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भोपाल में पुलिस के मानवीय चेहरे का प्रदर्शन करते हुए एक अनमोल जान बचाई गई। यह घटना पुलिस कमिश्नर कार्यालय में हुई, जहाँ देवेंद्र सक्सेना को अचानक दिल का दौरा पड़ा। आरक्षक मुकेश साहू और रंजीत रघुवंशी ने तुरंत सीपीआर देकर उनकी जान बचाई, जिसके कारण पाँच मिनट के भीतर उन्हें नई जिंदगी मिल गई। इस त्वरित मदद के बाद, आरआई जयसिंह तोमर ने अपने वाहन से देवेंद्र सक्सेना को आगे के उपचार के लिए अनंत हॉस्पिटल पहुँचाया।
शाहिद खान रिपोर्टर
भोपाल में पुलिस के मानवीय चेहरे का प्रदर्शन करते हुए एक अनमोल जान बचाई गई। यह घटना पुलिस कमिश्नर कार्यालय में हुई, जहाँ देवेंद्र सक्सेना को अचानक दिल का दौरा पड़ा। आरक्षक मुकेश साहू और रंजीत रघुवंशी ने तुरंत सीपीआर देकर उनकी जान बचाई, जिसके कारण पाँच मिनट के भीतर उन्हें नई जिंदगी मिल गई। इस त्वरित मदद के बाद, आरआई जयसिंह तोमर ने अपने वाहन से देवेंद्र सक्सेना को आगे के उपचार के लिए अनंत हॉस्पिटल पहुँचाया।
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- कवि राजेंद्र सिंह जादौन अपने व्यंग्यपूर्ण लेख में एक तीखा सवाल उठाते हैं कि 'आखिर देश किसका है?' वे कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि 'मोदी भारत का, भारत आरएसएस का, आरएसएस भाजपा की, भाजपा मोदी की', जिससे यह भ्रम पैदा होता है कि भारत संविधान या संसद का है या किसी 'खास किस्म' का। लेखक इस विचार को चुनौती देते हैं कि भारत एक व्यक्ति या संगठन की जागीर है, और जोर देते हैं कि यह उन करोड़ों लोगों का है जिनकी मेहनत इसकी तकदीर है। लेख में 'एक पेड़ माँ के नाम' जैसे अभियानों पर भी व्यंग्य किया गया है, जहाँ कैमरों के सामने एक पौधा लगाया जाता है, जबकि विकास के नाम पर हजारों पेड़ काटे जाते हैं, पहाड़ उजड़ते हैं और जंगल अपनी साँसें गिनते हैं। लेखक सवाल करते हैं कि नदियाँ किस विकास में शामिल हैं और जल, जंगल, ज़मीन पर सदियों से अधिकार रखने वालों को विस्थापन क्यों सहना पड़ा। इसे 'सेल्फी आधारित पर्यावरण संरक्षण' बताते हुए, जहाँ नेता फोटो खिंचवाते हैं और पौधा सूख जाता है, यह सवाल उठाया गया है कि लाखों पेड़ काटकर बनाई जा रही सड़कों, खदानों और परियोजनाओं का हिसाब कौन रखेगा। जानवरों के माध्यम से भी 'विकास' को उनके घरों का उजड़ना बताया गया है, और चेतावनी दी गई है कि जंगल कटने से वर्षा रूठती है, नदियाँ सूखती हैं और सभ्यता टूटती है। लेखक लोकतंत्र की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त करते हैं, जहाँ सवालों से डर लगता है और तर्कों पर पहरा लगता है। सत्ता से असहमत होने वालों को अक्सर 'ठहरा' दिया जाता है। वे कॉर्पोरेट और राजनीति के बीच बढ़ती 'गहरी दोस्ती' पर सवाल उठाते हैं, जहाँ जनता के लिए कोई जगह नहीं बचती। जनता को लोकतंत्र का मालिक होने के बावजूद सरकार तक पहुँचने के लिए 'अपॉइंटमेंट' लेने पड़ते हैं। गरीबों की दुर्दशा पर भी प्रकाश डाला गया है, जिन्हें हर चुनाव में वादे मिलते हैं, लेकिन वे राशन, अस्पताल और नौकरी की लाइनों में ही लगे रहते हैं। 'राष्ट्रभक्ति के निजीकरण' का भी उल्लेख है, जहाँ सवाल पूछने वालों को राष्ट्रविरोधी, विकास विरोधी या नकारात्मक सोचने वाला ठहरा दिया जाता है, और चुप रहने को सहमति मान लिया जाता है। निष्कर्ष में, लेखक स्पष्ट करते हैं कि यह सवाल किसी दल, व्यक्ति या उद्योगपति का नहीं, बल्कि उस धरती का है जो हर प्राणी का घर है। वे जोर देते हैं कि भारत किसी एक व्यक्ति या संगठन की संपत्ति नहीं, बल्कि उन 140 करोड़ लोगों का है जो देश के भविष्य का निर्माण करते हैं। यह आह्वान किया जाता है कि पेड़ भी लगाएं और जंगल भी बचाएं, तथा जल, जंगल और ज़मीन के प्रश्नों को लोकतंत्र में उठाया जाए, क्योंकि भारत का भविष्य नारों से नहीं, बल्कि धरती, प्रकृति और इंसान के सम्मान से बनेगा।1