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डिंडौरी जिले के मेहदवानी विकासखंड में स्थित सुखलोडी और खजरवारा गांवों के लिए दनदना जलाशय (देवरगढ़ बांध) से निकली 17 किलोमीटर लंबी नहर किसी जीवनरेखा से कम नहीं है। यह नहर न केवल किसानों के खेतों तक सिंचाई का पानी पहुँचाती है, बल्कि गर्मी के मौसम में इन दोनों गांवों की पेयजल व्यवस्था का भी प्रमुख आधार है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि नहर में पानी का प्रवाह बंद हो जाए, तो दोनों गांवों में गंभीर जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सुखलोडी गांव में लगभग 800 की आबादी और करीब 200 परिवार निवास करते हैं, जिनके 200 घरों में नल-जल योजना के तहत कनेक्शन दिए गए हैं। इन घरों तक पानी की आपूर्ति पूरी तरह से दनदना जलाशय की नहर पर निर्भर करती है, क्योंकि गांव में केवल एक प्रमुख कुआं है जो पूरी पेयजल व्यवस्था संचालित करता है। ग्रामीणों ने कुएं के आसपास रिचार्ज पिट का निर्माण कराया है, जिससे नहर का पानी रिसकर कुएं को रिचार्ज करता है। इसके बाद दो मोटरों की सहायता से पानी को टंकी में भरकर नल-जल योजना के माध्यम से घर-घर पहुँचाया जाता है। नहर में पानी बंद होने पर कुएं का जलस्तर तेजी से घट जाता है, जिससे ग्रामीणों को पानी के लिए भारी परेशानी उठानी पड़ती है। सुखलोडी ग्राम पंचायत के सरपंच शंभूलाल मरावी ने पुष्टि की कि नल-जल योजना पूरी तरह से नहर के पानी से रिचार्ज होने वाले कुएं पर निर्भर है, और लगभग 200 परिवारों तक पानी पहुँचाने के लिए दो मोटरों का उपयोग होता है। योजना के संचालन और रखरखाव के लिए प्रत्येक नल-जल कनेक्शनधारी परिवार से 30 रुपये मासिक शुल्क लिया जाता है। इसी तरह, खजरवारा गांव में भी नहर का पानी कुओं, हैंडपंपों और तालाबों को रिचार्ज करने का मुख्य स्रोत है। नहर में पानी नहीं आने पर सभी जल स्रोत सूखने लगते हैं, जिससे ग्रामीणों के साथ-साथ पशुधन और अन्य जीव-जंतुओं के लिए भी पानी की समस्या खड़ी हो जाती है। गर्मी के दिनों में तालाबों के सूख जाने से नहाने, कपड़े धोने और मवेशियों को पानी पिलाने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों को पानी लाने के लिए कई किलोमीटर दूर स्थित कुओं और अन्य जल स्रोतों तक जाना पड़ता है, जिससे उनका दैनिक जीवन प्रभावित होता है और पेयजल संकट और गहरा जाता है। इन परिस्थितियों को देखते हुए, ग्रामीणों ने प्रशासन से दनदना जलाशय की नहर में नियमित रूप से पानी छोड़ने की मांग की है, ताकि सुखलोडी और खजरवारा गांव के लोगों को पेयजल संकट का सामना न करना पड़े। ग्रामीणों का दृढ़ विश्वास है कि यह नहर केवल सिंचाई का साधन नहीं, बल्कि दोनों गांवों के लिए जीवनदायिनी संजीवनी है, जो हजारों लोगों और पशुओं की प्यास बुझाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुई है।

1 day ago
user_खमोद चंदेल
खमोद चंदेल
डिंडोरी, डिंडोरी, मध्य प्रदेश•
1 day ago
9c6c0c6b-f916-4bfd-bc3c-d5babdb3f4cb

डिंडौरी जिले के मेहदवानी विकासखंड में स्थित सुखलोडी और खजरवारा गांवों के लिए दनदना जलाशय (देवरगढ़ बांध) से निकली 17 किलोमीटर लंबी नहर किसी जीवनरेखा से कम नहीं है। यह नहर न केवल किसानों के खेतों तक सिंचाई का पानी पहुँचाती है, बल्कि गर्मी के मौसम में इन दोनों गांवों की पेयजल व्यवस्था का भी प्रमुख आधार है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि नहर में पानी का प्रवाह बंद हो जाए, तो दोनों गांवों में गंभीर जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सुखलोडी गांव में लगभग 800 की आबादी और करीब 200 परिवार निवास करते हैं, जिनके 200 घरों में नल-जल योजना के तहत कनेक्शन दिए गए हैं। इन घरों तक पानी की आपूर्ति पूरी तरह से दनदना जलाशय की नहर पर निर्भर करती है, क्योंकि गांव में केवल एक प्रमुख कुआं है जो पूरी पेयजल व्यवस्था संचालित करता है। ग्रामीणों ने कुएं के आसपास रिचार्ज पिट का

निर्माण कराया है, जिससे नहर का पानी रिसकर कुएं को रिचार्ज करता है। इसके बाद दो मोटरों की सहायता से पानी को टंकी में भरकर नल-जल योजना के माध्यम से घर-घर पहुँचाया जाता है। नहर में पानी बंद होने पर कुएं का जलस्तर तेजी से घट जाता है, जिससे ग्रामीणों को पानी के लिए भारी परेशानी उठानी पड़ती है। सुखलोडी ग्राम पंचायत के सरपंच शंभूलाल मरावी ने पुष्टि की कि नल-जल योजना पूरी तरह से नहर के पानी से रिचार्ज होने वाले कुएं पर निर्भर है, और लगभग 200 परिवारों तक पानी पहुँचाने के लिए दो मोटरों का उपयोग होता है। योजना के संचालन और रखरखाव के लिए प्रत्येक नल-जल कनेक्शनधारी परिवार से 30 रुपये मासिक शुल्क लिया जाता है। इसी तरह, खजरवारा गांव में भी नहर का पानी कुओं, हैंडपंपों और तालाबों को रिचार्ज करने का मुख्य स्रोत है। नहर में पानी नहीं आने पर सभी जल स्रोत सूखने लगते

हैं, जिससे ग्रामीणों के साथ-साथ पशुधन और अन्य जीव-जंतुओं के लिए भी पानी की समस्या खड़ी हो जाती है। गर्मी के दिनों में तालाबों के सूख जाने से नहाने, कपड़े धोने और मवेशियों को पानी पिलाने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों को पानी लाने के लिए कई किलोमीटर दूर स्थित कुओं और अन्य जल स्रोतों तक जाना पड़ता है, जिससे उनका दैनिक जीवन प्रभावित होता है और पेयजल संकट और गहरा जाता है। इन परिस्थितियों को देखते हुए, ग्रामीणों ने प्रशासन से दनदना जलाशय की नहर में नियमित रूप से पानी छोड़ने की मांग की है, ताकि सुखलोडी और खजरवारा गांव के लोगों को पेयजल संकट का सामना न करना पड़े। ग्रामीणों का दृढ़ विश्वास है कि यह नहर केवल सिंचाई का साधन नहीं, बल्कि दोनों गांवों के लिए जीवनदायिनी संजीवनी है, जो हजारों लोगों और पशुओं की प्यास बुझाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुई है।

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  • बजाग ब्लॉक के अंतर्गत आमाडोंगरी में राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण कार्य के दौरान पेयजल की पाइपलाइन टूट जाने से क्षेत्र की पानी आपूर्ति पूरी तरह बाधित हो गई। इस घटना के कारण ग्रामीणों में भारी रोष व्याप्त हो गया, जिसके चलते उन्होंने विरोध प्रदर्शन करते हुए चक्का जाम कर दिया। ग्रामीणों का गुस्सा पाइपलाइन फोड़ने से उत्पन्न हुई पेयजल समस्या को लेकर था। यह चक्का जाम संबंधित विभाग और प्रशासन द्वारा दिए गए आश्वासन और समझौते के बाद ही समाप्त किया गया।
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    बजाग ब्लॉक के अंतर्गत आमाडोंगरी में राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण कार्य के दौरान पेयजल की पाइपलाइन टूट जाने से क्षेत्र की पानी आपूर्ति पूरी तरह बाधित हो गई। इस घटना के कारण ग्रामीणों में भारी रोष व्याप्त हो गया, जिसके चलते उन्होंने विरोध प्रदर्शन करते हुए चक्का जाम कर दिया। ग्रामीणों का गुस्सा पाइपलाइन फोड़ने से उत्पन्न हुई पेयजल समस्या को लेकर था। यह चक्का जाम संबंधित विभाग और प्रशासन द्वारा दिए गए आश्वासन और समझौते के बाद ही समाप्त किया गया।
    user_Santosh Ahirwar
    Santosh Ahirwar
    Voice of people डिंडोरी, डिंडोरी, मध्य प्रदेश•
    2 hrs ago
  • डिंडौरी जिले में किसानों को जैविक खेती और नवाचार से जोड़ने के लिए नर्मदांचल गौ सेवा समिति ढोंढ़ा के जैविक कृषि विशेषज्ञ एवं भारतीय किसान संघ डिंडौरी के जिलाध्यक्ष बिहारी लाल साहू ने एक पहल की है। वे किसानों को धान की बेहतर पैदावार के लिए जैविक विधि से बीजोपचार और नर्सरी तैयार करने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। साहू का कहना है कि बीजों का समय पर उपचार करने से उक्ठा सहित कई बीजजनित और मृदाजनित रोगों से फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, धान की अच्छी उपज के लिए सीधे बुवाई के बजाय नर्सरी तैयार कर रोपाई करना अधिक लाभकारी है। यदि बीजोपचार जैविक तरीके से किया जाए, तो अंकुरण क्षमता बढ़ती है और पौधों की शुरुआती वृद्धि बेहतर होती है। बीजोपचार के लिए 'बीजामृत' नामक जैविक घोल तैयार किया जाता है, जिसके निर्माण में लगभग 10 किलोग्राम गोबर, 10 लीटर गौमूत्र, 500 ग्राम खाने का चूना, 5 लीटर साफ पानी और एक पाव कच्चे दूध का उपयोग होता है। इन सभी सामग्रियों को मिलाकर 24 घंटे छाया में रखा जाता है। तैयार मिश्रण का छिड़काव 100 किलोग्राम बीज पर कर उसे अच्छी तरह मिलाया जाता है, ताकि सभी बीजों पर एक समान परत बन जाए। उपचारित बीजों को छाया में सुखाकर अगले दिन बोआई करने की सलाह दी जाती है। इस प्रक्रिया से बीजों में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने और पौधों की जड़ों के बेहतर विकास में मदद मिल सकती है। बिहारी लाल साहू ने किसान भाइयों से आग्रह किया कि वे बीज बोने से पहले बीजोपचार अवश्य करें, क्योंकि जैविक विधि अपनाने से लागत कम करने और फसल की शुरुआती सुरक्षा में मदद मिल सकती है।
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    डिंडौरी जिले में किसानों को जैविक खेती और नवाचार से जोड़ने के लिए नर्मदांचल गौ सेवा समिति ढोंढ़ा के जैविक कृषि विशेषज्ञ एवं भारतीय किसान संघ डिंडौरी के जिलाध्यक्ष बिहारी लाल साहू ने एक पहल की है। वे किसानों को धान की बेहतर पैदावार के लिए जैविक विधि से बीजोपचार और नर्सरी तैयार करने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। साहू का कहना है कि बीजों का समय पर उपचार करने से उक्ठा सहित कई बीजजनित और मृदाजनित रोगों से फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, धान की अच्छी उपज के लिए सीधे बुवाई के बजाय नर्सरी तैयार कर रोपाई करना अधिक लाभकारी है। यदि बीजोपचार जैविक तरीके से किया जाए, तो अंकुरण क्षमता बढ़ती है और पौधों की शुरुआती वृद्धि बेहतर होती है। बीजोपचार के लिए 'बीजामृत' नामक जैविक घोल तैयार किया जाता है, जिसके निर्माण में लगभग 10 किलोग्राम गोबर, 10 लीटर गौमूत्र, 500 ग्राम खाने का चूना, 5 लीटर साफ पानी और एक पाव कच्चे दूध का उपयोग होता है। इन सभी सामग्रियों को मिलाकर 24 घंटे छाया में रखा जाता है।

तैयार मिश्रण का छिड़काव 100 किलोग्राम बीज पर कर उसे अच्छी तरह मिलाया जाता है, ताकि सभी बीजों पर एक समान परत बन जाए। उपचारित बीजों को छाया में सुखाकर अगले दिन बोआई करने की सलाह दी जाती है। इस प्रक्रिया से बीजों में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने और पौधों की जड़ों के बेहतर विकास में मदद मिल सकती है। बिहारी लाल साहू ने किसान भाइयों से आग्रह किया कि वे बीज बोने से पहले बीजोपचार अवश्य करें, क्योंकि जैविक विधि अपनाने से लागत कम करने और फसल की शुरुआती सुरक्षा में मदद मिल सकती है।
    user_वाइस ऑफ़ राइट्स न्यूज चैनल
    वाइस ऑफ़ राइट्स न्यूज चैनल
    Voice of people डिंडोरी, डिंडोरी, मध्य प्रदेश•
    4 hrs ago
  • डिंडौरी जिले के ढोंढ़ा में जनजाति कल्याण केन्द्र बरगांव प्रकल्प प्रमुख, वरिष्ठ प्रचारक श्याम जी और महाकौशल प्रांत गौसेवा प्रमुख घनश्याम जी ने दौरा किया। इस प्रवास के दौरान, उन्होंने जैविक खेती के महत्व पर विशेष जोर देते हुए इसे मानव जीवन, पशु-पक्षियों तथा पूरे पर्यावरण के अस्तित्व का आधार बताया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि खेत की जमीन और मिट्टी ही अन्न उत्पन्न करने की मूल शक्ति है, जिससे मानव तथा अन्य जीवों का जीवन चलता है, इसलिए मिट्टी का संरक्षण और उसकी उर्वरता को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। रासायनिक खेती के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता को हुए नुकसान, जमीन के बंजर होने, तथा जल, वायु और खाद्य पदार्थों के प्रदूषण पर चिंता व्यक्त की गई। इसके परिणामस्वरूप मानव स्वास्थ्य, पशुओं और पर्यावरण पर पड़ रहे सीधे प्रभाव को देखते हुए, गौवंश आधारित जैविक खेती को एकमात्र सही विकल्प के रूप में सामने रखा गया। जैविक खेती प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके मिट्टी की उर्वरता बनाए रखती है, पर्यावरण को संतुलित रखती है, और शुद्ध, सुरक्षित तथा स्वास्थ्यवर्धक फसलें उत्पन्न करती है। यह पद्धति दीर्घकालीन लाभ प्रदान करती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन को सुरक्षित रखती है। इस संदर्भ में, यह आवश्यक बताया गया कि अधिक से अधिक किसान जैविक खेती को अपनाएँ। साथ ही, केंद्र सरकार को भी जैविक खेती करने वाले किसानों को सीधे सहयोग प्रदान करना चाहिए, जिसमें प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता, बाजार की सुविधा और उचित मूल्य की व्यवस्था शामिल है। इससे किसानों का मनोबल बढ़ेगा और देश में जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा। अंततः यह निष्कर्ष निकाला गया कि अपने खेत, मिट्टी, स्वास्थ्य और पर्यावरण को बचाने के लिए जैविक खेती को अपनाना ही एकमात्र ऐसा मार्ग है, जो एक स्वस्थ, समृद्ध और संतुलित भविष्य की ओर ले जाता है। इस प्रवास के दौरान बायोगैस संयंत्र और जीवामृत जैसी जैविक खेती की महत्वपूर्ण तकनीकों पर भी चर्चा की गई। बायोगैस संयंत्र में पशुओं के गोबर को पानी में घोलकर टैंक में डाला जाता है, जहाँ बिना ऑक्सीजन के जैविक पदार्थों के विघटन से मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनती है। यह गैस सीधे चूल्हे तक पहुँचती है, जबकि बची हुई स्लरी उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद के रूप में उपयोग की जाती है। इसी प्रकार, जीवामृत देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन (दाल का आटा) और खेत की मिट्टी से बना एक प्राकृतिक तरल जैविक खाद है। हाल ही में, डिंडौरी जिले के जाने-माने बहुचर्चित ऑर्गेनिक फार्मिंग एक्सपर्ट बिहारी लाल साहू ने, जो विगत 10 वर्षों से लगातार जैविक खेती कर रहे हैं, जनजाति कल्याण केन्द्र महाकौशल बरगांव प्रकल्प प्रमुख (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक) श्याम जी भाईसाहब, महाकौशल प्रांत के गौसेवा प्रमुख (आर एस एस के प्रचारक) घनश्याम जी भाईसाहब, और यूट्यूबर बर्मन ब्लॉग्स के हेमराज बर्मन के साथ नर्मदांचल गौ सेवा केन्द्र ढोंढ़ा में संचालित बीआरसी और जैविक फार्म हाउस का दौरा किया। बिहारी लाल साहू स्वयं जैविक खेती करने के साथ-साथ ग्रामीण किसान बंधुओं, महाविद्यालयों, विद्यालयों, सरकारी संस्थानों और एनजीओ जैसे अनेक मंचों के माध्यम से डिंडौरी सहित विभिन्न जिलों में जैविक खेती का अमूल्य प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने अपने फार्म हाउस में जैविक खेती का लाइव डेमो भी दिखाया, जिसमें गोबर गैस संयंत्र को जलता हुआ प्रदर्शित किया गया। सभी आगंतुकों ने उनके इन प्रयासों की सराहना की। यह जानकारी डिंडौरी ब्यूरो से नीरज रजक द्वारा दिनांक 10 जून, 2026 को प्रदान की गई।
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    डिंडौरी जिले के ढोंढ़ा में जनजाति कल्याण केन्द्र बरगांव प्रकल्प प्रमुख, वरिष्ठ प्रचारक श्याम जी और महाकौशल प्रांत गौसेवा प्रमुख घनश्याम जी ने दौरा किया। इस प्रवास के दौरान, उन्होंने जैविक खेती के महत्व पर विशेष जोर देते हुए इसे मानव जीवन, पशु-पक्षियों तथा पूरे पर्यावरण के अस्तित्व का आधार बताया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि खेत की जमीन और मिट्टी ही अन्न उत्पन्न करने की मूल शक्ति है, जिससे मानव तथा अन्य जीवों का जीवन चलता है, इसलिए मिट्टी का संरक्षण और उसकी उर्वरता को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

रासायनिक खेती के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता को हुए नुकसान, जमीन के बंजर होने, तथा जल, वायु और खाद्य पदार्थों के प्रदूषण पर चिंता व्यक्त की गई। इसके परिणामस्वरूप मानव स्वास्थ्य, पशुओं और पर्यावरण पर पड़ रहे सीधे प्रभाव को देखते हुए, गौवंश आधारित जैविक खेती को एकमात्र सही विकल्प के रूप में सामने रखा गया। जैविक खेती प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके मिट्टी की उर्वरता बनाए रखती है, पर्यावरण को संतुलित रखती है, और शुद्ध, सुरक्षित तथा स्वास्थ्यवर्धक फसलें उत्पन्न करती है। यह पद्धति दीर्घकालीन लाभ प्रदान करती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन को सुरक्षित रखती है।

इस संदर्भ में, यह आवश्यक बताया गया कि अधिक से अधिक किसान जैविक खेती को अपनाएँ। साथ ही, केंद्र सरकार को भी जैविक खेती करने वाले किसानों को सीधे सहयोग प्रदान करना चाहिए, जिसमें प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता, बाजार की सुविधा और उचित मूल्य की व्यवस्था शामिल है। इससे किसानों का मनोबल बढ़ेगा और देश में जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा। अंततः यह निष्कर्ष निकाला गया कि अपने खेत, मिट्टी, स्वास्थ्य और पर्यावरण को बचाने के लिए जैविक खेती को अपनाना ही एकमात्र ऐसा मार्ग है, जो एक स्वस्थ, समृद्ध और संतुलित भविष्य की ओर ले जाता है।

इस प्रवास के दौरान बायोगैस संयंत्र और जीवामृत जैसी जैविक खेती की महत्वपूर्ण तकनीकों पर भी चर्चा की गई। बायोगैस संयंत्र में पशुओं के गोबर को पानी में घोलकर टैंक में डाला जाता है, जहाँ बिना ऑक्सीजन के जैविक पदार्थों के विघटन से मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनती है। यह गैस सीधे चूल्हे तक पहुँचती है, जबकि बची हुई स्लरी उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद के रूप में उपयोग की जाती है। इसी प्रकार, जीवामृत देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन (दाल का आटा) और खेत की मिट्टी से बना एक प्राकृतिक तरल जैविक खाद है।

हाल ही में, डिंडौरी जिले के जाने-माने बहुचर्चित ऑर्गेनिक फार्मिंग एक्सपर्ट बिहारी लाल साहू ने, जो विगत 10 वर्षों से लगातार जैविक खेती कर रहे हैं, जनजाति कल्याण केन्द्र महाकौशल बरगांव प्रकल्प प्रमुख (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक) श्याम जी भाईसाहब, महाकौशल प्रांत के गौसेवा प्रमुख (आर एस एस के प्रचारक) घनश्याम जी भाईसाहब, और यूट्यूबर बर्मन ब्लॉग्स के हेमराज बर्मन के साथ नर्मदांचल गौ सेवा केन्द्र ढोंढ़ा में संचालित बीआरसी और जैविक फार्म हाउस का दौरा किया। बिहारी लाल साहू स्वयं जैविक खेती करने के साथ-साथ ग्रामीण किसान बंधुओं, महाविद्यालयों, विद्यालयों, सरकारी संस्थानों और एनजीओ जैसे अनेक मंचों के माध्यम से डिंडौरी सहित विभिन्न जिलों में जैविक खेती का अमूल्य प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने अपने फार्म हाउस में जैविक खेती का लाइव डेमो भी दिखाया, जिसमें गोबर गैस संयंत्र को जलता हुआ प्रदर्शित किया गया। सभी आगंतुकों ने उनके इन प्रयासों की सराहना की। यह जानकारी डिंडौरी ब्यूरो से नीरज रजक द्वारा दिनांक 10 जून, 2026 को प्रदान की गई।
    user_Neeraj rajak
    Neeraj rajak
    Voice of people डिंडोरी, डिंडोरी, मध्य प्रदेश•
    4 hrs ago
  • डिंडौरी जिले के मेहदवानी विकासखंड में स्थित सुखलोडी और खजरवारा गांवों के लिए दनदना जलाशय (देवरगढ़ बांध) से निकली 17 किलोमीटर लंबी नहर किसी जीवनरेखा से कम नहीं है। यह नहर न केवल किसानों के खेतों तक सिंचाई का पानी पहुँचाती है, बल्कि गर्मी के मौसम में इन दोनों गांवों की पेयजल व्यवस्था का भी प्रमुख आधार है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि नहर में पानी का प्रवाह बंद हो जाए, तो दोनों गांवों में गंभीर जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सुखलोडी गांव में लगभग 800 की आबादी और करीब 200 परिवार निवास करते हैं, जिनके 200 घरों में नल-जल योजना के तहत कनेक्शन दिए गए हैं। इन घरों तक पानी की आपूर्ति पूरी तरह से दनदना जलाशय की नहर पर निर्भर करती है, क्योंकि गांव में केवल एक प्रमुख कुआं है जो पूरी पेयजल व्यवस्था संचालित करता है। ग्रामीणों ने कुएं के आसपास रिचार्ज पिट का निर्माण कराया है, जिससे नहर का पानी रिसकर कुएं को रिचार्ज करता है। इसके बाद दो मोटरों की सहायता से पानी को टंकी में भरकर नल-जल योजना के माध्यम से घर-घर पहुँचाया जाता है। नहर में पानी बंद होने पर कुएं का जलस्तर तेजी से घट जाता है, जिससे ग्रामीणों को पानी के लिए भारी परेशानी उठानी पड़ती है। सुखलोडी ग्राम पंचायत के सरपंच शंभूलाल मरावी ने पुष्टि की कि नल-जल योजना पूरी तरह से नहर के पानी से रिचार्ज होने वाले कुएं पर निर्भर है, और लगभग 200 परिवारों तक पानी पहुँचाने के लिए दो मोटरों का उपयोग होता है। योजना के संचालन और रखरखाव के लिए प्रत्येक नल-जल कनेक्शनधारी परिवार से 30 रुपये मासिक शुल्क लिया जाता है। इसी तरह, खजरवारा गांव में भी नहर का पानी कुओं, हैंडपंपों और तालाबों को रिचार्ज करने का मुख्य स्रोत है। नहर में पानी नहीं आने पर सभी जल स्रोत सूखने लगते हैं, जिससे ग्रामीणों के साथ-साथ पशुधन और अन्य जीव-जंतुओं के लिए भी पानी की समस्या खड़ी हो जाती है। गर्मी के दिनों में तालाबों के सूख जाने से नहाने, कपड़े धोने और मवेशियों को पानी पिलाने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों को पानी लाने के लिए कई किलोमीटर दूर स्थित कुओं और अन्य जल स्रोतों तक जाना पड़ता है, जिससे उनका दैनिक जीवन प्रभावित होता है और पेयजल संकट और गहरा जाता है। इन परिस्थितियों को देखते हुए, ग्रामीणों ने प्रशासन से दनदना जलाशय की नहर में नियमित रूप से पानी छोड़ने की मांग की है, ताकि सुखलोडी और खजरवारा गांव के लोगों को पेयजल संकट का सामना न करना पड़े। ग्रामीणों का दृढ़ विश्वास है कि यह नहर केवल सिंचाई का साधन नहीं, बल्कि दोनों गांवों के लिए जीवनदायिनी संजीवनी है, जो हजारों लोगों और पशुओं की प्यास बुझाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुई है।
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    डिंडौरी जिले के मेहदवानी विकासखंड में स्थित सुखलोडी और खजरवारा गांवों के लिए दनदना जलाशय (देवरगढ़ बांध) से निकली 17 किलोमीटर लंबी नहर किसी जीवनरेखा से कम नहीं है। यह नहर न केवल किसानों के खेतों तक सिंचाई का पानी पहुँचाती है, बल्कि गर्मी के मौसम में इन दोनों गांवों की पेयजल व्यवस्था का भी प्रमुख आधार है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि नहर में पानी का प्रवाह बंद हो जाए, तो दोनों गांवों में गंभीर जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

सुखलोडी गांव में लगभग 800 की आबादी और करीब 200 परिवार निवास करते हैं, जिनके 200 घरों में नल-जल योजना के तहत कनेक्शन दिए गए हैं। इन घरों तक पानी की आपूर्ति पूरी तरह से दनदना जलाशय की नहर पर निर्भर करती है, क्योंकि गांव में केवल एक प्रमुख कुआं है जो पूरी पेयजल व्यवस्था संचालित करता है। ग्रामीणों ने कुएं के आसपास रिचार्ज पिट का निर्माण कराया है, जिससे नहर का पानी रिसकर कुएं को रिचार्ज करता है। इसके बाद दो मोटरों की सहायता से पानी को टंकी में भरकर नल-जल योजना के माध्यम से घर-घर पहुँचाया जाता है। नहर में पानी बंद होने पर कुएं का जलस्तर तेजी से घट जाता है, जिससे ग्रामीणों को पानी के लिए भारी परेशानी उठानी पड़ती है। सुखलोडी ग्राम पंचायत के सरपंच शंभूलाल मरावी ने पुष्टि की कि नल-जल योजना पूरी तरह से नहर के पानी से रिचार्ज होने वाले कुएं पर निर्भर है, और लगभग 200 परिवारों तक पानी पहुँचाने के लिए दो मोटरों का उपयोग होता है। योजना के संचालन और रखरखाव के लिए प्रत्येक नल-जल कनेक्शनधारी परिवार से 30 रुपये मासिक शुल्क लिया जाता है।

इसी तरह, खजरवारा गांव में भी नहर का पानी कुओं, हैंडपंपों और तालाबों को रिचार्ज करने का मुख्य स्रोत है। नहर में पानी नहीं आने पर सभी जल स्रोत सूखने लगते हैं, जिससे ग्रामीणों के साथ-साथ पशुधन और अन्य जीव-जंतुओं के लिए भी पानी की समस्या खड़ी हो जाती है। गर्मी के दिनों में तालाबों के सूख जाने से नहाने, कपड़े धोने और मवेशियों को पानी पिलाने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों को पानी लाने के लिए कई किलोमीटर दूर स्थित कुओं और अन्य जल स्रोतों तक जाना पड़ता है, जिससे उनका दैनिक जीवन प्रभावित होता है और पेयजल संकट और गहरा जाता है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए, ग्रामीणों ने प्रशासन से दनदना जलाशय की नहर में नियमित रूप से पानी छोड़ने की मांग की है, ताकि सुखलोडी और खजरवारा गांव के लोगों को पेयजल संकट का सामना न करना पड़े। ग्रामीणों का दृढ़ विश्वास है कि यह नहर केवल सिंचाई का साधन नहीं, बल्कि दोनों गांवों के लिए जीवनदायिनी संजीवनी है, जो हजारों लोगों और पशुओं की प्यास बुझाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुई है।
    user_खमोद चंदेल
    खमोद चंदेल
    डिंडोरी, डिंडोरी, मध्य प्रदेश•
    1 day ago
  • डिंडोरी जिले के शहपुरा में, नर्मदांचल गौ सेवा समिति के जैव आदान संसाधन केंद्र ढोंढ़ा और जनजाति कल्याण केंद्र बरगांव का हाल ही में वरिष्ठ प्रचारक श्याम जी और महाकौशल प्रांत गौसेवा प्रमुख घनश्याम जी सहित कई प्रमुख व्यक्तियों ने दौरा किया। इस दौरान, जैविक खेती को वर्तमान समय की एकमात्र सही राह बताया गया, जो मानव जीवन, पशु-पक्षियों और संपूर्ण पर्यावरण के अस्तित्व का आधार है। यह जोर दिया गया कि खेत की जमीन और मिट्टी ही वह मूल शक्ति है जिससे अन्न उत्पन्न होता है, अतः मिट्टी का संरक्षण और उसकी उर्वरता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। रासायनिक खेती के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की गुणवत्ता को भारी नुकसान पहुँचाया है, जिससे जमीन बंजर हो रही है और जल, वायु तथा खाद्य पदार्थ प्रदूषित हो रहे हैं। इन समस्याओं के सीधे प्रभाव मानव स्वास्थ्य, पशुओं और पर्यावरण पर पड़ रहे हैं। ऐसे में गौवंश आधारित जैविक खेती को एकमात्र सही विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया, जो प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखती है और पर्यावरण को संतुलित रखती है, जिससे शुद्ध, सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक फसलें प्राप्त होती हैं। जैविक खेती के अंतर्गत बायोगैस संयंत्रों और जीवामृत के उपयोग पर भी प्रकाश डाला गया। बायोगैस संयंत्र पशुओं के गोबर से मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्पादन करते हैं, जो सीधे चूल्हे तक पहुँचती है, जबकि बची हुई स्लरी उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद के रूप में उपयोग होती है। जीवामृत को देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और खेत की मिट्टी से बनी प्राकृतिक तरल जैविक खाद बताया गया। डिंडोरी के जाने-माने ऑर्गेनिक फार्मिंग एक्सपर्ट बिहारी लाल साहू पिछले 10 वर्षों से लगातार जैविक खेती कर रहे हैं और ग्रामीण किसान बंधुओं के साथ-साथ महाविद्यालयों, विद्यालयों, सरकारी संस्थानों और एनजीओ जैसे विभिन्न मंचों के माध्यम से डिंडोरी सहित कई जिलों में जैविक खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं। वे अपने फार्म हाउस में जैविक खेती और गोबर गैस का लाइव डेमो भी दिखाते हैं। दिनांक 10/6/2026 को, जैविक कृषि विशेषज्ञ बिहारी लाल साहू के साथ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और जनजाति कल्याण केंद्र महाकौशल बरगांव के प्रकल्प प्रमुख श्याम जी भाईसाहब, महाकौशल प्रांत के गौसेवा प्रमुख घनश्याम जी भाईसाहब, और यूट्यूबर बर्मन ब्लॉग्स से हेमराज बर्मन ने नर्मदांचल गौ सेवा केंद्र ढोंढ़ा में संचालित बीआरसी और जैविक फार्म हाउस का भ्रमण कर उसकी सराहना की। यह भी आह्वान किया गया कि अधिक से अधिक किसान जैविक खेती को अपनाएं और केंद्र सरकार भी जैविक खेती करने वाले किसानों को प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता, बाजार सुविधा और उचित मूल्य जैसी सीधी सहायता प्रदान करे। अंततः, अपने खेत, मिट्टी, स्वास्थ्य और पर्यावरण को बचाने के लिए जैविक खेती को अपनाना ही एकमात्र मार्ग है, जो स्वस्थ, समृद्ध और संतुलित भविष्य की ओर ले जाएगा।
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    डिंडोरी जिले के शहपुरा में, नर्मदांचल गौ सेवा समिति के जैव आदान संसाधन केंद्र ढोंढ़ा और जनजाति कल्याण केंद्र बरगांव का हाल ही में वरिष्ठ प्रचारक श्याम जी और महाकौशल प्रांत गौसेवा प्रमुख घनश्याम जी सहित कई प्रमुख व्यक्तियों ने दौरा किया। इस दौरान, जैविक खेती को वर्तमान समय की एकमात्र सही राह बताया गया, जो मानव जीवन, पशु-पक्षियों और संपूर्ण पर्यावरण के अस्तित्व का आधार है।

यह जोर दिया गया कि खेत की जमीन और मिट्टी ही वह मूल शक्ति है जिससे अन्न उत्पन्न होता है, अतः मिट्टी का संरक्षण और उसकी उर्वरता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। रासायनिक खेती के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की गुणवत्ता को भारी नुकसान पहुँचाया है, जिससे जमीन बंजर हो रही है और जल, वायु तथा खाद्य पदार्थ प्रदूषित हो रहे हैं। इन समस्याओं के सीधे प्रभाव मानव स्वास्थ्य, पशुओं और पर्यावरण पर पड़ रहे हैं। ऐसे में गौवंश आधारित जैविक खेती को एकमात्र सही विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया, जो प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखती है और पर्यावरण को संतुलित रखती है, जिससे शुद्ध, सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक फसलें प्राप्त होती हैं।

जैविक खेती के अंतर्गत बायोगैस संयंत्रों और जीवामृत के उपयोग पर भी प्रकाश डाला गया। बायोगैस संयंत्र पशुओं के गोबर से मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्पादन करते हैं, जो सीधे चूल्हे तक पहुँचती है, जबकि बची हुई स्लरी उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद के रूप में उपयोग होती है। जीवामृत को देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और खेत की मिट्टी से बनी प्राकृतिक तरल जैविक खाद बताया गया। डिंडोरी के जाने-माने ऑर्गेनिक फार्मिंग एक्सपर्ट बिहारी लाल साहू पिछले 10 वर्षों से लगातार जैविक खेती कर रहे हैं और ग्रामीण किसान बंधुओं के साथ-साथ महाविद्यालयों, विद्यालयों, सरकारी संस्थानों और एनजीओ जैसे विभिन्न मंचों के माध्यम से डिंडोरी सहित कई जिलों में जैविक खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं। वे अपने फार्म हाउस में जैविक खेती और गोबर गैस का लाइव डेमो भी दिखाते हैं।

दिनांक 10/6/2026 को, जैविक कृषि विशेषज्ञ बिहारी लाल साहू के साथ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और जनजाति कल्याण केंद्र महाकौशल बरगांव के प्रकल्प प्रमुख श्याम जी भाईसाहब, महाकौशल प्रांत के गौसेवा प्रमुख घनश्याम जी भाईसाहब, और यूट्यूबर बर्मन ब्लॉग्स से हेमराज बर्मन ने नर्मदांचल गौ सेवा केंद्र ढोंढ़ा में संचालित बीआरसी और जैविक फार्म हाउस का भ्रमण कर उसकी सराहना की। यह भी आह्वान किया गया कि अधिक से अधिक किसान जैविक खेती को अपनाएं और केंद्र सरकार भी जैविक खेती करने वाले किसानों को प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता, बाजार सुविधा और उचित मूल्य जैसी सीधी सहायता प्रदान करे। अंततः, अपने खेत, मिट्टी, स्वास्थ्य और पर्यावरण को बचाने के लिए जैविक खेती को अपनाना ही एकमात्र मार्ग है, जो स्वस्थ, समृद्ध और संतुलित भविष्य की ओर ले जाएगा।
    user_Ishwar prasad Sahu
    Ishwar prasad Sahu
    शाहपुरा, डिंडोरी, मध्य प्रदेश•
    5 hrs ago
  • शहडोल जिले की गोहपारू पुलिस ने बुधवार दोपहर लगभग 2:30 बजे अपहरण और दुष्कर्म के एक फरार आरोपी लवकुश बैगा को पलसउ गांव से गिरफ्तार करने की जानकारी दी है। पुलिस के अनुसार, आरोपी ने अपहरण की घटना को अंजाम देने के बाद दुष्कर्म भी किया था और तब से वह लगातार फरार चल रहा था। मुखबिर से मिली सूचना के आधार पर गोहपारू पुलिस ने लवकुश बैगा को पकड़ा और उसे माननीय न्यायालय में पेश किया।
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    शहडोल जिले की गोहपारू पुलिस ने बुधवार दोपहर लगभग 2:30 बजे अपहरण और दुष्कर्म के एक फरार आरोपी लवकुश बैगा को पलसउ गांव से गिरफ्तार करने की जानकारी दी है। पुलिस के अनुसार, आरोपी ने अपहरण की घटना को अंजाम देने के बाद दुष्कर्म भी किया था और तब से वह लगातार फरार चल रहा था। मुखबिर से मिली सूचना के आधार पर गोहपारू पुलिस ने लवकुश बैगा को पकड़ा और उसे माननीय न्यायालय में पेश किया।
    user_Akhilesh Mishra
    Akhilesh Mishra
    सोहागपुर, शहडोल, मध्य प्रदेश•
    2 hrs ago
  • डिंडौरी/शहपुरा के ढोंढ़ा स्थित नर्मदांचल गौ सेवा समिति के जैव आदान संसाधन केंद्र (बीआरसी) और जैविक फार्म हाउस का हाल ही में जनजाति कल्याण केंद्र बरगांव के प्रकल्प प्रमुख व वरिष्ठ प्रचारक श्याम जी, तथा महाकौशल प्रांत गौसेवा प्रमुख घनश्याम जी ने यूट्यूबर बर्मन ब्लॉग्स हेमराज बर्मन के साथ दौरा किया। इस भ्रमण का उद्देश्य जैविक खेती के महत्व को समझना और उसे बढ़ावा देना था, जिसे सभी ने सराहा। इस दौरान जैविक खेती को एकमात्र सही मार्ग बताते हुए इस बात पर जोर दिया गया कि खेती केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि मानव जीवन, पशु-पक्षियों और पूरे पर्यावरण के अस्तित्व का आधार है। रासायनिक खेती के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की गुणवत्ता को नुकसान पहुँचाया है, जिससे जमीन बंजर हो रही है और जल, वायु व खाद्य पदार्थ प्रदूषित हो रहे हैं। इसका सीधा प्रभाव मानव स्वास्थ्य, पशुओं और पर्यावरण पर पड़ रहा है। ऐसे में गौवंश आधारित जैविक खेती को ही एकमात्र सही विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जैविक खेती प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके मिट्टी की उर्वरता बनाए रखती है, पर्यावरण को संतुलित करती है, और शुद्ध, सुरक्षित व स्वास्थ्यवर्धक फसलें देती है। यह खेती दीर्घकालीन लाभ प्रदान करती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन को सुरक्षित रखती है। इसलिए यह आवश्यक बताया गया कि अधिक से अधिक किसान जैविक खेती अपनाएं। साथ ही, केंद्र सरकार को भी जैविक खेती करने वाले किसानों को सीधे सहयोग प्रदान करना चाहिए, जिसमें प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता, बाजार की सुविधा और उचित मूल्य की व्यवस्था शामिल है। इससे किसानों का मनोबल बढ़ेगा और देश में जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा। इसके साथ ही बायोगैस संयंत्र और जीवामृत के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। बायोगैस संयंत्र में पशुओं के गोबर को पानी में घोलकर टैंक में डाला जाता है, जिससे मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनती है, जो सीधे चूल्हे तक पहुंचती है। बची हुई स्लरी उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद के रूप में उपयोग होती है। करीब 6 फीट चौड़े और 10 फीट लंबे इस संयंत्र से वर्षों तक गैस प्राप्त की जा सकती है, जिससे ईंधन की बचत और पर्यावरण संरक्षण होता है। जीवामृत को देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन (दाल का आटा) और खेत की मिट्टी से बना एक प्राकृतिक तरल जैविक खाद बताया गया। डिंडौरी जिले के जाने-माने बहुचर्चित ऑर्गेनिक फार्मिंग एक्सपर्ट बिहारी लाल साहू विगत 10 वर्षों से लगातार जैविक खेती कर रहे हैं। वे स्वयं जैविक खेती करने के साथ-साथ ग्रामीण किसान बंधुओं, महाविद्यालयों, विद्यालयों, सरकारी संस्थानों और एनजीओ जैसे विभिन्न मंचों के माध्यम से डिंडौरी सहित कई जिलों में जैविक खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं। वे अपने फार्म हाउस में जैविक खेती का लाइव डेमो भी दिखाते हैं, और वर्तमान में बनी गोबर गैस को भी जलाकर लोगों को प्रदर्शित किया गया। यह सारी जानकारी दिनांक 10/6/2026 को प्रदान की गई।
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    डिंडौरी/शहपुरा के ढोंढ़ा स्थित नर्मदांचल गौ सेवा समिति के जैव आदान संसाधन केंद्र (बीआरसी) और जैविक फार्म हाउस का हाल ही में जनजाति कल्याण केंद्र बरगांव के प्रकल्प प्रमुख व वरिष्ठ प्रचारक श्याम जी, तथा महाकौशल प्रांत गौसेवा प्रमुख घनश्याम जी ने यूट्यूबर बर्मन ब्लॉग्स हेमराज बर्मन के साथ दौरा किया। इस भ्रमण का उद्देश्य जैविक खेती के महत्व को समझना और उसे बढ़ावा देना था, जिसे सभी ने सराहा।

इस दौरान जैविक खेती को एकमात्र सही मार्ग बताते हुए इस बात पर जोर दिया गया कि खेती केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि मानव जीवन, पशु-पक्षियों और पूरे पर्यावरण के अस्तित्व का आधार है। रासायनिक खेती के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की गुणवत्ता को नुकसान पहुँचाया है, जिससे जमीन बंजर हो रही है और जल, वायु व खाद्य पदार्थ प्रदूषित हो रहे हैं। इसका सीधा प्रभाव मानव स्वास्थ्य, पशुओं और पर्यावरण पर पड़ रहा है। ऐसे में गौवंश आधारित जैविक खेती को ही एकमात्र सही विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जैविक खेती प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके मिट्टी की उर्वरता बनाए रखती है, पर्यावरण को संतुलित करती है, और शुद्ध, सुरक्षित व स्वास्थ्यवर्धक फसलें देती है। यह खेती दीर्घकालीन लाभ प्रदान करती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन को सुरक्षित रखती है।

इसलिए यह आवश्यक बताया गया कि अधिक से अधिक किसान जैविक खेती अपनाएं। साथ ही, केंद्र सरकार को भी जैविक खेती करने वाले किसानों को सीधे सहयोग प्रदान करना चाहिए, जिसमें प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता, बाजार की सुविधा और उचित मूल्य की व्यवस्था शामिल है। इससे किसानों का मनोबल बढ़ेगा और देश में जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा। इसके साथ ही बायोगैस संयंत्र और जीवामृत के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। बायोगैस संयंत्र में पशुओं के गोबर को पानी में घोलकर टैंक में डाला जाता है, जिससे मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनती है, जो सीधे चूल्हे तक पहुंचती है। बची हुई स्लरी उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद के रूप में उपयोग होती है। करीब 6 फीट चौड़े और 10 फीट लंबे इस संयंत्र से वर्षों तक गैस प्राप्त की जा सकती है, जिससे ईंधन की बचत और पर्यावरण संरक्षण होता है। जीवामृत को देसी गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन (दाल का आटा) और खेत की मिट्टी से बना एक प्राकृतिक तरल जैविक खाद बताया गया।

डिंडौरी जिले के जाने-माने बहुचर्चित ऑर्गेनिक फार्मिंग एक्सपर्ट बिहारी लाल साहू विगत 10 वर्षों से लगातार जैविक खेती कर रहे हैं। वे स्वयं जैविक खेती करने के साथ-साथ ग्रामीण किसान बंधुओं, महाविद्यालयों, विद्यालयों, सरकारी संस्थानों और एनजीओ जैसे विभिन्न मंचों के माध्यम से डिंडौरी सहित कई जिलों में जैविक खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं। वे अपने फार्म हाउस में जैविक खेती का लाइव डेमो भी दिखाते हैं, और वर्तमान में बनी गोबर गैस को भी जलाकर लोगों को प्रदर्शित किया गया। यह सारी जानकारी दिनांक 10/6/2026 को प्रदान की गई।
    user_वाइस ऑफ़ राइट्स न्यूज चैनल
    वाइस ऑफ़ राइट्स न्यूज चैनल
    Voice of people डिंडोरी, डिंडोरी, मध्य प्रदेश•
    4 hrs ago
  • डिंडौरी जिले के शाहपुर थाने से पुलिस अभिरक्षा से फरार हुए युवक उमेश कुमार का मामला अब और गंभीर होता दिख रहा है। युवक सोमवार सुबह गोरखपुर डेम से लगे जंगल क्षेत्र में गंभीर अवस्था में मिलने का दावा किया गया है, जिसके बाद परिजनों ने उसकी हालत को लेकर कई सवाल उठाए हैं। युवक रविवार रात करीब 10 बजे पुलिस अभिरक्षा से फरार हुआ था और सोमवार सुबह करीब 10 बजे उसे बेशर्म की झाड़ियों के बीच अचेत अवस्था में बरामद किया गया। परिजनों के अनुसार, युवक की हालत बेहद खराब थी और वह सामान्य रूप से बात नहीं कर पा रहा था। दावा किया गया कि उसके मुंह में पत्ते भरे हुए थे, जिन्हें बाहर निकाला गया, और उसके बाएं पैर में सूजन व चोट के निशान भी थे। गंभीर स्थिति को देखते हुए परिजन उसे तत्काल जिला अस्पताल डिंडौरी ले गए। उपचार कर रहे डॉ. नितिन देशमुख के अनुसार, प्रारंभिक जांच में मरीज का ब्लड प्रेशर और शुगर स्तर कम पाया गया है, और उसकी स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। युवक की मां सिंधिया बाई ने आरोप लगाया है कि उनके बेटे को टीआई साहब द्वारा बहुत टॉर्चर किया गया है और उसे न्याय मिलना चाहिए। परिजनों का यह भी आरोप है कि युवक डरा हुआ था और पुलिस के पास जाने से मना कर रहा था, हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। गौरतलब है कि युवक की मां पहले ही डिंडौरी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक से बेटे की तलाश की गुहार लगाते हुए पुलिस पर गंभीर आरोप लगा चुकी थीं। इस मामले को लेकर एसडीओपी शहपुरा ने कहा कि युवक का उपचार जारी है, और उसके बयान तथा जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर विस्तृत प्रतिवेदन पुलिस अधीक्षक कार्यालय को भेजा जाएगा। युवक के मिलने के बाद अब इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और सच्चाई सामने लाने की मांग तेज हो गई है।
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    डिंडौरी जिले के शाहपुर थाने से पुलिस अभिरक्षा से फरार हुए युवक उमेश कुमार का मामला अब और गंभीर होता दिख रहा है। युवक सोमवार सुबह गोरखपुर डेम से लगे जंगल क्षेत्र में गंभीर अवस्था में मिलने का दावा किया गया है, जिसके बाद परिजनों ने उसकी हालत को लेकर कई सवाल उठाए हैं। युवक रविवार रात करीब 10 बजे पुलिस अभिरक्षा से फरार हुआ था और सोमवार सुबह करीब 10 बजे उसे बेशर्म की झाड़ियों के बीच अचेत अवस्था में बरामद किया गया।

परिजनों के अनुसार, युवक की हालत बेहद खराब थी और वह सामान्य रूप से बात नहीं कर पा रहा था। दावा किया गया कि उसके मुंह में पत्ते भरे हुए थे, जिन्हें बाहर निकाला गया, और उसके बाएं पैर में सूजन व चोट के निशान भी थे। गंभीर स्थिति को देखते हुए परिजन उसे तत्काल जिला अस्पताल डिंडौरी ले गए। उपचार कर रहे डॉ. नितिन देशमुख के अनुसार, प्रारंभिक जांच में मरीज का ब्लड प्रेशर और शुगर स्तर कम पाया गया है, और उसकी स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।

युवक की मां सिंधिया बाई ने आरोप लगाया है कि उनके बेटे को टीआई साहब द्वारा बहुत टॉर्चर किया गया है और उसे न्याय मिलना चाहिए। परिजनों का यह भी आरोप है कि युवक डरा हुआ था और पुलिस के पास जाने से मना कर रहा था, हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। गौरतलब है कि युवक की मां पहले ही डिंडौरी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक से बेटे की तलाश की गुहार लगाते हुए पुलिस पर गंभीर आरोप लगा चुकी थीं।

इस मामले को लेकर एसडीओपी शहपुरा ने कहा कि युवक का उपचार जारी है, और उसके बयान तथा जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर विस्तृत प्रतिवेदन पुलिस अधीक्षक कार्यालय को भेजा जाएगा। युवक के मिलने के बाद अब इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और सच्चाई सामने लाने की मांग तेज हो गई है।
    user_राजेश ठाकुर
    राजेश ठाकुर
    डिंडोरी, डिंडोरी, मध्य प्रदेश•
    4 hrs ago
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