शीतलापारा कोचवाही के घर में चोरी का प्रयास करने वाला आरोपी गिरफ्तार,भेजा जेल 2 सितंबर शाम 6 बजे जिला पुलिस मुख्यालय से मिली जानकारी अनुसार, जिले के नरहरपुर शीतलापारा कोचवाही में घर का ताला तोड़कर, चोरी का प्रयास करने वाले आरोपी को नरहरपुर पुलिस ने,ग्रामीणों की मदद से गिरफ्तार किया है। घटना 1 सितंबर की है। सत्यभामा कोरेटी अपने पुत्र के साथ खेत गई थीं। दोपहर में लौटने पर घर का ताला टूटा मिला और अंदर से आवाज सुनाई दी। आसपास के लोगों को बुलाने पर एक व्यक्ति घर से भागने लगा, जिसे ग्रामीणों ने पीछा कर पकड़ लिया। पुलिस के अनुसार आरोपी की पहचान संजय कोरेटी उम्र 36 वर्ष, निवासी कोचवाही के रूप में हुई। पूछताछ में उसने चोरी की नीयत से घर में घुसकर,ताला तोड़ने का प्रयास करना स्वीकार किया। पुलिस ने आरोपी के कब्जे से घटना में प्रयुक्त गैती और टूटा हुआ ताला जब्त किया। पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया।
शीतलापारा कोचवाही के घर में चोरी का प्रयास करने वाला आरोपी गिरफ्तार,भेजा जेल 2 सितंबर शाम 6 बजे जिला पुलिस मुख्यालय से मिली जानकारी अनुसार, जिले के नरहरपुर शीतलापारा कोचवाही में घर का ताला तोड़कर, चोरी का प्रयास करने वाले आरोपी को नरहरपुर पुलिस ने,ग्रामीणों की मदद से गिरफ्तार किया है। घटना 1 सितंबर की है। सत्यभामा कोरेटी अपने पुत्र के साथ खेत गई थीं। दोपहर में लौटने पर घर का ताला टूटा मिला और अंदर से आवाज सुनाई दी। आसपास के लोगों को बुलाने पर एक व्यक्ति घर से भागने लगा, जिसे ग्रामीणों ने पीछा कर पकड़ लिया। पुलिस के अनुसार आरोपी की पहचान संजय कोरेटी उम्र 36 वर्ष, निवासी कोचवाही के रूप में हुई। पूछताछ में उसने चोरी की नीयत से घर में घुसकर,ताला तोड़ने का प्रयास करना स्वीकार किया। पुलिस ने आरोपी के कब्जे से घटना में प्रयुक्त गैती और टूटा हुआ ताला जब्त किया। पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया।
- शीतलापारा कोचवाही के घर में चोरी का प्रयास करने वाला आरोपी गिरफ्तार,भेजा जेल 2 सितंबर शाम 6 बजे जिला पुलिस मुख्यालय से मिली जानकारी अनुसार, जिले के नरहरपुर शीतलापारा कोचवाही में घर का ताला तोड़कर, चोरी का प्रयास करने वाले आरोपी को नरहरपुर पुलिस ने,ग्रामीणों की मदद से गिरफ्तार किया है। घटना 1 सितंबर की है। सत्यभामा कोरेटी अपने पुत्र के साथ खेत गई थीं। दोपहर में लौटने पर घर का ताला टूटा मिला और अंदर से आवाज सुनाई दी। आसपास के लोगों को बुलाने पर एक व्यक्ति घर से भागने लगा, जिसे ग्रामीणों ने पीछा कर पकड़ लिया। पुलिस के अनुसार आरोपी की पहचान संजय कोरेटी उम्र 36 वर्ष, निवासी कोचवाही के रूप में हुई। पूछताछ में उसने चोरी की नीयत से घर में घुसकर,ताला तोड़ने का प्रयास करना स्वीकार किया। पुलिस ने आरोपी के कब्जे से घटना में प्रयुक्त गैती और टूटा हुआ ताला जब्त किया। पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया।1
- 14 वीं बटालियन धनोरा के पास जंगली सूअर का आतंक जारी, ट्रक की चपेट में आने से बाल-बाल बचे जंगली सूअर NH 930 मे स्थित 14 वी बटालियन धनोरा के पास भी विगत एक माह से जंगली सूअर का झुंड देखा जा रहा है। ग्राम धनोरा में धान खरीदी केंद्र के अलावा अब नेशनल हाईवे से लगे दुकानो के पास भी 20 से 25 की संख्या मे जंगली सूअर पहुंच रहे है। बीती रात्रि मे बटालियन के सामने स्थित एक दुकान के पास जंगली सुवर का झुंड देखा गया, जहां मुख्य मार्ग से गुजरने वाले ट्रक की चपेट मे आने से दर्जनो जंगली सूअर बाल बाल बचे। यह पूरा घटनाक्रम सिन्हा किराना दुकान मे लगाए गए सीसीटीवी कैमरे मे भी कैप्चर हुआ है। ग्रामीण क्षेत्र में इस तरह 20 से 25 की संख्या मे जंगली सूअर के पहुंचने से ग्रामीणो मे दहशत का माहौल बना हुआ है।1
- कोंडागांव: बड़ेडोंगर-कोनगुड़ मार्ग पर बड़ा हादसा टला, जर्जर सड़क बनी परेशानी का सबब बड़ेडोंगर से कोनगुड़ मार्ग की जर्जर सड़क के कारण राहगीरों और वाहन चालकों को लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इसी मार्ग पर आज गिट्टी से लदा एक मालवाहक वाहन साइड देने के दौरान सड़क से नीचे उतर गया और पलटने से बाल-बाल बचा। इस मार्ग से प्रतिदिन हजारों दोपहिया वाहन, छोटी-बड़ी गाड़ियां और मालवाहक वाहन गुजरते हैं। यह मार्ग नारायणपुर क्षेत्र को भी जोड़ता है। सड़क की खराब स्थिति के चलते दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। स्थानीय लोगों ने संबंधित विभाग से सड़क की जल्द मरम्मत कराने की मांग की है।1
- सीतानदी-उदंती के ग्रामीणों की समस्याएं वन मंत्री के सामने, जल्द क्षेत्र का दौरा करेंगे केदार कश्यप धमतरी। सीतानदी-उदंती टाइगर रिजर्व क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं की कमी और वनाधिकार से जुड़े मामलों को लेकर जंगल-जमीन संघर्ष समिति के प्रतिनिधिमंडल ने वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने ग्रामीणों की समस्याओं से अवगत कराते हुए मांगों से संबंधित आवेदन सौंपा। स्थानीय आदिवासी स्वास्थ्य परम्परा एवं पादप औषधीय बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम और जिला पंचायत धमतरी अध्यक्ष अरुण सार्वा के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि क्षेत्र के ग्रामीण लंबे समय से सड़क, पुल-पुलिया और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। वनाधिकार से जुड़े मामलों तथा विस्थापन की चिंताओं को भी मंत्री के समक्ष प्रमुखता से रखा गया। मंत्री केदार कश्यप ने प्रतिनिधिमंडल की बातों को गंभीरता से सुना। उन्होंने कहा कि “नियमानुसार जो भी बेहतर होगा, उन कार्यों को अवश्य करेंगे।” उन्होंने जल्द नगरी-सिहावा क्षेत्र में पहुंचकर ग्रामीणों की समस्याओं को स्वयं देखने और उनके निराकरण के लिए उचित पहल करने का आश्वासन दिया। विकास मरकाम ने कहा कि ग्रामीणों की समस्याएं लंबे समय से बनी हुई हैं। मंत्री के आश्वासन से समाधान की उम्मीद जगी है। अरुण सार्वा ने कहा कि वन संरक्षण के नियमों का पालन करते हुए ग्रामीणों की जरूरत के अनुसार विकास कार्य होना जरूरी है। विकास के साथ ग्रामीणों के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। प्रतिनिधिमंडल में चन्द्रकुमार अग्रवानी, रेवाप्रसाद देवदास, ईश्वरी नेताम, श्रीधन सोम, दैनिक राम मंडावी, उदय सहित अन्य प्रतिनिधि शामिल रहे। समिति ने मंत्री की पहल को सकारात्मक बताते हुए ठोस कार्रवाई की उम्मीद जताई।1
- बस्तर बदल रहा है… और यही बदलाव कुछ लोगों के पेट में दर्द पैदा कर रहा है! बस्तर बदल रहा है… और यही बदलाव कुछ लोगों के पेट में दर्द पैदा कर रहा है! . बस्तर… हाँ, वही बस्तर। जिसका नाम कभी सुनते ही लोगों के जेहन में जंगल, बंदूक, बारूद, लैंडमाइन, एंबुश और नक्सली हिंसा की तस्वीर उभर आती थी। वही बस्तर… जहाँ जंगलों में चिड़ियों की आवाज से ज्यादा गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देती थी। जहाँ सड़क पर चलना सिर्फ सफर नहीं, बल्कि जोखिम था। जहाँ शाम के बाद गांवों में सन्नाटा उतरता था। जहाँ एक धमाका सिर्फ आवाज नहीं होता था— वह किसी परिवार की जिंदगी उजाड़ देने वाली खबर हो सकता था। दशकों तक बस्तर ने इस हिंसा को झेला। और सबसे बड़ी विडंबना देखिए… जिस हिंसा के सबसे बड़े शिकार बस्तर के आदिवासी हुए, उसी हिंसा को दूर बैठे कुछ लोग ‘क्रांति’ कहने लगे! जिस बंदूक ने आदिवासी के घर में डर पैदा किया, उसे ‘संघर्ष का हथियार’ बताया गया। जिस हिंसा ने गांवों को पीछे धकेला, उसे ‘जल-जंगल-जमीन की लड़ाई’ का नाम दिया गया। और अब… जब वही बंदूकें कमजोर पड़ रही हैं, जब जंगलों में सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ी है, जब सड़कें अंदरूनी इलाकों तक पहुंच रही हैं, जब मोबाइल नेटवर्क उन गांवों तक पहुंच रहा है जहाँ कभी संचार भी सपना था, जब बच्चे स्कूलों की तरफ लौट रहे हैं, जब स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंच रही हैं… तो कुछ विचारधाराओं के चेहरे पर बेचैनी दिखाई देने लगी है। क्यों? क्योंकि बस्तर का बदलना सिर्फ बस्तर का बदलना नहीं है। यह उस पूरी कहानी का अंत है जिसमें बंदूक को आदिवासी मुक्ति का रास्ता बताने की कोशिश की जाती रही। लेकिन बस्तर ने असली चेहरा देखा है। मैंने बस्तर को सिर्फ नक्शे पर नहीं देखा। मैंने इसे करीब से देखा है। मैंने उस डर को महसूस किया है, जिसमें एक परिवार यह सोचने पर मजबूर होता था कि आज रात कौन सुरक्षित लौटेगा और कौन नहीं। मैंने ऐसे लोगों की कहानियां सुनी हैं जिनके लिए खेत सिर्फ जमीन नहीं था— वह उनके पुरखों की विरासत था। लेकिन डर इतना बड़ा था कि इंसान को अपनी जमीन से ज्यादा अपने परिवार की चिंता करनी पड़ी। बूढ़े मां-बाप… पत्नी… बच्चे… आखिर कोई अपने परिवार को बंदूक के सामने कैसे खड़ा कर सकता है? और फिर यही सवाल पूछना जरूरी है— अगर बंदूक आदिवासियों की मुक्ति का रास्ता थी, तो इस रास्ते की सबसे बड़ी कीमत आदिवासियों ने ही क्यों चुकाई? किसका घर उजड़ा? किसका बच्चा अनाथ हुआ? किसका पति मारा गया? किसका भाई गया? किसका गांव डर में जीता रहा? बस्तर के आम आदमी का। अब जरा आज का बस्तर देखिए। जहाँ कभी बंदूक का डर था, वहाँ अब मोबाइल नेटवर्क की बात हो रही है। जहाँ कभी विकास का रास्ता बंद था, वहाँ सड़कें पहुंच रही हैं। जहाँ बच्चों का भविष्य अनिश्चित था, वहाँ स्कूल और शिक्षा की चर्चा हो रही है। जहाँ इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी, वहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हो रहा है। और सबसे बड़ी बात— लोगों के भीतर डर की जगह उम्मीद पैदा हो रही है। क्या यही असली बदलाव नहीं है? क्या आदिवासी समाज को यही नहीं चाहिए था? क्या उसे अपने बच्चे को पढ़ाने का अधिकार नहीं है? क्या उसे अपने गांव तक सड़क नहीं चाहिए? क्या उसे अस्पताल नहीं चाहिए? क्या उसे मोबाइल नेटवर्क नहीं चाहिए? क्या उसे रोजगार नहीं चाहिए? क्या उसे अपने खेत में बिना डर के जाने का अधिकार नहीं चाहिए? अगर इन सवालों का जवाब ‘हां’ है, तो फिर बंदूक की राजनीति किसके लिए थी? और अब कुछ लोग कह रहे हैं— “नक्सली क्रांतिकारी थे…” माफ कीजिए! बस्तर के आम आदमी से पूछिए। उस मां से पूछिए जिसने अपना बेटा खोया। उस परिवार से पूछिए जिसने डर के कारण गांव छोड़ा। उस ग्रामीण से पूछिए जिसने वर्षों तक धमकी और भय के बीच जीवन बिताया। उस जवान के परिवार से पूछिए जिसने बस्तर की धरती पर ड्यूटी करते हुए अपनी जान गंवाई। फिर तय कीजिए— कौन क्रांतिकारी था और कौन हिंसा का रास्ता चुन चुका था? मेरे लिए जवाब बिल्कुल स्पष्ट है। बंदूक के दम पर लोकतंत्र नहीं आता। डर के दम पर विकास नहीं आता। हिंसा के दम पर आदिवासी सशक्त नहीं होता। आदिवासी सशक्त तब होता है जब उसके हाथ में बंदूक नहीं, कलम और रोजगार होता है। जब उसके गांव तक सड़क होती है। जब उसके बच्चे के पास स्कूल होता है। जब उसके परिवार के पास इलाज की सुविधा होती है। जब वह अपने खेत में बिना भय के जा सकता है। और शायद यही बात कुछ लोगों को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है। क्योंकि जब जंगलों में बंदूक कमजोर होती है, तो सिर्फ हिंसा कमजोर नहीं होती… हिंसा के नाम पर चलने वाला पूरा नैरेटिव कमजोर पड़ता है। लेवी की व्यवस्था कमजोर पड़ती है। डर की राजनीति कमजोर पड़ती है। बंदूक के सहारे प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कमजोर पड़ती है। और तब असली सवाल सामने आता है— आखिर बस्तर के नाम पर इतने वर्षों तक किसका हित साधा जा रहा था? बस्तर को अब किसी बाहरी विचारधारा के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है। बस्तर के लोग खुद तय करेंगे कि उन्हें कैसा बस्तर चाहिए। और मुझे पूरा विश्वास है— उन्हें बंदूक वाला बस्तर नहीं चाहिए। उन्हें चाहिए— - शांत बस्तर - शिक्षित बस्तर - स्वस्थ बस्तर - सड़क वाला बस्तर - कनेक्टेड बस्तर - रोजगार वाला बस्तर - पर्यटन वाला बस्तर - और सबसे बढ़कर—भयमुक्त बस्तर। याद रखिए… जिस जंगल को दशकों तक बंदूक ने कैद करके रखा, वह जंगल अब खुली हवा में सांस लेना चाहता है। जिस आदिवासी को डर के साये में जीना पड़ा, वह अब अपने बच्चों का भविष्य बनाना चाहता है। जिस बस्तर की पहचान कभी नक्सलवाद से कराई जाती थी… वह अब अपनी पहचान खुद लिख रहा है। और इस बदलाव को रोकना आसान नहीं होगा। क्योंकि यह बदलाव किसी एक सरकार, किसी एक संगठन या किसी एक व्यक्ति का नहीं है। यह बस्तर के आम आदमी की इच्छा है। वह बस्तर जिसने हिंसा देखी है। वह बस्तर जिसने अपने लोगों को खोया है। वह बस्तर जिसने डर सहा है। और अब वही बस्तर कह रहा है— बस बहुत हुआ! हमें बंदूक नहीं चाहिए। हमें बारूद नहीं चाहिए। हमें लेवी नहीं चाहिए। हमें हिंसा नहीं चाहिए। हमें अपना भविष्य चाहिए। और मैं पूरे विश्वास से कहता हूं— मेरा बस्तर बदल रहा है… मेरा बस्तर बदलेगा… और अब बस्तर की पहचान बंदूक नहीं, विकास और उसकी अद्भुत संस्कृति होगी। जो लोग बस्तर को फिर से हिंसा के अंधेरे में ले जाना चाहते हैं, उन्हें एक बात समझ लेनी चाहिए— बस्तर अब जाग चुका है। और जागा हुआ बस्तर पीछे नहीं जाएगा। आप बस्तर के इस बदलाव के साथ हैं? तो सिर्फ पढ़कर मत जाइए—अपनी आवाज जरूर उठाइए। कमेंट में लिखिए— “मेरा बस्तर, मेरा गर्व।” #bastariya #BastarChanging #NaxalFreeBastar #BastarDevelopment #BastarDiaries #chhattisgarh #TribalDevelopment #peaceinbastar #development #BastarRising #Naxalism #explorepage #fypシ #Bastar #BastarChanging #BadaltaBastar #BastarNews #BastarDevelopment #Abujhmad #Abujhmar #AbujhmadNews #NaxalFreeBastar #Naxalism #NaxalMuktBastar #BastarVikas #BastarUpdate #ChhattisgarhNews #Chhattisgarh #BastarKiAwaaz #Adivasi #AdivasiNews #BastarCulture #BastarTourism #Development #Vikas #PeaceInBastar #JoharBastar #JoharBastarRT #Narayanpur #NarayanpurNews #BreakingNews #ViralVideo1
- कोंडागांव मुलमुला में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया हलषष्ठी पर्व सुहागिन महिलाओं ने संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए रखा व्रत, शिव मंदिर प्रांगण में विधि-विधान से किया पूजन।1
- श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया कमरछठ हलषष्ठी का पर्व _माताओं ने संतान के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा व्रत श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया कमरछठ हलषष्ठी का पर्व _माताओं ने संतान के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा व्रत फरसगांव :- पावन नगरी ग्राम बड़ेडोंगर में बुधवार को भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं से जुड़े पावन पर्व कमरछठ (हलषष्ठी) का पर्व माताओं एवं महिलाओं द्वारा पूरे श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हर्षोल्लासपूर्वक मनाया गया। पर्व के अवसर पर पूरे ग्राम में धार्मिक एवं भक्तिमय वातावरण देखने को मिला। कमरछठ के अवसर पर ग्राम की माताओं ने अपनी संतानों के सुखमय जीवन, उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, सुख-समृद्धि एवं उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए व्रत रखा और विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। महिलाओं ने पूजा के लिए विभिन्न प्रकार के मौसमी फल, फूल एवं पारंपरिक पूजा सामग्री श्रद्धापूर्वक एकत्रित कर पूजा स्थल पर पहुंचाई। इसके बाद सभी महिलाओं ने सामूहिक रूप से पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना कर अपनी संतानों की रक्षा एवं परिवार की खुशहाली के लिए मंगल कामना की। पूजन के दौरान महिलाओं की धार्मिक आस्था, अपनी संस्कृति और परंपराओं के प्रति अटूट विश्वास विशेष रूप से देखने को मिला। पारंपरिक वेशभूषा में पहुंची मातृशक्ति ने पूरे उत्साह एवं श्रद्धा के साथ पूजा में भाग लिया। महिलाओं ने एक-दूसरे के साथ मिलकर पूजा की तैयारियां कीं और पारंपरिक रीति से पर्व को संपन्न किया। ग्रामीण अंचलों में कमरछठ अथवा हलषष्ठी पर्व का विशेष धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। यह पर्व मातृत्व, ममता और संतान के प्रति समर्पण की भावना का प्रतीक है। इस दिन माताएं अपनी संतानों के बेहतर स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना के लिए व्रत रखकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं। बड़ेडोंगर में आयोजित इस धार्मिक पर्व ने ग्राम की समृद्ध संस्कृति और वर्षों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं को जीवंत कर दिया। आधुनिकता के दौर में भी ग्रामीण क्षेत्रों में पीढ़ियों से चली आ रही लोक आस्थाओं और धार्मिक परंपराओं का संरक्षण समाज की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है। कमरछठ के अवसर पर बड़ेडोंगर की मातृशक्ति द्वारा एकजुट होकर पर्व मनाना धार्मिक चेतना, सांस्कृतिक एकता और अपनी परंपराओं के प्रति सम्मान का सुंदर उदाहरण रहा। पूरे आयोजन के दौरान श्रद्धा और भक्ति का माहौल बना रहा तथा महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए पर्व की गरिमा को और बढ़ाया।2
- पुराना कचेहरी के पीछे मांझापारा में फिर निकला 5 फीट का अजगर, लोगो की चिंता बढ़ी 2 सितंबर शाम 7 बजे मांझापारा राजमाता मंदिर के पास लगभग 5 फीट लंबा अजगर निकला। लगातार जंगली जानवर और जीव जंतु के रिहायशी इलाके आने व,निकलने से लोगो की चिंता बड़ा दिया है। जिले में लगातार भालू के हमले और,अजगर से लेकर जहरीले सांप के निकलने से लोगो की नीद उड़ा दी है। अच्छी बात यह है की वन विभाग द्वारा सहायता के लिए एक ग्रुप बना दिया है। जिसमें केवल वन्य प्राणियों की सूचना देने के कुछ देर में रेस्क्यू टीम उस जगह पे पहुंच जाते है। सोमवार की रात में न्यायिक कर्मचारी कालोनी में निकला था लगभग 10 फीट का अजगर। मंगलवार को मांझापारा में दोपहर 1 बजे लगभग 10 फीट से बड़ा अजगर निकला था। जिसे वन विभाग की टीम ने लगभग 8 घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद, सुरक्षित पकड़ कर जंगल में छोड़ दिया। और आज बुधवार को शाम 7 बजे पुराना कचहरी के पीछे,मांझापारा में राज माता मंदिर के पास लगभग 5 फीट का अजगर निकला।अजगर निकलने की खबर सुन कर लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई अजगर को देखने के लिए।1