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शाहाबाद कोतवाली के सामने से सपा नेताओं ने जुलूस निकाला, “अखिलेश जिंदाबाद” के नारों से गूंजा इलाका। कार्यक्रम के लिए अनुमति ली गई थी या नहीं, यह स्पष्ट नहीं हो सका। थाने के सामने हुए इस प्रदर्शन के बावजूद कार्रवाई को लेकर पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
Harshdeep Mishra
शाहाबाद कोतवाली के सामने से सपा नेताओं ने जुलूस निकाला, “अखिलेश जिंदाबाद” के नारों से गूंजा इलाका। कार्यक्रम के लिए अनुमति ली गई थी या नहीं, यह स्पष्ट नहीं हो सका। थाने के सामने हुए इस प्रदर्शन के बावजूद कार्रवाई को लेकर पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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- ब्यूरो रिपोर्ट हरदोई हरदोई जनपद में पुलिस विभाग की छवि को झकझोर देने वाला एक मामला सामने आया है, जिसने वर्दी की गरिमा और अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मझिला थाने में तैनात एक दरोगा और महिला सिपाही का वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में दोनों पुलिसकर्मी एक स्थानीय भाजपा नेता इलियास गाजी के साथ रील बनाते नजर आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह वीडियो ड्यूटी के दौरान ही शूट किया गया है, जिसमें पुलिसकर्मी पूरी वर्दी में दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में “एक फोन पे चौकी हिले—दूसरे पे थाना” जैसे गाने पर ‘भौकाल’ दिखाने की कोशिश की गई है। इस तरह की हरकत न सिर्फ पुलिस की छवि को धूमिल करती है, बल्कि कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली संस्था की गंभीरता पर भी सवाल खड़े करती है। सूत्रों के मुताबिक, यह वीडियो भाजपा नेता की सोशल मीडिया आईडी से पोस्ट किया गया, जिसके बाद यह तेजी से वायरल हो गया। जैसे ही वीडियो पुलिस विभाग के उच्चाधिकारियों तक पहुंचा, महकमे में हड़कंप मच गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच की बात कही जा रही है और संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है। स्थानीय लोगों और सोशल मीडिया यूजर्स के बीच भी इस वीडियो को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। लोगों का कहना है कि जिन पर कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है, अगर वही इस तरह की गतिविधियों में लिप्त होंगे तो आम जनता का भरोसा कैसे कायम रहेगा। यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि वर्दी की गरिमा और अनुशासन को बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाना कितना जरूरी है। अब देखने वाली बात यह होगी कि पुलिस प्रशासन इस पूरे मामले में क्या कार्रवाई करता है और क्या यह कदम भविष्य में ऐसे मामलों पर रोक लगाने में कारगर साबित होगा।2
- Post by Harshdeep Mishra1
- बदायूं में चौंकाने वाला मामला! बदायूं से हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक पुरुष की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में कथित तौर पर ‘बच्चेदानी’ का जिक्र किया गया है 😳 👉 रिपोर्ट देखते ही परिवार और लोग हैरान रह गए 👉 मामला एक निजी अस्पताल से जुड़ा बताया जा रहा है फिलहाल यह साफ नहीं है कि यह 👉 लापरवाही है या रिपोर्ट में छेड़छाड़ जांच के बाद ही सच्चाई सामने आएगी। ❓ आपकी क्या राय है? कमेंट में जरूर बताएं 👇1
- थाना मल्लावां क्षेत्रांतर्गत आग में झुलसकर एक महिला की मृत्यु होने के संबंध में अपर पुलिस अधीक्षक (पूर्वी) श्री सुबोध गौतम1
- Post by संपादक गौरी शंकर त्रिवेदी1
- शाहजहांपुर: विकास खंड जलालाबाद क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय मढ़िया गुसाई में "स्कूल चलो अभियान" सत्र 2026 के अंतर्गत आज दिनांक 1 अप्रैल 2026 को वार्षिकोत्सव एवं पुरस्कार वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और प्रतिभाशाली छात्रों को सम्मानित किया गया। प्रतियोगिता में रॉकी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया, जबकि शिवम और अनमोल ने द्वितीय स्थान हासिल किया। शिवांगी को भी उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया गया। इस मौके पर अभिभावकों एवं शिक्षकों की उपस्थिति में विद्यालय प्रबंधक समिति अध्यक्ष आजाद बाबू, प्रधानाध्यापक गौरव कुमार, शिक्षामित्र संतोष राना, ग्राम प्रधान धर्मेंद्र कुमार, समाजसेवी पत्रकार तेजपाल कठेरिया, मुकेश कुमार सहित अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम के दौरान शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए सभी ने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की और अधिक से अधिक नामांकन कराने का आह्वान किया।1
- शाहजहाँपुर। जिलाधिकारी धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने बुधवार को गेहूं खरीद की तैयारियों की समीक्षा के दौरान लापरवाह अधिकारियों पर कड़ा प्रहार किया। निरीक्षण में अनुपस्थित पाए गए बी-पैक्स कलान के केंद्र प्रभारी परिमाल सिंह को डीएम ने तत्काल निलंबित करने के निर्देश दिए। वहीं, बैठक से नदारद रहने और क्रय केंद्र सक्रिय न करने पर यूपीएसएस के जिला प्रबंधक प्रवीण पाल को प्रतिकूल प्रविष्टि थमा दी गई।1
- ब्यूरो रिपोर्ट हरदोई हरदोई जनपद के शाहाबाद क्षेत्र के टोडरपुर ब्लॉक अंतर्गत स्थित जमुरा उप स्वास्थ्य केंद्र एक बार फिर सुर्खियों में है—लेकिन इस बार वजह विकास नहीं, बल्कि बदहाली, लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता है। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई यहां साफ देखी जा सकती है। पत्रकारों की टीम जब मौके पर पहुंची, तो उपकेंद्र पूरी तरह बंद मिला। मुख्य गेट पर जंग लगा ताला लटक रहा था, मानो महीनों से यहां कोई गतिविधि न हुई हो। अंदर कमरों पर भी ताले जड़े मिले और परिसर में सन्नाटा पसरा था। यह दृश्य किसी सक्रिय स्वास्थ्य केंद्र का नहीं, बल्कि एक परित्यक्त भवन का प्रतीत हो रहा था। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब यहां चिकित्सक और स्टाफ की तैनाती का दावा किया जा रहा है, तो वे हैं कहां? 👉 क्या ड्यूटी केवल कागज़ों तक सीमित है? 👉 क्या निरीक्षण केवल फाइलों में ही पूरा हो जाता है? 👉 और सबसे अहम—क्या जिम्मेदार अधिकारी जानबूझकर आंखें मूंदे हुए हैं? उपकेंद्र की स्थिति और भी चिंताजनक तब दिखी जब वहां बिजली, पानी और साफ-सफाई जैसी मूलभूत सुविधाएं तक नदारद मिलीं। शौचालय का टैंक खुला पड़ा था और आसपास गंदगी का अंबार था। यह हाल उस जगह का है, जहां लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं मिलनी चाहिए। स्थानीय ग्रामीणों का दर्द भी कम नहीं है। उनका कहना है कि महीनों से कोई डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी नियमित रूप से नहीं आता। छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी उन्हें कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। आपात स्थिति में तो हालात और भी भयावह हो जाते हैं। इस पूरे मामले में अधिकारियों के बयान भी एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। एक ओर जहां जिम्मेदार अधिकारी हैंडओवर प्रक्रिया का हवाला देकर पल्ला झाड़ रहे हैं, वहीं स्थानीय स्वास्थ्य प्रभारी दावा कर रहे हैं कि केंद्र रोज खुलता है और दवाइयां वितरित की जाती हैं। 👉 तो सवाल यह है कि सच कौन बोल रहा है? 👉 और अगर केंद्र सच में खुलता है, तो मौके पर ताले क्यों लटक रहे थे? गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब जमुरा उप स्वास्थ्य केंद्र की बदहाली सामने आई हो। पहले भी खबरें प्रकाशित हुईं, कुछ दिन सफाई हुई, फिर सब कुछ पहले जैसा। 👉 क्या कार्रवाई सिर्फ दिखावे के लिए होती है? 👉 क्या अधिकारियों को सिर्फ खबर दबने का इंतजार रहता है? सबसे बड़ा और गंभीर प्रश्न यही है कि आखिर उच्च अधिकारी कार्रवाई क्यों नहीं करते? क्या यह महज लापरवाही है या फिर किसी स्तर पर मिलीभगत? क्या ग्रामीणों की समस्याएं इतनी मामूली हैं कि उन्हें अनदेखा किया जा सकता है? जब प्रदेश स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, तब उसी प्रदेश के एक जिले में यह हालात कई सवाल खड़े करते हैं। यह मामला केवल एक उपकेंद्र का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न है। अगर समय रहते ठोस और सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि जिम्मेदारी तय करने का सिस्टम केवल कागजों तक सीमित है और जमीनी हकीकत में कोई बदलाव लाने की इच्छाशक्ति नहीं है। फिलहाल, जमुरा उप स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता और ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई का आईना बन चुका है।2