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बीकानेर के कोलायत से खबर कोलायत कॉलेज में छात्रसंघ चुनाव बहाली को लेकर NSUI का प्रदर्शन महाविद्यालय के मुख्य द्वार पर छात्रों ने किया विरोध-प्रदर्शन छात्रसंघ चुनाव की तिथि घोषित करने की उठाई मांग NSUI जिलाध्यक्ष श्रीकृष्ण गोदारा बोले- छात्रसंघ लोकतंत्र की पहली पाठशाला चुनाव बहाल नहीं होने तक आंदोलन जारी रखने की चेतावनी प्रदर्शन में प्रदेश महासचिव अशोक मेघवाल, विधानसभा अध्यक्ष रोहित चौहान, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष रणजीत सिंह सहित बड़ी संख्या में छात्र और NSUI कार्यकर्ता रहे मौजूद
गांव री खबरा
बीकानेर के कोलायत से खबर कोलायत कॉलेज में छात्रसंघ चुनाव बहाली को लेकर NSUI का प्रदर्शन महाविद्यालय के मुख्य द्वार पर छात्रों ने किया विरोध-प्रदर्शन छात्रसंघ चुनाव की तिथि घोषित करने की उठाई मांग NSUI जिलाध्यक्ष श्रीकृष्ण गोदारा बोले- छात्रसंघ लोकतंत्र की पहली पाठशाला चुनाव बहाल नहीं होने तक आंदोलन जारी रखने की चेतावनी प्रदर्शन में प्रदेश महासचिव अशोक मेघवाल, विधानसभा अध्यक्ष रोहित चौहान, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष रणजीत सिंह सहित बड़ी संख्या में छात्र और NSUI कार्यकर्ता रहे मौजूद
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- चक 7 DOBB में लंबे समय से बारिश नहीं होने के कारण किसानों की फसलों नष्ट हो रही हें आज भगवान इंद्र को खुश करने के लिए सभी किसानों ने मिलकर मीठी परशादी बनाई और हवन भी किया इस अवसर पर विसनाराम कडे़ला माणकासर मागीलाल पवार तुलछाराम कडे़ला इमाम खान भीयाराम प्यारे लाल जी चिनिया अर्जुन रेवंत राम चेनाराम गुले खान विशनाराम कडे़ला ने बताया कि 8 सालों से लागोतर हवन करते आए हैं आज तक की सफल हो वा हें मूंगफली की बिजाई हुई ने दो महीना हो चुके हैं लेकिन अभी तक अच्छी बारिश नहीं हुई टाइम पर बिजली भी नहीं मिल रही है किसानों को1
- राहुल गांधी का केंद्र पर बड़ा हमला छात्रों को माफी नहीं सरकार से सच न्याय और माफी चाहिए तमिलनाडु दौरे के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने नीट प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा रद्द होने के बाद जान गंवाने वाले तीन मेडिकल अभ्यर्थियों—गोपिका, रोशिनी और वेत्री आनंदन—के परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि हर परिवार का एक ही सवाल था कि ईमानदारी से मेहनत करने वाले छात्रों को भ्रष्ट व्यवस्था की सजा क्यों भुगतनी पड़ रही है। राहुल गांधी ने कहा कि प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा रद्द होने और दोबारा परीक्षा कराने से छात्रों पर असहनीय मानसिक दबाव पड़ा। उन्होंने कहा कि हर आंकड़े के पीछे एक छात्र का सपना और एक परिवार का दर्द छिपा है। उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई ऐसी शिक्षा व्यवस्था के लिए है जहां मेहनत का सम्मान हो, परीक्षाएं निष्पक्ष हों और किसी छात्र को संस्थागत विफलताओं की कीमत अपनी जान देकर न चुकानी पड़े। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि भारत के छात्रों को किसी माफी की जरूरत नहीं है। सरकार को छात्रों के सामने सच रखना चाहिए, उन्हें न्याय देना चाहिए और उनसे माफी मांगनी चाहिए।1
- कर्बला का दर्दनाक और रूहानी इतिहास: इमाम-ए-हुसैन की शहादत से चेहलुम तक इतिहास के पन्नों में जब-जब सच्चाई, न्याय और धर्म की रक्षा की मिसाल दी जाएगी, तब-तब कर्बला की उस पावन और गमगीन दास्तां को नम आँखों से याद किया जाएगा। यह कहानी है पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे (दोहिते), जिगर के टुकड़े, हजरत इमाम हुसैन (इमाम-ए-अली मकाम) और उनके परिवार व वफादार साथियों के उस महान बलिदान की, जिसे आज भी याद कर हर आँख छलक उठती है। 1. सत्य और असत्य का टकराव: बइअत से इनकार हजरत अली के विसाल के बाद जब राजनीतिक हालात बदले, तो यज़ीद बिन मुआविया ने खुद को मुस्लिम जगत का खलीफा घोषित कर दिया। यज़ीद चाहता था कि इमाम हुसैन उसकी सत्ता के आगे झुकें और उसके हक में 'बइअत' (निष्ठा की शपथ) दें। लेकिन इमाम हुसैन भली-भांति जानते थे कि यज़ीद का चरित्र और उसका शासन इस्लाम के मूल उसूलों, न्याय, और इंसानी नैतिकता के बिल्कुल खिलाफ है। इमाम हुसैन ने फरमाया कि "मुझ जैसा इंसान यज़ीद जैसे तानाशाह की बैअत कभी नहीं कर सकता।" उन्होंने दीन-ए-इस्लाम और इंसानियत को बचाने के लिए यज़ीद की तानाशाही के सामने अपनी गर्दन झुकाने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा। 2. मदीना से कर्बला का तन्हा सफर अपने नाना (पैगंबर साहब) के शहर मदीना में अपनी जान को खतरा देख और जुल्म से बचने के लिए, इमाम हुसैन ने अपने परिवार और कुछ चुनिंदा वफादार साथियों (जिनमें महिलाएं, छोटे-छोटे बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे) के साथ मदीना छोड़ा। कूफा के लोगों के लगातार बुलावा भेजने पर वे इрак की तरफ बढ़े। लेकिन रास्ते में हालात बदल चुके थे। यज़ीद की खूंखार और विशाल फौज ने उनके काफिले को कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान में घेर लिया। फरात नदी के बहते हुए पानी पर पाबंदी लगा दी गई। जरा सोचिए उस मंज़र को—जहाँ खेमों में मासूम बच्चे भूख और प्यास से तड़प रहे हों, हलक सूख रहे हों, लेकिन इन सबके बावजूद इमाम हुसैन और उनके साथियों के हौसले और ईमान में एक इंच की भी कमजोरी नहीं आई। 3. मुहर्रम की 10 तारीख (आशूरा): कर्बला का कत्लेआम मुहर्रम की 10वीं तारीख (आशूरा) का सूरज कयामत बनकर उभरा। एक तरफ यज़ीद की हजारों हथियारों से लैस फौज थी, और दूसरी तरफ मुट्ठीभर (महज 72) प्यासे और जांबाज लोग थे। एक-एक कर इमाम हुसैन के घर के जवान बेटों, भाइयों और साथियों ने मैदान-ए-जंग में कदम रखा। हजरत अब्बास की वफादारी, युवा हजरत अली अकबर की शहादत और गोद के छह महीने के मासूम अली असगर के सीने पर तीर लगने का वह दर्दनाक वाक़या आज भी सीने को छलनी कर देता है। जब परिवार का हर पुरुष शहीद हो गया, तब शाम के वक्त खुद इमाम-ए-हुसैन जख्मों से चूर, भूखे-प्यासे मैदान में उतरे। उन्होंने सजदे की हालत में, खुदा की इबादत करते हुए अपना सिर कटा लिया, लेकिन ظालिम (जालिम) के आगे अपना सिर नहीं झुकाया। उस रेत पर बिखरा हुआ खून गवाही दे रहा था कि जिस्म कट सकते हैं, लेकिन हक और सच कभी नहीं मर सकता। 4. ताजिया, मन्नत और अकीदे का सिलसिला उनकी इस महान शहादत की याद सिर्फ दिलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सदियों से यह गम और मोहब्बत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। ताजिये की स्थापना और जुलूस: मोहर्रम की 9वीं, 10वीं और उसके ठीक 40वें दिन (चेहलुम) पर इमाम बाड़ों से ताजिए निकाले जाते हैं और उन्हें बहुत अदब के साथ अपने-अपने स्थानों पर बैठाया जाता है। मान्यताओं का अटूट समंदर: लोगों का यह अटूट और पाक विश्वास है कि इमाम-ए-हुसैन और उनके परिवार की बारगाह में जो भी सच्ची नीयत से आता है, खाली गोदें भर जाती हैं और हर बीमारी व बला दूर होती है। ताजिये के नीचे से गुजरने की रस्म: इस मुबारक मौके पर बच्चे और बड़े अकीदत के साथ ताजिए के नीचे से होकर गुजरते हैं, जिसे कर्बला के शहीदों की बरकत और सलामती का जरिया माना जाता है। कुरान खानी और दुआएं: हर मजहब और हर वर्ग के लोग अपने-अपने तरीके से कलाम-पाक पढ़ते हैं, कुरान खानी करते हैं और इमाम-ए-अली मकाम की याद में आँखें नम करके फातिहा व दुआएं मांगते हैं। 5. चेहलुम और रूहानी पैगाम आज कर्बला की घटना को सदियां बीत चुकी हैं, लेकिन इमाम हुसैन का नाम आज भी जिंदा है। बीकानेर शहर से लेकर देश के हर कोने और मदीना शरीफ तक, आज चेहलुम के मौके पर हर आँख नम है और दिल में एक ही हूक उठती है— "या हुसैन!" आज का दिन सिर्फ एक मातम का दिन नहीं है, बल्कि यह हमें यह याद दिलाने के लिए है कि जब-जब दुनिया में जुल्म और अहंकार बढ़ेगा, तब-तब हुसैन का किरदार और कर्बला का सबक हमें यह सिखाएगा कि जान चली जाए तो जाए, लेकिन जुल्म के आगे कभी झुकना नहीं है। कर्बला का दर्दनाक और रूहानी इतिहास: इमाम-ए-हुसैन की शहादत से चेहलुम तक इतिहास के पन्नों में जब-जब सच्चाई, न्याय और धर्म की रक्षा की मिसाल दी जाएगी, तब-तब कर्बला की उस पावन और गमगीन दास्तां को नम आँखों से याद किया जाएगा। यह कहानी है पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे (दोहिते), जिगर के टुकड़े, हजरत इमाम हुसैन (इमाम-ए-अली मकाम) और उनके परिवार व वफादार साथियों के उस महान बलिदान की, जिसे आज भी याद कर हर आँख छलक उठती है। 1. सत्य और असत्य का टकराव: बइअत से इनकार हजरत अली के विसाल के बाद जब राजनीतिक हालात बदले, तो यज़ीद बिन मुआविया ने खुद को मुस्लिम जगत का खलीफा घोषित कर दिया। यज़ीद चाहता था कि इमाम हुसैन उसकी सत्ता के आगे झुकें और उसके हक में 'बइअत' (निष्ठा की शपथ) दें। लेकिन इमाम हुसैन भली-भांति जानते थे कि यज़ीद का चरित्र और उसका शासन इस्लाम के मूल उसूलों, न्याय, और इंसानी नैतिकता के बिल्कुल खिलाफ है। इमाम हुसैन ने फरमाया कि "मुझ जैसा इंसान यज़ीद जैसे तानाशाह की बैअत कभी नहीं कर सकता।" उन्होंने दीन-ए-इस्लाम और इंसानियत को बचाने के लिए यज़ीद की तानाशाही के सामने अपनी गर्दन झुकाने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा। 2. मदीना से कर्बला का तन्हा सफर अपने नाना (पैगंबर साहब) के शहर मदीना में अपनी जान को खतरा देख और जुल्म से बचने के लिए, इमाम हुसैन ने अपने परिवार और कुछ चुनिंदा वफादार साथियों (जिनमें महिलाएं, छोटे-छोटे बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे) के साथ मदीना छोड़ा। कूफा के लोगों के लगातार बुलावा भेजने पर वे इрак की तरफ बढ़े। लेकिन रास्ते में हालात बदल चुके थे। यज़ीद की खूंखार और विशाल फौज ने उनके काफिले को कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान में घेर लिया। फरात नदी के बहते हुए पानी पर पाबंदी लगा दी गई। जरा सोचिए उस मंज़र को—जहाँ खेमों में मासूम बच्चे भूख और प्यास से तड़प रहे हों, हलक सूख रहे हों, लेकिन इन सबके बावजूद इमाम हुसैन और उनके साथियों के हौसले और ईमान में एक इंच की भी कमजोरी नहीं आई। 3. मुहर्रम की 10 तारीख (आशूरा): कर्बला का कत्लेआम मुहर्रम की 10वीं तारीख (आशूरा) का सूरज कयामत बनकर उभरा। एक तरफ यज़ीद की हजारों हथियारों से लैस फौज थी, और दूसरी तरफ मुट्ठीभर (महज 72) प्यासे और जांबाज लोग थे। एक-एक कर इमाम हुसैन के घर के जवान बेटों, भाइयों और साथियों ने मैदान-ए-जंग में कदम रखा। हजरत अब्बास की वफादारी, युवा हजरत अली अकबर की शहादत और गोद के छह महीने के मासूम अली असगर के सीने पर तीर लगने का वह दर्दनाक वाक़या आज भी सीने को छलनी कर देता है। जब परिवार का हर पुरुष शहीद हो गया, तब शाम के वक्त खुद इमाम-ए-हुसैन जख्मों से चूर, भूखे-प्यासे मैदान में उतरे। उन्होंने सजदे की हालत में, खुदा की इबादत करते हुए अपना सिर कटा लिया, लेकिन ظालिम (जालिम) के आगे अपना सिर नहीं झुकाया। उस रेत पर बिखरा हुआ खून गवाही दे रहा था कि जिस्म कट सकते हैं, लेकिन हक और सच कभी नहीं मर सकता। 4. ताजिया, मन्नत और अकीदे का सिलसिला उनकी इस महान शहादत की याद सिर्फ दिलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सदियों से यह गम और मोहब्बत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। ताजिये की स्थापना और जुलूस: मोहर्रम की 9वीं, 10वीं और उसके ठीक 40वें दिन (चेहलुम) पर इमाम बाड़ों से ताजिए निकाले जाते हैं और उन्हें बहुत अदब के साथ अपने-अपने स्थानों पर बैठाया जाता है। मान्यताओं का अटूट समंदर: लोगों का यह अटूट और पाक विश्वास है कि इमाम-ए-हुसैन और उनके परिवार की बारगाह में जो भी सच्ची नीयत से आता है, खाली गोदें भर जाती हैं और हर बीमारी व बला दूर होती है। ताजिये के नीचे से गुजरने की रस्म: इस मुबारक मौके पर बच्चे और बड़े अकीदत के साथ ताजिए के नीचे से होकर गुजरते हैं, जिसे कर्बला के शहीदों की बरकत और सलामती का जरिया माना जाता है। कुरान खानी और दुआएं: हर मजहब और हर वर्ग के लोग अपने-अपने तरीके से कलाम-पाक पढ़ते हैं, कुरान खानी करते हैं और इमाम-ए-अली मकाम की याद में आँखें नम करके फातिहा व दुआएं मांगते हैं। 5. चेहलुम और रूहानी पैगाम आज कर्बला की घटना को सदियां बीत चुकी हैं, लेकिन इमाम हुसैन का नाम आज भी जिंदा है। बीकानेर शहर से लेकर देश के हर कोने और मदीना शरीफ तक, आज चेहलुम के मौके पर हर आँख नम है और दिल में एक ही हूक उठती है— "या हुसैन!" आज का दिन सिर्फ एक मातम का दिन नहीं है, बल्कि यह हमें यह याद दिलाने के लिए है कि जब-जब दुनिया में जुल्म और अहंकार बढ़ेगा, तब-तब हुसैन का किरदार और कर्बला का सबक हमें यह सिखाएगा कि जान चली जाए तो जाए, लेकिन जुल्म के आगे कभी झुकना नहीं है।1
- बीकानेर के कोलायत से खबर कोलायत कॉलेज में छात्रसंघ चुनाव बहाली को लेकर NSUI का प्रदर्शन महाविद्यालय के मुख्य द्वार पर छात्रों ने किया विरोध-प्रदर्शन छात्रसंघ चुनाव की तिथि घोषित करने की उठाई मांग NSUI जिलाध्यक्ष श्रीकृष्ण गोदारा बोले- छात्रसंघ लोकतंत्र की पहली पाठशाला चुनाव बहाल नहीं होने तक आंदोलन जारी रखने की चेतावनी प्रदर्शन में प्रदेश महासचिव अशोक मेघवाल, विधानसभा अध्यक्ष रोहित चौहान, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष रणजीत सिंह सहित बड़ी संख्या में छात्र और NSUI कार्यकर्ता रहे मौजूद1
- छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर NSUI का प्रदर्शन, टायर जलाकर सरकार के ख छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर NSUI का प्रदर्शन, टायर जलाकर सरकार के खिलाफ की नारेबाजी श्रीकोलायत। राजस्थान में लंबे समय से छात्रसंघ चुनाव नहीं कराए जाने के विरोध में मंगलवार को राजकीय स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय श्रीकोलायत के बाहर एनएसयूआई कार्यकर्ताओं और विद्यार्थियों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान छात्रों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए टायर जलाकर अपना विरोध दर्ज कराया तथा छात्रसंघ चुनाव शीघ्र बहाल करने की मांग उठाई। प्रदर्शन के बाद विद्यार्थियों ने मुख्यमंत्री के नाम उपखंड अधिकारी के माध्यम से ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में बताया गया कि लोकतंत्र की पहली पाठशाला छात्रसंघ चुनाव माने जाते हैं, लेकिन पिछले कई वर्षों से चुनाव नहीं होने के कारण प्रदेश के लाखों छात्र अपने संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित हैं। इससे महाविद्यालयों में छात्रों की समस्याओं के समाधान के लिए प्रतिनिधित्व का अभाव बना हुआ है। NSUI प्रदेश महासचिव अशोक मेघवाल ने बताया कि ज्ञापन में मांग की गई कि राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव की तिथि शीघ्र घोषित कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पुनः बहाल किया जाए, ताकि विद्यार्थियों को अपना प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिल सके। इस दौरान एनएसयूआई जिला अध्यक्ष श्रीकृष्ण गोदारा के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने सरकार से जल्द निर्णय लेने की मांग करते हुए चेतावनी दी कि यदि छात्रसंघ चुनाव शीघ्र घोषित नहीं किए गए तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। प्रदर्शन में पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष रणजीत सिँह, बबलू सेन, रोहित, शहजाद खान, अकाश, महेंद्र मेघवाल, राजेश जाजड़ा, विशाखा सेन सहित बड़ी संख्या में एनएसयूआई पदाधिकारी, कार्यकर्ता एवं राजकीय स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय श्रीकोलायत के विद्यार्थी उपस्थित रहे।1