पहले बेटियां अपने-अपने संसार में चली गईं... पिता मांगकर खाते रहे, आखिर डिवाइडर पर थम गईं सांसें 70 साल की जिंदगी का दर्दनाक अंत: रानीताल में सड़क किनारे मिला अशोक कुमार जैन का शव, अंतिम विदाई देने पहुंची बेबस बेटी पहले बेटियां अपने-अपने संसार में चली गईं... पिता मांगकर खाते रहे, आखिर डिवाइडर पर थम गईं सांसें 70 साल की जिंदगी का दर्दनाक अंत: रानीताल में सड़क किनारे मिला अशोक कुमार जैन का शव, अंतिम विदाई देने पहुंची बेबस बेटी जबलपुर। जिस पिता ने कभी अपनी औलाद की जरूरतों के लिए मजदूरी की होगी, जिसने अपनी संतान को पालने के लिए जिंदगी के तमाम संघर्ष सहे होंगे, उसी पिता की जिंदगी का आखिरी पड़ाव रानीताल के एक डिवाइडर पर खत्म हो गया। 70 वर्षीय अशोक कुमार जैन का शव रानीताल बजरंग बली मंदिर के सामने डिवाइडर पर मिला। उनके पास उनकी बेटी अनीता कुमार जैन बैठी थी। आंखों में आंसू थे, सामने पिता का शव था और दिल में सिर्फ एक सवाल—काश, मैं अपने पिता के लिए कुछ कर पाती... अशोक कुमार की जिंदगी गरीबी और अभावों से घिरी रही। मजदूरी कर किसी तरह जीवन चलाया। पत्नी का साथ पहले ही छूट चुका था। बच्चे बड़े हुए तो अपने-अपने संसार में चले गए। बुढ़ापे में जब सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब आर्थिक तंगी ने उन्हें रानीताल में मांगकर जीवन गुजारने को मजबूर कर दिया। आखिरकार जिस सड़क किनारे वे जिंदगी के दिन काट रहे थे, वहीं उनकी जिंदगी की आखिरी सांस भी थम गई। राहगीरों ने देखा शव... पास बैठी थी बेटी रानीताल में डिवाइडर पर बुजुर्ग का शव देखकर राहगीरों ने सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने जानकारी जुटाई तो शव की पहचान अशोक कुमार जैन के रूप में हुई। शव के पास उनकी बेटी अनीता बैठी थी। पिता को इस हालत में देखकर वह खुद को संभाल नहीं पा रही थी। सूचना मिलने पर गरीब नवाज कमेटी के सदस्य भी मौके पर पहुंचे। परिवार की आर्थिक स्थिति सामने आने के बाद कमेटी ने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई। तीन बेटियां थीं... मगर अंतिम सफर में एक ही बेटी साथ थी अनीता ने बताया कि परिवार में बेटियां और बेटे हैं, लेकिन समय के साथ सभी अपने-अपने परिवारों में चले गए। उसकी दो बहनों की शादी संपन्न परिवारों में हुई। आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण पिता से उनका संपर्क कम हो गया। अनीता ने खुद अपनी पसंद से मध्यमवर्गीय बर्मन परिवार में विवाह किया। आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद उसने पिता से रिश्ता नहीं तोड़ा। शायद यही वजह थी कि पिता की मौत की खबर मिलते ही वह दौड़ी चली आई। लेकिन इस बार वह बेटी अपने पिता को बचाने नहीं, उन्हें आखिरी बार विदा करने आई थी। "जिस पिता ने मेरी हर जरूरत पूरी करने के लिए मेहनत की... आज मैं उनके लिए कुछ नहीं कर पा रही" पिता के शव के पास बैठी अनीता की यह बात वहां मौजूद लोगों को भी भावुक कर गई। पिता की मौत का दुख तो था ही, लेकिन उससे बड़ा दर्द अपनी बेबसी का था। पिता के लिए बेटी की आंखों में आंसू थे, मगर जेब में अंतिम संस्कार का खर्च नहीं। डेढ़ साल की उम्र से शुरू हुआ था अनीता का संघर्ष अनीता ने बताया कि जब वह महज डेढ़ वर्ष की थी, तब गरीबी के कारण उसके मामा के परिवार ने उसे अपने घर से बाहर कर दिया था। बचपन से ही उसने अभाव देखे और संघर्ष के बीच जिंदगी गुजारी। शायद गरीबी ने दोनों—पिता और बेटी—को अलग-अलग उम्र में एक ही दर्द दिया था। फर्क सिर्फ इतना था कि पिता जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर थे और बेटी चाहकर भी उनके लिए बहुत कुछ नहीं कर पा रही थी। जब अपने कमजोर पड़े, समाज ने थामा हाथ अशोक कुमार के अंतिम संस्कार के लिए जब आर्थिक संकट सामने आया तो गरीब नवाज कमेटी आगे आई। कमेटी के सदस्यों ने शव को रानीताल मुक्ति धाम पहुंचाया और अंतिम संस्कार की व्यवस्था की। बेटी अनीता ने नम आंखों से पिता को अंतिम विदाई दी। जिस पिता की जिंदगी अकेलेपन में गुजर गई, उनके अंतिम सफर में समाज का एक हाथ सहारा बन गया। एक डिवाइडर पर खत्म हुई जिंदगी... लेकिन कहानी छोड़ गई कई सवाल रानीताल का वह डिवाइडर अब सिर्फ सड़क का हिस्सा नहीं रह गया। वह एक ऐसे पिता की आखिरी कहानी का गवाह बन गया, जिसने गरीबी में जिंदगी काटी, बुढ़ापे में मांगकर गुजारा किया और आखिरकार सड़क किनारे दम तोड़ दिया। अशोक कुमार की मौत कई सवाल छोड़ गई है— क्या बुजुर्ग माता-पिता का सहारा उनकी आर्थिक स्थिति देखकर तय होगा? क्या गरीबी रिश्तों के बीच भी दीवार खड़ी कर देती है? और क्या ऐसे बेसहारा बुजुर्गों की पहचान समय रहते नहीं होनी चाहिए, ताकि उनका आखिरी वक्त सड़क किनारे अकेलेपन में न बीते? अशोक कुमार चले गए। बेटी ने अंतिम विदाई दे दी। गरीब नवाज कमेटी ने अंतिम सफर में साथ दिया। लेकिन रानीताल का वह डिवाइडर पीछे छोड़ गया एक ऐसा दर्द, जिसका जवाब शायद सिर्फ परिवार नहीं, पूरे समाज को तलाशना होगा।
पहले बेटियां अपने-अपने संसार में चली गईं... पिता मांगकर खाते रहे, आखिर डिवाइडर पर थम गईं सांसें 70 साल की जिंदगी का दर्दनाक अंत: रानीताल में सड़क किनारे मिला अशोक कुमार जैन का शव, अंतिम विदाई देने पहुंची बेबस बेटी पहले बेटियां अपने-अपने संसार में चली गईं... पिता मांगकर खाते रहे, आखिर डिवाइडर पर थम गईं सांसें 70 साल की जिंदगी का दर्दनाक अंत: रानीताल में सड़क किनारे मिला अशोक कुमार जैन का शव, अंतिम विदाई देने पहुंची बेबस बेटी जबलपुर। जिस पिता ने कभी अपनी औलाद की जरूरतों के लिए मजदूरी की होगी, जिसने अपनी संतान को पालने के लिए जिंदगी के तमाम संघर्ष सहे होंगे, उसी पिता की जिंदगी का आखिरी पड़ाव रानीताल के एक डिवाइडर पर खत्म हो गया। 70 वर्षीय अशोक कुमार जैन का शव रानीताल बजरंग बली मंदिर के सामने डिवाइडर पर मिला। उनके पास उनकी बेटी अनीता कुमार जैन बैठी थी। आंखों में आंसू थे, सामने पिता का शव था और दिल में सिर्फ एक सवाल—काश, मैं अपने पिता के लिए कुछ कर पाती... अशोक कुमार की जिंदगी गरीबी और अभावों से घिरी रही। मजदूरी कर किसी तरह जीवन चलाया। पत्नी का साथ पहले ही छूट चुका था। बच्चे बड़े हुए तो अपने-अपने संसार में चले गए। बुढ़ापे में जब सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब आर्थिक तंगी ने उन्हें रानीताल में मांगकर जीवन गुजारने को मजबूर कर दिया। आखिरकार जिस सड़क किनारे वे जिंदगी के दिन काट रहे थे, वहीं उनकी जिंदगी की आखिरी सांस भी थम गई। राहगीरों ने देखा शव... पास बैठी थी बेटी रानीताल में डिवाइडर पर बुजुर्ग का शव देखकर राहगीरों ने सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने जानकारी जुटाई तो शव की पहचान अशोक कुमार जैन के रूप में हुई। शव के पास उनकी बेटी अनीता बैठी थी। पिता को इस हालत में देखकर वह खुद को संभाल नहीं पा रही थी। सूचना मिलने पर गरीब नवाज कमेटी के सदस्य भी मौके पर पहुंचे। परिवार की आर्थिक स्थिति सामने आने के बाद कमेटी ने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई। तीन बेटियां थीं... मगर अंतिम सफर में एक ही बेटी साथ थी अनीता ने बताया कि परिवार में बेटियां और बेटे हैं, लेकिन समय के साथ सभी अपने-अपने परिवारों में चले गए। उसकी दो बहनों की शादी संपन्न परिवारों में हुई। आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण पिता से उनका संपर्क कम हो गया। अनीता ने खुद अपनी पसंद से मध्यमवर्गीय बर्मन परिवार में विवाह किया। आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद उसने पिता से रिश्ता नहीं तोड़ा। शायद यही वजह थी कि पिता की मौत की खबर मिलते ही वह दौड़ी चली आई। लेकिन इस बार वह बेटी अपने पिता को बचाने नहीं, उन्हें आखिरी बार विदा करने आई थी। "जिस पिता ने मेरी हर जरूरत पूरी करने के लिए मेहनत की... आज मैं उनके लिए कुछ नहीं कर पा रही" पिता के शव के पास बैठी अनीता की यह बात वहां मौजूद लोगों को भी भावुक कर गई। पिता की मौत का दुख तो था ही, लेकिन उससे बड़ा दर्द अपनी बेबसी का था। पिता के लिए बेटी की आंखों में आंसू थे, मगर जेब में अंतिम संस्कार का खर्च नहीं। डेढ़ साल की उम्र से शुरू हुआ था अनीता का संघर्ष अनीता ने बताया कि जब वह महज डेढ़ वर्ष की थी, तब गरीबी के कारण उसके मामा के परिवार ने उसे अपने घर से बाहर कर दिया था। बचपन से ही उसने अभाव देखे और संघर्ष के बीच जिंदगी गुजारी। शायद गरीबी ने दोनों—पिता और बेटी—को अलग-अलग उम्र में एक ही दर्द दिया था। फर्क सिर्फ इतना था कि पिता जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर थे और बेटी चाहकर भी उनके लिए बहुत कुछ नहीं कर पा रही थी। जब अपने कमजोर पड़े, समाज ने थामा हाथ अशोक कुमार के अंतिम संस्कार के लिए जब आर्थिक संकट सामने आया तो गरीब नवाज कमेटी आगे आई। कमेटी के सदस्यों ने शव को रानीताल मुक्ति धाम पहुंचाया और अंतिम संस्कार की व्यवस्था की। बेटी अनीता ने नम आंखों से पिता को अंतिम विदाई दी। जिस पिता की जिंदगी अकेलेपन में गुजर गई, उनके अंतिम सफर में समाज का एक हाथ सहारा बन गया। एक डिवाइडर पर खत्म हुई जिंदगी... लेकिन कहानी छोड़ गई कई सवाल रानीताल का वह डिवाइडर अब सिर्फ सड़क का हिस्सा नहीं रह गया। वह एक ऐसे पिता की आखिरी कहानी का गवाह बन गया, जिसने गरीबी में जिंदगी काटी, बुढ़ापे में मांगकर गुजारा किया और आखिरकार सड़क किनारे दम तोड़ दिया। अशोक कुमार की मौत कई सवाल छोड़ गई है— क्या बुजुर्ग माता-पिता का सहारा उनकी आर्थिक स्थिति देखकर तय होगा? क्या गरीबी रिश्तों के बीच भी दीवार खड़ी कर देती है? और क्या ऐसे बेसहारा बुजुर्गों की पहचान समय रहते नहीं होनी चाहिए, ताकि उनका आखिरी वक्त सड़क किनारे अकेलेपन में न बीते? अशोक कुमार चले गए। बेटी ने अंतिम विदाई दे दी। गरीब नवाज कमेटी ने अंतिम सफर में साथ दिया। लेकिन रानीताल का वह डिवाइडर पीछे छोड़ गया एक ऐसा दर्द, जिसका जवाब शायद सिर्फ परिवार नहीं, पूरे समाज को तलाशना होगा।
- पहले बेटियां अपने-अपने संसार में चली गईं... पिता मांगकर खाते रहे, आखिर डिवाइडर पर थम गईं सांसें 70 साल की जिंदगी का दर्दनाक अंत: रानीताल में सड़क किनारे मिला अशोक कुमार जैन का शव, अंतिम विदाई देने पहुंची बेबस बेटी पहले बेटियां अपने-अपने संसार में चली गईं... पिता मांगकर खाते रहे, आखिर डिवाइडर पर थम गईं सांसें 70 साल की जिंदगी का दर्दनाक अंत: रानीताल में सड़क किनारे मिला अशोक कुमार जैन का शव, अंतिम विदाई देने पहुंची बेबस बेटी जबलपुर। जिस पिता ने कभी अपनी औलाद की जरूरतों के लिए मजदूरी की होगी, जिसने अपनी संतान को पालने के लिए जिंदगी के तमाम संघर्ष सहे होंगे, उसी पिता की जिंदगी का आखिरी पड़ाव रानीताल के एक डिवाइडर पर खत्म हो गया। 70 वर्षीय अशोक कुमार जैन का शव रानीताल बजरंग बली मंदिर के सामने डिवाइडर पर मिला। उनके पास उनकी बेटी अनीता कुमार जैन बैठी थी। आंखों में आंसू थे, सामने पिता का शव था और दिल में सिर्फ एक सवाल—काश, मैं अपने पिता के लिए कुछ कर पाती... अशोक कुमार की जिंदगी गरीबी और अभावों से घिरी रही। मजदूरी कर किसी तरह जीवन चलाया। पत्नी का साथ पहले ही छूट चुका था। बच्चे बड़े हुए तो अपने-अपने संसार में चले गए। बुढ़ापे में जब सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब आर्थिक तंगी ने उन्हें रानीताल में मांगकर जीवन गुजारने को मजबूर कर दिया। आखिरकार जिस सड़क किनारे वे जिंदगी के दिन काट रहे थे, वहीं उनकी जिंदगी की आखिरी सांस भी थम गई। राहगीरों ने देखा शव... पास बैठी थी बेटी रानीताल में डिवाइडर पर बुजुर्ग का शव देखकर राहगीरों ने सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने जानकारी जुटाई तो शव की पहचान अशोक कुमार जैन के रूप में हुई। शव के पास उनकी बेटी अनीता बैठी थी। पिता को इस हालत में देखकर वह खुद को संभाल नहीं पा रही थी। सूचना मिलने पर गरीब नवाज कमेटी के सदस्य भी मौके पर पहुंचे। परिवार की आर्थिक स्थिति सामने आने के बाद कमेटी ने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई। तीन बेटियां थीं... मगर अंतिम सफर में एक ही बेटी साथ थी अनीता ने बताया कि परिवार में बेटियां और बेटे हैं, लेकिन समय के साथ सभी अपने-अपने परिवारों में चले गए। उसकी दो बहनों की शादी संपन्न परिवारों में हुई। आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण पिता से उनका संपर्क कम हो गया। अनीता ने खुद अपनी पसंद से मध्यमवर्गीय बर्मन परिवार में विवाह किया। आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद उसने पिता से रिश्ता नहीं तोड़ा। शायद यही वजह थी कि पिता की मौत की खबर मिलते ही वह दौड़ी चली आई। लेकिन इस बार वह बेटी अपने पिता को बचाने नहीं, उन्हें आखिरी बार विदा करने आई थी। "जिस पिता ने मेरी हर जरूरत पूरी करने के लिए मेहनत की... आज मैं उनके लिए कुछ नहीं कर पा रही" पिता के शव के पास बैठी अनीता की यह बात वहां मौजूद लोगों को भी भावुक कर गई। पिता की मौत का दुख तो था ही, लेकिन उससे बड़ा दर्द अपनी बेबसी का था। पिता के लिए बेटी की आंखों में आंसू थे, मगर जेब में अंतिम संस्कार का खर्च नहीं। डेढ़ साल की उम्र से शुरू हुआ था अनीता का संघर्ष अनीता ने बताया कि जब वह महज डेढ़ वर्ष की थी, तब गरीबी के कारण उसके मामा के परिवार ने उसे अपने घर से बाहर कर दिया था। बचपन से ही उसने अभाव देखे और संघर्ष के बीच जिंदगी गुजारी। शायद गरीबी ने दोनों—पिता और बेटी—को अलग-अलग उम्र में एक ही दर्द दिया था। फर्क सिर्फ इतना था कि पिता जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर थे और बेटी चाहकर भी उनके लिए बहुत कुछ नहीं कर पा रही थी। जब अपने कमजोर पड़े, समाज ने थामा हाथ अशोक कुमार के अंतिम संस्कार के लिए जब आर्थिक संकट सामने आया तो गरीब नवाज कमेटी आगे आई। कमेटी के सदस्यों ने शव को रानीताल मुक्ति धाम पहुंचाया और अंतिम संस्कार की व्यवस्था की। बेटी अनीता ने नम आंखों से पिता को अंतिम विदाई दी। जिस पिता की जिंदगी अकेलेपन में गुजर गई, उनके अंतिम सफर में समाज का एक हाथ सहारा बन गया। एक डिवाइडर पर खत्म हुई जिंदगी... लेकिन कहानी छोड़ गई कई सवाल रानीताल का वह डिवाइडर अब सिर्फ सड़क का हिस्सा नहीं रह गया। वह एक ऐसे पिता की आखिरी कहानी का गवाह बन गया, जिसने गरीबी में जिंदगी काटी, बुढ़ापे में मांगकर गुजारा किया और आखिरकार सड़क किनारे दम तोड़ दिया। अशोक कुमार की मौत कई सवाल छोड़ गई है— क्या बुजुर्ग माता-पिता का सहारा उनकी आर्थिक स्थिति देखकर तय होगा? क्या गरीबी रिश्तों के बीच भी दीवार खड़ी कर देती है? और क्या ऐसे बेसहारा बुजुर्गों की पहचान समय रहते नहीं होनी चाहिए, ताकि उनका आखिरी वक्त सड़क किनारे अकेलेपन में न बीते? अशोक कुमार चले गए। बेटी ने अंतिम विदाई दे दी। गरीब नवाज कमेटी ने अंतिम सफर में साथ दिया। लेकिन रानीताल का वह डिवाइडर पीछे छोड़ गया एक ऐसा दर्द, जिसका जवाब शायद सिर्फ परिवार नहीं, पूरे समाज को तलाशना होगा।1
- जबलपुर: सिंधी कॉलोनी के लोग 10 वर्षों से नाली सड़क के लिए संघर्षरत जबलपुर: रानी लक्ष्मीबाई वार्ड 66 की सिंधी कॉलोनी के निवासी नाली सड़क की समस्या से लगभग 10 वर्षों से जूझ रहे हैं। यह कॉलोनी पूर्व विधायक द्वारा बनाई गई है, लेकिन आज भी यहां सड़क की हालत खराब है। तीन-चार फीट गहरे गड्ढों में पानी जमा हो जाता है, जिससे इलाके में रहने वाले लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे नाली सड़क की मरम्मत के लिए बार-बार अधिकारियों और पार्षदों से मांग कर चुके हैं, लेकिन अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। पार्षद भी इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, जिससे समस्या बनी हुई है।3
- पीने वाला पानी और घर में रोजमर्रा की जिंदगी में उसे होने वाले पानी की बात समस्या नल जल योजना वाले नल चालू नहीं हुए चालू हुए कुछ दिन चले महीना 15 दिन पर बंद हो गए आदमी निर्भर हो गए पानी के लिए नल जल योजना पर और गांव के जो हेड पंप है वह भी सब बिगड़ी पड़े हैं और कोई सुनने को तैयार नहीं है पानी की एक-एक बूंद के लिए किल्लतमची है1
- अवैध वसूली के विरोध पर मिठाई दुकान में संचालक व्यापारी-कर्मचारी पर लाठी-डंडों से किया हमला... जबलपुर - जबलपुर के सीओडी तिराहा स्थित प्रसिद्ध मिठाई की दुकान में कथित अवैध वसूली को लेकर जमकर मारपीट की गई । पुलिस के अनुसार ग्राम गधेरी निवासी यादव बंधु अर्जुन यादव, सागर यादव सहित अन्य लोग दुकान पर अवैध वसूली के लिए पहुंचे थे। दुकान संचालक मुन्ना गुप्ता और कर्मचारियों ने इसका विरोध किया तो आरोपी आगबबूला हो गए और मारपीट शुरू कर दी। दबंगों ने दुकान में जमकर उत्पात मचाते हुए कर्मचारियों के साथ मारपीट की। बीच-बचाव करने पहुंचे कर्मचारी कल्लू कुशवाहा को भी नहीं बख्शा गया और उसके सिर पर लाठी-डंडे से जोरदार वार कर घायल दिया गया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। घटना के बाद इलाके में हड़कंप की स्थिति बन गई।.... मामले की सूचना मिलते ही रांझी पुलिस सक्रिय हुई और शिकायत के आधार पर आरोपियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू कर दी। थाना प्रभारी उमेश गोल्हानी के मुताबिक पुलिस आरोपियों की तलाश में जुटी है। घटनास्थल और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगाले जा रहे हैं, ताकि हमले में शामिल सभी लोगों की पहचान की जा सके। पुलिस का कहना है कि जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ कड़ी वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। जबलपुर से कार्तिक गुप्ता की रिपोर्ट4
- कटनी नगर//- श्री गणेश जी की पाँच महाआरती का आयोजन श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ किया गया। कटनी शहर के गणेश चौक में गणेश उत्सव की भव्य छटा देखने को मिल रही है। भगवान श्री गणेश जी की पाँच महाआरती का आयोजन श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ किया गया। महाआरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और गणपति बप्पा के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा। भक्तों ने सुख-समृद्धि और शांति की कामना करते हुए भगवान गणेश का आशीर्वाद लिया।👌🙏🍂🧿💞🌺1
- कटनी: इंटरसिटी एक्सप्रेस से कटकर 30 बकरियों की मौत, 3 महिलाएं बच गई 💥*बड़ी खबर*💥 *इंटरसिटी एक्सप्रेस से कटकर 30 बकरियों की मौत, 3 महिलाएं बाल-बाल बचीं, घटना का लाइव वीडियो आया सामने* इंटरसिटी एक्सप्रेस की चपेट में आने से 30 बकरियों की मौत हो गई। जबकि, बकरियों की झुंड इधर-उधर भागती रहीं। संयोग ही रहा कि बकरियां चरा रहीं महिलाएं बाल-बाल बच गईं।हथिगवां के कृष्णा राम का पुरवा बिसहिया के पास रेलवे फाटक के समीप बुधवार सुबह 11 बजे कुछ महिलाएं बकरियां चरा रहीं थीं, तभी ट्रेन की चपेट मे आने से हादसा हो गया। सूचना पर पहुंची आरपीएफ ने मामले की जांच की इस दौरान ट्रेन 10 मिनट तक रुकी रही!1
- जर्जर भवन से तिरपाल तक पहुंची शिक्षा व्यवस्था बम्हनगांव में मासूमों की पढ़ाई का दर्दनाक सच, निजी परिसर में अस्थायी इंतजाम; ग्रामीणों ने उठाए सुरक्षा पर सवाल कटनी। शिक्षा के अधिकार के साथ बच्चों को सुरक्षित और बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराने के दावे किए जाते हैं, लेकिन बड़वारा विकासखंड के ग्राम बम्हनगांव की तस्वीर इन दावों के बीच गंभीर सवाल खड़े करती है। यहां संचालित शासकीय प्राथमिक शाला के बच्चे जर्जर भवन के कारण अब तिरपाल की छांव में पढ़ने को मजबूर हैं। स्कूल की बदहाल व्यवस्था का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद मामला चर्चा में है। जर्जर भवन के कारण निजी परिसर में शिफ्ट हुई कक्षाएं जानकारी के अनुसार स्कूल का मूल भवन लंबे समय से जर्जर स्थिति में था। बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए उच्च अधिकारियों के निर्देश पर विद्यालय को अस्थायी रूप से एक निजी मकान के परिसर में संचालित किया जा रहा है। यहां दीवार के सहारे और तिरपाल लगाकर बरामदे में कक्षाएं संचालित हो रही हैं। बार-बार पत्राचार, फिर भी स्थायी समाधान नहीं विद्यालय के प्रभारी प्राचार्य राकेश तिवारी के अनुसार स्कूल भवन अत्यंत जर्जर हो चुका है। बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ही विद्यालय को अस्थायी स्थान पर शिफ्ट किया गया। भवन की मरम्मत और जीर्णोद्धार के संबंध में विभागीय अधिकारियों को कई बार लिखित सूचना दी जा चुकी है, लेकिन अभी तक स्थायी समाधान नहीं हो सका है। बारिश में सांप-बिच्छू का खतरा, अभिभावकों में चिंता ग्रामीणों का कहना है कि जिस स्थान पर बच्चों की कक्षाएं लग रही हैं, वहां सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। बाउंड्रीवॉल नहीं होने और खुले परिसर के कारण बारिश के मौसम में सांप, बिच्छू सहित जहरीले जीवों का खतरा बना रहता है। ऐसे माहौल में छोटे बच्चों को पढ़ाना अभिभावकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। स्थानीय नागरिक राजाराम पटेल सहित ग्रामीणों ने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए प्रशासन और शिक्षा विभाग से तत्काल कार्रवाई की मांग की है। ग्रामीणों की मांग—या तो नया भवन बने, या तत्काल मरम्मत हो अभिभावकों और ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि बच्चों के भविष्य और सुरक्षा को देखते हुए विद्यालय के लिए नए भवन की स्वीकृति और निर्माण की प्रक्रिया जल्द शुरू की जाए। यदि नए भवन के निर्माण में समय लगता है तो जर्जर भवन की आवश्यक मरम्मत कराकर बच्चों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि नौनिहालों को तिरपाल के नीचे पढ़ने की मजबूरी से निजात मिल सके। कटनी | संवाददाता बाल किशन नामदेव1
- जबलपुर के निजी हॉस्टल में इंजीनियरिंग छात्र की मौत, पढ़ाई के तनाव की आशंका जबलपुर हॉस्टल के कमरे में मिला मैकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र का शव जबलपुर। रांझी थाना क्षेत्र में गांधी व्यायामशाला के पीछे स्थित एक निजी हॉस्टल में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के चौथे वर्ष के छात्र की मौत से सनसनी फैल गई। मृतक छात्र की पहचान ओम पांडे के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि ओम पढ़ाई में मेधावी था और अपनी पढ़ाई को लेकर काफी गंभीर रहता था। स्वास्थ्य खराब रहने के कारण कुछ विषयों में पिछड़ने के बाद वह कथित तौर पर पढ़ाई और परीक्षा को लेकर तनाव में था। घटना के समय उसके रूम पार्टनर हॉस्टल से बाहर गए हुए थे। घटना की सूचना मिलते ही रांझी थाना पुलिस मौके पर पहुंची और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा। प्रारंभिक जानकारी में पढ़ाई और परीक्षा से जुड़ा तनाव सामने आया है, हालांकि पुलिस मामले के सभी पहलुओं की जांच कर रही है। पुलिस हॉस्टल में मौजूद लोगों और परिजनों से पूछताछ कर घटना के कारणों का पता लगाने में जुटी है। घटना के बाद परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। विशेष अपील: पढ़ाई, परीक्षा या किसी अन्य कारण से तनाव महसूस होने पर अकेले रहने के बजाय परिवार, दोस्तों, शिक्षक या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें और जरूरत पड़ने पर पेशेवर मदद लें।4