1200 साल की विरासत... रास्तों में झाड़ियां, बदहाल हालात में शेरगढ़ दुर्ग परवन नदी के किनारे इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम, 790 ईस्वी के शिलालेख से लेकर प्राचीन मंदिर-हवेलियां आज भी मौजूद संवाददाता : गजेंद्र गौतम संवाददाता : गजेंद्र गौतम कवाई. परवन नदी के किनारे घने जंगल और हरियाली के बीच सदियों से खड़ा शेरगढ़ दुर्ग अपने भीतर इतिहास की कई परतें समेटे हुए है। करीब 1200 साल पुरानी विरासत, प्राचीन मंदिर, बौद्ध अवशेष, हवेलियां, बुर्ज, छतरियां और नदी का विहंगम दृश्य इसे पर्यटन की दृष्टि से खास बनाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जिस धरोहर को देखने सैलानी दूर-दूर से पहुंच रहे हैं, उसी दुर्ग के भीतर कई रास्ते झाड़ियों और गंदगी से अटे पड़े हैं। सार-संभाल के अभाव में कई हिस्सों तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है। इतिहास की यह धरोहर आज संरक्षण और सुविधाओं की बाट जोह रही है। दुर्ग के प्रवेश से लेकर भीतर तक कई स्थानों पर झाड़ियां रास्तों पर फैल गई हैं। बारिश के मौसम में हरियाली ने भले ही किले की खूबसूरती बढ़ा दी हो, लेकिन यही बढ़ी हुई वनस्पति कई प्राचीन स्थलों तक पहुंच में बाधा बन रही है। साफ-सफाई और नियमित देखरेख की कमी भी नजर आती है। 790 ईस्वी का शिलालेख बताता है पुराना इतिहास** दुर्ग परिसर में लगे सूचना पट्ट के अनुसार यहां 790 ईस्वी का महत्वपूर्ण शिलालेख मिला है। इसमें सामंत देवदत्त का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने यहां बौद्ध मंदिर और विहार का निर्माण कराया था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि शेरगढ़ केवल एक किला नहीं, बल्कि प्राचीन काल से ही धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इस दुर्ग का प्राचीन नाम कोषवर्धन बताया जाता है। बाद के दौर में शेरशाह सूरी के मालवा अभियान के दौरान इस क्षेत्र पर अधिकार के बाद इसका नाम शेरगढ़ पड़ा माना जाता है। अलग-अलग कालखंडों में यहां विभिन्न शासकों का प्रभाव रहा, जिसके प्रमाण आज भी दुर्ग की स्थापत्य कला और अवशेषों में दिखाई देते हैं। मंदिर, गुफाएं और हवेलियां... हर कदम पर इतिहास शेरगढ़ में प्राचीन मंदिरों और स्थापत्य अवशेषों की भरमार है। सोम नाथ और लक्ष्मीनारायण मंदिर सहित कई संरचनाएं यहां के गौरवशाली अतीत की गवाही देती हैं। लक्ष्मीनारायण मंदिर को 11वीं शताब्दी से संबंधित माना जाता है। मंदिर के शिलालेख में धार के परमार शासकों की वंशावली का उल्लेख भी मिलता है। दुर्ग में जैन और बौद्ध परंपरा से जुड़े अवशेष तथा गुफाओं में बौद्ध प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। मुगलकालीन प्रभाव की झलक नवाब की हवेली, बेगम की हवेली और अन्य स्थापत्य में दिखाई देती है। किले में स्थित तीन प्रमुख हवेलियां—नवाब की हवेली, बेगम की हवेली और राजा की हवेली—आज भी आकर्षण का केंद्र हैं। राजा की हवेली निजी मिल्कियत बताई जाती है। एक मंदिर पर दशकों से ताला, कई प्रतिमाएं बदहाल* दुर्ग के लक्ष्मीनारायण मंदिर से ग्रामीणों के अनुसार करीब चार दशक पहले मूर्ति चोरी हो गई थी। इसके बाद से मंदिर पर ताला लगा हुआ है। पत्थरों पर बारीक शिल्पकला से सुसज्जित यह मंदिर करीब दर्जनभर खंभों पर टिका है, लेकिन संरक्षण के अभाव में इसकी भव्यता अब केवल बाहरी स्वरूप में दिखाई देती है। किले में कई प्राचीन प्रतिमाएं और अवशेष भी मौजूद हैं। नदी किनारे बनी एक प्राचीन समाधि का ऊपरी हिस्सा क्षतिग्रस्त है, जबकि उसका करीब चार फीट ऊंचा आधार अभी सुरक्षित है। ऐसे में इन धरोहरों के संरक्षण की जरूरत साफ नजर आती है। दो परकोटों में बसा है शेरगढ़** शेरगढ़ दुर्ग दो परकोटों से घिरा हुआ है। एक परकोटे के भीतर शेरगढ़ गांव बसा है, जबकि दूसरे के भीतर मुख्य किला है। मुख्य द्वार से कुछ दूरी पर बुर्ज पर रखी 19वीं सदी की रामबाण तोप आज भी यहां के सैन्य इतिहास की कहानी कहती है। दुर्ग के दक्षिणी हिस्से से परवन नदी का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। बारिश के दिनों में चारों ओर फैली हरियाली, पत्थरों की प्राचीन दीवारें और नदी का बहाव मिलकर ऐसा प्राकृतिक दृश्य बनाते हैं, जो सैलानियों को बरबस अपनी ओर खींचता है। कभी कोटा था नंदगांव, शेरगढ़ कहलाता था बरसाना अटरू निवासी राकेश शर्मा के अनुसार कोटा के शासक ने अपना राज्य श्रीकृष्ण को अर्पित करने के बाद कोटा को नंदगांव और शेरगढ़ को बरसाना घोषित किया था। इसके बाद शेरगढ़ वल्लभ संप्रदाय की एक पीठ की शरणस्थली भी रहा। संवत 1926 तक यह कस्बा इस परंपरा से जुड़ा रहा। बाद में द्वारकाधीशजी को महाराजा गायकवाड़ के आमंत्रण पर गुजरात के बड़ौदा ले जाया गया। शेरगढ़ का इतिहास पिंडारियों के दौर से भी जुड़ा रहा है। बताया जाता है कि पिंडारियों के अत्याचार से परेशान झाला जालिम सिंह ने कूटनीति के तहत उनके नेता अमीर खान पिंडारी के परिवार को भी शेरगढ़ में सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराया था। सैलानी पहुंच रहे, लेकिन सुविधाओं का टोटा शेरगढ़ की ऐतिहासिकता के साथ इसका प्राकृतिक सौंदर्य भी इसे खास बनाता है। परवन नदी और जंगलों से घिरे इस दुर्ग में पर्यटकों के लिए कई दर्शनीय स्थल हैं। करीब दो वर्ष पहले यहां फिल्म की शूटिंग होने के बाद भी यह स्थल चर्चा में आया। इसके बावजूद पर्यटकों के लिए मूलभूत सुविधाओं की कमी महसूस होती है। किले के भीतर रास्तों की सफाई, झाड़ियों की कटाई, नियमित देखरेख और ऐतिहासिक स्थलों तक सुगम पहुंच जैसी व्यवस्थाओं पर ध्यान देने की जरूरत है। **1.46 करोड़ के संरक्षण कार्य की उम्मीद शेरगढ़ दुर्ग की ऐतिहासिकता को देखते हुए इसके संरक्षण, जीर्णोद्धार और विकास के लिए राजस्थान सरकार की ओर से करीब 1.46 करोड़ रुपए के कार्य की निविदा जारी होने की जानकारी है। ऐसे में उम्मीद है कि प्रस्तावित कार्य जमीन पर नजर आएंगे और दुर्ग की बदहाल स्थिति में सुधार होगा। सवाल सिर्फ सफाई का नहीं, विरासत बचाने का है शेरगढ़ के पास इतिहास भी है और प्रकृति भी। 790 ईस्वी का शिलालेख, प्राचीन मंदिर, बौद्ध अवशेष, हवेलियां, बुर्ज और परवन नदी इसे पर्यटन का बड़ा केंद्र बनाने की क्षमता रखते हैं। जरूरत सिर्फ इन धरोहरों को सुरक्षित रखने और पर्यटकों के लिए बेहतर सुविधाएं विकसित करने की है। सवाल यह है कि जिस विरासत को देखकर सैलानी शेरगढ़ के इतिहास से रूबरू होने पहुंच रहे हैं, क्या उसके रास्ते और धरोहरें भी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखी जा सकेंगी।
1200 साल की विरासत... रास्तों में झाड़ियां, बदहाल हालात में शेरगढ़ दुर्ग परवन नदी के किनारे इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम, 790 ईस्वी के शिलालेख से लेकर प्राचीन मंदिर-हवेलियां आज भी मौजूद संवाददाता : गजेंद्र गौतम संवाददाता : गजेंद्र गौतम कवाई. परवन नदी के किनारे घने जंगल और हरियाली के बीच सदियों से खड़ा शेरगढ़ दुर्ग अपने भीतर इतिहास की कई परतें समेटे हुए है। करीब 1200 साल पुरानी विरासत, प्राचीन मंदिर, बौद्ध अवशेष, हवेलियां, बुर्ज, छतरियां और नदी का विहंगम दृश्य इसे पर्यटन की दृष्टि से खास बनाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जिस धरोहर को देखने सैलानी दूर-दूर से पहुंच रहे हैं, उसी दुर्ग के भीतर कई रास्ते झाड़ियों और गंदगी से अटे पड़े हैं। सार-संभाल के अभाव में कई हिस्सों तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है। इतिहास की यह धरोहर आज संरक्षण और सुविधाओं की बाट जोह रही है। दुर्ग के प्रवेश से लेकर भीतर तक कई स्थानों पर झाड़ियां रास्तों पर फैल गई हैं। बारिश के मौसम में हरियाली ने भले ही किले की खूबसूरती बढ़ा दी हो, लेकिन यही बढ़ी हुई वनस्पति कई प्राचीन स्थलों तक पहुंच में बाधा बन रही है। साफ-सफाई और नियमित देखरेख की कमी भी नजर आती है। 790 ईस्वी का शिलालेख बताता है पुराना इतिहास** दुर्ग परिसर में लगे सूचना पट्ट के अनुसार यहां 790 ईस्वी का महत्वपूर्ण शिलालेख मिला है। इसमें सामंत देवदत्त का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने यहां बौद्ध मंदिर और विहार का निर्माण कराया था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि शेरगढ़ केवल एक किला नहीं, बल्कि प्राचीन काल से ही धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इस दुर्ग का प्राचीन नाम कोषवर्धन बताया जाता है। बाद के दौर में शेरशाह सूरी के मालवा अभियान के दौरान इस क्षेत्र पर अधिकार के बाद इसका नाम शेरगढ़ पड़ा माना जाता है। अलग-अलग कालखंडों में यहां विभिन्न शासकों का प्रभाव रहा, जिसके प्रमाण आज भी दुर्ग की स्थापत्य कला और अवशेषों में दिखाई देते हैं। मंदिर, गुफाएं और हवेलियां... हर कदम पर इतिहास शेरगढ़ में प्राचीन मंदिरों
और स्थापत्य अवशेषों की भरमार है। सोम नाथ और लक्ष्मीनारायण मंदिर सहित कई संरचनाएं यहां के गौरवशाली अतीत की गवाही देती हैं। लक्ष्मीनारायण मंदिर को 11वीं शताब्दी से संबंधित माना जाता है। मंदिर के शिलालेख में धार के परमार शासकों की वंशावली का उल्लेख भी मिलता है। दुर्ग में जैन और बौद्ध परंपरा से जुड़े अवशेष तथा गुफाओं में बौद्ध प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। मुगलकालीन प्रभाव की झलक नवाब की हवेली, बेगम की हवेली और अन्य स्थापत्य में दिखाई देती है। किले में स्थित तीन प्रमुख हवेलियां—नवाब की हवेली, बेगम की हवेली और राजा की हवेली—आज भी आकर्षण का केंद्र हैं। राजा की हवेली निजी मिल्कियत बताई जाती है। एक मंदिर पर दशकों से ताला, कई प्रतिमाएं बदहाल* दुर्ग के लक्ष्मीनारायण मंदिर से ग्रामीणों के अनुसार करीब चार दशक पहले मूर्ति चोरी हो गई थी। इसके बाद से मंदिर पर ताला लगा हुआ है। पत्थरों पर बारीक शिल्पकला से सुसज्जित यह मंदिर करीब दर्जनभर खंभों पर टिका है, लेकिन संरक्षण के अभाव में इसकी भव्यता अब केवल बाहरी स्वरूप में दिखाई देती है। किले में कई प्राचीन प्रतिमाएं और अवशेष भी मौजूद हैं। नदी किनारे बनी एक प्राचीन समाधि का ऊपरी हिस्सा क्षतिग्रस्त है, जबकि उसका करीब चार फीट ऊंचा आधार अभी सुरक्षित है। ऐसे में इन धरोहरों के संरक्षण की जरूरत साफ नजर आती है। दो परकोटों में बसा है शेरगढ़** शेरगढ़ दुर्ग दो परकोटों से घिरा हुआ है। एक परकोटे के भीतर शेरगढ़ गांव बसा है, जबकि दूसरे के भीतर मुख्य किला है। मुख्य द्वार से कुछ दूरी पर बुर्ज पर रखी 19वीं सदी की रामबाण तोप आज भी यहां के सैन्य इतिहास की कहानी कहती है। दुर्ग के दक्षिणी हिस्से से परवन नदी का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। बारिश के दिनों में चारों ओर फैली हरियाली, पत्थरों की प्राचीन दीवारें और नदी का बहाव मिलकर ऐसा प्राकृतिक दृश्य बनाते हैं, जो सैलानियों को बरबस अपनी ओर खींचता है। कभी कोटा था नंदगांव, शेरगढ़ कहलाता था बरसाना अटरू निवासी राकेश शर्मा के अनुसार कोटा के शासक ने अपना राज्य श्रीकृष्ण
को अर्पित करने के बाद कोटा को नंदगांव और शेरगढ़ को बरसाना घोषित किया था। इसके बाद शेरगढ़ वल्लभ संप्रदाय की एक पीठ की शरणस्थली भी रहा। संवत 1926 तक यह कस्बा इस परंपरा से जुड़ा रहा। बाद में द्वारकाधीशजी को महाराजा गायकवाड़ के आमंत्रण पर गुजरात के बड़ौदा ले जाया गया। शेरगढ़ का इतिहास पिंडारियों के दौर से भी जुड़ा रहा है। बताया जाता है कि पिंडारियों के अत्याचार से परेशान झाला जालिम सिंह ने कूटनीति के तहत उनके नेता अमीर खान पिंडारी के परिवार को भी शेरगढ़ में सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराया था। सैलानी पहुंच रहे, लेकिन सुविधाओं का टोटा शेरगढ़ की ऐतिहासिकता के साथ इसका प्राकृतिक सौंदर्य भी इसे खास बनाता है। परवन नदी और जंगलों से घिरे इस दुर्ग में पर्यटकों के लिए कई दर्शनीय स्थल हैं। करीब दो वर्ष पहले यहां फिल्म की शूटिंग होने के बाद भी यह स्थल चर्चा में आया। इसके बावजूद पर्यटकों के लिए मूलभूत सुविधाओं की कमी महसूस होती है। किले के भीतर रास्तों की सफाई, झाड़ियों की कटाई, नियमित देखरेख और ऐतिहासिक स्थलों तक सुगम पहुंच जैसी व्यवस्थाओं पर ध्यान देने की जरूरत है। **1.46 करोड़ के संरक्षण कार्य की उम्मीद शेरगढ़ दुर्ग की ऐतिहासिकता को देखते हुए इसके संरक्षण, जीर्णोद्धार और विकास के लिए राजस्थान सरकार की ओर से करीब 1.46 करोड़ रुपए के कार्य की निविदा जारी होने की जानकारी है। ऐसे में उम्मीद है कि प्रस्तावित कार्य जमीन पर नजर आएंगे और दुर्ग की बदहाल स्थिति में सुधार होगा। सवाल सिर्फ सफाई का नहीं, विरासत बचाने का है शेरगढ़ के पास इतिहास भी है और प्रकृति भी। 790 ईस्वी का शिलालेख, प्राचीन मंदिर, बौद्ध अवशेष, हवेलियां, बुर्ज और परवन नदी इसे पर्यटन का बड़ा केंद्र बनाने की क्षमता रखते हैं। जरूरत सिर्फ इन धरोहरों को सुरक्षित रखने और पर्यटकों के लिए बेहतर सुविधाएं विकसित करने की है। सवाल यह है कि जिस विरासत को देखकर सैलानी शेरगढ़ के इतिहास से रूबरू होने पहुंच रहे हैं, क्या उसके रास्ते और धरोहरें भी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखी जा सकेंगी।
- ताश के पत्तों पर सज रही थी जुए की बाजी, पुलिस ने मारी दबिश मवासा में चार जुआरी गिरफ्तार, 10,100 रुपए की जुआ राशि जब्त कवाई। ग्राम मवासा में ताश के पत्तों पर रुपए का दांव लगाकर जुआ खेल रहे चार युवकों पर पुलिस ने कार्रवाई की। गश्त के दौरान मिली सूचना के बाद पुलिस टीम ने मौके पर दबिश दी तो वहां ताश के पत्तों पर दांव लगाते चार युवक मिले। पुलिस ने चारों को मौके से गिरफ्तार कर उनके कब्जे से 10,100 रुपए की जुआ राशि बरामद की। पुलिस अधीक्षक बारां अभिषेक अंदासु ने बताया कि वांछित एवं फरार अपराधियों की गिरफ्तारी तथा थाना क्षेत्र में संचालित अवैध गतिविधियों के खिलाफ विशेष अभियान चलाया जा रहा है। इसी अभियान के तहत अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सौरभ तिवाड़ी के निर्देशन, अटरू वृत्ताधिकारी रामानंद यादव के निकटतम पर्यवेक्षण तथा थानाधिकारी राजपाल सिंह के नेतृत्व में पुलिस टीम गश्त कर रही थी। इसी दौरान पुलिस को सूचना मिली कि मवासा गांव में कुछ लोग ताश के पत्तों पर रुपए का दांव लगाकर जुआ खेल रहे हैं। सूचना की तस्दीक के बाद पुलिस टीम मौके पर पहुंची तो चार युवक जुआ खेलते मिले। पुलिस को देखते ही वहां खलबली मच गई। टीम ने मौके पर ही चारों को पकड़ लिया और जुआ राशि जब्त कर ली। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान नरेन्द्र पुत्र रामचन्द्र ऐरवाल (23) निवासी बनारसी तिहारा, नितेश पुत्र दुर्गालाल किराड़ (24) निवासी मवासा, गोलू पुत्र देवकरण ऐरवाल (24) निवासी बनारसी चौराहा तथा कमल किशोर पुत्र रामदयाल किराड़ (26) निवासी गोरधनपुरा के रूप में हुई है। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ राजस्थान सार्वजनिक जुआ अधिनियम की धारा 13 के तहत प्रकरण दर्ज कर अनुसंधान शुरू कर दिया है। पुलिस टीम में थानाधिकारी राजपाल सिंह, सहायक उपनिरीक्षक विजय कुमार, कांस्टेबल रामेश्वर. महेन्द्र एवं हेमराज शामिल रहे।2
- भाइयों की कलाइयों पर सजेगी वोट वाली राखियां बाजार में आकर्षण का केंद्र बनीं मतदाता जागरूकता राखियां भाइयों की कलाइयों पर सजेगी वोट वाली राखियां बाजार में आकर्षण का केंद्र बनीं मतदाता जागरूकता राखियां1
- राम कथा प्रारम हो चुकी है सभी भक्तजन जादा से जादा पधारे देहलनपुर सांवरिया सेठ कदम वाले1
- श्री सांवरिया सेठ कदम की पहाड़ी पर झूला महोत्सव एवं धार्मिक मेला तथा श्री राम कथा का शुभारंभ श्री सांवरिया सेठ कदम की पहाड़ी पर झूला महोत्सव एवं धार्मिक मेला तथा श्री राम कथा का शुभारंभ हरनावदा शाहजी थाना क्षेत्र के देहलनपुर में स्थित श्री सांवरिया सेठ कदम की पहाड़ी पर आज झूला मौसम धार्मिक खेल तथा श्री राम कथा का शुभारंभ हुआ कथावाचक श्री 108 रामदास जी महाराज लटेरी वालों के श्री मुख से श्री राम कथा का श्रवण करवाया जा रहा है। श्री कृष्ण सेवा समिति के सदस्य अनिल कुमार ने बताया कि हर वर्ष की भर्ती इस वर्ष की झूला महोत्सव एवं धार्मिक मेला तथा श्री राम कथा का आयोजन किया जा रहा है जिसका प्रारंभ आज से कलश यात्रा शोभायात्रा के साथ देहलनपुर गांव के श्री राम जानकी मंदिर से प्रारंभ होकर कदम प्रांगण श्री सांवरिया पहाड़ी स्थान पर पहुंचे , जहां पर श्री राम कथा का शुभारंभ किया गया। श्री राम कथा का अंतिम समापन श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर 4 सितंबर को रहेगा श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर जन्माष्टमी के दिन विशाल धार्मिक मेले के ,आयोजन के साथ झूला महोत्सव एवं धार्मिक मेला तथा श्री राम कथा का समापन होगा4
- पिता की पुण्य स्मृति में विद्यार्थियों को बैग व स्टेशनरी वितरित खानपुर। क्षेत्र के शिवनगर ढाणी स्थित राजकीय वरिष्ठ उपाध्याय संस्कृत विद्यालय में स्व. राधाकिशनजी रेबारी की पुण्य स्मृति में विद्यार्थियों को बैग एवं स्टेशनरी वितरित की गई। विद्यालय प्रशासक शम्भूलाल रेबारी की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सीबीईओ सियाराम नागर ने विद्यार्थियों को शैक्षणिक सामग्री वितरित की। इस अवसर पर सीबीईओ सियाराम नागर ने विद्यार्थियों को शिक्षा के प्रति जागरूक, निडर रहने और नियमित अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा ही समाज के विकास और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का सबसे सशक्त माध्यम है। कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों एवं ग्रामवासियों ने आयोजन की सराहना की। विद्यार्थियों में बैग एवं स्टेशनरी मिलने को लेकर खासा उत्साह नजर आया। आयोजन के अंत में विद्यालय प्रशासक शम्भूलाल रेबारी ने सभी अतिथियों एवं ग्रामवासियों का आभार व्यक्त किया।1
- रक्षाबंधन से पहले बाजार में जाम ही जाम।खानपुर में त्योहार की खरीदारी के लिए उमड़ी भीड़ के बीच दुकानों के आगे 3 से 10 फीट तक अतिक्रमण ने यातायात व्यवस्था बिगाड़ दी। हर घंटे जाम, सड़कों पर वाहनों की कतार और पैदल राहगीर परेशान।1
- नेपाल में आई ऐसी बाढ़ लोगो को संभलने का समय तक नही मिला1
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