सूचना इलेक्ट्रॉनिक माध्यम देने से मना किया मेंड्राकलां सचिव व कार्यकारी अभियंता भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए सूचना का अधिकार बनाम प्रशासनिक मानसिकता: मेन्द्राकला मंडी प्रकरण से उठते सवाल लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था का मूल तत्व है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 इसी उद्देश्य से अस्तित्व में आया था — ताकि नागरिक सरकार से प्रश्न पूछ सके और शासन जवाबदेह बने। परंतु जब स्वयं सार्वजनिक संस्थान सूचना देने से बचते दिखाई दें, तो यह केवल एक कार्यालय का मुद्दा नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था की सोच पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले, अंबिकापुर स्थित कृषि उपज मंडी समिति मेन्द्रा कला से जुड़ा हालिया प्रकरण इसी बहस को पुनः जीवित करता है। मुद्दा केवल 7230 रुपये का नहीं आरटीआई आवेदन के माध्यम से पिछले दो वर्षों के टेंडर, भुगतान, एमबी बुक, सब्सिडी एवं अन्य प्रशासनिक दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई। जवाब में कार्यालय ने 3615 पृष्ठों की प्रतिलिपि बताकर 7230 रुपये शुल्क जमा करने का निर्देश दिया। कानूनन प्रति पृष्ठ निर्धारित शुल्क लिया जा सकता है — यह व्यवस्था का हिस्सा है। परंतु प्रश्न यह है कि जब सूचना डिजिटल रूप में उपलब्ध कराई जा सकती है, तब केवल छायाप्रति के रूप में देने पर जोर क्यों? क्या यह तकनीकी सुविधा का अभाव है, या प्रक्रिया को जटिल बनाने की प्रवृत्ति? सूचना का अधिकार केवल कागजों का लेन-देन नहीं, बल्कि पारदर्शिता का माध्यम है। यदि सूचना देने की प्रक्रिया ही इतनी महंगी और बोझिल बना दी जाए कि आम नागरिक पीछे हट जाए, तो कानून का उद्देश्य कैसे पूरा होगा? धारा 4(1)(b) की आत्मा आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1)(b) सार्वजनिक प्राधिकरणों को कई जानकारियां स्वतः सार्वजनिक करने का निर्देश देती है। टेंडर, भुगतान, कार्यादेश और बैठकों के निर्णय — ये सभी ऐसी सूचनाएं हैं जिन्हें नियमित रूप से वेबसाइट या सूचना पट्ट पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यदि दो वर्षों की जानकारी 3615 पृष्ठों में फैली है, तो यह भी विचारणीय है कि क्या इनका नियमित डिजिटलीकरण और सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ? यदि नहीं, तो क्यों? प्रशासनिक प्रशिक्षण और संवेदनशीलता मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें अधिकारी द्वारा आरटीआई की धाराओं की जानकारी न होने संबंधी कथन सुनाई देता है। यदि ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रुटि नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और जवाबदेही की कमी का संकेत है। जन सूचना अधिकारी का दायित्व मात्र आवेदन स्वीकार करना नहीं, बल्कि अधिनियम की भावना को समझते हुए नागरिक को सहयोग देना है। “जैसा अधिकारी कहेगा वैसा होगा” जैसी मानसिकता पारदर्शी शासन के सिद्धांत से मेल नहीं खाती। बड़ा प्रश्न: क्या व्यवस्था पारदर्शिता से सहज है? यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध आरोप का विषय नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रश्न का संकेत है — क्या हमारी संस्थाएं पारदर्शिता को सहजता से स्वीकार कर पा रही हैं? यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हुई हैं, तो सूचना उपलब्ध कराने में संकोच क्यों? यदि टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी है, तो दस्तावेज साझा करने में हिचक क्यों? लोकतंत्र में विश्वास दस्तावेजों से बनता है, बयानों से नहीं। आगे क्या? ऐसे मामलों में आवश्यक है कि: विभागीय स्तर पर पारदर्शिता की समीक्षा हो डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली को अनिवार्य बनाया जाए जन सूचना अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण हो स्वप्रकाशन (Proactive Disclosure) को सख्ती से लागू किया जाए सूचना का अधिकार कोई एहसान नहीं, बल्कि नागरिक का विधिक अधिकार है। शासन की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह सवालों से कितना सहज है। मेन्द्राकला मंडी प्रकरण एक अवसर भी है — व्यवस्था आत्ममंथन करे और पारदर्शिता को कागजों से निकालकर व्यवहार में उतारे। कृषि उपज मंडी मेंड्राकलां अंबिकापुर सरगुजा छत्तीसगढ़ सचिव प्रभु दयाल सिंह कार्यकारी अभियंता ओबीएस टोप्पो
सूचना इलेक्ट्रॉनिक माध्यम देने से मना किया मेंड्राकलां सचिव व कार्यकारी अभियंता भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए सूचना का अधिकार बनाम प्रशासनिक मानसिकता: मेन्द्राकला मंडी प्रकरण से उठते सवाल लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था का मूल तत्व है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 इसी उद्देश्य से अस्तित्व में आया था — ताकि नागरिक सरकार से प्रश्न पूछ सके और शासन जवाबदेह बने। परंतु जब स्वयं सार्वजनिक संस्थान सूचना देने से बचते दिखाई दें, तो यह केवल एक कार्यालय का मुद्दा नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था की सोच पर प्रश्नचिह्न बन जाता
है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले, अंबिकापुर स्थित कृषि उपज मंडी समिति मेन्द्रा कला से जुड़ा हालिया प्रकरण इसी बहस को पुनः जीवित करता है। मुद्दा केवल 7230 रुपये का नहीं आरटीआई आवेदन के माध्यम से पिछले दो वर्षों के टेंडर, भुगतान, एमबी बुक, सब्सिडी एवं अन्य प्रशासनिक दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई। जवाब में कार्यालय ने 3615 पृष्ठों की प्रतिलिपि बताकर 7230 रुपये शुल्क जमा करने का निर्देश दिया। कानूनन प्रति पृष्ठ निर्धारित शुल्क लिया जा सकता है — यह व्यवस्था का हिस्सा है। परंतु प्रश्न यह है कि जब सूचना डिजिटल रूप में उपलब्ध कराई जा सकती है, तब
केवल छायाप्रति के रूप में देने पर जोर क्यों? क्या यह तकनीकी सुविधा का अभाव है, या प्रक्रिया को जटिल बनाने की प्रवृत्ति? सूचना का अधिकार केवल कागजों का लेन-देन नहीं, बल्कि पारदर्शिता का माध्यम है। यदि सूचना देने की प्रक्रिया ही इतनी महंगी और बोझिल बना दी जाए कि आम नागरिक पीछे हट जाए, तो कानून का उद्देश्य कैसे पूरा होगा? धारा 4(1)(b) की आत्मा आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1)(b) सार्वजनिक प्राधिकरणों को कई जानकारियां स्वतः सार्वजनिक करने का निर्देश देती है। टेंडर, भुगतान, कार्यादेश और बैठकों के निर्णय — ये सभी ऐसी सूचनाएं हैं जिन्हें
नियमित रूप से वेबसाइट या सूचना पट्ट पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यदि दो वर्षों की जानकारी 3615 पृष्ठों में फैली है, तो यह भी विचारणीय है कि क्या इनका नियमित डिजिटलीकरण और सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ? यदि नहीं, तो क्यों? प्रशासनिक प्रशिक्षण और संवेदनशीलता मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें अधिकारी द्वारा आरटीआई की धाराओं की जानकारी न होने संबंधी कथन सुनाई देता है। यदि ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रुटि नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और जवाबदेही की कमी का संकेत है। जन सूचना अधिकारी का दायित्व मात्र आवेदन स्वीकार करना नहीं, बल्कि अधिनियम
की भावना को समझते हुए नागरिक को सहयोग देना है। “जैसा अधिकारी कहेगा वैसा होगा” जैसी मानसिकता पारदर्शी शासन के सिद्धांत से मेल नहीं खाती। बड़ा प्रश्न: क्या व्यवस्था पारदर्शिता से सहज है? यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध आरोप का विषय नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रश्न का संकेत है — क्या हमारी संस्थाएं पारदर्शिता को सहजता से स्वीकार कर पा रही हैं? यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हुई हैं, तो सूचना उपलब्ध कराने में संकोच क्यों? यदि टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी है, तो दस्तावेज साझा करने में हिचक क्यों? लोकतंत्र में विश्वास दस्तावेजों से बनता है, बयानों से
नहीं। आगे क्या? ऐसे मामलों में आवश्यक है कि: विभागीय स्तर पर पारदर्शिता की समीक्षा हो डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली को अनिवार्य बनाया जाए जन सूचना अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण हो स्वप्रकाशन (Proactive Disclosure) को सख्ती से लागू किया जाए सूचना का अधिकार कोई एहसान नहीं, बल्कि नागरिक का विधिक अधिकार है। शासन की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह सवालों से कितना सहज है। मेन्द्राकला मंडी प्रकरण एक अवसर भी है — व्यवस्था आत्ममंथन करे और पारदर्शिता को कागजों से निकालकर व्यवहार में उतारे। कृषि उपज मंडी मेंड्राकलां अंबिकापुर सरगुजा छत्तीसगढ़ सचिव प्रभु दयाल सिंह कार्यकारी अभियंता ओबीएस टोप्पो
- सूचना का अधिकार बनाम प्रशासनिक मानसिकता: मेन्द्राकला मंडी प्रकरण से उठते सवाल लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था का मूल तत्व है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 इसी उद्देश्य से अस्तित्व में आया था — ताकि नागरिक सरकार से प्रश्न पूछ सके और शासन जवाबदेह बने। परंतु जब स्वयं सार्वजनिक संस्थान सूचना देने से बचते दिखाई दें, तो यह केवल एक कार्यालय का मुद्दा नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था की सोच पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले, अंबिकापुर स्थित कृषि उपज मंडी समिति मेन्द्रा कला से जुड़ा हालिया प्रकरण इसी बहस को पुनः जीवित करता है। मुद्दा केवल 7230 रुपये का नहीं आरटीआई आवेदन के माध्यम से पिछले दो वर्षों के टेंडर, भुगतान, एमबी बुक, सब्सिडी एवं अन्य प्रशासनिक दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई। जवाब में कार्यालय ने 3615 पृष्ठों की प्रतिलिपि बताकर 7230 रुपये शुल्क जमा करने का निर्देश दिया। कानूनन प्रति पृष्ठ निर्धारित शुल्क लिया जा सकता है — यह व्यवस्था का हिस्सा है। परंतु प्रश्न यह है कि जब सूचना डिजिटल रूप में उपलब्ध कराई जा सकती है, तब केवल छायाप्रति के रूप में देने पर जोर क्यों? क्या यह तकनीकी सुविधा का अभाव है, या प्रक्रिया को जटिल बनाने की प्रवृत्ति? सूचना का अधिकार केवल कागजों का लेन-देन नहीं, बल्कि पारदर्शिता का माध्यम है। यदि सूचना देने की प्रक्रिया ही इतनी महंगी और बोझिल बना दी जाए कि आम नागरिक पीछे हट जाए, तो कानून का उद्देश्य कैसे पूरा होगा? धारा 4(1)(b) की आत्मा आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1)(b) सार्वजनिक प्राधिकरणों को कई जानकारियां स्वतः सार्वजनिक करने का निर्देश देती है। टेंडर, भुगतान, कार्यादेश और बैठकों के निर्णय — ये सभी ऐसी सूचनाएं हैं जिन्हें नियमित रूप से वेबसाइट या सूचना पट्ट पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यदि दो वर्षों की जानकारी 3615 पृष्ठों में फैली है, तो यह भी विचारणीय है कि क्या इनका नियमित डिजिटलीकरण और सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ? यदि नहीं, तो क्यों? प्रशासनिक प्रशिक्षण और संवेदनशीलता मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें अधिकारी द्वारा आरटीआई की धाराओं की जानकारी न होने संबंधी कथन सुनाई देता है। यदि ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रुटि नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और जवाबदेही की कमी का संकेत है। जन सूचना अधिकारी का दायित्व मात्र आवेदन स्वीकार करना नहीं, बल्कि अधिनियम की भावना को समझते हुए नागरिक को सहयोग देना है। “जैसा अधिकारी कहेगा वैसा होगा” जैसी मानसिकता पारदर्शी शासन के सिद्धांत से मेल नहीं खाती। बड़ा प्रश्न: क्या व्यवस्था पारदर्शिता से सहज है? यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध आरोप का विषय नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रश्न का संकेत है — क्या हमारी संस्थाएं पारदर्शिता को सहजता से स्वीकार कर पा रही हैं? यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हुई हैं, तो सूचना उपलब्ध कराने में संकोच क्यों? यदि टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी है, तो दस्तावेज साझा करने में हिचक क्यों? लोकतंत्र में विश्वास दस्तावेजों से बनता है, बयानों से नहीं। आगे क्या? ऐसे मामलों में आवश्यक है कि: विभागीय स्तर पर पारदर्शिता की समीक्षा हो डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली को अनिवार्य बनाया जाए जन सूचना अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण हो स्वप्रकाशन (Proactive Disclosure) को सख्ती से लागू किया जाए सूचना का अधिकार कोई एहसान नहीं, बल्कि नागरिक का विधिक अधिकार है। शासन की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह सवालों से कितना सहज है। मेन्द्राकला मंडी प्रकरण एक अवसर भी है — व्यवस्था आत्ममंथन करे और पारदर्शिता को कागजों से निकालकर व्यवहार में उतारे। कृषि उपज मंडी मेंड्राकलां अंबिकापुर सरगुजा छत्तीसगढ़ सचिव प्रभु दयाल सिंह कार्यकारी अभियंता ओबीएस टोप्पो6
- 🎥 स्पेशल रिपोर्ट – धान खरीदी में जिम्मेदार कौनइंट्रो (तेज और सीधे सवाल): किसान धान लेकर खरीदी केंद्र पहुंचा… लेकिन नाम सूची में नहीं! टोकन नहीं कटा… धान नहीं बिका… और लाखों का नुकसान! अब बड़ा सवाल – आखिर जिम्मेदार कौन? 📌 मामला क्या है? ग्राम लहपटरा, जनपद लखनपुर के किसान देवप्रसाद का आरोप है कि 55 क्विंटल 60 किलो धान बेचने के लिए परेशान!! बावजूद सूची में नाम नहीं होने का हवाला देकर टोकन नहीं काटा गया। सरकारी दर 2100 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से लगभग ₹1,16,760 रुपये का भुगतान मिलना था। आरोप है कि संबंधित पटवारी भारत सिंह की भूमिका संदिग्ध है। 🎯 बड़ा सवाल – धान खरीदी में पटवारी का काम क्या? ❓ सवाल 1: क्या पटवारी सीधे धान खरीदता है? 👉 नहीं। धान की तौल और भुगतान समिति/खरीदी केंद्र करता है। ❓ सवाल 2: क्या पटवारी की भूमिका होती है? 👉 हाँ। जमीन और रकबे का सत्यापन किसान पंजीयन का मिलान खसरा रिकॉर्ड की पुष्टि सूची में नाम जोड़ने/सत्यापन में सहयोग ❓ सवाल 3: अगर सूची में नाम नहीं था तो जिम्मेदार कौन? 👉 अगर पंजीयन या रकबा सत्यापन में गलती है, तो पटवारी की भूमिका जांच के दायरे में आती है। 👉 अगर तकनीकी या समिति स्तर की त्रुटि है, तो खरीदी केंद्र प्रबंधन जिम्मेदार हो सकता है। 🎤 किसान का आरोप देवप्रसाद का कहना है कि समय पर पहुंचने के बावजूद टोकन नहीं कटा, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हुआ। उन्होंने एमडी न्यूज के माध्यम से निष्पक्ष जांच और मुआवजे की मांग की है। ⚖ अब प्रशासन से सवाल क्या किसान का पंजीयन सही था? सूची से नाम क्यों गायब था? किसकी लापरवाही से ₹1 लाख से ज्यादा का नुकसान हुआ? क्या जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई होगआउट्रो (दमदार): किसान की मेहनत से समझौता नहीं हो सकता। अब देखना होगा – जांच होगी या मामला दबेगा? कैमरामैन के साथ ________, एमडी न्यूज।1
- केरजू समिति में 127 किसानों के फर्जी हस्ताक्षर कर 1.92 करोड़ का घोटाला: तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी, शाखा प्रबंधक और कैशियर सहित 8 पर FIR … अम्बिकापुर | आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित केरजू में फर्जी ऋण आहरण का एक बड़ा सनसनीखेज मामला उजागर हुआ है। जांच में 127 किसानों के नाम पर फर्जी हस्ताक्षर कर 1,92,82,006 रुपये (एक करोड़ बयानवे लाख बयासी हजार छह रुपये) का अवैध आहरण पाया गया है। इस वित्तीय अनियमितता की पुष्टि होने के बाद कलेक्टर अजीत वसंत ने तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारियों, शाखा प्रबंधक, सहायक लेखापाल और कंप्यूटर ऑपरेटर सहित कुल 8 संबंधितों के विरुद्ध एफआईआर (FIR) दर्ज करने के कड़े निर्देश दिए हैं। 127 किसानों के हक पर डाका: फर्जी हस्ताक्षर से निकाला पैसा अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) सीतापुर की अध्यक्षता में गठित संयुक्त जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि सहकारी समिति के भीतर एक सुनियोजित तरीके से किसानों के नाम पर कर्ज निकाला गया। रिकॉर्ड के अनुसार, कुल 127 किसानों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए और उनके खाते से करोड़ों रुपये की राशि निकाल ली गई। जांच प्रतिवेदन के आधार पर प्रशासन ने निम्नलिखित कर्मचारियों और अधिकारियों को सीधे तौर पर दोषी पाया है: मदन सिंह (तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी) जोगी राम (तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी) सैनाथ केरकेट्टा (वरिष्ठ सहकारी निरीक्षक एवं प्राधिकृत अधिकारी) भूपेन्द्र सिंह परिहार (तत्कालीन शाखा प्रबंधक) शिवशंकर सोनी (सहायक लेखापाल) ललिता सिन्हा (कैशियर) सुमित कुमार (सामान्य सहायक) दीपक कुमार चक्रधारी (कम्प्यूटर ऑपरेटर)1
- सरगुजा जिले के घाटबर्रा गांव में कोयला खदान विस्तार के दौरान श्मशान घाट में जेसीबी से खुदाई की जा रही थी। दावा है कि रात के समय अचानक रोने की आवाज सुनकर चालक मशीन छोड़कर भाग गया। गांव में दहशत का माहौल है, लोग इसे रहस्यमयी घटना से जोड़ रहे हैं। फिलहाल रात में खनन कार्य बंद बताया जा रहा है।1
- Post by Sunil Gupta1
- सूरजपुर, दिनांक 02 मार्च 2026 को सूरजपुर के मंगल भवन में आगामी माता कर्मा जयंती को लेकर सरगुजा संभाग के 6 जिले के सामाजिक बंधुओं को संबोधित करते हुए साहू समाज प्रदेश के मुखिया माननीय निरेंद्र साहू जी ने कहा कि हमारे समाज की आराध्य देवी माता कर्मा की प्रदेश स्तरीय जयंती सरगुजा संभाग में धूमधाम से मनाई जाएगी। प्रदेश ने निर्णय लिया है कि प्रदेश के सभी संभागों में साहू समाज के संत महात्माओं की जयंतियां अलग-अलग संभाग में मनाई जाएगी छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज के बाद सबसे बड़ा साहू समाज है जो पूरे छत्तीसगढ़ में फैला हुआ है मैं गांव-गांव में समाज के जागरूकता का संदेश लेकर जाऊंगा और अंतिम व्यक्ति तक समरसता एवं भाईचारा का संदेश देने का प्रयास करूंगा। समाज मैं व्याप्त कुरीतियों, नशा पान को जड़ से समूल नष्ट करना है जो सामाजिक बंधु इस कार्य में मेरा साथ देना चाहते हैं मेरे साथ चल सकते हैं। इस बैठक में जो जिलाध्यक्ष उपस्थित हैं वह इस जागरूकता के संदेश को कर्मा रथ के माध्यम से गांव-गांव में जाकर अलख जगाने का प्रयास करें। हमारे समाज को जो राजनीतिक पार्टियां आगे बढ़ाएंगी हमारा समाज उनका सहयोग करेगा अन्यथा सबक भी सिखाएंगे। संभाग से आए समस्त जनों का उन्होंने आभार व्यक्त किया। स्वागत भाषण देते हुए जिले के पूर्व जिला अध्यक्ष एवं वर्तमान साहू समाज के संरक्षक रामकृपाल साहू ने कहा जब से प्रदेश का नेतृत्व डॉक्टर निरेंद्र साहू जी संभाले हैं उन्होंने शादियों में प्री वेडिंग सूट को तत्काल प्रतिबंधित कर दिया है एवं हमारे समाज के महापुरुषों की जयंतियां प्रदेश के सभी संभागों में प्रदेश स्तरीय मनाने का निर्णय लिया है जिसके लिए उनकी सोच को मैं हृदय से धन्यवाद देता हूं इस प्रकार के कार्यक्रम करने से सुदूर क्षेत्रों में भी समाज के लोगों में जागरूकता एवं अपने इतिहास को जानने का अवसर प्राप्त होगा। प्रदेश स्तरीय कर्मा जयंती का आयोजन सूरजपुर जिले में तय करने के लिए उन्होंने संभाग के सभी जिला अध्यक्ष की सहमति एवं प्रदेश नेतृत्व को आभार व्यक्त किया और कहा की संभाग के सभी जिले से भारी संख्या में सामाजिक जन इस वृहद प्रदेश स्तरीय कर्मा जयंती कार्यक्रम में उपस्थित होंगे। कार्यक्रम को प्रदेश साहू संघ के डॉक्टर सुनील साहू ने संबोधित करते हुए कहा कि आज यह उपस्थित भीड़ सरगुजा संभाग में आयोजित कर्मा जयंती के कार्यक्रम को सफल बनाएगी ऐसा मुझे विश्वास है उन्होंने कहा हम प्रदेश अध्यक्ष जी के साथ प्रदेश के सभी जिलों में जाकर साहू समाज की एकजुटता का प्रयास कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ का नेतृत्व इस बात की चिंता कर रहा है कि हमारे समाज को संख्या के आधार पर राजनीतिक क्षेत्र में भी भागीदारी बढ़े। कार्यक्रम का सफल संचालन राजेश साहू ने किया एवं एवं सूरजपुर जिला अध्यक्ष राम लल्लू साहू ने उपस्थित सामाजिक बंधुओं को धन्यवाद दिया। इस अवसर पर सरगुजा के जिला अध्यक्ष केके गुप्ता, जशपुर के जिला अध्यक्ष सुरेंद्र गुप्ता, बलरामपुर के जिला अध्यक्ष बंसीधर गुप्ता, कोरिया के जिला अध्यक्ष जगदीश साहू, एमसी के जिला अध्यक्ष मनमोहन साहू, वरिष्ठ सामाजिक जनों में बनारसी लाल गुप्ता, रामविलास साहू, रामजतन साहू, लक्ष्मी गुप्ता, रामसेवक गुप्ता, मधुसूदन साहू, मार्तंड साहू, जोखनलाल साहू, गैबी नाथ साहू, सुभाष साहू, प्रयागराज साहू, डॉ मोहन साहू, रामकृपाल साहू रामू,प्रकाश साहू, सुरेश साहू, सुशील कुमार साहू, राम शिरोमणि साहू, उमाशंकर साहू, रामनिवास साहू, अशोक कुमार साहू, सौरभ साहू, मुकेश साहू छोटू, सुनील साहू, प्रदीप साहू, राम शिरोमणि साहू, राम प्राण साहू, बिरजा राम साहू, राजपाल साहू, रमेश कुमार साहू, बंसीलाल साहू, राजेश कुमार साहू, जिला मीडिया से सौरभ साहू मोंटू, जिला मीडिया से सुरेंद्र साहू, संदीप साहू, राजेश साहू, कमलेश साहू, सत्यम साहू, संतोष साहू, वीरेंद्र साहू, अर्चना साहू, विजय साहू मनीष दीपक साहू,आदित्य नारायण साहू, चंद्रभूषण साहू, अनिल साहू, रामकरण साहू, विष्णु साहू, जनक लाल गुप्ता, दिनेश साहू,महेंद्र साहू, उपेंद्र गुप्ता, प्रदेश से गोपाल साहू, जयप्रकाश साहू, सहित समाज के भारी संख्या में लोग उपस्थित रहे।1
- बैकुंठपुर /कोरिया मुख्यालय बैकुंठपुर में पुलिस अधीक्षक के निर्देशन पर आम जनता के सुरक्षा हेतु होली के पावन पर्व पर कोरिया पुलिस के द्वारा कई गाड़ियों में लदे पुलिस जवान बैकुंठपुर के एक-एक गली मोहल्ला समूचे पूरे कोरिया जिले में अस्त्र शस्त्र से तैनात होकर होली की त्यौहार शातिपूर्वक मनाने के लिए यह रैली शान्ति सद भावना की कोरिया पुलिस ने संदेश दिया आइये जानते है पुलिस की तैनाती रैली कैसी रही1
- आज की बड़ी खबर आ रही है छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से, जहां कृषि उपज मंडी मेंड्राकला में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार, मंडी में नियुक्त चौकीदार की जगह एक गरीब मजदूर से काम कराया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि उस मजदूर को महज 7 हजार रुपये महीने पर रखा गया, और उसे पिछले दो से तीन महीने से वेतन तक नहीं मिला है। आख़िर क्यों एक नियमित कर्मचारी घर पर आराम कर रहा है और एक गरीब मजदूर रात भर ड्यूटी देने को मजबूर है? देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट। “छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से बड़ी खबर! मंडी में चौकीदार घर में आराम कर रहा है… और एक गरीब मजदूर रात भर पहरा देने को मजबूर है! आरटीआई में हुआ बड़ा खुलासा — 7 हजार रुपये में काम… वो भी बिना वेतन के! क्या यही है व्यवस्था? क्या गरीब का हक़ ऐसे ही मारा जाएगा? हम सवाल पूछेंगे… जवाब लेकर रहेंगे!” तो क्या गरीब मजदूर के हक़ पर डाका डाला जा रहा है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर होगी कार्रवाई? अब देखना होगा कि इस खुलासे के बाद प्रशासन क्या कदम उठाता है। फिलहाल के लिए इतना ही, लेकिन इस खबर पर हमारी नजर बनी रहेगी।1