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कस्बा कमासिन में अतिक्रमण चलते लगता है जाम प्रशासन के नाक तले
राधेश्याम गुप्ता जय मां दुर्गे
कस्बा कमासिन में अतिक्रमण चलते लगता है जाम प्रशासन के नाक तले
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- कस्बा कमासिन में अतिक्रमण चलते लगता है जाम प्रशासन के नाक तले2
- 75 मीटर तिरंगे के साथ निकली भव्य तिरंगा यात्रा, छात्रों ने बढ़ाया उत्साह। 75 मीटर तिरंगे के साथ निकली भव्य तिरंगा यात्रा, छात्रों ने बढ़ाया उत्साह बांदा। बबेरू कस्बे में देशभक्ति के जज्बे के साथ भव्य तिरंगा यात्रा निकाली गई। जिला अध्यक्ष कल्लू सिंह राजपूत की मौजूदगी में निकली यह यात्रा मां मढ़ी दाई मैरिज हाल से शुरू होकर मेन चौराहा होते हुए अंबेडकर पार्क तक पहुंची। यात्रा में 75 मीटर लंबा तिरंगा आकर्षण का मुख्य केंद्र रहा। बड़ी संख्या में विद्यालयों के छात्र-छात्राओं समेत क्षेत्र के लोगों ने तिरंगा यात्रा में सहभागिता की और देशभक्ति के नारों से माहौल गूंज उठा। तिरंगा यात्रा में जिला पंचायत अध्यक्ष सुनील सिंह पटेल, भाजपा नेता अजय सिंह पटेल, नगर पंचायत अध्यक्ष विवेकानंद गुप्ता, पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष विजयपाल सिंह, पूर्व ब्लॉक प्रमुख बच्चा सिंह, भाजपा किसान मोर्चा जिलाध्यक्ष विजय विक्रम सिंह, भाजपा जिला महामंत्री सुधीर कुशवाहा, भाजपा मंडल अध्यक्ष सौरभ शिवहरे, पूर्व मंडल अध्यक्ष श्याम जी मिश्रा, राजा दीक्षित सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।1
- झाड़-फूंक के चक्कर में गई 24 वर्षीय युवक की जान, कुमेढ़ा सानी गांव में पसरा सन्नाटा झाड़-फूंक के चक्कर में गई 24 वर्षीय युवक की जान, कुमेढ़ा सानी गांव में पसरा सन्नाटा बांदा जिले के कमासिन थाना क्षेत्र अंतर्गत कुमेढ़ा सानी गांव में एक दर्दनाक हादसा सामने आया है। यहां घर में सो रहे 24 वर्षीय युवक को देर रात जहरीले सांप ने काट लिया। परिजनों द्वारा समय पर अस्पताल ले जाने के बजाय झाड़-फूंक कराने के चक्कर में युवक की जान चली गई। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। पूरा मामला कमासिन थाना क्षेत्र के कुमेढ़ा सानी गांव का है। बताया जा रहा है कि मैकू प्रजापति का 24 वर्षीय पुत्र संदीप कुमार सोमवार और मंगलवार की मध्य रात अपने घर में सो रहा था। मंगलवार तड़के करीब 4:00 बजे अचानक उसके हाथ में एक जहरीले सांप ने काट लिया। सर्पदंश की जानकारी मिलते ही परिजनों में अफरा-तफरी मच गई। हालांकि, जागरूकता के अभाव में परिजन उसे तुरंत अस्पताल ले जाने के बजाय गांव में ही झाड़-फूंक कराने के चक्कर में पड़ गए। झाड़-फूंक के दौरान संदीप की हालत लगातार बिगड़ती गई। जब स्थिति बेहद गंभीर हो गई, तब परिजन उसे आनन-फानन में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) बबेरू लेकर पहुंचे। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। स्वास्थ्य परीक्षण के बाद डॉक्टरों ने संदीप को मृत घोषित कर दिया। मौत की खबर सुनते ही परिवार में रोना-पिटना मच गया। घटना की सूचना मिलते ही कमासिन थाना पुलिस अस्पताल पहुंची। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पंचनामा भरा और पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। मंगलवार दोपहर करीब 2:30 बजे शव का पोस्टमार्टम कराया गया। बाइट - परिजन1
- जनपद बांदा के ब्लांक बड़ोखर खुर्द के ग्राम सेमरा में मरवा भूमि खेतों का बड़े पैमाने पर पूरी तरह से जलमग्न हो जाने के कारण जल निकासी का समाधान करके जल्द से जल्द निस्तारण करने की कृपा करें1
- इलाज के लिए आए थे यहां तो व्यवस्था ही मरीज निकली दुर्गावती मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों की गैर हाजिरी से लेकर जांच रिपोर्टर तक सवालों का जाल ऑपरेशन से पहले 25 से 30हजार की बाहर वाली पर्ची का आरोप बांदा।मरीज अस्पताल पहुंचता है बीमारी लेकर… लेकिन यहां पहुंचते ही उसे एक और बीमारी पकड़ लेती है—व्यवस्था की।कहीं डॉक्टर की कुर्सी खाली है, कहीं स्टाफ का पता नहीं, कहीं जांच रिपोर्ट पर जिम्मेदारी के हस्ताक्षर तलाशे जा रहे हैं और कहीं ऑपरेशन से पहले मरीज को दवाओं और सामान की ऐसी सूची थमा दिए जाने के आरोप हैं, जिसे देखकर बीमारी से ज्यादा जेब का दर्द बढ़ जाए।यह तस्वीर किसी निजी अस्पताल की नहीं, बल्कि राजकीय रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज की बताई जा रही है।जिस संस्थान को बुंदेलखंड के गरीब मरीजों के लिए उम्मीद का सबसे बड़ा दरवाजा होना चाहिए, वहां व्यवस्थाओं को लेकर उठ रहे सवाल अब इतने गंभीर हैं कि उन्हें नजरअंदाज करना मरीजों की पीड़ा को नजरअंदाज करने जैसा होगा।डॉक्टर कहां हैं? मरीज पूछ रहा है… कुर्सी जवाब दे रही है!ईएनटी विभाग के HOD जितेंद्र यादव और सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष कुलदीप के लंबे समय से ड्यूटी से नदारद रहने के आरोप सामने आए हैं।अगर आरोप सही हैं तो फिर सवाल बेहद सीधा है—जब विभागाध्यक्ष ही विभाग में नहीं होंगे तो मरीज की शिकायत कौन सुनेगा? और अगर वे नियमित रूप से ड्यूटी पर हैं तो उनकी उपस्थिति का रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के सामने रखने में परेशानी क्या है? सरकारी अस्पताल में मरीज डॉक्टर को खोजता रहे और डॉक्टर फाइलों में मौजूद मिले—तो फिर इलाज किसका हो रहा है?फार्मेसी में दवा है, लेकिन स्टाफ कहां है?आरोप है कि फार्मेसी में तैनात स्थायी स्टाफ का एक हिस्सा नियमित ड्यूटी पर नहीं पहुंचता।मरीज दवा लेने आता है।काउंटर देखता है। कर्मचारी तलाशता है। फिर व्यवस्था को तलाशता है। दवा मुफ्त हो सकती है, लेकिन अगर उसे देने वाला ही गायब हो तो मरीज के लिए मुफ्त इलाज का अर्थ क्या रह जाता है?जांच रिपोर्ट पर हस्ताक्षर नहीं… फिर रिपोर्ट किसकी?सबसे गंभीर सवाल पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी की जांच रिपोर्टों को लेकर है। आरोप है कि मरीजों को दी जाने वाली कुछ रिपोर्टों पर स्थायी लैब टेक्नीशियन के हस्ताक्षर तक नहीं होते।जरा सोचिए—एक मरीज अपनी बीमारी का सच जानने के लिए जांच कराता है।रिपोर्ट हाथ में आती है।डॉक्टर उसी रिपोर्ट को देखकर इलाज तय करता है।लेकिन रिपोर्ट पर जिम्मेदारी का हस्ताक्षर ही न हो तो…मरीज भरोसा किस पर करे—मशीन पर, कागज पर या किस्मत पर?यह सवाल सिर्फ प्रशासनिक नहीं, सीधे मरीज की सुरक्षा से जुड़ा है।ऑपरेशन से पहले मरीज की जेब का ‘ऑपरेशन’!सरकारी अस्पताल में गरीब मरीज इस भरोसे आता है कि यहां इलाज उसकी पहुंच में होगा।लेकिन आरोप है कि सर्जरी से पहले मरीजों को 25 से 30 हजार रुपये तक की दवाएं और चिकित्सा सामग्री बाहर से खरीदने के लिए कहा जाता है।यानी—ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले ही मरीज की जेब का ऑपरेशन! दूर गांव से आया मजदूर, किसान या गरीब परिवार इतनी बड़ी रकम कहां से लाए?क्या अस्पताल में जरूरी दवाएं और सर्जिकल सामग्री उपलब्ध नहीं हैं? यदि नहीं हैं तो क्यों नहीं? और यदि उपलब्ध हैं तो मरीजों को बाहर से खरीदारी क्यों करनी पड़ रही है? इन सवालों के जवाब कागज से नहीं, रिकॉर्ड और जांच से मिलने चाहिए।11 साल की तैनाती—कुर्सी से रिश्ता इतना गहरा कि तबादला भी हार गया?डॉ. मुकेश बंसल के करीब 11 वर्षों से इसी मेडिकल कॉलेज में जमे होने का आरोप है।सरकारी सेवा में तबादला सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन यहां आरोपों के मुताबिक एक ही जगह पर 11 साल का पड़ाव है।और सवाल यहीं खत्म नहीं होता।आउटसोर्सिंग, सुरक्षा और सफाई समेत कई महत्वपूर्ण प्रभार भी उन्हीं के पास होने की बात कही जा रही है।एक व्यक्ति, इतने महत्वपूर्ण प्रभार और वर्षों की एक ही जगह तैनाती—क्या यह व्यवस्था पारदर्शिता की कसौटी पर खरी उतरती है? यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक है तो दस्तावेज सामने आने चाहिए।यदि नियमों में कोई अपवाद है तो उसका आधार भी सामने आना चाहिए।क्योंकि सवाल व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था के चरित्र का है।साढ़े तीन साल से ‘प्रभारी’—क्या कुर्सी को स्थायित्व पसंद नहीं?मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य पद पर डॉ. सुनील कौशल करीब साढ़े तीन वर्षों से प्रभारी/कार्यवाहक के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। यह भी अपने आप में बड़ा सवाल है।जिस मेडिकल कॉलेज में मरीजों की जिंदगी का इलाज होता है, उसकी प्रशासनिक व्यवस्था वर्षों तक ‘प्रभारी’ के भरोसे क्यों चले?क्या स्थायी प्राचार्य की जरूरत सिर्फ सरकारी कागजों में है?सबसे बड़ा सवाल—मरीज जाए तो जाए कहां?मेडिकल कॉलेज की सबसे कमजोर कड़ी मरीज है।वह बहस करने नहीं आता।वह व्यवस्था को चुनौती देने नहीं आता।वह सिर्फ इलाज कराने आता है।वह अपनी बीमारी के साथ अपनी बचत भी लेकर आता है।कई बार बचत खत्म होती है तो गहने बिकते हैं।गहने खत्म होते हैं तो कर्ज शुरू होता है।ऐसे मरीज को यदि सरकारी अस्पताल में भी बाहर से दवाएं और सामान खरीदने की मजबूरी झेलनी पड़े, तो फिर गरीब के लिए सरकारी अस्पताल और निजी अस्पताल के बीच अंतर आखिर बचता क्या है?अब जांच जरूरी है—और ऐसी जांच, जिसमें फाइल नहीं, सच खुले इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।डॉक्टरों की उपस्थिति जांची जाए।फार्मेसी स्टाफ की ड्यूटी का रिकॉर्ड देखा जाए।जांच रिपोर्ट जारी करने की पूरी प्रक्रिया की पड़ताल हो।ऑपरेशन के दौरान बाहर से खरीदी गई दवाओं और सामग्री का रिकॉर्ड मिलाया जाए।महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रभारों की समीक्षा हो।लंबी तैनाती के नियमों और उसके औचित्य की जांच हो।क्योंकि अगर आरोप झूठे हैं तो जांच उन्हें झूठ साबित करेगी।और अगर आरोप सही हैं तो…फिर यह सिर्फ अस्पताल की अव्यवस्था नहीं होगी—यह उस भरोसे के साथ धोखा होगा, जिसके सहारे बुंदेलखंड का गरीब मरीज मेडिकल कॉलेज की चौखट तक पहुंचता है।अस्पताल की इमारत कितनी भी भव्य क्यों न हो,मरीज को इलाज चाहिए—कुर्सियां नहीं।रिपोर्ट चाहिए—सवाल नहीं।दवा चाहिए—बाहर की पर्ची नहीं।और सबसे बढ़कर… उसे भरोसा चाहिए।अब देखना यह है कि शासन इन सवालों का इलाज करता है या फिर इन सवालों को ही बीमारी बताकर फाइल में बंद कर देता है।1
- जिला चित्रकूट बांदा सिक्योरिटी गार्ड भर्ती निर्धारित पद टोटल 500 हजारों की संख्या में बेरोजगार छात्र युवा परेशान नौकरी के लिए दर दर भटक रहे लोग पहाड़ी भर्ती सिक्योरिटी गार्ड भर्ती के नाम पर लूट पहले रजिस्ट्रेशन फीस 350 और बाद में ज्वाइनिंग फीस 7500 इसका जिम्मेदार कौन माननीय जिलाधिकारी महोदय चित्रकूट बांदा ये भर्ती फ्री करवाया जाए आखिर युवा छात्र लोग को कब तक लुटते रहेंगे गरीब लोगों के पास पैसे न होने के कारण परेशान टोटल पद पांच सौ हजारों की संख्या में दिखे बेरोजगार युवा2
- उत्तर प्रदेश में AI टेक्नोलॉजी को मिलेगा बढ़ावा | युवाओं के लिए खुलेंगे नए अवसर | UP Breaking News 2026 | Artificial Intelligence Latest Update उत्तर प्रदेश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल तकनीक के क्षेत्र में काम को बढ़ावा देने के लिए IndiaAI और उत्तर प्रदेश की संस्था UPDESCO के बीच समझौता किया गया है। इसका उद्देश्य राज्य में AI आधारित तकनीकी विकास और डिजिटल क्षमताओं को मजबूत करना है। आने वाले समय में इससे तकनीकी शिक्षा, स्टार्टअप और रोजगार के नए अवसरों को बढ़ावा मिलने की संभावना है।1
- ब्लॉक पहाड़ी चित्रकूट सिक्योरिटी गार्ड भर्ती को टोटल सीटे 500 एक हजार लोगों की भीड़ बेराजगार युवा परेशान ब्लॉक पहाड़ी सिक्योरिटी गार्ड भर्ती चार ब्लॉक में टोटल 500 पद निर्धारित किए गए बेरोजगार युवा परेशान एक हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ बी जे पी सरकार भ्रष्ट सरकार आखिर प्राइवेट भारती की भी उम्मीद नहीं1