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सोनीपत पुलिस की फुट पेट्रोलिंग जारी, एसीपी गन्नौर ऋषिकांत के नेतृत्व में शहर में निकाला गया पैदल मार्च! सहायक पुलिस आयुक्त गन्नौर ऋषिकांत के नेतृत्व में गन्नौर शहर के प्रमुख बाजारों एवं भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में व्यापक पैदल मार्च किया गया। इस दौरान पुलिस टीम ने क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया तथा आमजन के साथ संवाद स्थापित कर उनकी समस्याओं को भी सुना। पैदल मार्च के दौरान सड़कों पर अवैध रूप से वाहन खड़े करने वाले चालकों को समझाइश देकर वाहन हटवाए गए। साथ ही सड़क पर अतिक्रमण करने वाले व्यक्तियों को भविष्य में अतिक्रमण न करने की सख्त हिदायत दी गई। पुलिस अधिकारियों ने नागरिकों से यातायात नियमों का पालन करने, सार्वजनिक स्थलों पर अनुशासन बनाए रखने एवं कानून-व्यवस्था कायम रखने में पुलिस का सहयोग करने की अपील की।
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सोनीपत पुलिस की फुट पेट्रोलिंग जारी, एसीपी गन्नौर ऋषिकांत के नेतृत्व में शहर में निकाला गया पैदल मार्च! सहायक पुलिस आयुक्त गन्नौर ऋषिकांत के नेतृत्व में गन्नौर शहर के प्रमुख बाजारों एवं भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में व्यापक पैदल मार्च किया गया। इस दौरान पुलिस टीम ने क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया तथा आमजन के साथ संवाद स्थापित कर उनकी समस्याओं को भी सुना। पैदल मार्च के दौरान सड़कों पर अवैध रूप से वाहन खड़े करने वाले चालकों को समझाइश देकर वाहन हटवाए गए। साथ ही सड़क पर अतिक्रमण करने वाले व्यक्तियों को भविष्य में अतिक्रमण न करने की सख्त हिदायत दी गई। पुलिस अधिकारियों ने नागरिकों से यातायात नियमों का पालन करने, सार्वजनिक स्थलों पर अनुशासन बनाए रखने एवं कानून-व्यवस्था कायम रखने में पुलिस का सहयोग करने की अपील की।
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- मीडिया के जमीर से जनता का सवाल: "हम किसके रक्षक और काहे के पत्रकार, जब अपनों की चोट पर ही हम लाचार?" कुरुक्षेत्र की चौपालों से गूंजा कड़वा सच— "जो पत्रकार अपनों के साथ नहीं खड़ा, वो जनता की लड़ाई क्या लड़ेगा?" कुरुक्षेत्र (India News 9 Live): आज कुरुक्षेत्र की जागरूक जनता ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया को वह आईना दिखाया है जिसमें चेहरा देखना शायद हर पत्रकार के लिए मुश्किल होगा। जनता ने किसी राजनेता से नहीं, बल्कि सीधा पत्रकारों की बिरादरी से पूछा है कि आप किसका प्रचार कर रहे हैं और किसकी ढाल बन रहे हैं? आईने के सामने खड़े मीडिया से जनता के सीधे सवाल: लाचार पत्रकार या सरकारी प्रचारक? जनता पूछ रही है कि जब सच दिखाने वाले एक पत्रकार के परिवार को निशाना बनाया जाता है, उसे डराया-धमकाया जाता है, तो बाकी पत्रकार चुप क्यों रहते हैं? क्या हम वाकई जनता की आवाज़ हैं या सिर्फ सत्ता के गुणगान का जरिया बन कर रह गए हैं? अपनों की बेरुखी और जनता का अविश्वास: ग्रामीणों का कहना है कि जब पत्रकार ही पत्रकार के अधिकार के लिए साथ खड़ा नहीं होता, तो आम आदमी किस पर भरोसा करे? " काहे की भ्रष्टाचार विरोधी सरकार और काहे के फिर पत्रकार, जब हम ही हैं लाचार"—यह जुमला आज हर उस शख्स की ज़ुबान पर है जो मीडिया को उम्मीद की नज़रों से देखता था। भ्रष्टाचार पर मौन क्यों? फैमिली आईडी की गड़बड़ी से डेढ़ साल तक तड़पते गरीब और कटे हुए राशन कार्डों पर मीडिया का एक बड़ा हिस्सा खामोश क्यों है? क्या अधिकारियों के गैर-जिम्मेदार रवैये को उजागर करना अब पत्रकारों के एजेंडे में नहीं रहा? रक्षक या भक्षक की मंशा? जो लोग चौथे स्तंभ को टारगेट कर रहे हैं, वे हमारे बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेल रहे हैं। जनता पूछ रही है कि क्या मीडिया इन 'क्रिमिनल माइंडसेट' वाले लोगों के खिलाफ खड़ा होने का साहस दिखाएगा? निष्कर्ष: जनता की खरी-खरी अब वक्त आ गया है कि मीडिया अपनी भूमिका को फिर से पहचाने। जनता का साफ संदेश है—वोट मांगने वाले चेहरे पुराने हो सकते हैं, लेकिन अगर उन्हें आइना दिखाने वाला पत्रकार ही डर गया या बिक गया, तो लोकतंत्र का भविष्य क्या होगा? मीडिया के आत्ममंथन की एक रिपोर्ट— विशाल शर्मा (Freelancer Journalist Researcher) जनता की आवाज1
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