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एक्टर अमिताभ बच्चन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो साझा किया है, जिसमें पुणे महापालिका के कर्मचारी बारिश के बीच डिवाइडर पर लगे पेड़-पौधों को पानी देते दिख रहे हैं। इस वीडियो के साथ अमिताभ बच्चन ने अपने कैप्शन में लिखा, 'तब त्राहि त्राहि मची हुई थी; अब त्राहि त्राहि मची हुई है', जो स्थिति पर उनके व्यंग्य और अवलोकन को दर्शाता है।
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एक्टर अमिताभ बच्चन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो साझा किया है, जिसमें पुणे महापालिका के कर्मचारी बारिश के बीच डिवाइडर पर लगे पेड़-पौधों को पानी देते दिख रहे हैं। इस वीडियो के साथ अमिताभ बच्चन ने अपने कैप्शन में लिखा, 'तब त्राहि त्राहि मची हुई थी; अब त्राहि त्राहि मची हुई है', जो स्थिति पर उनके व्यंग्य और अवलोकन को दर्शाता है।
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- अफगानिस्तान क्रिकेट को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले शापूर ज़ादरान का इंतक़ाल हो गया है। लंबे समय से एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे शापूर ज़ादरान ने मंगलवार को अंतिम सांस ली। अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने सोशल मीडिया के माध्यम से उनके निधन की जानकारी साझा की है।1
- भोपाल स्थित जनता कॉलोनी E-6 में कान्हा टावर क्षेत्र के करीब दाना पानी रोड मौजूद है।1
- सोशल मीडिया पर एक अत्यंत भावुक कर देने वाला वीडियो तेज़ी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक गिलहरी को मंदिर के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए देखा जा सकता है। इस अद्वितीय दृश्य ने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। श्रद्धा से ओत-प्रोत इस वीडियो को देखकर अनेकों लोग भावुक हो रहे हैं और अपनी प्रतिक्रियाएँ साझा कर रहे हैं।1
- मध्य प्रदेश में वक्फ कानून 2026 को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और सियासत तेज हो गई है। कांग्रेस नेता जहीर खान ने इस कानून के संबंध में केंद्र और राज्य सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने वक्फ बोर्ड और मंदिर समितियों की संरचना को लेकर अपनी बात रखते हुए कहा कि सरकार का यह फैसला मुस्लिम समाज की भावनाओं से सीधा जुड़ा है। वक्फ कानून 2026 लागू होने के बाद अपनी प्रतिक्रिया देते हुए जहीर खान ने केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार से पूछा कि यदि देश के बड़े मंदिर समितियों में कभी किसी मुस्लिम सदस्य को शामिल करने का प्रस्ताव नहीं रखा जाता, तो फिर वक्फ से जुड़े मामलों में इस तरह का हस्तक्षेप क्यों किया जा रहा है? उन्होंने सरकार से सवाल किया कि यदि वह समानता की बात करती है, तो क्या मुसलमानों को भी मंदिर प्रबंधन समितियों में प्रतिनिधित्व देने पर विचार करेगी? जहीर खान ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार को सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए और किसी भी समुदाय की धार्मिक संस्थाओं के मामलों में संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेना चाहिए। फिलहाल, वक्फ कानून 2026 को लेकर प्रदेश में लगातार राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन उठाए गए सवालों का क्या जवाब देती है।1
- महिला आयोग की चेयरपर्सन रेणु भाटिया को एक मासूम बच्ची ने रोते-रोते अपनी आपबीती सुनाई है, जिसमें उसने एक डॉक्टर पर गंभीर आरोप लगाए हैं। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए, चेयरपर्सन रेणु भाटिया तुरंत कुरुक्षेत्र अस्पताल पहुँचीं और वहाँ के प्रबंधन से तीखे सवाल किए। उन्होंने अस्पताल प्रबंधन से पूछा कि घटना के वक्त नर्सें कहाँ थीं और मासूम बच्ची को डॉक्टर के पास अकेला क्यों छोड़ा गया था।1
- मध्यप्रदेश में एक अनोखा "विशेष प्रोटोकॉल एक्ट" लागू है, जो न संसद ने बनाया है, न विधानसभा ने पारित किया है, और न ही राजपत्र में प्रकाशित हुआ है। इस व्यंग्यात्मक लेख के अनुसार, यह एक्ट व्यवहार में पूरी दृढ़ता से पालन किया जाता है, जिसके तहत मुख्यमंत्री को जनता का सेवक माना जाता है, पर सड़क पर आते ही जनता उनकी 'प्रजा' बन जाती है। यह व्यवस्था प्रदेश को "अजब है सबसे गजब है" का तमगा देने का एक प्रमुख कारण बन गई है। मुख्यमंत्री के काफिले की सूचना मिलते ही पुलिस महकमा युद्धस्तर पर सक्रिय हो जाता है। सड़कें खाली कराई जाती हैं, चौराहे बंद कर दिए जाते हैं, और आम आदमी को किनारे खड़ा कर दिया जाता है। यह सब कुछ इस तरह होता है मानो कोई राष्ट्रीय आपदा आ गई हो, जबकि असलियत यह होती है कि मुख्यमंत्री को सिर्फ एक कार्यक्रम में पहुँचना होता है। इस दौरान सड़क पर खड़े लोगों के चेहरे देखने लायक होते हैं, क्योंकि उनकी दफ्तर, अस्पताल, परीक्षा या काम पर पहुँचने की मंजिल से ज़्यादा महत्वपूर्ण मुख्यमंत्री का रास्ता हो जाता है। यह दृश्य लोकतंत्र का वह 'सुंदर' पहलू दिखाता है जहाँ जनता अपनी ही सड़क पर खड़ी होकर अपने ही सेवक के गुजरने का इंतजार करती है, जो राजा-महाराजाओं के समय की याद दिलाता है; फर्क सिर्फ इतना है कि तब हाथी-रथ होते थे, अब फॉर्च्यूनर-इनोवा चलती हैं, और तब सैनिक भाले लेकर चलते थे, अब पायलट वाहन और एस्कॉर्ट गाड़ियाँ चलती हैं। कभी-कभी तो यह किसी मुगल बादशाह के शाही जुलूस जैसा प्रतीत होता है। यह व्यवस्था उस चुनावी वादे के ठीक उलट है, जहाँ नेता जनता को लोकतंत्र में 'मालिक' बताते हैं, पर चुनाव जीतने के बाद लगता है कि किसी फाइल में गलती से शब्द बदल गया है और "मालिक" की जगह "रुकावट" लिख दिया गया है। जब कोई आम आदमी पुलिस से रास्ता खुलने का सवाल पूछता है, तो उसे ऐसी नज़रों से देखा जाता है जैसे उसने देश की सुरक्षा से जुड़ा कोई गोपनीय प्रश्न पूछ लिया हो, और "मुख्यमंत्री जी निकल रहे हैं" का उत्तर सभी सवालों को खत्म कर देता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री जनता से मिलने जा रहे होते हैं, लेकिन जनता को मिलने से पहले ही रोक दिया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे डॉक्टर मरीजों का इलाज करने जाए और रास्ते में ही सभी मरीजों को घंटों खड़ा कर दे। लेख में कहा गया है कि मध्यप्रदेश में ट्रैफिक के दो तरह के नियम दिखते हैं: एक आम जनता के लिए, जहाँ लालबत्ती तोड़ने, हेलमेट न पहनने या गलत पार्किंग पर चालान होता है; और दूसरा वीआईपी काफिलों के लिए, जहाँ हजारों लोगों को रोककर सड़क खाली कराना "प्रोटोकॉल" कहलाता है। इस व्यवस्था में जनता का समय सरकारी रजिस्टर में दर्ज नहीं होता और अमूल्य नहीं माना जाता; मुख्यमंत्री के पाँच मिनट जहाँ 'अमूल्य' होते हैं, वहीं जनता के पचास मिनट 'सामान्य' समझे जाते हैं। जाम में फंसे व्यक्ति को हुए नुकसान, छूटी हुई ट्रेन, नौकरी के इंटरव्यू या मरीज की बिगड़ी हालत की कोई परवाह नहीं की जाती, क्योंकि यहाँ समय की कीमत पद के हिसाब से तय होती है, जिसे किसी विशेष प्रशासनिक प्रशिक्षण में पढ़ाया जाता होगा। यह 'प्रोटोकॉल' अक्सर सुरक्षा से ज़्यादा प्रतिष्ठा का विषय बन जाता है, जबकि दुनिया के कई देशों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सिग्नल पर रुकते और सामान्य ट्रैफिक में निकलते भी दिख जाते हैं, जहाँ सुरक्षा और जनता की सुविधा दोनों का संतुलन बना रहता है। मध्यप्रदेश में यह व्यवस्था कभी-कभी ऐसी लगती है मानो मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि पृथ्वी पर उतर रहे किसी दुर्लभ ग्रह के सम्राट हों, जो उसी जनता के वोट से मिली कुर्सी की ताकत दिखाते हैं, जिसने उन्हें चुना है। अब समय बदल रहा है, मोबाइल कैमरों के साथ जनता सवाल पूछ रही है, और ये सवाल मुख्यमंत्री की सुरक्षा पर नहीं, बल्कि सुरक्षा के नाम पर जनता को दी जा रही असुविधा और लोकतंत्र में जनता के समय के महत्व पर हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि मध्यप्रदेश में यह कौन-सा अदृश्य "प्रोटोकॉल एक्ट" लागू है, जो सड़क पर खड़ी जनता को यह एहसास कराता है कि सत्ता खुद को जनता से ऊपर समझती है, जबकि संविधान में जनता ही सर्वोपरि है। यह दिखाता है कि "लोकतंत्र फाइलों में है, सड़क पर अभी भी शाही सवारी निकल रही है।"1
- एक्टर अमिताभ बच्चन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो साझा किया है, जिसमें पुणे महापालिका के कर्मचारी बारिश के बीच डिवाइडर पर लगे पेड़-पौधों को पानी देते दिख रहे हैं। इस वीडियो के साथ अमिताभ बच्चन ने अपने कैप्शन में लिखा, 'तब त्राहि त्राहि मची हुई थी; अब त्राहि त्राहि मची हुई है', जो स्थिति पर उनके व्यंग्य और अवलोकन को दर्शाता है।1
- सीहोर जिले के पास सोमवार को हुए भीषण सड़क हादसे में जान गंवाने वाले पांच लोगों में से चार का मंगलवार को राजगढ़ जिले के कालीपीठ थाना क्षेत्र के भियापुरा गांव में एक ही चिता पर अंतिम संस्कार किया गया। एक ही गांव से बनेसिंह तंवर (25), देवीराम तंवर (60), भगवान सिंह तंवर (45) और गुलाब सिंह तंवर (32) की चार अर्थियां एक साथ उठीं, जिससे पूरे गांव में मातम पसर गया और हर आंख नम हो गई। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था। यह हृदयविदारक हादसा सोमवार दोपहर करीब 2:45 बजे आष्टा के पास गोदी जोड़ के समीप हुआ था, जब भियापुरा से एक बोलेरो में सवार 9 लोग मानसिक रूप से अस्वस्थ बनेसिंह को देवास जिले के काटा फोड़ इलाज के लिए ले जा रहे थे और बोलेरो की सामने से आ रहे एक ट्रक से जोरदार टक्कर हो गई। इस दुर्घटना में पांच लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि इंदर सिंह, राजाराम, राधेश्याम और हेमराज घायल हो गए। इनमें से दो, राधेश्याम और राजाराम का इलाज भोपाल में तथा हेमराज व इंदर सिंह का इलाज सीहोर में चल रहा है। वहीं, बोलेरो चालक अमरसिंह तंवर (45) निवासी सेमलाबे का अंतिम संस्कार 3 किलोमीटर दूर उसके पैतृक गांव में किया गया। मंगलवार दोपहर 12 बजे चारों शव गांव पहुंचने पर ग्रामीणों और परिजनों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि चारों की मौत एक साथ हुई है, इसलिए उनका अंतिम संस्कार भी एक ही चिता पर किया जाएगा। इसके उपरांत, गांव के बाहर एक बड़ी चिता तैयार की गई और दोपहर करीब 1 बजे चारों की अंतिम यात्रा एक साथ निकाल कर, उन्हें एक ही बड़ी चिता पर लिटाकर अंतिम संस्कार किया गया। हादसे के बाद भियापुरा और सेमलाबे दोनों गांवों में गहरा शोक का माहौल रहा; मंगलवार दोपहर तक दोनों गांवों में चूल्हे नहीं जले और ग्रामीणों ने अंतिम संस्कार होने तक अन्न ग्रहण नहीं किया। हादसे की सूचना के बाद से पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई है। पूर्व विधायक बापू सिंह तंवर सहित बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, ग्रामीण और आसपास के गांवों के लोग अंतिम विदाई देने पहुंचे। एक साथ चार शवों की अंतिम यात्रा और एक ही चिता पर अंतिम संस्कार का यह मार्मिक दृश्य देखकर हर किसी की आंखें नम हो गईं।4