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डोंगरगढ़ का रहस्य: राजा वीरसेन की तपस्या से लेकर 1600 फीट ऊंची पहाड़ी पर माँ के अवतरण तक की पूरी कथा। डोंगरगढ़ की माँ बम्लेश्वरी: 2200 साल पुरानी आस्था की अमर गाथा, जहां प्रेम, भक्ति और चमत्कार एक साथ बुनते हैं देवी का दरबार! छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में पहाड़ी पर विराजमान यह शक्तिपीठ लाखों भक्तों की मनोकामना पूरी करता है – जानिए पूरी कथा, राजाओं की भक्ति से लेकर प्रेमियों के पुनर्जीवन तक नमस्कार दोस्तों, आप देख रहे हैं द छत्तीसगढ़ चैनल। मैं हूं आपके साथ योगेश कुमार साहू। आज हम लेकर आए हैं छत्तीसगढ़ की सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ माँ बम्लेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़ की पूरी कहानी। यह सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि 2200 वर्ष पुरानी भक्ति, राजसी इतिहास और एक अनोखी प्रेम कथा का जीवंत साक्षी है। चैत्र नवरात्र 2026 में यहां लाखों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं – 1000 सीढ़ियां चढ़कर, रोपवे से या पैदल – सब माँ के दर्शन के लिए। 7 दिनों में 10 लाख से ज्यादा भक्त आ चुके हैं, और मंदिर 8 हजार से ज्यादा ज्योति कलशों से जगमगा रहा है। प्रसाद योजना के तहत नए पर्यटक सुविधा केंद्र भी बन चुके हैं। लेकिन असली महिमा तो माँ की चमत्कारी कहानी में है। चलिए, विस्तार से जानते हैं। 1600 फीट ऊंची पहाड़ी पर बड़ी बम्लेश्वरी, नीचे छोटी बम्लेश्वरी और मंझली रणचंडी – तीनों स्वरूपों में माँ बगलामुखी (दुर्गा का रूप) जागृत हैं। प्राचीन नाम था कामाख्या नगरी या कामावती नगर। यहां की यात्रा हर भक्त को माँ के चरणों में ले जाती है। 2200 वर्ष पुरानी शुरुआत: राजा वीरसेन की संतानहीन पीड़ा और मंदिर की नींव करीब 2200 साल पहले, कामाख्या नगरी में राजा वीरसेन का शासन था। वे प्रजापालक थे, लेकिन संतान नहीं थी। पंडितों की सलाह पर उन्होंने शिवजी और माँ दुर्गा की एक साल तक कठोर तपस्या की। देवी-देवता प्रसन्न हुए, रानी को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ – नाम रखा मदनसेन। आभार में राजा ने पहाड़ी पर माँ बम्लेश्वरी (दुर्गा का शक्तिरूप) का मंदिर बनवाया। यहीं से शुरू हुई इस धाम की यात्रा। मदनसेन के बाद उनके पुत्र राजा कामसेन गद्दी पर आए। वे भी माँ बगलामुखी के परम भक्त थे। राजा कामसेन की तपस्या और माँ का पहाड़ी पर अवतरण कामसेन ने तपोबल से माँ बगलामुखी को इतना प्रसन्न किया कि विनती की – “माँ, पहाड़ी की चोटी पर विराजमान हो जाओ, ताकि प्रजा आसानी से दर्शन कर सके।” माँ प्रसन्न हुईं और बड़ी बम्लेश्वरी स्वरूप में प्रकट हो गईं। लेकिन जंगल और दुर्गम रास्ते से भक्तों को कष्ट होता देख राजा ने फिर प्रार्थना की – “माँ, नीचे भी विराजमान हो जाओ।” माँ ने उनकी भक्ति और प्रजा-कल्याण की भावना देखी, और पहाड़ से उतरकर छोटी बम्लेश्वरी व मंझली रणचंडी के रूप में जागृत हो गईं। आज भी तीनों माताएं भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं। अब आती है वो सबसे भावुक प्रेम कथा – माधवानल और कामकंदला की जुदाई और माँ का चमत्कार यह कथा मंदिर की सबसे प्रसिद्ध है। कामाख्या नगरी संगीत-नृत्य की नगरी थी। राजा कामसेन के दरबार में गायक माधवानल और नृतकी कामकंदला आए। दोनों पहली नजर में प्रेम में पड़ गए। एक बार नृत्य में ताल बिगड़ने पर माधवानल ने कारण बताया। राजा प्रसन्न होकर मोतियों की माला दी, लेकिन माधवानल ने उसे कामकंदला को सौंप दिया। राजा क्रोधित हुए और माधवानल को निकाल दिया। राजकुमार मदनादित्य भी कामकंदला पर मोहित था। उसने राजद्रोह का आरोप लगाकर कामकंदला को बंदी बना लिया। माधवानल मदद के लिए उज्जैन पहुंचे – राजा विक्रमादित्य के पास। विक्रमादित्य ने युद्ध किया, शिव-दुर्गा के हस्तक्षेप से संधि हुई। लेकिन विक्रमादित्य ने परीक्षा ली – झूठ बोला कि माधवानल मर गया। दुख से कामकंदला ने तालाब में कूदकर प्राण त्याग दिए। माधवानल को पता चला तो उसने भी जीवन समाप्त कर दिया। यहां हुआ चमत्कार! विक्रमादित्य ने माँ बगलामुखी को आह्वान किया। माँ प्रकट हुईं, दोनों प्रेमियों को जीवित किया और कहा – “सच्चा प्रेम कभी नहीं मरता। मैं यहां जागृत रूप में रहूंगी, सच्चे प्रेमियों और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करूंगी।” यही कारण है कि माँ बम्लेश्वरी को “प्रेमियों की देवी” भी कहा जाता है। यह कथा ‘माधवानल कामकंदला’ ग्रंथ में विस्तार से है। मंदिर का वर्णन और वर्तमान महिमा बड़ी बम्लेश्वरी 1600 फीट ऊंची पहाड़ी पर है – 1000+ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर भव्य, माँ की मूर्ति चमकदार। नीचे छोटी बम्लेश्वरी अक्षरधाम शैली में – 8 द्वार, 44 स्तंभ, 95 फीट ऊंचा। गर्भगृह सोने-चांदी से सजा। चारों ओर हरा-भरा जंगल, तालाब – प्रकृति का अद्भुत संगम। ट्रस्ट (1976 से) संचालित। रोपवे, धर्मशालाएं, भोजनालय सब उपलब्ध। नवरात्र में नारियल चढ़ाव, ज्योति कलश – मंदिर जगमगाता है। भक्त कहते हैं – “सच्चे दिल से मांगी मनोकामना पूरी होती है।” संतान, विवाह, नौकरी, स्वास्थ्य – सब मिलता है। कैसे पहुंचें? • रेल: डोंगरगढ़ जंक्शन (मुंबई-हावड़ा रूट) • सड़क: राजनांदगांव से 35 किमी, रायपुर से 106 किमी (NH-6) • हवाई: रायपुर एयरपोर्ट (72 किमी) दोस्तों, डोंगरगढ़ की माँ बम्लेश्वरी सिर्फ धाम नहीं, छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर हैं। यहां राजा वीरसेन की भक्ति, कामसेन की तपस्या और माधवानल-कामकंदला का प्रेम एक साथ सांस लेता है। जो एक बार आता है, बार-बार लौटना चाहता है। अगर आप भी माँ के दरबार में जाना चाहते हैं, तो बस मन में संकल्प लीजिए – माँ जरूर बुलाएंगी। जय माँ बम्लेश्वरी! जय छत्तीसगढ़! धन्यवाद देखने के लिए। अगर आपको यह वीडियो पसंद आया तो लाइक, शेयर और सब्सक्राइब जरूर करें। बेल आइकन दबाकर नोटिफिकेशन ऑन रखें, ताकि छत्तीसगढ़ की हर खबर और कहानी सबसे पहले आप तक पहुंचे। नमस्कार, जय जोहार!

11 hrs ago
user_YOGESH KUAMR SAHU
YOGESH KUAMR SAHU
News Anchor बालोद, बालोद, छत्तीसगढ़•
11 hrs ago

डोंगरगढ़ का रहस्य: राजा वीरसेन की तपस्या से लेकर 1600 फीट ऊंची पहाड़ी पर माँ के अवतरण तक की पूरी कथा। डोंगरगढ़ की माँ बम्लेश्वरी: 2200 साल पुरानी आस्था की अमर गाथा, जहां प्रेम, भक्ति और चमत्कार एक साथ बुनते हैं देवी का दरबार! छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में पहाड़ी पर विराजमान यह शक्तिपीठ लाखों भक्तों की मनोकामना पूरी करता है – जानिए पूरी कथा, राजाओं की भक्ति से लेकर प्रेमियों के पुनर्जीवन तक नमस्कार दोस्तों, आप देख रहे हैं द छत्तीसगढ़ चैनल। मैं हूं आपके साथ योगेश कुमार साहू। आज हम लेकर आए हैं छत्तीसगढ़ की सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ माँ बम्लेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़ की पूरी कहानी। यह सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि 2200 वर्ष पुरानी भक्ति, राजसी इतिहास और एक अनोखी प्रेम कथा का जीवंत साक्षी है। चैत्र नवरात्र 2026 में यहां लाखों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं – 1000 सीढ़ियां चढ़कर, रोपवे से या पैदल – सब माँ के दर्शन के लिए। 7 दिनों में 10 लाख से ज्यादा भक्त आ चुके हैं, और मंदिर 8 हजार से ज्यादा ज्योति कलशों से जगमगा रहा है। प्रसाद योजना के तहत नए पर्यटक सुविधा केंद्र भी बन चुके हैं। लेकिन असली महिमा तो माँ की चमत्कारी कहानी में है। चलिए, विस्तार से जानते हैं। 1600 फीट ऊंची पहाड़ी पर बड़ी बम्लेश्वरी, नीचे छोटी बम्लेश्वरी और मंझली रणचंडी – तीनों स्वरूपों में माँ बगलामुखी (दुर्गा का रूप) जागृत हैं। प्राचीन नाम था कामाख्या नगरी या कामावती नगर। यहां की यात्रा हर भक्त को माँ के चरणों में ले जाती है। 2200 वर्ष पुरानी शुरुआत: राजा वीरसेन की संतानहीन पीड़ा और मंदिर की नींव करीब 2200 साल पहले, कामाख्या नगरी में राजा वीरसेन का शासन था। वे प्रजापालक थे, लेकिन संतान नहीं थी। पंडितों की सलाह पर उन्होंने शिवजी और माँ दुर्गा की एक साल तक कठोर तपस्या की। देवी-देवता प्रसन्न हुए, रानी को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ – नाम रखा मदनसेन। आभार में राजा ने पहाड़ी पर माँ बम्लेश्वरी (दुर्गा का शक्तिरूप) का मंदिर बनवाया। यहीं से शुरू हुई इस धाम की यात्रा। मदनसेन के बाद उनके पुत्र राजा कामसेन गद्दी पर आए। वे भी माँ बगलामुखी के परम भक्त थे। राजा कामसेन की तपस्या और माँ का पहाड़ी पर अवतरण कामसेन ने तपोबल से माँ बगलामुखी को इतना प्रसन्न किया कि विनती की – “माँ, पहाड़ी की चोटी पर विराजमान हो जाओ, ताकि प्रजा आसानी से दर्शन कर सके।” माँ प्रसन्न हुईं और बड़ी बम्लेश्वरी स्वरूप में प्रकट हो गईं। लेकिन जंगल और दुर्गम रास्ते से भक्तों को कष्ट होता देख राजा ने फिर प्रार्थना की – “माँ, नीचे भी विराजमान हो जाओ।” माँ ने उनकी भक्ति और प्रजा-कल्याण की भावना देखी, और पहाड़ से उतरकर छोटी बम्लेश्वरी व मंझली रणचंडी के रूप में जागृत हो गईं। आज भी तीनों माताएं भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं। अब आती है वो सबसे भावुक प्रेम कथा – माधवानल और कामकंदला की जुदाई और माँ का चमत्कार यह कथा मंदिर की सबसे प्रसिद्ध है। कामाख्या नगरी संगीत-नृत्य की नगरी थी। राजा कामसेन के दरबार में गायक माधवानल और नृतकी कामकंदला आए। दोनों पहली नजर में प्रेम में पड़ गए। एक बार नृत्य में ताल बिगड़ने पर माधवानल ने कारण बताया। राजा प्रसन्न होकर मोतियों की माला दी, लेकिन माधवानल ने उसे कामकंदला को सौंप दिया। राजा क्रोधित हुए और माधवानल को निकाल दिया। राजकुमार मदनादित्य भी कामकंदला पर मोहित था। उसने राजद्रोह का आरोप लगाकर कामकंदला को बंदी बना लिया। माधवानल मदद के लिए उज्जैन पहुंचे – राजा विक्रमादित्य के पास। विक्रमादित्य ने युद्ध किया, शिव-दुर्गा के हस्तक्षेप से संधि हुई। लेकिन विक्रमादित्य ने परीक्षा ली – झूठ बोला कि माधवानल मर गया। दुख से कामकंदला ने तालाब में कूदकर प्राण त्याग दिए। माधवानल को पता चला तो उसने भी जीवन समाप्त कर दिया। यहां हुआ चमत्कार! विक्रमादित्य ने माँ बगलामुखी को आह्वान किया। माँ प्रकट हुईं, दोनों प्रेमियों को जीवित किया और कहा – “सच्चा प्रेम कभी नहीं मरता। मैं यहां जागृत रूप में रहूंगी, सच्चे प्रेमियों और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करूंगी।” यही कारण है कि माँ बम्लेश्वरी को “प्रेमियों की देवी” भी कहा जाता है। यह कथा ‘माधवानल कामकंदला’ ग्रंथ में विस्तार से है। मंदिर का वर्णन और वर्तमान महिमा बड़ी बम्लेश्वरी 1600 फीट ऊंची पहाड़ी पर है – 1000+ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर भव्य, माँ की मूर्ति चमकदार। नीचे छोटी बम्लेश्वरी अक्षरधाम शैली में – 8 द्वार, 44 स्तंभ, 95 फीट ऊंचा। गर्भगृह सोने-चांदी से सजा। चारों ओर हरा-भरा जंगल, तालाब – प्रकृति का अद्भुत संगम। ट्रस्ट (1976 से) संचालित। रोपवे, धर्मशालाएं, भोजनालय सब उपलब्ध। नवरात्र में नारियल चढ़ाव, ज्योति कलश – मंदिर जगमगाता है। भक्त कहते हैं – “सच्चे दिल से मांगी मनोकामना पूरी होती है।” संतान, विवाह, नौकरी, स्वास्थ्य – सब मिलता है। कैसे पहुंचें? • रेल: डोंगरगढ़ जंक्शन (मुंबई-हावड़ा रूट) • सड़क: राजनांदगांव से 35 किमी, रायपुर से 106 किमी (NH-6) • हवाई: रायपुर एयरपोर्ट (72 किमी) दोस्तों, डोंगरगढ़ की माँ बम्लेश्वरी सिर्फ धाम नहीं, छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर हैं। यहां राजा वीरसेन की भक्ति, कामसेन की तपस्या और माधवानल-कामकंदला का प्रेम एक साथ सांस लेता है। जो एक बार आता है, बार-बार लौटना चाहता है। अगर आप भी माँ के दरबार में जाना चाहते हैं, तो बस मन में संकल्प लीजिए – माँ जरूर बुलाएंगी। जय माँ बम्लेश्वरी! जय छत्तीसगढ़! धन्यवाद देखने के लिए। अगर आपको यह वीडियो पसंद आया तो लाइक, शेयर और सब्सक्राइब जरूर करें। बेल आइकन दबाकर नोटिफिकेशन ऑन रखें, ताकि छत्तीसगढ़ की हर खबर और कहानी सबसे पहले आप तक पहुंचे। नमस्कार, जय जोहार!

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  • नमस्कार जय जोहार जय छत्तीसगढ़ आप देख रहे हैं द छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में पुलिस और स्पेशल टीम ने एक बड़ी सफलता हासिल की है। 34 नग बिना तराशे हुए हीरे (रॉ डायमंड्स) के साथ एक अंतरराज्यीय तस्कर को गिरफ्तार किया गया है। इन हीरों की अनुमानित कीमत 63 लाख 50 हजार रुपये बताई जा रही है। आरोपी ग्राहक की तलाश में नहरगांव स्कूल के पास घूम रहा था, तभी पुलिस की नजर पड़ गई। घटना की विस्तृत जानकारी कुछ यूं है… गरियाबंद पुलिस और स्पेशल टीम की सतर्कता के कारण उड़ीसा के कालाहांडी जिले का निवासी बंशी शेट्टी (पिता डमरू शेट्टी, उम्र 50 वर्ष, निवासी भवानीपटम धोबीपारा, जिला कालाहांडी, उड़ीसा) को रंगे हाथों पकड़ा गया। आरोपी के पास से 34 नग बिना तराशे हुए हीरे बरामद किए गए हैं। पुलिस के अनुसार आरोपी नहरगांव स्कूल के पास ग्राहक ढूंढने के लिए घूम रहा था। टीम ने उसकी तलाशी ली तो भारी मात्रा में हीरे मिले। इन अनकट हीरों की बाजार मूल्य लगभग 63 लाख 50 हजार रुपये आंकी जा रही है। वर्तमान में आरोपी के खिलाफ माइनिंग एक्ट के तहत मामला दर्ज कर कार्यवाही शुरू कर दी गई है। पुलिस आगे की जांच में यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि ये हीरे कहां से आए हैं, इनका असली स्रोत क्या है और क्या कोई बड़ा गिरोह इस तस्करी में शामिल है। यह कार्रवाई छत्तीसगढ़ पुलिस की सतर्कता और अवैध खनन-तस्करी पर सख्त रुख को दर्शाती है। ऐसे तस्करों के खिलाफ लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि राज्य के प्राकृतिक संसाधनों की लूट रोकी जा सके। द छत्तीसगढ़ हमेशा की तरह राज्य की महत्वपूर्ण खबरें आपके तक बिना किसी संशोधन के पहुंचाता रहेगा। दर्शकों, अगर आपके इलाके में कोई अवैध खनन, हीरे-मणियों की तस्करी या संदिग्ध गतिविधि नजर आए तो तुरंत गरियाबंद पुलिस या नजदीकी थाने में सूचना दें। आपकी एक सतर्कता राज्य की संपत्ति बचाने में मदद कर सकती है। हेल्पलाइन नंबर 112 पर भी कॉल करें। अधिक अपडेट्स के लिए द छत्तीसगढ़ चैनल को अभी सब्सक्राइब करें, लाइक और शेयर जरूर करें। नमस्कार… जय छत्तीसगढ़!
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    नमस्कार जय जोहार जय छत्तीसगढ़ आप देख रहे हैं द छत्तीसगढ़ 
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में पुलिस और स्पेशल टीम ने एक बड़ी सफलता हासिल की है। 34 नग बिना तराशे हुए हीरे (रॉ डायमंड्स) के साथ एक अंतरराज्यीय तस्कर को गिरफ्तार किया गया है। इन हीरों की अनुमानित कीमत 63 लाख 50 हजार रुपये बताई जा रही है। आरोपी ग्राहक की तलाश में नहरगांव स्कूल के पास घूम रहा था, तभी पुलिस की नजर पड़ गई।
घटना की विस्तृत जानकारी कुछ यूं है…
गरियाबंद पुलिस और स्पेशल टीम की सतर्कता के कारण उड़ीसा के कालाहांडी जिले का निवासी बंशी शेट्टी (पिता डमरू शेट्टी, उम्र 50 वर्ष, निवासी भवानीपटम धोबीपारा, जिला कालाहांडी, उड़ीसा) को रंगे हाथों पकड़ा गया। आरोपी के पास से 34 नग बिना तराशे हुए हीरे बरामद किए गए हैं।
पुलिस के अनुसार आरोपी नहरगांव स्कूल के पास ग्राहक ढूंढने के लिए घूम रहा था। टीम ने उसकी तलाशी ली तो भारी मात्रा में हीरे मिले। इन अनकट हीरों की बाजार मूल्य लगभग 63 लाख 50 हजार रुपये आंकी जा रही है।
वर्तमान में आरोपी के खिलाफ माइनिंग एक्ट के तहत मामला दर्ज कर कार्यवाही शुरू कर दी गई है। पुलिस आगे की जांच में यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि ये हीरे कहां से आए हैं, इनका असली स्रोत क्या है और क्या कोई बड़ा गिरोह इस तस्करी में शामिल है।
यह कार्रवाई छत्तीसगढ़ पुलिस की सतर्कता और अवैध खनन-तस्करी पर सख्त रुख को दर्शाती है। ऐसे तस्करों के खिलाफ लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि राज्य के प्राकृतिक संसाधनों की लूट रोकी जा सके।
द छत्तीसगढ़ हमेशा की तरह राज्य की महत्वपूर्ण खबरें आपके तक बिना किसी संशोधन के पहुंचाता रहेगा।
दर्शकों, अगर आपके इलाके में कोई अवैध खनन, हीरे-मणियों की तस्करी या संदिग्ध गतिविधि नजर आए तो तुरंत गरियाबंद पुलिस या नजदीकी थाने में सूचना दें। आपकी एक सतर्कता राज्य की संपत्ति बचाने में मदद कर सकती है। हेल्पलाइन नंबर 112 पर भी कॉल करें।
अधिक अपडेट्स के लिए द छत्तीसगढ़ चैनल को अभी सब्सक्राइब करें, लाइक और शेयर जरूर करें।
नमस्कार… जय छत्तीसगढ़!
    user_YOGESH KUAMR SAHU
    YOGESH KUAMR SAHU
    News Anchor बालोद, बालोद, छत्तीसगढ़•
    7 hrs ago
  • "जस गीत केवल सुर और ताल नहीं, बल्कि भक्ति और श्रद्धा की सजीव अभिव्यक्ति है।" "जहाँ जस गीत गूंजता है, वहाँ माँ की कृपा स्वयं विराजती है।" "जस गीत की हर पंक्ति में आस्था का सागर और भक्ति का गहरापन छिपा होता है।" "जस गीत आत्मा को माँ के चरणों से जोड़ने का पवित्र माध्यम है।" "संगीत जब भक्ति से मिल जाए, तो जस गीत बनकर हृदय को दिव्यता से भर देता है।" "जस गीत केवल प्रस्तुति नहीं, यह माँ के प्रति समर्पण की अनुभूति है।" "भक्ति की सच्ची पहचान है—दिल से गाया गया जस गीत।" "जस गीत में शब्द नहीं, भाव बोलते हैं और माँ तक पहुँचते हैं।"
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    "जस गीत केवल सुर और ताल नहीं, बल्कि भक्ति और श्रद्धा की सजीव अभिव्यक्ति है।"
"जहाँ जस गीत गूंजता है, वहाँ माँ की कृपा स्वयं विराजती है।"
"जस गीत की हर पंक्ति में आस्था का सागर और भक्ति का गहरापन छिपा होता है।"
"जस गीत आत्मा को माँ के चरणों से जोड़ने का पवित्र माध्यम है।"
"संगीत जब भक्ति से मिल जाए, तो जस गीत बनकर हृदय को दिव्यता से भर देता है।"
"जस गीत केवल प्रस्तुति नहीं, यह माँ के प्रति समर्पण की अनुभूति है।"
"भक्ति की सच्ची पहचान है—दिल से गाया गया जस गीत।"
"जस गीत में शब्द नहीं, भाव बोलते हैं और माँ तक पहुँचते हैं।"
    user_User8642
    User8642
    पत्रकार मोहला, मोहला मानपुर अम्बागढ़ चौकी, छत्तीसगढ़•
    9 hrs ago
  • - धमधा की सड़क एक बार फिर खून से लाल हो गई। शादी समारोह में शामिल होने जा रहे दो लोगों की दर्दनाक सड़क हादसे में मौके पर ही मौत हो गई। खुशियों से भरा माहौल देखते ही देखते मातम में बदल गया। ग्राम गीरोधा थाना नंदिनी निवासी हरिश्चंद्र यादव (48 वर्ष) पिता माखन यादव और ग्राम खमतराई, बेरला निवासी पीतांबर उर्फ भोले (35 वर्ष) पिता झाड़ी राम, बरहापुर से धमधा की ओर एक शादी कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे। इसी दौरान रास्ते में तेज रफ्तार लक्ष्मी ट्रेवल्स की बस ने उन्हें जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि दोनों की मौके पर ही मौत हो गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हादसे के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई। आसपास के लोगों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। सूचना मिलते ही धमधा पुलिस मौके पर पहुंची और शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। थाना प्रभारी रामनारायण ध्रुव ने बताया कि बस चालक के खिलाफ विधिवत कार्रवाई की जा रही है और मामले की जांच जारी है। पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिए जाएंगे। इस हृदयविदारक घटना से दोनों गांवों में शोक की लहर है। जहां एक ओर शादी के घर में बैंड-बाजे की तैयारियां चल रही थीं, वहीं अब रोने-बिलखने की आवाजें गूंज रही हैं। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है।
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    - धमधा की सड़क एक बार फिर खून से लाल हो गई। शादी समारोह में शामिल होने जा रहे दो लोगों की दर्दनाक सड़क हादसे में मौके पर ही मौत हो गई। खुशियों से भरा माहौल देखते ही देखते मातम में बदल गया।
ग्राम गीरोधा थाना नंदिनी निवासी हरिश्चंद्र यादव (48 वर्ष) पिता माखन यादव और ग्राम खमतराई, बेरला निवासी पीतांबर उर्फ भोले (35 वर्ष) पिता झाड़ी राम, बरहापुर से धमधा की ओर एक शादी कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे। इसी दौरान रास्ते में तेज रफ्तार लक्ष्मी ट्रेवल्स की बस ने उन्हें जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि दोनों की मौके पर ही मौत हो गई।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हादसे के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई। आसपास के लोगों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। सूचना मिलते ही धमधा पुलिस मौके पर पहुंची और शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
थाना प्रभारी रामनारायण ध्रुव ने बताया कि बस चालक के खिलाफ विधिवत कार्रवाई की जा रही है और मामले की जांच जारी है। पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिए जाएंगे।
इस हृदयविदारक घटना से दोनों गांवों में शोक की लहर है। जहां एक ओर शादी के घर में बैंड-बाजे की तैयारियां चल रही थीं, वहीं अब रोने-बिलखने की आवाजें गूंज रही हैं। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है।
    user_हेमंत उमरे
    हेमंत उमरे
    पत्रकार दुर्ग, दुर्ग, छत्तीसगढ़•
    3 hrs ago
  • Post by "HASTE RAHO"
    1
    Post by "HASTE RAHO"
    user_"HASTE RAHO"
    "HASTE RAHO"
    Smile दुर्ग, दुर्ग, छत्तीसगढ़•
    5 hrs ago
  • प्रधानमंत्री जी ने कहा कि देश मे फिर एक बार लॉकडाउन की स्थिति बन सकती है?
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    प्रधानमंत्री जी ने कहा कि देश मे फिर एक बार लॉकडाउन की स्थिति बन सकती है?
    user_Srijanbhoominews
    Srijanbhoominews
    औदगी, रायपुर, छत्तीसगढ़•
    12 hrs ago
  • बलरामपुर।आदिवासी विकास विभाग द्वारा मुख्यमंत्री बाल भविष्य सुरक्षा योजना अंतर्गत संचालित प्रयास आवासीय विद्यालयों में सत्र 2026-27 के लिए कक्षा 9वीं में प्रवेश हेतु ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है। इच्छुक एवं पात्र विद्यार्थी आवेदन कर सकते हैं। जारी सूचना के अनुसार ऑनलाइन आवेदन करने की अंतिम तिथि 17 अप्रैल 2026 रात्रि 12 बजे तक निर्धारित की गई है। आवेदन पत्र में त्रुटि सुधार के लिए 18 अप्रैल से 21 अप्रैल 2026 तक तथा जिला स्तर पर दस्तावेजों का परीक्षण 22 अप्रैल से 28 अप्रैल 2026 तक किया जाएगा।विद्यार्थी 1 मई से 9 मई 2026 के बीच अपने प्रवेश पत्र डाउनलोड कर सकेंगे। प्रवेश हेतु परीक्षा का आयोजन 10 मई 2026 को किया जाएगा। बलरामपुर जिले के सहायक आयुक्त आदिवासी विभाग ने जानकारी देते हुए बताया कि प्रयास आवासीय विद्यालयों में विद्यार्थियों को कक्षा 9वीं से 12वीं तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे मेडिकल, इंजीनियरिंग एवं अन्य परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है।ऑनलाइन आवेदन एवं विस्तृत जानकारी के लिए अभ्यर्थी विभागीय वेबसाइट पर विजिट कर सकते हैं। साथ ही कार्यालय सहायक आयुक्त, आदिवासी विकास, बलरामपुर से भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
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    बलरामपुर।आदिवासी विकास विभाग द्वारा मुख्यमंत्री बाल भविष्य सुरक्षा योजना अंतर्गत संचालित प्रयास आवासीय विद्यालयों में सत्र 2026-27 के लिए कक्षा 9वीं में प्रवेश हेतु ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है। इच्छुक एवं पात्र विद्यार्थी आवेदन कर सकते हैं। जारी सूचना के अनुसार ऑनलाइन आवेदन करने की अंतिम तिथि 17 अप्रैल 2026 रात्रि 12 बजे तक निर्धारित की गई है। आवेदन पत्र में त्रुटि सुधार के लिए 18 अप्रैल से 21 अप्रैल 2026 तक तथा जिला स्तर पर दस्तावेजों का परीक्षण 22 अप्रैल से 28 अप्रैल 2026 तक किया जाएगा।विद्यार्थी 1 मई से 9 मई 2026 के बीच अपने प्रवेश पत्र डाउनलोड कर सकेंगे। प्रवेश हेतु परीक्षा का आयोजन 10 मई 2026 को किया जाएगा। बलरामपुर जिले के सहायक आयुक्त आदिवासी विभाग ने जानकारी देते हुए बताया कि प्रयास आवासीय विद्यालयों में विद्यार्थियों को कक्षा 9वीं से 12वीं तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे मेडिकल, इंजीनियरिंग एवं अन्य परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है।ऑनलाइन आवेदन एवं विस्तृत जानकारी के लिए अभ्यर्थी विभागीय वेबसाइट पर विजिट कर सकते हैं। साथ ही कार्यालय सहायक आयुक्त, आदिवासी विकास, बलरामपुर से भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
    user_Puran Dewangan
    Puran Dewangan
    Rajpur, Balrampur•
    2 hrs ago
  • नकुल साहू ने आभार जताया कि मुझे बोरी लिटिया मंडल युवा मोर्चा महामंत्री का दायित्व मिलना मेरे लिए गर्व, जिम्मेदारी और जोश — तीनों का संगम है। संगठन ने मुझ पर जो विश्वास जताया है, उसके लिए सभी वरिष्ठ नेताओं, पदाधिकारियों और साथियों का दिल से धन्यवाद। अब लक्ष्य साफ है — संगठन को और मजबूत बनाना और डिजिटल ताकत से विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाना। जोश भी रहेगा… मेहनत भी रहेगी… और संगठन के लिए समर्पण हमेशा टॉप गियर में रहेगा। आप सभी का साथ और आशीर्वाद ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।
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    नकुल साहू ने आभार जताया कि मुझे बोरी लिटिया मंडल युवा मोर्चा महामंत्री का दायित्व मिलना मेरे लिए गर्व, जिम्मेदारी और जोश — तीनों का संगम है। 
संगठन ने मुझ पर जो विश्वास जताया है, उसके लिए सभी वरिष्ठ नेताओं, पदाधिकारियों और साथियों का दिल से धन्यवाद। 
अब लक्ष्य साफ है — संगठन को और मजबूत बनाना और डिजिटल ताकत से विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाना। 
जोश भी रहेगा… मेहनत भी रहेगी… और संगठन के लिए समर्पण हमेशा टॉप गियर में रहेगा। 
आप सभी का साथ और आशीर्वाद ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।
    user_छ्ग राज्य न्यूज
    छ्ग राज्य न्यूज
    Citizen Reporter धमधा, दुर्ग, छत्तीसगढ़•
    8 hrs ago
  • डोंगरगढ़ की माँ बम्लेश्वरी: 2200 साल पुरानी आस्था की अमर गाथा, जहां प्रेम, भक्ति और चमत्कार एक साथ बुनते हैं देवी का दरबार! छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में पहाड़ी पर विराजमान यह शक्तिपीठ लाखों भक्तों की मनोकामना पूरी करता है – जानिए पूरी कथा, राजाओं की भक्ति से लेकर प्रेमियों के पुनर्जीवन तक नमस्कार दोस्तों, आप देख रहे हैं द छत्तीसगढ़ चैनल। मैं हूं आपके साथ योगेश कुमार साहू। आज हम लेकर आए हैं छत्तीसगढ़ की सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ माँ बम्लेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़ की पूरी कहानी। यह सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि 2200 वर्ष पुरानी भक्ति, राजसी इतिहास और एक अनोखी प्रेम कथा का जीवंत साक्षी है। चैत्र नवरात्र 2026 में यहां लाखों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं – 1000 सीढ़ियां चढ़कर, रोपवे से या पैदल – सब माँ के दर्शन के लिए। 7 दिनों में 10 लाख से ज्यादा भक्त आ चुके हैं, और मंदिर 8 हजार से ज्यादा ज्योति कलशों से जगमगा रहा है। प्रसाद योजना के तहत नए पर्यटक सुविधा केंद्र भी बन चुके हैं। लेकिन असली महिमा तो माँ की चमत्कारी कहानी में है। चलिए, विस्तार से जानते हैं। 1600 फीट ऊंची पहाड़ी पर बड़ी बम्लेश्वरी, नीचे छोटी बम्लेश्वरी और मंझली रणचंडी – तीनों स्वरूपों में माँ बगलामुखी (दुर्गा का रूप) जागृत हैं। प्राचीन नाम था कामाख्या नगरी या कामावती नगर। यहां की यात्रा हर भक्त को माँ के चरणों में ले जाती है। 2200 वर्ष पुरानी शुरुआत: राजा वीरसेन की संतानहीन पीड़ा और मंदिर की नींव करीब 2200 साल पहले, कामाख्या नगरी में राजा वीरसेन का शासन था। वे प्रजापालक थे, लेकिन संतान नहीं थी। पंडितों की सलाह पर उन्होंने शिवजी और माँ दुर्गा की एक साल तक कठोर तपस्या की। देवी-देवता प्रसन्न हुए, रानी को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ – नाम रखा मदनसेन। आभार में राजा ने पहाड़ी पर माँ बम्लेश्वरी (दुर्गा का शक्तिरूप) का मंदिर बनवाया। यहीं से शुरू हुई इस धाम की यात्रा। मदनसेन के बाद उनके पुत्र राजा कामसेन गद्दी पर आए। वे भी माँ बगलामुखी के परम भक्त थे। राजा कामसेन की तपस्या और माँ का पहाड़ी पर अवतरण कामसेन ने तपोबल से माँ बगलामुखी को इतना प्रसन्न किया कि विनती की – “माँ, पहाड़ी की चोटी पर विराजमान हो जाओ, ताकि प्रजा आसानी से दर्शन कर सके।” माँ प्रसन्न हुईं और बड़ी बम्लेश्वरी स्वरूप में प्रकट हो गईं। लेकिन जंगल और दुर्गम रास्ते से भक्तों को कष्ट होता देख राजा ने फिर प्रार्थना की – “माँ, नीचे भी विराजमान हो जाओ।” माँ ने उनकी भक्ति और प्रजा-कल्याण की भावना देखी, और पहाड़ से उतरकर छोटी बम्लेश्वरी व मंझली रणचंडी के रूप में जागृत हो गईं। आज भी तीनों माताएं भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं। अब आती है वो सबसे भावुक प्रेम कथा – माधवानल और कामकंदला की जुदाई और माँ का चमत्कार यह कथा मंदिर की सबसे प्रसिद्ध है। कामाख्या नगरी संगीत-नृत्य की नगरी थी। राजा कामसेन के दरबार में गायक माधवानल और नृतकी कामकंदला आए। दोनों पहली नजर में प्रेम में पड़ गए। एक बार नृत्य में ताल बिगड़ने पर माधवानल ने कारण बताया। राजा प्रसन्न होकर मोतियों की माला दी, लेकिन माधवानल ने उसे कामकंदला को सौंप दिया। राजा क्रोधित हुए और माधवानल को निकाल दिया। राजकुमार मदनादित्य भी कामकंदला पर मोहित था। उसने राजद्रोह का आरोप लगाकर कामकंदला को बंदी बना लिया। माधवानल मदद के लिए उज्जैन पहुंचे – राजा विक्रमादित्य के पास। विक्रमादित्य ने युद्ध किया, शिव-दुर्गा के हस्तक्षेप से संधि हुई। लेकिन विक्रमादित्य ने परीक्षा ली – झूठ बोला कि माधवानल मर गया। दुख से कामकंदला ने तालाब में कूदकर प्राण त्याग दिए। माधवानल को पता चला तो उसने भी जीवन समाप्त कर दिया। यहां हुआ चमत्कार! विक्रमादित्य ने माँ बगलामुखी को आह्वान किया। माँ प्रकट हुईं, दोनों प्रेमियों को जीवित किया और कहा – “सच्चा प्रेम कभी नहीं मरता। मैं यहां जागृत रूप में रहूंगी, सच्चे प्रेमियों और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करूंगी।” यही कारण है कि माँ बम्लेश्वरी को “प्रेमियों की देवी” भी कहा जाता है। यह कथा ‘माधवानल कामकंदला’ ग्रंथ में विस्तार से है। मंदिर का वर्णन और वर्तमान महिमा बड़ी बम्लेश्वरी 1600 फीट ऊंची पहाड़ी पर है – 1000+ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर भव्य, माँ की मूर्ति चमकदार। नीचे छोटी बम्लेश्वरी अक्षरधाम शैली में – 8 द्वार, 44 स्तंभ, 95 फीट ऊंचा। गर्भगृह सोने-चांदी से सजा। चारों ओर हरा-भरा जंगल, तालाब – प्रकृति का अद्भुत संगम। ट्रस्ट (1976 से) संचालित। रोपवे, धर्मशालाएं, भोजनालय सब उपलब्ध। नवरात्र में नारियल चढ़ाव, ज्योति कलश – मंदिर जगमगाता है। भक्त कहते हैं – “सच्चे दिल से मांगी मनोकामना पूरी होती है।” संतान, विवाह, नौकरी, स्वास्थ्य – सब मिलता है। कैसे पहुंचें? • रेल: डोंगरगढ़ जंक्शन (मुंबई-हावड़ा रूट) • सड़क: राजनांदगांव से 35 किमी, रायपुर से 106 किमी (NH-6) • हवाई: रायपुर एयरपोर्ट (72 किमी) दोस्तों, डोंगरगढ़ की माँ बम्लेश्वरी सिर्फ धाम नहीं, छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर हैं। यहां राजा वीरसेन की भक्ति, कामसेन की तपस्या और माधवानल-कामकंदला का प्रेम एक साथ सांस लेता है। जो एक बार आता है, बार-बार लौटना चाहता है। अगर आप भी माँ के दरबार में जाना चाहते हैं, तो बस मन में संकल्प लीजिए – माँ जरूर बुलाएंगी। जय माँ बम्लेश्वरी! जय छत्तीसगढ़! धन्यवाद देखने के लिए। अगर आपको यह वीडियो पसंद आया तो लाइक, शेयर और सब्सक्राइब जरूर करें। बेल आइकन दबाकर नोटिफिकेशन ऑन रखें, ताकि छत्तीसगढ़ की हर खबर और कहानी सबसे पहले आप तक पहुंचे। नमस्कार, जय जोहार!
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    डोंगरगढ़ की माँ बम्लेश्वरी: 2200 साल पुरानी आस्था की अमर गाथा, जहां प्रेम, भक्ति और चमत्कार एक साथ बुनते हैं देवी का दरबार!
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में पहाड़ी पर विराजमान यह शक्तिपीठ लाखों भक्तों की मनोकामना पूरी करता है – जानिए पूरी कथा, राजाओं की भक्ति से लेकर प्रेमियों के पुनर्जीवन तक
नमस्कार दोस्तों,
आप देख रहे हैं द छत्तीसगढ़ चैनल।
मैं हूं आपके साथ योगेश कुमार साहू।
आज हम लेकर आए हैं छत्तीसगढ़ की सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ माँ बम्लेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़ की पूरी कहानी। यह सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि 2200 वर्ष पुरानी भक्ति, राजसी इतिहास और एक अनोखी प्रेम कथा का जीवंत साक्षी है। चैत्र नवरात्र 2026 में यहां लाखों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं – 1000 सीढ़ियां चढ़कर, रोपवे से या पैदल – सब माँ के दर्शन के लिए। 7 दिनों में 10 लाख से ज्यादा भक्त आ चुके हैं, और मंदिर 8 हजार से ज्यादा ज्योति कलशों से जगमगा रहा है। प्रसाद योजना के तहत नए पर्यटक सुविधा केंद्र भी बन चुके हैं। लेकिन असली महिमा तो माँ की चमत्कारी कहानी में है। चलिए, विस्तार से जानते हैं।
1600 फीट ऊंची पहाड़ी पर बड़ी बम्लेश्वरी, नीचे छोटी बम्लेश्वरी और मंझली रणचंडी – तीनों स्वरूपों में माँ बगलामुखी (दुर्गा का रूप) जागृत हैं। प्राचीन नाम था कामाख्या नगरी या कामावती नगर। यहां की यात्रा हर भक्त को माँ के चरणों में ले जाती है।
2200 वर्ष पुरानी शुरुआत: राजा वीरसेन की संतानहीन पीड़ा और मंदिर की नींव
करीब 2200 साल पहले, कामाख्या नगरी में राजा वीरसेन का शासन था। वे प्रजापालक थे, लेकिन संतान नहीं थी। पंडितों की सलाह पर उन्होंने शिवजी और माँ दुर्गा की एक साल तक कठोर तपस्या की। देवी-देवता प्रसन्न हुए, रानी को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ – नाम रखा मदनसेन। आभार में राजा ने पहाड़ी पर माँ बम्लेश्वरी (दुर्गा का शक्तिरूप) का मंदिर बनवाया। यहीं से शुरू हुई इस धाम की यात्रा।
मदनसेन के बाद उनके पुत्र राजा कामसेन गद्दी पर आए। वे भी माँ बगलामुखी के परम भक्त थे।
राजा कामसेन की तपस्या और माँ का पहाड़ी पर अवतरण
कामसेन ने तपोबल से माँ बगलामुखी को इतना प्रसन्न किया कि विनती की – “माँ, पहाड़ी की चोटी पर विराजमान हो जाओ, ताकि प्रजा आसानी से दर्शन कर सके।” माँ प्रसन्न हुईं और बड़ी बम्लेश्वरी स्वरूप में प्रकट हो गईं। लेकिन जंगल और दुर्गम रास्ते से भक्तों को कष्ट होता देख राजा ने फिर प्रार्थना की – “माँ, नीचे भी विराजमान हो जाओ।” माँ ने उनकी भक्ति और प्रजा-कल्याण की भावना देखी, और पहाड़ से उतरकर छोटी बम्लेश्वरी व मंझली रणचंडी के रूप में जागृत हो गईं। आज भी तीनों माताएं भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं।
अब आती है वो सबसे भावुक प्रेम कथा – माधवानल और कामकंदला की जुदाई और माँ का चमत्कार
यह कथा मंदिर की सबसे प्रसिद्ध है। कामाख्या नगरी संगीत-नृत्य की नगरी थी। राजा कामसेन के दरबार में गायक माधवानल और नृतकी कामकंदला आए। दोनों पहली नजर में प्रेम में पड़ गए। एक बार नृत्य में ताल बिगड़ने पर माधवानल ने कारण बताया। राजा प्रसन्न होकर मोतियों की माला दी, लेकिन माधवानल ने उसे कामकंदला को सौंप दिया। राजा क्रोधित हुए और माधवानल को निकाल दिया।
राजकुमार मदनादित्य भी कामकंदला पर मोहित था। उसने राजद्रोह का आरोप लगाकर कामकंदला को बंदी बना लिया। माधवानल मदद के लिए उज्जैन पहुंचे – राजा विक्रमादित्य के पास। विक्रमादित्य ने युद्ध किया, शिव-दुर्गा के हस्तक्षेप से संधि हुई। लेकिन विक्रमादित्य ने परीक्षा ली – झूठ बोला कि माधवानल मर गया। दुख से कामकंदला ने तालाब में कूदकर प्राण त्याग दिए। माधवानल को पता चला तो उसने भी जीवन समाप्त कर दिया।
यहां हुआ चमत्कार! विक्रमादित्य ने माँ बगलामुखी को आह्वान किया। माँ प्रकट हुईं, दोनों प्रेमियों को जीवित किया और कहा – “सच्चा प्रेम कभी नहीं मरता। मैं यहां जागृत रूप में रहूंगी, सच्चे प्रेमियों और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करूंगी।” यही कारण है कि माँ बम्लेश्वरी को “प्रेमियों की देवी” भी कहा जाता है। यह कथा ‘माधवानल कामकंदला’ ग्रंथ में विस्तार से है।
मंदिर का वर्णन और वर्तमान महिमा
बड़ी बम्लेश्वरी 1600 फीट ऊंची पहाड़ी पर है – 1000+ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर भव्य, माँ की मूर्ति चमकदार। नीचे छोटी बम्लेश्वरी अक्षरधाम शैली में – 8 द्वार, 44 स्तंभ, 95 फीट ऊंचा। गर्भगृह सोने-चांदी से सजा। चारों ओर हरा-भरा जंगल, तालाब – प्रकृति का अद्भुत संगम।
ट्रस्ट (1976 से) संचालित। रोपवे, धर्मशालाएं, भोजनालय सब उपलब्ध। नवरात्र में नारियल चढ़ाव, ज्योति कलश – मंदिर जगमगाता है। भक्त कहते हैं – “सच्चे दिल से मांगी मनोकामना पूरी होती है।” संतान, विवाह, नौकरी, स्वास्थ्य – सब मिलता है।
कैसे पहुंचें?
•  रेल: डोंगरगढ़ जंक्शन (मुंबई-हावड़ा रूट)
•  सड़क: राजनांदगांव से 35 किमी, रायपुर से 106 किमी (NH-6)
•  हवाई: रायपुर एयरपोर्ट (72 किमी)
दोस्तों, डोंगरगढ़ की माँ बम्लेश्वरी सिर्फ धाम नहीं, छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर हैं। यहां राजा वीरसेन की भक्ति, कामसेन की तपस्या और माधवानल-कामकंदला का प्रेम एक साथ सांस लेता है। जो एक बार आता है, बार-बार लौटना चाहता है।
अगर आप भी माँ के दरबार में जाना चाहते हैं, तो बस मन में संकल्प लीजिए – माँ जरूर बुलाएंगी।
जय माँ बम्लेश्वरी! जय छत्तीसगढ़!
धन्यवाद देखने के लिए।
अगर आपको यह वीडियो पसंद आया तो लाइक, शेयर और सब्सक्राइब जरूर करें।
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नमस्कार, जय जोहार!
    user_YOGESH KUAMR SAHU
    YOGESH KUAMR SAHU
    News Anchor बालोद, बालोद, छत्तीसगढ़•
    11 hrs ago
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