ओटीपी के जाल में फंसी आम जनता, हर सदस्य के लिए मोबाइल खरीदना बना मजबूरी सरकारी योजनाओं, स्कूलों के दस्तावेज, छात्रवृत्ति, समग्र आईडी और बैंकिंग कार्यों में मोबाइल ओटीपी की अनिवार्यता ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। हालात ऐसे हो गए हैं कि अब एक परिवार को हर सदस्य के नाम पर अलग मोबाइल और सिम लेना पड़ रहा है। ग्रामीण और गरीब परिवारों में जहां दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल है, वहां अब हर महीने महंगे मोबाइल रिचार्ज कराना नई मुसीबत बन गया है। सरकार की डिजिटल व्यवस्था का बोझ सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है। लोगों का कहना है कि पहले एक मोबाइल नंबर से पूरे परिवार का काम चल जाता था, लेकिन अब हर दस्तावेज में अलग नंबर और ओटीपी की मांग की जा रही है। नेटवर्क न आने, ओटीपी देर से पहुंचने और नंबर लिंक न होने जैसी समस्याओं से लोग घंटों परेशान हो रहे हैं।सबसे ज्यादा दिक्कत ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिल रही है, जहां कई परिवार आज भी साधारण मोबाइल या सीमित संसाधनों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। मजबूरी में लोग कर्ज लेकर मोबाइल खरीद रहे हैं और हर महीने रिचार्ज का अतिरिक्त बोझ उठा रहे हैं। आम जनता सवाल उठा रही है कि क्या डिजिटल इंडिया का मतलब अब हर व्यक्ति के हाथ में अलग मोबाइल थमाना है? आखिर सरकार कब तक आम आदमी पर इस तरह का आर्थिक बोझ डालती रहेगी?
ओटीपी के जाल में फंसी आम जनता, हर सदस्य के लिए मोबाइल खरीदना बना मजबूरी सरकारी योजनाओं, स्कूलों के दस्तावेज, छात्रवृत्ति, समग्र आईडी और बैंकिंग कार्यों में मोबाइल ओटीपी की अनिवार्यता ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। हालात ऐसे हो गए हैं कि अब एक परिवार को हर सदस्य के नाम पर अलग मोबाइल और सिम लेना पड़ रहा है। ग्रामीण और गरीब परिवारों में जहां दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल है, वहां अब हर महीने महंगे मोबाइल रिचार्ज कराना नई मुसीबत बन गया है। सरकार की डिजिटल व्यवस्था का बोझ सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है। लोगों का कहना है कि पहले एक मोबाइल नंबर से पूरे परिवार का काम चल जाता था, लेकिन अब हर दस्तावेज में अलग नंबर और ओटीपी की मांग की जा रही है। नेटवर्क न आने, ओटीपी देर से पहुंचने और नंबर लिंक न होने जैसी समस्याओं से लोग घंटों परेशान हो रहे हैं।सबसे ज्यादा दिक्कत ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिल रही है, जहां कई परिवार आज भी साधारण मोबाइल या सीमित संसाधनों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। मजबूरी में लोग कर्ज लेकर मोबाइल खरीद रहे हैं और हर महीने रिचार्ज का अतिरिक्त बोझ उठा रहे हैं। आम जनता सवाल उठा रही है कि क्या डिजिटल इंडिया का मतलब अब हर व्यक्ति के हाथ में अलग मोबाइल थमाना है? आखिर सरकार कब तक आम आदमी पर इस तरह का आर्थिक बोझ डालती रहेगी?
- कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में मात्र 15 दिनों में 6 बाघों की संदिग्ध मौत के बाद पत्रकारों ने अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है। वे कान्हा प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए, उसे हटाने और इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।1
- विकास कार्यों की समीक्षा, प्रभारी मंत्री ने अधिकारियों को दिए निर्देश डिंडौरी कलेक्ट्रेट सभागार में जिले की प्रभारी मंत्री प्रतिमा बागरी ने विकास कार्यों को लेकर समीक्षा बैठक की। बैठक में सभी विभागों के कार्यों की जानकारी लेते हुए अधिकारियों को जरूरी निर्देश दिए गए। इस दौरान जिले में चल रहे नवाचार और योजनाओं की प्रगति पर भी चर्चा हुई। प्रभारी मंत्री ने “जल गंगा अभियान” में देशभर में पहला स्थान मिलने पर जिले के अधिकारियों और कर्मचारियों को बधाई दी। बैठक में जनप्रतिनिधि और सभी विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।1
- बिजली पोल केवल लाइन बदलने वाले ठेकेदार की अनदेखा करना यह वीडियो ग्राम पंचायत पिपरिया कला की पोषक ग्राम बिजोरी की हैं बिजली ठेकेदार की मनमानी1
- पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा ‘स्टीफन’ को लेकर लिए जाने वाले एक महत्वपूर्ण निर्णय पर सस्पेंस बरकरार है। उनकी चुप्पी ने राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है, जिसके राष्ट्रीय राजनीति पर गहरे प्रभाव की संभावना है।1
- खबर: ग्राम पंचायत भीरा में नाली निर्माण में मानकों की अनदेखी, भ्रष्टाचार की बू बोड़ला - भीरा (कबीरधाम): ग्राम पंचायत भीरा में सरकारी धन की लूट का एक ऐसा मामला सामने आया है जहाँ भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए कायदे-कानूनों की धज्जियां उड़ा दी गईं। ₹8.36 लाख की लागत से बन रही नाली में जब अनियमितता का मामला सामने आया तो जिम्मेदार अधिकारियों ने जाँच करने के बजाय ठेका एजेंसी को काम 'रफा-दफा' करने का मौका दे दिया। *जाँच का दिखावा और भ्रष्टाचार की ढाल* हैरानी की बात यह है कि जब इस घटिया निर्माण की जानकारी कार्यक्रम अधिकारी और इंजीनियर को दी गई, तब कार्य प्रगति पर था। तकनीकी तौर पर गड़बड़ी दिखने के बावजूद अधिकारियों ने काम रुकवाने के बजाय "जाँच करेंगे" का रटा-रटाया जवाब दिया। लेकिन हकीकत में जाँच की टीम पहुँचने से पहले ही आनन-फानन में निर्माण कार्य को पूर्ण (Finish) कर दिया गया, ताकि घटिया सरिया और खराब बेस कंक्रीट के नीचे दब जाए और सबूत मिटाया जा सके। *क्यों उठ रहे हैं मिलीभगत के सवाल?* स्वयं एजेंसी, स्वयं निर्णायक: चूँकि कार्य एजेंसी स्वयं ग्राम पंचायत है, इसलिए निगरानी की जिम्मेदारी तकनीकी सहायक और इंजीनियर की थी। जाँच से पहले काम का पूरा होना यह दर्शाता है कि इंजीनियर और पंचायत के बीच अंदरूनी सांठगांठ है। सबूत मिटाने की जल्दी: नाली के बेस में सरिया की दूरी मानकों से कई गुना अधिक थी और जमीन की सफाई भी नहीं की गई थी। इन कमियों को छिपाने के लिए ही कंक्रीट डालकर काम खत्म कर दिया गया। लाखों का बंदरबांट: सूचना पटल के अनुसार सामग्री के लिए आवंटित ₹7.30 लाख का बड़ा हिस्सा गुणवत्ता के नाम पर बलि चढ़ा दिया गया है। तकनीकी खामियां जो भविष्य में बनेंगी मुसीबत: मजबूती शून्य: सरिया के जाल में इतनी दूरी है कि भारी वाहन या पानी के दबाव से नाली बीच से टूट जाएगी। जल्द आएगी दरार: मिट्टी और कचरे के ऊपर कंक्रीट डालने के कारण जमीन और स्लैब के बीच पकड़ नहीं बनी है। सरकारी धन की बर्बादी: बिना उचित 'कवर ब्लॉक' और सही 'ग्रेड' के कंक्रीट के, यह नाली अपनी अनुमानित उम्र का 10% समय भी नहीं निकाल पाएगी। ग्रामीणों का आक्रोश और मुख्य सवाल: क्या इंजीनियर और अधिकारी ने जानबूझकर ठेकेदार/पंचायत को सबूत छिपाने का समय दिया? जाँच से पहले ही कार्य पूर्ण कैसे मान लिया गया? क्या जिला प्रशासन इस 'दबाए गए' भ्रष्टाचार की खुदाई करवाकर वास्तविक गुणवत्ता की जाँच कराएगा? निष्कर्ष: ग्राम पंचायत भीरा का यह मामला केवल एक नाली निर्माण नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का एक संगठित मॉडल है। ग्रामीणों ने अब जिला कलेक्टर और उच्चाधिकारियों से मांग की है कि इस कार्य का 'क्वालिटी ऑडिट' कराया जाए और दोषियों पर गबन का मामला दर्ज हो। भीरा की जनता पूछ रही है—साहब, जाँच होने वाली थी या खेल होने वाला था?1
- जबलपुर क्षेत्र के होटल में महिला की हत्या दमोह निवासी युवक के साथ आई थी महिला, पुलिस जाच में जुटी1
- ओटीपी के जाल में फंसी आम जनता, हर सदस्य के लिए मोबाइल खरीदना बना मजबूरी सरकारी योजनाओं, स्कूलों के दस्तावेज, छात्रवृत्ति, समग्र आईडी और बैंकिंग कार्यों में मोबाइल ओटीपी की अनिवार्यता ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। हालात ऐसे हो गए हैं कि अब एक परिवार को हर सदस्य के नाम पर अलग मोबाइल और सिम लेना पड़ रहा है। ग्रामीण और गरीब परिवारों में जहां दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल है, वहां अब हर महीने महंगे मोबाइल रिचार्ज कराना नई मुसीबत बन गया है। सरकार की डिजिटल व्यवस्था का बोझ सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है। लोगों का कहना है कि पहले एक मोबाइल नंबर से पूरे परिवार का काम चल जाता था, लेकिन अब हर दस्तावेज में अलग नंबर और ओटीपी की मांग की जा रही है। नेटवर्क न आने, ओटीपी देर से पहुंचने और नंबर लिंक न होने जैसी समस्याओं से लोग घंटों परेशान हो रहे हैं।सबसे ज्यादा दिक्कत ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिल रही है, जहां कई परिवार आज भी साधारण मोबाइल या सीमित संसाधनों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। मजबूरी में लोग कर्ज लेकर मोबाइल खरीद रहे हैं और हर महीने रिचार्ज का अतिरिक्त बोझ उठा रहे हैं। आम जनता सवाल उठा रही है कि क्या डिजिटल इंडिया का मतलब अब हर व्यक्ति के हाथ में अलग मोबाइल थमाना है? आखिर सरकार कब तक आम आदमी पर इस तरह का आर्थिक बोझ डालती रहेगी?1
- मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले में बिलगढ़ा बांध के पास नियमों की अनदेखी कर विस्फोटक का इस्तेमाल कर निर्माण कार्य जारी है। ग्रामीणों का आरोप है कि बिना सुरक्षा इंतजाम के लगातार धमाकों से इलाके में हादसे का खतरा और दहशत का माहौल है। जल संसाधन विभाग के काम रोकने के निर्देश और पूर्व में दर्ज FIR के बावजूद यह कार्य जारी है।1
- अमेरिका द्वारा 'ख़ेमनई' को 'शहीद' करने के दावे पर एक बड़ा बयान सामने आया है। इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल पैदा कर दी है, जिससे वैश्विक राजनीति में नए समीकरण बन रहे हैं।1