून” बता रहे हैं। आखिर इन नियमों में ऐसा क्या है, जिससे विरोध हो रहा है? और क्या ये नियम छात्रों के हित में हैं या नुकसानदायक? इन्हीं सवालों पर आज हम विशेषज्ञ से खास बातचीत कर रहे हैं।1
- राजस्थान के हाड़ौती अंचल की धरती पर बसे कोटा शहर के इतिहास में राजपूत शासकों से पहले एक ऐसा नाम आता है जिसे लोककथाएं आज भी गर्व से याद करती हैं वह नाम है वीर कोटिया भील का जिन्हें कई इतिहासकार और स्थानीय परंपराएं कोटा का पहला शासक मानती हैं कहा जाता है कि जब यह इलाका घने जंगलों, पहाड़ियों और नदी घाटियों से घिरा हुआ था तब भील समुदाय यहां स्वतंत्र रूप से रहता था और उसी समुदाय से उभरे कोटिया भील ने अपनी वीरता, नेतृत्व क्षमता और युद्ध कौशल के दम पर आसपास के क्षेत्रों को संगठित कर एक मजबूत गणराज्य जैसा शासन स्थापित किया था। लोककथाओं के अनुसार कोटिया भील न केवल योद्धा थे बल्कि न्यायप्रिय और प्रजा के रक्षक भी माने जाते थे वे शिकार, जंगल और जल स्रोतों की रक्षा को अपना धर्म समझते थे और बाहरी आक्रमणकारियों से अपने क्षेत्र को बचाने के लिए सदैव तैयार रहते थे कहा जाता है कि बाद में जब बूंदी के हाड़ा राजपूतों का विस्तार इस क्षेत्र तक हुआ तब संघर्ष की स्थिति बनी और अंततः युद्ध में कोटिया भील वीरगति को प्राप्त हुए किंतु उनकी स्मृति इस भूमि से कभी मिट नहीं सकी माना जाता है कि कोटा नाम भी कहीं न कहीं कोटिया भील के नाम से जुड़ा हुआ है और आज भी स्थानीय लोग उन्हें इस क्षेत्र का मूल स्वामी मानकर सम्मान देते हैं इतिहास की पुस्तकों में भले उनका उल्लेख सीमित हो लेकिन लोकगीतों, कथाओं और जनश्रुतियों में कोटिया भील आज भी जीवित हैं और उनकी कहानी आदिवासी शौर्य, स्वाभिमान और अपने भूभाग से अटूट जुड़ाव की मिसाल बनकर पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती रही है अपने क्षेत्र की सभी वायरल विडियोज के लिए डाउनलोड करें शुरू ऐप (Shuru App) 👇🏻1
- Post by VKH NEWS1
- राजस्थान के हाड़ौती अंचल की धरती पर बसे कोटा शहर के इतिहास में राजपूत शासकों से पहले एक ऐसा नाम आता है जिसे लोककथाएं आज भी गर्व से याद करती हैं वह नाम है वीर कोटिया भील का जिन्हें कई इतिहासकार और स्थानीय परंपराएं कोटा का पहला शासक मानती हैं कहा जाता है कि जब यह इलाका घने जंगलों, पहाड़ियों और नदी घाटियों से घिरा हुआ था तब भील समुदाय यहां स्वतंत्र रूप से रहता था और उसी समुदाय से उभरे कोटिया भील ने अपनी वीरता, नेतृत्व क्षमता और युद्ध कौशल के दम पर आसपास के क्षेत्रों को संगठित कर एक मजबूत गणराज्य जैसा शासन स्थापित किया था लोककथाओं के अनुसार कोटिया भील न केवल योद्धा थे बल्कि न्यायप्रिय और प्रजा के रक्षक भी माने जाते थे वे शिकार, जंगल और जल स्रोतों की रक्षा को अपना धर्म समझते थे और बाहरी आक्रमणकारियों से अपने क्षेत्र को बचाने के लिए सदैव तैयार रहते थे कहा जाता है कि बाद में जब बूंदी के हाड़ा राजपूतों का विस्तार इस क्षेत्र तक हुआ तब संघर्ष की स्थिति बनी और अंततः युद्ध में कोटिया भील वीरगति को प्राप्त हुए किंतु उनकी स्मृति इस भूमि से कभी मिट नहीं सकी माना जाता है कि कोटा नाम भी कहीं न कहीं कोटिया भील के नाम से जुड़ा हुआ है और आज भी स्थानीय लोग उन्हें इस क्षेत्र का मूल स्वामी मानकर सम्मान देते हैं इतिहास की पुस्तकों में भले उनका उल्लेख सीमित हो लेकिन लोकगीतों, कथाओं और जनश्रुतियों में कोटिया भील आज भी जीवित हैं और उनकी कहानी आदिवासी शौर्य, स्वाभिमान और अपने भूभाग से अटूट जुड़ाव की मिसाल बनकर पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती रही है।1