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Apke Nagar Ki App…

*30 फीट ऊपर आस्था की परिक्रमा: उल्टा लटककर निभाते हैं ‘लाड़ा’ मन्नत, बलि से अर्पित होता है आभार* *धुलेंडी पर आदिवासी समाज का अद्भुत अनुष्ठान—भगोरिया से गल तक सात दिन की साधना, विश्वास का सार्वजनिक उत्सव* *विनय पंचाल, पिटोल।* देशभर में होली के रंग फीके पड़ते ही झाबुआ के आदिवासी अंचल में आस्था की एक अनोखी परंपरा जीवंत हो उठती है। धुलेंडी के दिन भील समुदाय सदियों पुरानी गल परंपरा का निर्वाह करता है। इस परंपरा के तहत मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु 20 से 30 फीट ऊंचे खंभे से बंधकर हवा में परिक्रमा करते हैं। गांव के किसी प्रमुख स्थान पर एक ऊंचा लकड़ी का खंभा स्थापित किया जाता है। खंभे के नीचे विधि-विधान से पूजन-पाठ किया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इसी स्थान को “गल” कहा जाता है और यहां गल देवता की पूजा की जाती है। श्रद्धालु पहले पूजा-अर्चना कर देवता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, इसके बाद अनुष्ठान की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। खंभे के शीर्ष पर आड़ी लकड़ी या बांस बांधा जाता है। जिस व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण होती है, वह “मन्नतधारी” कहलाता है—स्थानीय बोली में उसे “लाड़ा” कहा जाता है। रस्सियों और कपड़ों की सहायता से लाड़ा को सुरक्षित रूप से उल्टा लटकाकर बांधा जाता है। नीचे खड़े लोग संरचना को घुमाते हैं, जिससे लाड़ा लगभग 30 फीट की ऊंचाई पर हवा में गोल-गोल परिक्रमा करता है। उल्टे लटककर किया जाने वाला यह अनुष्ठान पूरे गांव के लिए आस्था, साहस और वचन-पालन का चरम दृश्य बन जाता है। *मन्नत और बलि की परंपरा* आदिवासी समाज में गल देवता से संतान प्राप्ति, परिवार के स्वास्थ्य, बीमारी से मुक्ति, जमीन-जायदाद के विवाद या अन्य कठिनाइयों से राहत के लिए मन्नत ली जाती है। श्रद्धालु संकल्प लेते हैं कि इच्छा पूर्ण होने पर वे गल पर घूमकर सार्वजनिक रूप से देवता का आभार व्यक्त करेंगे। परंपरा के अनुसार प्रत्येक मन्नतधारी अपने साथ एक बकरा लेकर आता है। गल परिक्रमा पूर्ण होने के बाद बकरे की बलि दी जाती है, जिसे मन्नत-पूर्ति और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। *भगोरिया से गल तक: सात दिन की साधना* गल अनुष्ठान की तैयारी होली से एक सप्ताह पूर्व प्रारंभ होती है। इसी दौरान झाबुआ जिले में पारंपरिक भगोरिया मेले आयोजित होते हैं। कई मन्नतधारी इन सात दिनों में विभिन्न भगोरिया मेलों में शामिल होते हैं और व्रत व अनुशासन का पालन करते हैं। इसे उनकी आध्यात्मिक साधना का हिस्सा माना जाता है। इन सात दिनों के दौरान मन्नतधारी एक समय भोजन करते हैं, शरीर पर हल्दी का लेप लगाते हैं, लाल वस्त्र और पगड़ी धारण करते हैं तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए धार्मिक अनुशासन का कड़ाई से निर्वाह करते हैं। धुलेंडी के दिन उन्हें दूल्हे की तरह हल्दी लगाई जाती है। *ढोल-मांदल की थाप और मेले का उत्सव* अनुष्ठान के दिन लाड़ा परिवारजनों और इष्ट-मित्रों के साथ जुलूस के रूप में गल स्थल तक पहुंचता है। ढोल-मांदल की थाप, नृत्य और जयकारों के बीच पूरा वातावरण उत्सव में बदल जाता है। पिटोल क्षेत्र इस परंपरा का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहां दो दर्जन से अधिक आसपास के छोटे-बड़े गांवों के लोग एक स्थान पर एकत्रित होते हैं। इस अवसर पर मेले जैसा दृश्य बन जाता है—दुकानें सजती हैं, झूले और चकरी लगती हैं, और बड़ी संख्या में लोग इस अनुष्ठान को देखने के लिए पहुंचते हैं। झाबुआ के आदिवासी समाज के लिए गल केवल एक रस्म नहीं—यह परंपरा, पहचान और सामुदायिक विश्वास का जीवंत प्रतीक है। धुलेंडी के दिन जब ‘लाड़ा’ 30 फीट ऊपर उल्टा लटककर हवा में परिक्रमा करता है, तब आस्था सचमुच आसमान को छूती दिखाई देती है।

4 hrs ago
user_Vinay Panchal Pitol
Vinay Panchal Pitol
रिपोर्टर Jhabua, Madhya Pradesh•
4 hrs ago

*30 फीट ऊपर आस्था की परिक्रमा: उल्टा लटककर निभाते हैं ‘लाड़ा’ मन्नत, बलि से अर्पित होता है आभार* *धुलेंडी पर आदिवासी समाज का अद्भुत अनुष्ठान—भगोरिया से गल तक सात दिन की साधना, विश्वास का सार्वजनिक उत्सव* *विनय पंचाल, पिटोल।* देशभर में होली के रंग फीके पड़ते ही झाबुआ के आदिवासी अंचल में आस्था की एक अनोखी परंपरा जीवंत हो उठती है। धुलेंडी के दिन भील समुदाय सदियों पुरानी गल परंपरा का निर्वाह करता है। इस परंपरा के तहत मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु 20 से 30 फीट ऊंचे खंभे से बंधकर हवा में परिक्रमा करते हैं। गांव के किसी प्रमुख स्थान पर एक ऊंचा लकड़ी का खंभा स्थापित किया जाता है। खंभे के नीचे विधि-विधान से पूजन-पाठ किया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इसी स्थान को “गल” कहा जाता है और यहां गल देवता की पूजा की जाती है। श्रद्धालु पहले पूजा-अर्चना कर देवता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, इसके बाद अनुष्ठान की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। खंभे के शीर्ष पर आड़ी लकड़ी या बांस बांधा जाता है। जिस व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण होती है, वह “मन्नतधारी” कहलाता है—स्थानीय बोली में उसे “लाड़ा” कहा जाता है। रस्सियों और कपड़ों की सहायता से लाड़ा को सुरक्षित रूप से उल्टा लटकाकर बांधा जाता है। नीचे खड़े लोग संरचना को घुमाते हैं, जिससे लाड़ा लगभग 30 फीट की ऊंचाई पर हवा में गोल-गोल परिक्रमा करता है। उल्टे लटककर किया जाने वाला यह अनुष्ठान पूरे गांव के लिए आस्था, साहस और वचन-पालन का चरम दृश्य बन जाता है। *मन्नत और बलि की परंपरा* आदिवासी समाज में गल देवता से संतान प्राप्ति, परिवार के स्वास्थ्य, बीमारी से मुक्ति, जमीन-जायदाद के विवाद या अन्य कठिनाइयों से राहत के लिए मन्नत ली जाती है। श्रद्धालु संकल्प लेते हैं कि इच्छा पूर्ण होने पर वे गल पर घूमकर सार्वजनिक रूप से देवता का आभार व्यक्त करेंगे। परंपरा के अनुसार प्रत्येक मन्नतधारी अपने साथ एक बकरा लेकर आता है। गल परिक्रमा पूर्ण होने के बाद बकरे की बलि दी जाती है, जिसे मन्नत-पूर्ति और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। *भगोरिया से गल तक: सात दिन की साधना* गल अनुष्ठान की तैयारी होली से एक सप्ताह पूर्व प्रारंभ होती है। इसी दौरान झाबुआ जिले में पारंपरिक भगोरिया मेले आयोजित होते हैं। कई मन्नतधारी इन सात दिनों में विभिन्न भगोरिया मेलों में शामिल होते हैं और व्रत व अनुशासन का पालन करते हैं। इसे उनकी आध्यात्मिक साधना का हिस्सा माना जाता है। इन सात दिनों के दौरान मन्नतधारी एक समय भोजन करते हैं, शरीर पर हल्दी का लेप लगाते हैं, लाल वस्त्र और पगड़ी धारण करते हैं तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए धार्मिक अनुशासन का कड़ाई से निर्वाह करते हैं। धुलेंडी के दिन उन्हें दूल्हे की तरह हल्दी लगाई जाती है। *ढोल-मांदल की थाप और मेले का उत्सव* अनुष्ठान के दिन लाड़ा परिवारजनों और इष्ट-मित्रों के साथ जुलूस के रूप में गल स्थल तक पहुंचता है। ढोल-मांदल की थाप, नृत्य और जयकारों के बीच पूरा वातावरण उत्सव में बदल जाता है। पिटोल क्षेत्र इस परंपरा का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहां दो दर्जन से अधिक आसपास के छोटे-बड़े गांवों के लोग एक स्थान पर एकत्रित होते हैं। इस अवसर पर मेले जैसा दृश्य बन जाता है—दुकानें सजती हैं, झूले और चकरी लगती हैं, और बड़ी संख्या में लोग इस अनुष्ठान को देखने के लिए पहुंचते हैं। झाबुआ के आदिवासी समाज के लिए गल केवल एक रस्म नहीं—यह परंपरा, पहचान और सामुदायिक विश्वास का जीवंत प्रतीक है। धुलेंडी के दिन जब ‘लाड़ा’ 30 फीट ऊपर उल्टा लटककर हवा में परिक्रमा करता है, तब आस्था सचमुच आसमान को छूती दिखाई देती है।

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    चतुर्भुज श्री राम मंदिर मांडू में होलिका दहन कार्यक्रम धूम धाम से मनाया गया 
होलिका दहन चतुर्भुज श्री राम मंदिर मांडू के पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर डॉक्टर नरसिंह दास जी महाराज द्वारा क्या गया
राहुल सेन मांडव 
मो 9669141814
मांडू न्यूज/मांडू नगर में आज होलिका दहन कार्यक्रम बड़ी धूमधाम से मनाया गया। मांडू नगर और आसपास के क्षेत्र की महिलाओं ने शाम होते ही कार्यक्रम स्थल पहुंचकर पूजा-अर्चना की और सुख समृद्धि की कामना की। सबसे पहले होली जलाने की परंपरा मांडू के चतुर्भुज राम मंदिर में है  वही पूजा अर्चना कर होलिका दहन किया।
पीठाधीश्वर  महामंडलेश्वर डॉ नरसिंह दास  महाराज ने जलाई होली
होलिका में गाय के गोबर से बने उपले की माला बनाई गई है उस माला में छोटे-छोटे सात उपले बनाकर आज होली में पूजन अर्चन के बाद टांगे गए। मांडू नगर मे  परंपरा अनुसार 7 बजे पूजन अर्चन के बाद होलिका दहन किया गया। होली के समय यह माला होलिका के साथ जला दी। इसका उद्देश्य यह होता है कि होली के साथ घर में रहने वाली बुरी नज़र भी जल जाती है और घर में सुख समृद्धि आने लगती है। गाय के गोबर के कंडे से व उपलों से बनी इस होलिका का मध्याह्न से ही विधिवत पूजा प्रारम्भ होने लगी। आज होली के अवसर पर घरों में जो भी बने पकवान बने थे उसका भी भोग लगाया गया पूजा के साथ। आज रात तक शुभ मुहूर्त पर होलिका का दहन किया गया। इस होलिका में नई फसल की गेहूं की बालियों और चने के झंगरी को भी भूना होली की आग में सेंका गया और सीक ने के बाद खाया प्रसाद के रूप में इसे खाया गया। होलिका का दहन हमें समाज की व्याप्त बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय
त्योहारः मांडू में होलिका दहन कार्यक्रम धूमधाम से मनाया गया, महिलाओं ने पूजा अर्चना कर मन्नत मांगी का प्रतीक है। होली पर्व का आज पहला दिन।
होलिका दहन के साथ पाप अंहकार को भस्म कर लोगों ने एक दूसरे के लिए सुख समृद्धि की दुआएं मांगी हैं। सोमवार  को मांडू नगर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों मैं महिलाओं ने पूजा-अर्चना कर होली के फेरे लगा कर सुख शांति की कामना की। लंबे समय से बीमारियों से ग्रस्त लोगों ने आहूति देकर बीमारियों से छुटकारे की कामना की।
वही होलिका दहन के बाद चतुर्भुज राम मंदिर के पुजारी महेंद्र जी वह बटुक छोटे छोटे बच्चों ने होलिका की पूजा की वही आचार्य शुभम जी के द्वारा वैदिक मंत्र का जाप क्या गया वही रामायण मंडल के द्वारा फाग गीत गाए वही वहां पर उपस्थित भाजपा अजजा मोर्चा प्रदेश उपाध्यक्ष मांडू नगर परिषद अध्यक्ष प्रतिनिधि जयराम गावर,मांडू नगर परिषद उपाध्यक्ष कृष्णा यादव ,भाजपा मन की बात धार जिला ग्रामीण प्रभारी रवींद्र परिहार,चतुर्भुज श्री राम मंदिर ट्रस्टी मांगीलाल जायसवाल,ट्रस्टी अशोक निगम,राहुल सेन मांडव,उज्वल निगम के साथ कई भक्त लोग होलिका दहन में मौजूद रहे ओर पुजा अर्चना की गई 
पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर डॉक्टर नरसिंह दास जी ने क्या कहा 
वही चतुर्भुज श्री राम मंदिर मांडू के पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर दो नरसिंह दास जी महाराज ने बताया कि होली का ने प्रहलाद को अपनी गोद में बैठ कर जलती आग में प्रवेश क्या लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रहलाद सुरक्षित रहे और होलीका जलकर भस्म हो गई यही कारण है कि हर साल बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में होलिका दहन किया जाता है होलिका दहन की परंपरा सदियों से चली आ रही है
    user_राहुल सेन मांडव
    राहुल सेन मांडव
    Social Media Manager धार, धार, मध्य प्रदेश•
    22 hrs ago
  • बागीदौरा उपखण्ड के नौगामा में बरसों पुरानी गढ़भेदन परंपरा का निर्वाह धुलंडी पर हुआ। गांववासी होली चौक पर एकत्रित हुए। युवाओं ने गढ़ भेदकर शक्ति का प्रदर्शन किया। दोपहर में ढूंढोंत्सव आयोजित हुआ तथा शाम 5 बजे काली कल्याण धाम में महंत सूर्यवीरसिंह चौहान के सान्निध्य में पारम्परिक आयोजन शुरू हुआ। ढ़ोल -नगाड़ों की गूंज से माहौल उत्साहित हो उठा। 25 युवाओं ने कमर में सफेद कपड़े की रस्सी बांधी। दोनों ओर 50-50 युवाओं की टीमों ने गढ़ भेदन की आजमाइश की। कार्यक्रम देर तक चला। गढ़ भेदन के बाद युवाओं ने पारम्परिक लोकनृत्य किया। महिलाओं ने फाग गीत गाकर जोश बढ़ाया। आसपास के गांवों से सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे।
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    बागीदौरा उपखण्ड के नौगामा में बरसों पुरानी गढ़भेदन परंपरा का निर्वाह धुलंडी पर हुआ।
गांववासी होली चौक पर एकत्रित हुए। युवाओं ने गढ़ भेदकर शक्ति का प्रदर्शन किया। दोपहर में ढूंढोंत्सव आयोजित हुआ तथा शाम 5 बजे काली कल्याण धाम में महंत सूर्यवीरसिंह चौहान के सान्निध्य में पारम्परिक आयोजन शुरू हुआ। ढ़ोल -नगाड़ों की गूंज से माहौल उत्साहित हो उठा। 25 युवाओं ने कमर में सफेद कपड़े की रस्सी बांधी। दोनों ओर 50-50 युवाओं की टीमों ने गढ़ भेदन की आजमाइश की। कार्यक्रम देर तक चला।
गढ़ भेदन के बाद युवाओं ने पारम्परिक लोकनृत्य किया। महिलाओं ने फाग गीत गाकर जोश बढ़ाया।
आसपास के गांवों से सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे।
    user_धर्मेंद्र उपाध्याय
    धर्मेंद्र उपाध्याय
    पत्रकार बांसवाड़ा, बांसवाड़ा, राजस्थान•
    18 min ago
  • बांसवाड़ा में हो रहे 2026 की होली बहुत ही धूमधाम से मनाया गया जिसमें सभी महिला पुरुष और गाजे बाजे के साथ होली का आनंद ले रहे हैं
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    बांसवाड़ा में हो रहे 2026 की होली बहुत ही धूमधाम से मनाया गया जिसमें सभी महिला पुरुष और गाजे बाजे के साथ होली का आनंद ले रहे हैं
    user_Ajay kumar Pandit
    Ajay kumar Pandit
    Photographer Banswara, Rajasthan•
    56 min ago
  • बड़वानी। संत खांडेराव महाराज और फखरुद्दीन बाबा की स्मृति में निभाई जा रही 831 वर्ष पुरानी गाड़ा खिंचाई की ऐतिहासिक परंपरा इस वर्ष 4 मार्च 2026 (धुलेंडी) को गोधूलि बेला में बड़वानी जिला मुख्यालय, ठीकरी, अंजड़ और शहर के नवलपुरा क्षेत्र में श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजित की जाएगी। विक्रम संवत 1252 से निरंतर चली आ रही यह परंपरा आज भी क्षेत्र की आस्था, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक बनी हुई है। ठीकरी में होगा आयोजन ठीकरी में आयोजन की शुरुआत पारंपरिक विधि-विधान के साथ होगी। एक दिन पूर्व रात्रि में बाबा खांडेराव महाराज मंदिर से गाड़ों को गाड़ा मैदान लाया जाएगा। धुलेंडी के दिन दोपहर दर्शन के पश्चात मंदिर के पट बंद कर दिए जाएंगे। गोधूलि बेला में बड़वा एडू यादव के बाहर आने पर सारथी उन्हें कंधे पर बैठाकर गाड़ा मैदान तक ले जाएंगे। मलिहार चौक में पारंपरिक मकड़ी यंत्र घुमाने की रस्म निभाई जाएगी। इसके बाद जैसे ही बड़वा चंदन की जोड़ी को कंधे पर धारण कर गाड़ों को स्पर्श करेंगे, रेल की तरह एक-दूसरे से बंधे भारी-भरकम गाड़े स्वतः चल पड़ेंगे। अंतिम गाड़े के तोरण पार करते ही गाड़ा खिंचाई की रस्म पूर्ण मानी जाएगी। नगर परिषद और पुलिस प्रशासन द्वारा सुरक्षा, पार्किंग, पेयजल और भीड़ प्रबंधन के विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। अंजड़ में बस स्टैंड से भोंगली नदी पुलिया तक सात गाड़े खींचे जाएंगे अंजड़ में भी यह आयोजन शाम 6 बजे से बस स्टैंड क्षेत्र में प्रारंभ होगा। बड़वा संतोष धनगर यादव मोहल्ले से ढोल-नगाड़ों के साथ निकलकर हनुमान मंदिर में पूजन-अर्चन करेंगे और आशीर्वाद लेकर आयोजन स्थल पहुंचेंगे। बस स्टैंड से भोंगली नदी पुलिया तक सात गाड़े खींचे जाएंगे। मकड़ी यंत्र घुमाने के बाद बड़वा का कंधा लगते ही गाड़े जयघोष के बीच चल पड़ेंगे। हर वर्ष की तरह इस बार भी हजारों श्रद्धालुओं के उमड़ने की संभावना है। बड़वानी में होगा अलग माहौल बड़वानी शहर के नवलपुरा क्षेत्र में इस वर्ष 20वें वर्ष गाड़ा खिंचाई का आयोजन होगा। लगभग 14 से 15 गाड़ों को एक साथ बांधकर हल्दी-कुंकू से सजाया जाएगा। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में गाड़ों पर सौभाग्य तिलक कर पूजन करेंगी। बड़वा राकेश यादव “खांडेराव-खांडेराव” के जयघोष के साथ गाड़ों को स्पर्श करेंगे और कई टन वजनी गाड़े आगे बढ़ते नजर आएंगे। पूरे मार्ग पर रंगोली और गुलाल से सजावट की जाएगी तथा श्रद्धालु मार्ग के दोनों ओर और मकानों की छतों से इस अद्भुत दृश्य के साक्षी बनेंगे। एकता की मिसाल भी मानी जाती है यह परंपरा हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल भी मानी जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार संत खांडेराव महाराज और उनके मित्र पीर मोईनुद्दीन चिश्ती वर्षों पूर्व भ्रमण करते हुए ठीकरी पहुंचे थे। उन्होंने ग्रामीणों को चमत्कार दिखाकर आपसी भाईचारे और गांव की उन्नति के लिए गाड़ा खिंचाई की परंपरा प्रारंभ करने का संदेश दिया। तभी से यादव परिवार के बड़वा इस आयोजन का निर्वहन करते आ रहे हैं। गोधूलि बेला में बड़वा के कंधा लगते ही गाड़ों का चल पड़ना अलग है गोधूलि बेला में बड़वा के कंधा लगते ही गाड़ों का चल पड़ना श्रद्धालुओं के लिए आस्था और चमत्कार का प्रतीक माना जाता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा सामाजिक समरसता, धार्मिक सद्भाव और सांस्कृतिक धरोहर की अनूठी मिसाल है। 4 मार्च 2026 को एक बार फिर बड़वानी जिले में हजारों लोगों की मौजूदगी में यह ऐतिहासिक दृश्य साकार होगा और गाड़ा खिंचाई की परंपरा पूरे श्रद्धाभाव के साथ निभाई जाएगी।
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    बड़वानी। संत खांडेराव महाराज और फखरुद्दीन बाबा की स्मृति में निभाई जा रही 831 वर्ष पुरानी गाड़ा खिंचाई की ऐतिहासिक परंपरा इस वर्ष 4 मार्च 2026 (धुलेंडी) को गोधूलि बेला में बड़वानी जिला मुख्यालय, ठीकरी, अंजड़ और शहर के नवलपुरा क्षेत्र में श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजित की जाएगी। विक्रम संवत 1252 से निरंतर चली आ रही यह परंपरा आज भी क्षेत्र की आस्था, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक बनी हुई है।
ठीकरी में होगा आयोजन
ठीकरी में आयोजन की शुरुआत पारंपरिक विधि-विधान के साथ होगी। एक दिन पूर्व रात्रि में बाबा खांडेराव महाराज मंदिर से गाड़ों को गाड़ा मैदान लाया जाएगा। धुलेंडी के दिन दोपहर दर्शन के पश्चात मंदिर के पट बंद कर दिए जाएंगे। गोधूलि बेला में बड़वा एडू यादव के बाहर आने पर सारथी उन्हें कंधे पर बैठाकर गाड़ा मैदान तक ले जाएंगे। मलिहार चौक में पारंपरिक मकड़ी यंत्र घुमाने की रस्म निभाई जाएगी। इसके बाद जैसे ही बड़वा चंदन की जोड़ी को कंधे पर धारण कर गाड़ों को स्पर्श करेंगे, रेल की तरह एक-दूसरे से बंधे भारी-भरकम गाड़े स्वतः चल पड़ेंगे। अंतिम गाड़े के तोरण पार करते ही गाड़ा खिंचाई की रस्म पूर्ण मानी जाएगी। नगर परिषद और पुलिस प्रशासन द्वारा सुरक्षा, पार्किंग, पेयजल और भीड़ प्रबंधन के विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं।
अंजड़ में बस स्टैंड से भोंगली नदी पुलिया तक सात गाड़े खींचे जाएंगे
अंजड़ में भी यह आयोजन शाम 6 बजे से बस स्टैंड क्षेत्र में प्रारंभ होगा। बड़वा संतोष धनगर यादव मोहल्ले से ढोल-नगाड़ों के साथ निकलकर हनुमान मंदिर में पूजन-अर्चन करेंगे और आशीर्वाद लेकर आयोजन स्थल पहुंचेंगे। बस स्टैंड से भोंगली नदी पुलिया तक सात गाड़े खींचे जाएंगे। मकड़ी यंत्र घुमाने के बाद बड़वा का कंधा लगते ही गाड़े जयघोष के बीच चल पड़ेंगे। हर वर्ष की तरह इस बार भी हजारों श्रद्धालुओं के उमड़ने की संभावना है।
बड़वानी में होगा अलग माहौल
बड़वानी शहर के नवलपुरा क्षेत्र में इस वर्ष 20वें वर्ष गाड़ा खिंचाई का आयोजन होगा। लगभग 14 से 15 गाड़ों को एक साथ बांधकर हल्दी-कुंकू से सजाया जाएगा। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में गाड़ों पर सौभाग्य तिलक कर पूजन करेंगी। बड़वा राकेश यादव “खांडेराव-खांडेराव” के जयघोष के साथ गाड़ों को स्पर्श करेंगे और कई टन वजनी गाड़े आगे बढ़ते नजर आएंगे। पूरे मार्ग पर रंगोली और गुलाल से सजावट की जाएगी तथा श्रद्धालु मार्ग के दोनों ओर और मकानों की छतों से इस अद्भुत दृश्य के साक्षी बनेंगे।
एकता की मिसाल भी मानी जाती है
यह परंपरा हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल भी मानी जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार संत खांडेराव महाराज और उनके मित्र पीर मोईनुद्दीन चिश्ती वर्षों पूर्व भ्रमण करते हुए ठीकरी पहुंचे थे। उन्होंने ग्रामीणों को चमत्कार दिखाकर आपसी भाईचारे और गांव की उन्नति के लिए गाड़ा खिंचाई की परंपरा प्रारंभ करने का संदेश दिया। तभी से यादव परिवार के बड़वा इस आयोजन का निर्वहन करते आ रहे हैं।
गोधूलि बेला में बड़वा के कंधा लगते ही गाड़ों का चल पड़ना अलग है
गोधूलि बेला में बड़वा के कंधा लगते ही गाड़ों का चल पड़ना श्रद्धालुओं के लिए आस्था और चमत्कार का प्रतीक माना जाता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा सामाजिक समरसता, धार्मिक सद्भाव और सांस्कृतिक धरोहर की अनूठी मिसाल है। 4 मार्च 2026 को एक बार फिर बड़वानी जिले में हजारों लोगों की मौजूदगी में यह ऐतिहासिक दृश्य साकार होगा और गाड़ा खिंचाई की परंपरा पूरे श्रद्धाभाव के साथ निभाई जाएगी।
    user_पत्रकार आदित्य शर्मा बड़वानी
    पत्रकार आदित्य शर्मा बड़वानी
    पत्रकार बड़वानी, बड़वानी, मध्य प्रदेश•
    5 hrs ago
  • Post by Hemant Nagziriya
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    Post by Hemant Nagziriya
    user_Hemant Nagziriya
    Hemant Nagziriya
    News Anchor बड़वानी, बड़वानी, मध्य प्रदेश•
    8 hrs ago
  • देपालपुर के पूर्व विधायक विशाल जगदीश पटेल दुबई में फंसे हुए थे । जो अब सुरक्षित वापस इंदौर लौट आए हैं समर्थकों ने इंदौर एयरपोर्ट पर उनका स्वागत किया ।
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    देपालपुर के पूर्व विधायक विशाल जगदीश पटेल दुबई में फंसे हुए थे ।  जो अब सुरक्षित वापस इंदौर लौट आए हैं समर्थकों ने इंदौर एयरपोर्ट पर उनका स्वागत किया ।
    user_प्रेस क्लब अध्यक्ष बेटमा रणजीत मंडलोई
    प्रेस क्लब अध्यक्ष बेटमा रणजीत मंडलोई
    खबर भारत360 न्यूज Live Depalpur, Indore•
    26 min ago
  • बांसवाड़ा जिले के बोडीगामा कस्बे में होली पर इस बार अनूठा और उत्साहपूर्ण माहौल देखने को मिला। ग्राम पंचायत बोडीगामा के गौड़ बंजारा समाज के पुरुषों ने पारंपरिक होली गीत गाते हुए शानदार लोकनृत्य प्रस्तुत किया। फागण गीतों की मधुर गूंज के साथ समाजजनों ने वर्षों पुरानी परंपरा का निर्वहन किया। रंग, उमंग और लोक संस्कृति से सराबोर यह आयोजन बड़ी धूमधाम और उल्लास के साथ संपन्न हुआ।
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    बांसवाड़ा जिले के बोडीगामा कस्बे में होली पर इस बार अनूठा और उत्साहपूर्ण माहौल देखने को मिला। ग्राम पंचायत बोडीगामा के गौड़ बंजारा समाज के पुरुषों ने पारंपरिक होली गीत गाते हुए शानदार लोकनृत्य प्रस्तुत किया।
फागण गीतों की मधुर गूंज के साथ समाजजनों ने वर्षों पुरानी परंपरा का निर्वहन किया। रंग, उमंग और लोक संस्कृति से सराबोर यह आयोजन बड़ी धूमधाम और उल्लास के साथ संपन्न हुआ।
    user_धर्मेंद्र उपाध्याय
    धर्मेंद्र उपाध्याय
    पत्रकार बांसवाड़ा, बांसवाड़ा, राजस्थान•
    3 hrs ago
  • बड़वानी जिले में मंगलवार को चंद्रग्रहण के प्रभाव के कारण प्रमुख मंदिरों के कपाट अस्थायी रूप से बंद कर दिए गए हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण काल में मंदिरों में पूजा-अर्चना और दर्शन नहीं किए जाते हैं, जिसका पालन करते हुए शहर और ग्रामीण अंचलों के कई प्रसिद्ध मंदिर बंद रखे गए हैं। शहर के वैष्णो देवी मंदिर, श्री सांवरिया सेठ मंदिर, मां कालिका माता मंदिर और संकट मोचन हनुमान मंदिर सहित कई छोटे-बड़े मंदिरों के पट बंद हैं। मंदिर प्रबंधन समितियों ने श्रद्धालुओं को इसकी सूचना पहले ही दे दी थी। मंदिरों के कपाट शाम करीब 7:30 बजे ग्रहण समाप्त होने के बाद खोले जाएंगे। इसके बाद शुद्धिकरण और गंगाजल छिड़काव की विधि-विधान प्रक्रिया के उपरांत नियमित आरती और दर्शन की व्यवस्था बहाल होगी। ग्रहण काल के दौरान श्रद्धालुओं ने अपने घरों में ही जप-तप और पूजा-अर्चना की। कई परिवारों ने ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान और दान की तैयारियां भी की हैं। धार्मिक आस्था के कारण दिनभर मंदिरों के बाहर सन्नाटा पसरा रहा, हालांकि ग्रहण समाप्त होने के बाद शाम को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने की संभावना है। मां कालिका माता मंदिर के पुजारी अशोक पंडित ने बताया कि चंद्रग्रहण का सूतक काल ग्रहण शुरू होने से लगभग 9 घंटे पहले प्रभावी हो जाता है। आज लगने वाला चंद्रग्रहण दोपहर 3:20 बजे से शुरू हो रहा है, जिसके कारण इसका सूतक काल सुबह लगभग 6:20 बजे से ही प्रभावी हो चुका था। इस अवधि में मंदिरों के पट बंद रखे जाते हैं।
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    बड़वानी जिले में मंगलवार को चंद्रग्रहण के प्रभाव के कारण प्रमुख मंदिरों के कपाट अस्थायी रूप से बंद कर दिए गए हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण काल में मंदिरों में पूजा-अर्चना और दर्शन नहीं किए जाते हैं, जिसका पालन करते हुए शहर और ग्रामीण अंचलों के कई प्रसिद्ध मंदिर बंद रखे गए हैं। शहर के वैष्णो देवी मंदिर, श्री सांवरिया सेठ मंदिर, मां कालिका माता मंदिर और संकट मोचन हनुमान मंदिर सहित कई छोटे-बड़े मंदिरों के पट बंद हैं। मंदिर प्रबंधन समितियों ने श्रद्धालुओं को इसकी सूचना पहले ही दे दी थी। मंदिरों के कपाट शाम करीब 7:30 बजे ग्रहण समाप्त होने के बाद खोले जाएंगे। इसके बाद शुद्धिकरण और गंगाजल छिड़काव की विधि-विधान प्रक्रिया के उपरांत नियमित आरती और दर्शन की व्यवस्था बहाल होगी।
ग्रहण काल के दौरान श्रद्धालुओं ने अपने घरों में ही जप-तप और पूजा-अर्चना की। कई परिवारों ने ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान और दान की तैयारियां भी की हैं। धार्मिक आस्था के कारण दिनभर मंदिरों के बाहर सन्नाटा पसरा रहा, हालांकि ग्रहण समाप्त होने के बाद शाम को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने की संभावना है।
मां कालिका माता मंदिर के पुजारी अशोक पंडित ने बताया कि चंद्रग्रहण का सूतक काल ग्रहण शुरू होने से लगभग 9 घंटे पहले प्रभावी हो जाता है। आज लगने वाला चंद्रग्रहण दोपहर 3:20 बजे से शुरू हो रहा है, जिसके कारण इसका सूतक काल सुबह लगभग 6:20 बजे से ही प्रभावी हो चुका था। इस अवधि में मंदिरों के पट बंद रखे जाते हैं।
    user_पत्रकार आदित्य शर्मा बड़वानी
    पत्रकार आदित्य शर्मा बड़वानी
    पत्रकार बड़वानी, बड़वानी, मध्य प्रदेश•
    5 hrs ago
  • सभी देशवासियों को प्रेस क्लब बेटमा की ओर से होली के महापर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं
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    सभी देशवासियों को प्रेस क्लब बेटमा की ओर से होली के महापर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं
    user_प्रेस क्लब अध्यक्ष बेटमा रणजीत मंडलोई
    प्रेस क्लब अध्यक्ष बेटमा रणजीत मंडलोई
    खबर भारत360 न्यूज Live Depalpur, Indore•
    11 hrs ago
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