तीमारदार बाहर एम आर अंदर जिला महिला अस्पताल की ओ पी डी के नियमों का चमत्कार बाँदा। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था के चमकते दावों के बीच जिला महिला अस्पताल बाँदा से एक ऐसा दृश्य सामने आया है, जो व्यवस्था की सच्चाई को बिना बोले ही बयान कर देता है।मामला ओपीडी कक्ष नंबर 26 का है। 13 मार्च 2026 को दोपहर लगभग 12:12 बजे एक महिला मरीज विनीता डॉक्टर को दिखाने पहुंची। मरीज के साथ आए तीमारदार को गार्ड ने तुरंत रोक दिया—कहा गया कि “पुरुषों का अंदर जाना मना है।” नियमों की दुहाई इतनी सख्ती से दी गई मानो अस्पताल अनुशासन का आदर्श मंदिर हो।लेकिन इसी बीच एक दवा कंपनी का एमआर (Medical Representative) पूरे आत्मविश्वास के साथ ओपीडी कक्ष के अंदर प्रवेश कर गया। न कोई रोक, न कोई टोक। अब सवाल उठता है— अगर तीमारदार का अंदर जाना नियम के खिलाफ है, तो एमआर का अंदर जाना किस नियम की किताब में लिखा है? जब इस पूरे मामले को लेकर फोन पर महिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. सुनीता सिंह से बात की गई, तो उनका जवाब भी कम दिलचस्प नहीं था। उन्होंने कहा कि “पुरुषों का अंदर जाना मना है।”लेकिन जब उनसे पूछा गया कि फिर एमआर अंदर कैसे पहुंच गए, तो जवाब देने के बजाय उन्होंने “ओटी में हूँ” कहकर फोन ही काट दिया।अब अस्पताल के गलियारों में लोग तंज कसते हुए पूछ रहे हैं—क्या मरीज और उसके तीमारदार से ज्यादा जरूरी एमआर की मुलाकात होती है? क्या अस्पतालों में इलाज से पहले दवा कंपनियों का ‘प्रोटोकॉल’ पूरा करना जरूरी हो गया है?बाँदा के महिला अस्पताल की यह तस्वीर एक बार फिर वही पुराना सवाल खड़ा कर रही है—क्या नियम सिर्फ आम जनता के लिए हैं, और ‘खास मेहमानों’ के लिए दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं?क्योंकि यहाँ लगता है कि मरीज इंतजार कर सकता है, तीमारदार बाहर खड़ा रह सकता है…लेकिन एमआर का प्रवेश किसी वीआईपी पास से कम नहीं!
तीमारदार बाहर एम आर अंदर जिला महिला अस्पताल की ओ पी डी के नियमों का चमत्कार बाँदा। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था के चमकते दावों के बीच जिला महिला अस्पताल बाँदा से एक ऐसा दृश्य सामने आया है, जो व्यवस्था की सच्चाई को बिना बोले ही बयान कर देता है।मामला ओपीडी कक्ष नंबर 26 का है। 13 मार्च 2026 को दोपहर लगभग 12:12 बजे एक महिला मरीज विनीता डॉक्टर को दिखाने पहुंची। मरीज के साथ आए तीमारदार को गार्ड ने तुरंत रोक दिया—कहा गया कि “पुरुषों का अंदर जाना मना है।” नियमों की दुहाई इतनी सख्ती से दी गई मानो अस्पताल अनुशासन का आदर्श मंदिर हो।लेकिन इसी बीच एक दवा कंपनी का एमआर (Medical Representative) पूरे आत्मविश्वास के साथ ओपीडी कक्ष के अंदर प्रवेश कर गया। न कोई रोक, न कोई टोक। अब सवाल उठता है— अगर तीमारदार का अंदर जाना नियम के खिलाफ है, तो एमआर का अंदर जाना किस नियम की किताब में लिखा है? जब इस पूरे मामले को लेकर फोन पर महिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. सुनीता सिंह से बात की गई, तो उनका जवाब भी कम दिलचस्प नहीं था। उन्होंने कहा कि “पुरुषों का अंदर जाना मना है।”लेकिन जब उनसे पूछा गया कि फिर एमआर अंदर कैसे पहुंच गए, तो जवाब देने के बजाय उन्होंने “ओटी में हूँ” कहकर फोन ही काट दिया।अब अस्पताल के गलियारों में लोग तंज कसते हुए पूछ रहे हैं—क्या मरीज और उसके तीमारदार से ज्यादा जरूरी एमआर की मुलाकात होती है? क्या अस्पतालों में इलाज से पहले दवा कंपनियों का ‘प्रोटोकॉल’ पूरा करना जरूरी हो गया है?बाँदा के महिला अस्पताल की यह तस्वीर एक बार फिर वही पुराना सवाल खड़ा कर रही है—क्या नियम सिर्फ आम जनता के लिए हैं, और ‘खास मेहमानों’ के लिए दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं?क्योंकि यहाँ लगता है कि मरीज इंतजार कर सकता है, तीमारदार बाहर खड़ा रह सकता है…लेकिन एमआर का प्रवेश किसी वीआईपी पास से कम नहीं!
- बाँदा। शहर के मध्य स्थित राइफल क्लब खेल मैदान में प्रस्तावित प्रदर्शनी को लेकर विरोध तेज होता जा रहा है। जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राजेश दीक्षित ने जिलाधिकारी जे. रीभा को मांगपत्र प्रेषित कर इस प्रदर्शनी को तत्काल प्रभाव से रोकने की मांग की है।प्रेषित पत्र में कांग्रेस जिलाध्यक्ष ने कहा कि शहर में खेल प्रेमियों और युवाओं के लिए राइफल क्लब मैदान ही एकमात्र प्रमुख खेल स्थल है, जहां खिलाड़ी विभिन्न खेलों का अभ्यास कर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का सपना संजोते हैं। यहां समय-समय पर खेल प्रतियोगिताएं और प्रशिक्षण शिविर भी आयोजित होते रहते हैं, जिससे युवाओं की प्रतिभा निखरती है। उन्होंने यह भी बताया कि केंद्र सरकार की अग्निवीर योजना के तहत सेना भर्ती की तैयारी करने वाले कई युवा इसी मैदान में शारीरिक अभ्यास करते हैं। ऐसे में इस मैदान में प्रदर्शनी लगाना न केवल खेल गतिविधियों में बाधा उत्पन्न करेगा, बल्कि खिलाड़ियों और युवाओं के साथ अन्याय तथा उनकी प्रतिभा का दमन भी माना जाएगा। राजेश दीक्षित ने प्रशासन से मांग की है कि खेल मैदान का उपयोग केवल खेल गतिविधियों के लिए ही सुनिश्चित किया जाए और प्रस्तावित प्रदर्शनी की अनुमति तुरंत निरस्त की जाए। कांग्रेस जिलाध्यक्ष ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि शीघ्र इस दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो कांग्रेस पार्टी खिलाड़ियों और युवाओं के हित में बड़ा आंदोलन करने को बाध्य होगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।1
- बाँदा :24 घंटे में चोरी का खुलासा नरैनी पुलिस ने शातिर चोर दबोचा1
- Post by Raj dwivedi1
- Post by Mamta chaurasiya1
- बांदा : थाना नरैनी पुलिस टीम द्वारा थाना नरैनी क्षेत्रान्तर्गत बरसडामानपुर में घर का ताला तोड़कर हुई चोरी की घटना का सफल अनावरण करते हुए अभियुक्त को गिरफ्तार किया है । बताया गया कि थाना नरैना क्षेत्र के बरसडामानपुर में पप्पू पुत्र रामसेवक के घर का ताला तोड़कर अज्ञात चोरों द्वारा सोने के जेवरात चोरी करने की घटना को अंजाम दिया गया था । जिसके सम्बन्ध में थाना नरैनी में अभियोग पंजीकृत किया गया कर अभियुक्त की पहचान व गिरफ्तारी हेतु कई टीमों का गठन किया गया था । इसी क्रम में थाना नरैनी पुलिस टीम द्वारा सीसीटीवी कैमरों, वैज्ञानिक व तकनिकी साक्ष्यों का प्रयोग कर अभियुक्तों की पहचान करते हुए मुखबिर की सूचना पर 24 घण्टे के अन्दर लहुटेरा के पास से अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया गया1
- #Apkiawajdigital बुलंदशहर | गुरुवार, 12 मार्च 2026 विशेष संवाददाता कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर बुलंदशहर के एक बुजुर्ग का वीडियो तेजी से वायरल हुआ था। वीडियो में बाबा अपनी पोती शिखा की UPSC परीक्षा में 113वीं रैंक आने की खुशी में फूट-फूटकर रो रहे थे। उस पल को लोगों ने 'संघर्ष की जीत' के रूप में देखा था। लेकिन आज, जब हकीकत सामने आई है, तो वही खुशी के आंसू परिवार के लिए गहरे शर्म और अफसोस का सबब बन गए हैं। धोखे की बुनियाद और टूटता हुआ विश्वास जांच में यह स्पष्ट हो चुका है कि पोती शिखा का यूपीएससी परीक्षा में चयन नहीं हुआ है। असल में, 113वीं रैंक हरियाणा की एक अन्य शिखा ने हासिल की थी, और बुलंदशहर वाली शिखा तो मुख्य परीक्षा (Mains) भी पास नहीं कर सकी थीं। केवल नाम की समानता का लाभ उठाकर किए गए इस दावे ने न केवल प्रशासन की नजर में परिवार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि उस बुजुर्ग बाबा की भावनाओं का भी मजाक बना दिया है, जिन्होंने अपनी पोती की कथित सफलता को अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि माना था। सोशल मीडिया का 'दिखावटी जश्न' और उसका कड़वा सच यह वायरल वीडियो मंगलवार, 10 मार्च 2026 को सामने आया था। उस वक्त बाबा का भावुक चेहरा हर किसी के दिल को छू गया था। लेकिन जब सच सामने आया कि यह सफलता महज एक 'नाम का भ्रम' थी, तो सोशल मीडिया पर लोगों ने इस पूरे घटनाक्रम को 'असंवेदनशील प्रचार' करार दिया है। परिवार पर उठे सवाल सवाल यह उठता है कि क्या केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए एक पूरे परिवार ने बुजुर्ग दादा की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया? बिना रोल नंबर की पुष्टि किए, एक बड़े जश्न का आयोजन करना और उसे सार्वजनिक करना अब बुलंदशहर के इस परिवार पर भारी पड़ रहा है। यह घटना दिखाती है कि कैसे डिजिटल युग में बिना ठोस तथ्यों के किया गया प्रचार, अंततः अपनों के सम्मान को ही दांव पर लगा देता है। आज वह बाबा, जो गर्व से रो रहे थे, सच्चाई सामने आने के बाद शर्मिंदगी के साए में हैं।1
- Post by Mamta chaurasiya1
- #Apkiawajdigital बुलंदशहर | गुरुवार, 12 मार्च 2026 विशेष संवाददाता यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में सफलता का दावा करना एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन बुलंदशहर की एक शिखा के लिए यह उपलब्धि तब 'हास्यास्पद' बन गई जब उन्होंने बिना रोल नंबर मिलान किए ही अपनी जीत का ढोल पीट दिया। खबर यह है कि जिस शिखा ने बड़े ही धूमधाम से अपना विजय जुलूस निकलवाया था, उनका नाम मेरिट लिस्ट में था ही नहीं। जुलूस अब भी निकलेगा, लेकिन शर्म का! सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे बुलंदशहर की शिखा ने यूपीएससी में 113वीं रैंक आने का दावा कर गाजे-बाजे के साथ अपना जुलूस निकलवाया था। मिठाई बांटी गई, ढोल-नगाड़े बजे और पूरे क्षेत्र में उनकी चर्चा होने लगी। लेकिन, अब जब सच्चाई सामने आई है कि वह मुख्य परीक्षा (Mains) में भी उत्तीर्ण नहीं हो सकी थीं, तो सोशल मीडिया पर जनता का गुस्सा फूट पड़ा है। लोग तंज कस रहे हैं कि "जुलूस तो निकलेगा, पर इस बार जीत का नहीं, बल्कि फर्जीवाड़े के शर्म का।" 'नाम की समानता' का लिया सहारा? इस अजीबोगरीब वाकये पर शिखा का बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने सफाई दी कि, "उसका भी नाम शिखा है, मेरा भी। मैंने PDF में सिर्फ नाम देखा, रोल नंबर नहीं।" प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नाम के आधार पर UPSC जैसी परीक्षा में सफलता का दावा करना न केवल लापरवाही है, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की गरिमा को कम करने जैसा है। सच्चाई यह है कि 113वीं रैंक हरियाणा की एक अन्य शिखा ने प्राप्त की है, न कि बुलंदशहर की इस शिखा ने। वायरल वीडियो ने खोली पोल सोशल मीडिया पर उनका जश्न मनाते हुए जो वीडियो मंगलवार, 10 मार्च 2026 को वायरल हुआ था, आज वही वीडियो उनकी फजीहत का कारण बना हुआ है। जहाँ पहले लोग उन्हें बधाई दे रहे थे, वहीं अब उनके इस 'झूठे दावे' को लेकर ट्रोलिंग का सिलसिला जारी है। यह घटना उन सभी उम्मीदवारों के लिए एक बड़ा सबक है जो बिना तथ्यों की पुष्टि किए सोशल मीडिया पर अपनी 'सफलता' का बखान करते हैं। बुलंदशहर की इस घटना ने साबित कर दिया है कि सच्चाई छिपाने से नहीं, बल्कि मेहनत से ही सामने आती है।1
- हमीरपुर जिले की गौशालाओं में गोवंश की लगातार हो रही मौतों और अव्यवस्थाओं को लेकर मामला गरमा गया है। भारतीय श्री राधाकृष्ण गौरक्षा संघ के जिलाध्यक्ष राजा साहू ने जिलाधिकारी को शिकायती पत्र सौंपकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कुछ गौशालाओं में ग्राम प्रधान और संबंधित अधिकारियों की मिलीभगत से गोवंश की उपेक्षा की जा रही है। चारा-पानी की कमी के कारण गोवंश की हालत खराब हो रही है और कई स्थानों पर उनकी मौत की घटनाएं सामने आ रही हैं। गौरक्षा संघ का यह भी आरोप है कि मृत गोवंश के शवों को खुले में फेंक दिया जाता है, जिससे गंभीर लापरवाही उजागर हो रही है। संगठन ने प्रशासन से मांग की है कि गौशालाओं का तत्काल निरीक्षण कराया जाए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।1