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User8788
- User8788सरमथुरा, धौलपुर, राजस्थानsarmathura Dholpur Rajasthanon 17 February
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- आंगनबाड़ी केंद्र Chhawer फर्स्ट की हालत हो रही है4
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- करौली शहर शहर जिले भर में गर्मियों में पक्षियों को पानी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से करौली पुलिस अधीक्षक लोकेश सोनवाल ने 'एक परिंदा मेरा भी' अभियान की शुरुआत की। इस पहल के तहत शहर सहित जिलेभर में सार्वजनिक स्थानों, घरों और संस्थानों पर परिंडे लगाकर पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था करने का संदेश दिया जा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता पुष्पेंन्द्र गारूवाल करई ने गुरुवार सुबह 11:00 बजे बताया कि अभियान की शुरुआत एसपी ऑफिस के गार्डन से की गई है। उन्होंने लोगों से अपील की प्रत्येक व्यक्ति को पानी से भरे परिंडे लगाने चाहिए।1
- उत्तर भारत का प्रसिद्ध आस्थाधाम मां कैलादेवी का चैत्र मेला 16 मार्च से प्रारंभ होगा मेले की तैयारी को लेकर जिला प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट ने सभी तैयारियां पूरी कर ली है।1
- चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला शीतला अष्टमी (बसोड़ा) का पर्व इस बार सोमवार और बुधवार को बड़े उत्साह और पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया गया। ग्रहण और तिथियों के विशेष संयोग के कारण महिलाओं ने दो दिनों तक शीतला माता की विशेष पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। *बासी भोजन का लगाया भोग* धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शीतला माता को ठंडी चीजें अत्यंत प्रिय मानी जाती हैं। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए महिलाओं ने माता को दही-चावल, लापसी और विभिन्न मीठे व्यंजनों का भोग लगाया। परंपरा के अनुसार इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया गया और एक दिन पहले तैयार किया गया बासी भोजन ही सुबह और शाम प्रसाद के रूप में ग्रहण किया गया। *निरोगी काया की प्रार्थना* पूजा के दौरान महिलाओं ने शीतला माता से अपने परिवार की सुख-शांति और विशेष रूप से निरोगी काया (अच्छे स्वास्थ्य) का आशीर्वाद मांगा। मंदिरों में दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर समितियों और प्रशासन द्वारा विशेष व्यवस्थाएं भी की गईं। *बसोड़ा का धार्मिक महत्व* हिंदू पंचांग के अनुसार ऋतु परिवर्तन के समय मनाया जाने वाला यह पर्व स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने का संदेश देता है। शीतला माता को स्वच्छता और शीतलता की देवी माना जाता है, इसलिए उन्हें बासी और ठंडे भोजन का भोग लगाने की यह प्राचीन परंपरा आज भी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।2
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