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#चम्बा , वायरल खबर: हिमाचल के जोलना गांव से छूटा "दूडूआ" का जादू, राज्य वर्धन का गाना सोशल मीडिया पर मचा रहा धूम! #दूडूआ #Dudua #राज्यवर्धन #RajyaVardhan #हिमाचलीगाना #HimachaliViral #ViralHimachaliSong #Chamba #जोलनागांव #ZorawarHunk #PahadiVibes #HimachalPradesh #लोकगीत #PahadiMusic #ViralReels #हिमाचल_की_शान #ViralSong2026 क्या आपने गाना सुना? कितना पसंद आया? कमेंट में बताएं और शेयर जरूर करें! 🎶🏔️✨

2 hrs ago
user_न्यूज रिपोर्टर
न्यूज रिपोर्टर
Chamba, Himachal Pradesh•
2 hrs ago

#चम्बा , वायरल खबर: हिमाचल के जोलना गांव से छूटा "दूडूआ" का जादू, राज्य वर्धन का गाना सोशल मीडिया पर मचा रहा धूम! #दूडूआ #Dudua #राज्यवर्धन #RajyaVardhan #हिमाचलीगाना #HimachaliViral #ViralHimachaliSong #Chamba #जोलनागांव #ZorawarHunk #PahadiVibes #HimachalPradesh #लोकगीत #PahadiMusic #ViralReels #हिमाचल_की_शान #ViralSong2026 क्या आपने गाना सुना? कितना पसंद आया? कमेंट में बताएं और शेयर जरूर करें! 🎶🏔️✨

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  • Post by न्यूज रिपोर्टर
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    Post by न्यूज रिपोर्टर
    user_न्यूज रिपोर्टर
    न्यूज रिपोर्टर
    Chamba, Himachal Pradesh•
    2 hrs ago
  • Post by Dishant Bramnhotra
    1
    Post by Dishant Bramnhotra
    user_Dishant Bramnhotra
    Dishant Bramnhotra
    Salesperson Chamba, Himachal Pradesh•
    9 hrs ago
  • भदरोया वन रेंज के जंगल में एक तेंदुआ मृत अवस्था में मिलने से वन विभाग में हड कंप मच गया। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम और वेटनरी डॉक्टर मौके पर पहुंचे और शव का निरीक्षण किया। प्रारंभिक जांच में बाहरी चोट के निशान नहीं मिले हैं। अधिकारियों के अनुसार तेंदुए की मौत तीन-चार दिन पहले होने की आशंका है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के वास्तविक कारण स्पष्ट होंगे। आसपास के क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी गई है।
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    भदरोया वन रेंज के जंगल में एक तेंदुआ मृत अवस्था में मिलने से वन विभाग में हड कंप मच गया। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम और वेटनरी डॉक्टर मौके पर पहुंचे और शव का निरीक्षण किया। प्रारंभिक जांच में बाहरी चोट के निशान नहीं मिले हैं। अधिकारियों के अनुसार तेंदुए की मौत तीन-चार दिन पहले होने की आशंका है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के वास्तविक कारण स्पष्ट होंगे। आसपास के क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी गई है।
    user_ASHISH JOURNALIST
    ASHISH JOURNALIST
    its A Digital news website and web tv Kangra, Himachal Pradesh•
    5 hrs ago
  • Post by Amarjeet Thakur
    3
    Post by Amarjeet Thakur
    user_Amarjeet Thakur
    Amarjeet Thakur
    उदयपुर, लाहौल और स्पीति, हिमाचल प्रदेश•
    14 hrs ago
  • हिमाचल प्रदेश के सबसे दुर्गम और नैसर्गिक सौंदर्य से लबालब जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी में इन दिनों 'जुकारू' उत्सव की लहर चल रही है। उत्सव के तीसरे दिन मनाया जाने वाला 'मांगल' (जिसे स्थानीय भाषा में चियालू मेला भी कहा जाता है) पर्व साच गांव सहित पूरी घाटी में पूरी भव्यता के साथ संपन्न हुआ। बर्फ की सफेद चादर ओढ़े पहाड़ों के बीच, रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे ग्रामीणों ने अपनी सदियों पुरानी संस्कृति को जीवंत कर दिया। 1. ब्रह्म मुहूर्त का आध्यात्मिक आरम्भ: पूजा पाठ और शुद्धि। मांगल पर्व का दिन पांगी वासियों के लिए किसी आध्यात्मिक यात्रा से कम नहीं होता। इसकी शुरुआत सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में होती है। कड़ाके की ठंड और शून्य से नीचे के तापमान के बावजूद, ग्रामीण सुबह जल्दी उठकर पारंपरिक स्नान (शुद्धि) करते हैं। * ध्वनि और वातावरण: गांवों की गलियां शंखनाद और लोक वाद्ययंत्रों की पवित्र ध्वनियों से गूंज उठती हैं। * वेशभूषा: महिलाएं अपने विशेष पंगवाली परिधानों और पुश्तैनी चांदी के आभूषणों में सजती हैं, जबकि पुरुष पारंपरिक ऊनी टोपी और चोला पहनकर इस उत्सव की गरिमा बढ़ाते हैं। 2. कुल देव और धरती माता का पूजन: सामूहिक एकता की मिसाल। घरों में पूजा-अर्चना के बाद, ग्रामीण टोलियों के रूप में अपने-अपने 'धरती माता' पूजन स्थलों की ओर प्रस्थान करते हैं। * वंशानुगत आस्था: कई परिवार अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित 'कुल स्थलों' पर जाते हैं, जहाँ पीढ़ियों से पूजा होती आ रही है। * सामुदायिक भावना: साच जैसे गांवों में प्रजामंडल (पूरे गांव का समूह) एक ही स्थान पर एकत्रित होकर सामूहिक पूजा करता है। यह दृश्य आधुनिक युग में भी आपसी भाईचारे और सामुदायिक एकता की एक सशक्त मिसाल पेश करता है। 3. विशेष अनुष्ठान: आटे के बकरे और प्रतीकात्मक समर्पण। पूजा स्थल पर पहुँचते ही सबसे पहले धरती माता का फूलों, अक्षत और धूप-दीप से शृंगार किया जाता है। * पारंपरिक भोग: माता को घर में बने ताजे पूरी, मंडे और सत्तू का भोग लगाया जाता है। * अद्वितीय परंपरा: इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण और रोचक पहलू आटे से बने बकरों की प्रतिमा का अर्पण है। बुजुर्गों के अनुसार, यह 'प्रतीकात्मक बलि' प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवों के प्रति दया भाव का संदेश देती है। यह इस विश्वास का प्रतीक है कि मनुष्य अपनी फसल और पशुधन की रक्षा के लिए ईश्वर को अपना सर्वस्व समर्पित करता है। 4. कृषि चक्र की औपचारिक शुरुआत: बर्फ के बीच उम्मीदों की बुआई। पांगी घाटी में सर्दियाँ लंबी और कठिन होती हैं, जहाँ खेती के लिए वर्ष में केवल एक ही अवसर (सीजन) मिलता है। 'मांगल' पर्व इसी कृषि चक्र के आगमन का शंखनाद है। * प्रतीकात्मक हल: पूजा के पश्चात किसान अपने पारंपरिक लकड़ी के हल और औजारों के साथ खेतों में उतरते हैं। * बीज वपन: प्रतीकात्मक रूप से खेत जोतकर बीज बोए जाते हैं। यह रस्म केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता और कठिन परिस्थितियों में भी श्रम करने के जज्बे को दर्शाती है। 5. लोकनृत्य 'पंगवाली नाटी' और संगीत का उल्लास। दोपहर के समय पूरी घाटी उत्सव के रंग में रंग जाती है। ढोल, नगाड़े और स्थानीय वाद्ययंत्रों की थाप पर पुरुष और महिलाएं पंगवाली नाटी (लोकनृत्य) करते हैं। * नृत्य की शैली: महिलाएं एक-दूसरे का हाथ थामकर गोल घेरा बनाती हैं और धीमी लय से शुरू होकर तीव्र गति तक नृत्य करती हैं। * युवा पीढ़ी की भागीदारी: इस वर्ष के उत्सव में युवाओं और बच्चों का भारी उत्साह देखा गया, जो यह दर्शाता है कि आधुनिकता की दौड़ में भी पांगी की सांस्कृतिक जड़ें बेहद गहरी और सुरक्षित हैं। अंत में कह सकते है: संस्कृति और प्रकृति का अटूट बंधन। जुकारू का यह मांगल पर्व सिद्ध करता है कि पांगी के लोग अपनी जमीन को केवल 'मिट्टी' नहीं, बल्कि 'माता' मानते हैं। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, जीव दया और सामुदायिक सहयोग का एक ऐसा उत्कृष्ट उदाहरण है जिसे पूरी दुनिया को देखना चाहिए। कठिन भूगोल और आधुनिक सुविधाओं के अभाव के बावजूद, पांगी की यह जीवंत संस्कृति आज भी हिमाचल के गौरव को बढ़ा रही है।
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    हिमाचल प्रदेश के सबसे दुर्गम और नैसर्गिक सौंदर्य से लबालब जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी में इन दिनों 'जुकारू' उत्सव की लहर चल रही है। उत्सव के तीसरे दिन मनाया जाने वाला 'मांगल' (जिसे स्थानीय भाषा में चियालू मेला भी कहा जाता है) पर्व साच गांव सहित पूरी घाटी में पूरी भव्यता के साथ संपन्न हुआ। बर्फ की सफेद चादर ओढ़े पहाड़ों के बीच, रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे ग्रामीणों ने अपनी सदियों पुरानी संस्कृति को जीवंत कर दिया।
1. ब्रह्म मुहूर्त का आध्यात्मिक आरम्भ: पूजा पाठ और शुद्धि।
मांगल पर्व का दिन पांगी वासियों के लिए किसी आध्यात्मिक यात्रा से कम नहीं होता। इसकी शुरुआत सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में होती है। कड़ाके की ठंड और शून्य से नीचे के तापमान के बावजूद, ग्रामीण सुबह जल्दी उठकर पारंपरिक स्नान (शुद्धि) करते हैं।
* ध्वनि और वातावरण: गांवों की गलियां शंखनाद और लोक वाद्ययंत्रों की पवित्र ध्वनियों से गूंज उठती हैं।
* वेशभूषा: महिलाएं अपने विशेष पंगवाली परिधानों और पुश्तैनी चांदी के आभूषणों में सजती हैं, जबकि पुरुष पारंपरिक ऊनी टोपी और चोला पहनकर इस उत्सव की गरिमा बढ़ाते हैं।
2. कुल देव और धरती माता का पूजन: सामूहिक एकता की मिसाल।
घरों में पूजा-अर्चना के बाद, ग्रामीण टोलियों के रूप में अपने-अपने 'धरती माता' पूजन स्थलों की ओर प्रस्थान करते हैं।
* वंशानुगत आस्था: कई परिवार अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित 'कुल स्थलों' पर जाते हैं, जहाँ पीढ़ियों से पूजा होती आ रही है।
* सामुदायिक भावना: साच जैसे गांवों में प्रजामंडल (पूरे गांव का समूह) एक ही स्थान पर एकत्रित होकर सामूहिक पूजा करता है। यह दृश्य आधुनिक युग में भी आपसी भाईचारे और सामुदायिक एकता की एक सशक्त मिसाल पेश करता है।
3. विशेष अनुष्ठान: आटे के बकरे और प्रतीकात्मक समर्पण।
पूजा स्थल पर पहुँचते ही सबसे पहले धरती माता का फूलों, अक्षत और धूप-दीप से शृंगार किया जाता है।
* पारंपरिक भोग: माता को घर में बने ताजे पूरी, मंडे और सत्तू का भोग लगाया जाता है।
* अद्वितीय परंपरा: इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण और रोचक पहलू आटे से बने बकरों की प्रतिमा का अर्पण है। बुजुर्गों के अनुसार, यह 'प्रतीकात्मक बलि' प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवों के प्रति दया भाव का संदेश देती है। यह इस विश्वास का प्रतीक है कि मनुष्य अपनी फसल और पशुधन की रक्षा के लिए ईश्वर को अपना सर्वस्व समर्पित करता है।
4. कृषि चक्र की औपचारिक शुरुआत: बर्फ के बीच उम्मीदों की बुआई।
पांगी घाटी में सर्दियाँ लंबी और कठिन होती हैं, जहाँ खेती के लिए वर्ष में केवल एक ही अवसर (सीजन) मिलता है। 'मांगल' पर्व इसी कृषि चक्र के आगमन का शंखनाद है।
* प्रतीकात्मक हल: पूजा के पश्चात किसान अपने पारंपरिक लकड़ी के हल और औजारों के साथ खेतों में उतरते हैं।
* बीज वपन: प्रतीकात्मक रूप से खेत जोतकर बीज बोए जाते हैं। यह रस्म केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता और कठिन परिस्थितियों में भी श्रम करने के जज्बे को दर्शाती है।
5. लोकनृत्य 'पंगवाली नाटी' और संगीत का उल्लास।
दोपहर के समय पूरी घाटी उत्सव के रंग में रंग जाती है। ढोल, नगाड़े और स्थानीय वाद्ययंत्रों की थाप पर पुरुष और महिलाएं पंगवाली नाटी (लोकनृत्य) करते हैं।
* नृत्य की शैली: महिलाएं एक-दूसरे का हाथ थामकर गोल घेरा बनाती हैं और धीमी लय से शुरू होकर तीव्र गति तक नृत्य करती हैं।
* युवा पीढ़ी की भागीदारी: इस वर्ष के उत्सव में युवाओं और बच्चों का भारी उत्साह देखा गया, जो यह दर्शाता है कि आधुनिकता की दौड़ में भी पांगी की सांस्कृतिक जड़ें बेहद गहरी और सुरक्षित हैं।
अंत में कह सकते है: संस्कृति और प्रकृति का अटूट बंधन।
जुकारू का यह मांगल पर्व सिद्ध करता है कि पांगी के लोग अपनी जमीन को केवल 'मिट्टी' नहीं, बल्कि 'माता' मानते हैं। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, जीव दया और सामुदायिक सहयोग का एक ऐसा उत्कृष्ट उदाहरण है जिसे पूरी दुनिया को देखना चाहिए। कठिन भूगोल और आधुनिक सुविधाओं के अभाव के बावजूद, पांगी की यह जीवंत संस्कृति आज भी हिमाचल के गौरव को बढ़ा रही है।
    user_PANGI NEWS 24
    PANGI NEWS 24
    Social Media Manager Pangi, Chamba•
    3 hrs ago
  • Post by इन्दौरा रिपोर्टर
    3
    Post by इन्दौरा रिपोर्टर
    user_इन्दौरा रिपोर्टर
    इन्दौरा रिपोर्टर
    Stationery Shop इंदोरा, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश•
    4 hrs ago
  • चम्बा में संकटग्रस्त हिमालयी वन्यजीवों की निगरानी पर विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला शुरू सुरेंद्र ठाकुर चम्बा, 20 फरवरी: बचत भवन चम्बा में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण और हिमाचल प्रदेश वन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में एक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। यह कार्यशाला भारतीय हिमालयी क्षेत्र के संकटग्रस्त स्तनधारी जीवों की निगरानी विषय पर आधारित है, जिसमें चम्बा वन वृत्त के अधिकारियों और फ्रंटलाइन स्टाफ ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि वन अरण्यपाल चम्बा राकेश कुमार ने किया। उन्होंने वन्यजीव संरक्षण में साक्ष्य-आधारित निर्णय, वैज्ञानिक अनुसंधान और वन्यजीव फॉरेंसिक की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि वन्यजीव अपराधों की रोकथाम और जैव विविधता की सुरक्षा में फ्रंटलाइन स्टाफ की भूमिका सबसे अहम है। विशिष्ट अतिथि डी.एफ.ओ. वाइल्डलाइफ डॉ. कुलदीप सिंह जमवाल ने वन विभाग, अनुसंधान संस्थानों और स्थानीय समुदायों के बीच समन्वय को संरक्षण की सफलता की कुंजी बताया। सेवानिवृत्त प्राचार्य डॉ. बिपन राठौर ने राष्ट्रीय संस्थानों के साथ मिलकर चम्बा के पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षित रखने का आह्वान किया। कार्यक्रम समन्वयक डॉ. ललित कुमार शर्मा ने एन.एच.एम.एस. द्वारा वित्तपोषित परियोजना की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने चेताया कि हिमालयी क्षेत्रों में कई स्तनधारी प्रजातियों की संख्या तेजी से घट रही है, जिसके लिए तत्काल वैज्ञानिक हस्तक्षेप आवश्यक है। डॉ. अमीरा शरीफ ने वन्यजीव गलियारों और परिदृश्य जुड़ाव के महत्व पर प्रकाश डाला, जबकि डॉ. विनीत राणा ने चम्बा में चल रही फील्ड गतिविधियों और निगरानी उपकरणों की जानकारी साझा की। डॉ. रितम दत्ता ने वन्यजीव संरक्षण में जी.आई.एस. और रिमोट सेंसिंग तकनीकों के उपयोग पर व्याख्यान दिया। सत्र के दौरान शोधकर्ता अंकित कश्यप और संजय शर्मा ने प्रतिभागियों को फील्ड में उपयोग होने वाले उपकरणों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। इसमें कैमरा ट्रैप स्थापित करना, जी.पी.एस. और कंपास का प्रयोग, ट्रेल सर्वे तथा वनस्पति नमूनाकरण जैसी तकनीकों का प्रशिक्षण शामिल रहा, ताकि वन्यजीवों से संबंधित आंकड़ों का सटीक संकलन सुनिश्चित किया जा सके। इस कार्यशाला में चम्बा सर्किल के 50 से अधिक वन कर्मियों ने भाग लेकर प्रशिक्षण का लाभ उठाया।
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    चम्बा में संकटग्रस्त हिमालयी वन्यजीवों की निगरानी पर विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला शुरू
सुरेंद्र ठाकुर 
चम्बा, 20 फरवरी:
बचत भवन चम्बा में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण और हिमाचल प्रदेश वन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में एक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। यह कार्यशाला भारतीय हिमालयी क्षेत्र के संकटग्रस्त स्तनधारी जीवों की निगरानी विषय पर आधारित है, जिसमें चम्बा वन वृत्त के अधिकारियों और फ्रंटलाइन स्टाफ ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि वन अरण्यपाल चम्बा राकेश कुमार ने किया। उन्होंने वन्यजीव संरक्षण में साक्ष्य-आधारित निर्णय, वैज्ञानिक अनुसंधान और वन्यजीव फॉरेंसिक की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि वन्यजीव अपराधों की रोकथाम और जैव विविधता की सुरक्षा में फ्रंटलाइन स्टाफ की भूमिका सबसे अहम है।
विशिष्ट अतिथि डी.एफ.ओ. वाइल्डलाइफ डॉ. कुलदीप सिंह जमवाल ने वन विभाग, अनुसंधान संस्थानों और स्थानीय समुदायों के बीच समन्वय को संरक्षण की सफलता की कुंजी बताया। सेवानिवृत्त प्राचार्य डॉ. बिपन राठौर ने राष्ट्रीय संस्थानों के साथ मिलकर चम्बा के पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षित रखने का आह्वान किया।
कार्यक्रम समन्वयक डॉ. ललित कुमार शर्मा ने एन.एच.एम.एस. द्वारा वित्तपोषित परियोजना की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने चेताया कि हिमालयी क्षेत्रों में कई स्तनधारी प्रजातियों की संख्या तेजी से घट रही है, जिसके लिए तत्काल वैज्ञानिक हस्तक्षेप आवश्यक है।
डॉ. अमीरा शरीफ ने वन्यजीव गलियारों और परिदृश्य जुड़ाव के महत्व पर प्रकाश डाला, जबकि डॉ. विनीत राणा ने चम्बा में चल रही फील्ड गतिविधियों और निगरानी उपकरणों की जानकारी साझा की। डॉ. रितम दत्ता ने वन्यजीव संरक्षण में जी.आई.एस. और रिमोट सेंसिंग तकनीकों के उपयोग पर व्याख्यान दिया।
सत्र के दौरान शोधकर्ता अंकित कश्यप और संजय शर्मा ने प्रतिभागियों को फील्ड में उपयोग होने वाले उपकरणों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। इसमें कैमरा ट्रैप स्थापित करना, जी.पी.एस. और कंपास का प्रयोग, ट्रेल सर्वे तथा वनस्पति नमूनाकरण जैसी तकनीकों का प्रशिक्षण शामिल रहा, ताकि वन्यजीवों से संबंधित आंकड़ों का सटीक संकलन सुनिश्चित किया जा सके।
इस कार्यशाला में चम्बा सर्किल के 50 से अधिक वन कर्मियों ने भाग लेकर प्रशिक्षण का लाभ उठाया।
    user_Surender Thakur
    Surender Thakur
    Social Media Manager पांगी, चंबा, हिमाचल प्रदेश•
    5 hrs ago
  • Post by इन्दौरा रिपोर्टर
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    Post by इन्दौरा रिपोर्टर
    user_इन्दौरा रिपोर्टर
    इन्दौरा रिपोर्टर
    Stationery Shop इंदोरा, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश•
    5 hrs ago
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