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जीएमसीएच में अवैध सिक्योरिटी एजेंसी को किसका संरक्षण, ओमप्रकाश क्रांति का तीखा हमला
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जीएमसीएच में अवैध सिक्योरिटी एजेंसी को किसका संरक्षण, ओमप्रकाश क्रांति का तीखा हमला
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- बेतिया महाराज स्टेडियम में 46 दुकानदारों को जिला खेल एसोसिशन के द्वारा दुकान एलॉट निविदा के द्वारा किया गया था l जिसमें 26 दुकानदारों को लीज एग्रीमेंट पर दिया गया उनसे सिक्योरिटी मनी लेकर और दुकानदारों को सिर्फ खाका मिला था दुकानदार अपने पैसे से इट बालू और मटेरियल की व्यवस्था कर दुकान बनवाए थे और अपना दुकान कर रोजी-रोटी और गुजर वसर कर रहे थे उन लोगों का कोई वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना ही दुकान को बुलडोजर लगाकर तोड़ दिया गया है जिससे दुकानदारों के परिजनों के सामने भुखमरी आ गया है दुकानदारों में हरेंद्र यादव अनिल शर्मा, डॉ सुरेश शर्मा, अमर कुमार आदि का कहना है कि दुकान एलर्ट करने के बाद हम लोग अपने पैसे से दुकान बनाए और गुर्जर बसर करते आ रहे हैं लेकिन हम लोगों के साथ ना इंसाफी करते हुए दुकान को तोड़ दिया गया है यादव ने बताया कि हम लोगों को सरकार के द्वारा कुछ भी सहयोग नहीं कर दुकान तोड़कर रोड पर ला दिया गया है इसके खिलाफ हम लोगों ने हाईकोर्ट में मुकदमा दायर किया है कोर्ट के आदेश का ओहेलना करते हुए दुकान को तोड़कर गिरा दिया गया है वही खेल पदाधिकारी और मत्स्य पदाधिकारी से पूछे जाने पर कुछ भी बताने से कतराते रहे l सभी दुकानदार एक स्वर में भाजपा जदयू की सरकार को कोस रहे हैं l दुकानदार हरेंद्र यादव ने बताया की हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी दुकानों को तोड़ा गया और पदाधिकारी ने तोड़ने का कोई आदेश नहीं दिखाया है l1
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- रिश्तों में डबल स्टैंडर्ड क्यों? एक कड़वा लेकिन ज़रूरी सवाल आज भी हमारे समाज में रिश्ता तय करते समय सबसे पहले लड़की के रंग-रूप खूबसूरती और शरीर पर चर्चा शुरू हो जाती है। रंग साफ़ है या नहीं? दिखने में कैसी है? फोटो भेजिए ज़रा… लेकिन सवाल ये है कि जब यही कसौटी लड़के पर लागू की जाए, तो लोग असहज क्यों हो जाते हैं? जब लड़के वालों ने लड़की के रंग पर टिप्पणी की, तो लड़की वालों ने भी लड़के के फिज़िकल स्टैंडर्ड पर सवाल उठा दिए। अचानक माहौल बदल गया। जो बात पहले नॉर्मल लग रही थी, वही अब गलत और अपमानजनक लगने लगी। दूसरों की कमियाँ निकालना आसान होता है, लेकिन जब वही आईना अपनी तरफ़ घुमा दिया जाए तो सच्चाई चुभने लगती है। रिश्ता कोई प्रोडक्ट नहीं रिश्ता कोई मार्केट का सामान नहीं है जिसे रंग, कद, वजन या लुक्स के आधार पर पास-फेल किया जाए। रिश्ता दो इंसानों की सोच, संस्कार, समझ और इज्ज़त से बनता है। अगर लड़की को परखा जाएगा, तो लड़का भी परखा जाएगा। बराबरी चाहिए तो सोच में भी बराबरी लानी होगी। जब तक हम सिर्फ लड़की से परफेक्ट होने की उम्मीद रखते रहेंगे तब तक रिश्ते नहीं सौदे होते रहेंगे। अब सवाल आपसे ▪️ क्या रिश्ता तय करते वक्त सिर्फ लुक्स देखना सही है? ▪️ क्या लड़की वालों का यह जवाब समाज को सोचने पर मजबूर करता है? ▪️ क्या अब समय नहीं आ गया कि हम डबल स्टैंडर्ड छोड़ें?1
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