Shuru
Apke Nagar Ki App…
सिलेंडर और केरोसिन उर्फ मिट्टी का तेल के लिए क्या कुछ व्यवस्थाएं जारी सिलेंडर और केरोसिन उर्फ मिट्टी का तेल के लिए क्या कुछ व्यवस्थाएं जारी यूपी के जिला अंबेडकर नगर के व्यापारियों द्वारा केरोसिन लेने के लिए क्या कुछ व्यवस्थाएं बताई गई और यह भी कहा गया की पुरानी व्यवस्था को फिर से जारी करने के लिए हमारे पास कैपिटल अकाउंट नहीं है
रिपोर्टर Goswami
सिलेंडर और केरोसिन उर्फ मिट्टी का तेल के लिए क्या कुछ व्यवस्थाएं जारी सिलेंडर और केरोसिन उर्फ मिट्टी का तेल के लिए क्या कुछ व्यवस्थाएं जारी यूपी के जिला अंबेडकर नगर के व्यापारियों द्वारा केरोसिन लेने के लिए क्या कुछ व्यवस्थाएं बताई गई और यह भी कहा गया की पुरानी व्यवस्था को फिर से जारी करने के लिए हमारे पास कैपिटल अकाउंट नहीं है
More news from उत्तर प्रदेश and nearby areas
- Post by Dushyant Kumar Journalist1
- अजीत मिश्रा (खोजी) बस्ती। जनपद के विक्रमजोत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) से मानवता को शर्मसार कर देने वाली घटना सामने आई है। जिस अस्पताल की दहलीज पर एक परिवार नई खुशियों की उम्मीद लेकर पहुँचा था, वहाँ डॉक्टर की कथित लापरवाही और संवेदनहीनता ने एक मासूम की जान ले ली। यह घटना केवल एक चिकित्सा विफलता नहीं, बल्कि हमारी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के मुँह पर एक करारा तमाचा है। क्या है पूरा मामला? मिली जानकारी के अनुसार, राजमंगल कनौजिया नामक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को प्रसव के लिए सुबह 8 बजे विक्रमजोत CHC में भर्ती कराया था। दोपहर करीब 12:50 पर एक बच्ची का जन्म हुआ। लेकिन खुशियों का यह पल ज्यादा देर नहीं टिका। डॉक्टरों ने बच्ची की स्थिति गंभीर बताते हुए उसे रेफर कर दिया। पीड़ित पिता का आरोप है कि जब एम्बुलेंस कर्मियों ने ऑक्सीजन की आवश्यकता के बारे में पूछा, तो डॉ. साजिया खातून ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया कि ऑक्सीजन की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जब मासूम को उच्च केंद्र ले जाया गया, तो वहाँ के डॉक्टरों ने बच्ची को मृत घोषित करते हुए फटकार लगाई कि "बिना ऑक्सीजन के इसे यहाँ क्यों लाए?" सवालों के घेरे में संवेदनहीनता इस हृदय विदारक घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं: क्या एक डॉक्टर को इतनी सामान्य जानकारी नहीं थी कि नवजात को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ सकती है? क्या सरकारी अस्पतालों में तैनात डॉक्टरों के लिए मरीजों की जान केवल एक 'आंकड़ा' बनकर रह गई है? आखिर कब तक इस तरह की लापरवाही के कारण गरीब परिवार अपनी गोद उजड़ते देखेंगे? सिस्टम की जवाबदेही कहाँ? राजमंगल कनौजिया जैसे साधारण व्यक्ति के लिए उसका बच्चा उसकी पूरी दुनिया थी। आज उस परिवार पर जो गुजर रही है, उसकी भरपाई कोई सरकारी मुआवजा या जाँच कमेटी नहीं कर सकती। एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ फील्ड पर तैनात डॉक्टरों की ऐसी लापरवाही उन सभी दावों की पोल खोल देती है। निष्कर्ष: अब कार्रवाई की दरकार यह केवल एक व्यक्ति की शिकायत नहीं है, बल्कि उस डर की आवाज़ है जो हर आम आदमी सरकारी अस्पताल जाते समय महसूस करता है। प्रशासन को चाहिए कि डॉ. साजिया खातून और इस लापरवाही में शामिल अन्य दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक इसी तरह मासूमों की बलि चढ़ती रहेगी और "स्वास्थ्य केंद्र" केवल "मृत्यु केंद्र" बनकर रह जाएंगे।1
- सूरत के भेस्तान इलाके की संगम चौकड़ी पर कल शाम करीब 7 बजे एक बड़ा हादसा होते-होते टल गया। जानकारी के अनुसार सूरत BRTS बस ने एक एक्टिवा स्कूटी को जोरदार टक्कर मार दी। हादसा इतना जोरदार था कि एक्टिवा स्कूटी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। हालांकि राहत की बात यह रही कि स्कूटी चालक बाल-बाल बच गया और उसे गंभीर चोट नहीं आई। स्थानीय लोगों के अनुसार हादसा तेज रफ्तार और लापरवाही की वजह से हुआ। घटना के बाद मौके पर लोगों की भीड़ जमा हो गई। फिलहाल इस घटना को लेकर आगे की कार्रवाई की जा रही है।1
- जय श्री राम 🚩🚩🚩 जय गौ माता 🐄🐄🐄 जय हिंद 🇮🇳🇮🇳🇮🇳 गौ सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है इसलिए अपना कर्तव्य निभा सकते हो तो निभाओ2
- शुकुलुउमरी जनपद सुल्तानपुर की लम्भुआ विधानसभा से जुडा मामला1
- Post by A news 881
- यूपी के जिला अंबेडकर नगर के थाना कोतवाली अकबरपुर के अंतर्गत ग्राम सभा कौराहा उसे मूसेपुर किरण का यह मामला है पावन पवित्र श्रावण धाम के पास 7 से 8 मीटर की खुदाई मानक विहीन कार्य हो रहा है भूमिया खनन खुदाई में लगे पड़े आल्हा अधिकारी मौन1
- Post by Dushyant Kumar Journalist1
- अजीत मिश्रा (खोजी) बस्ती। सत्ता के गलियारों में बैठकर 'सब चंगा है' का राग अलापना कितना आसान होता है, इसका जीता-जागता नमूना बस्ती में देखने को मिल रहा है। एडीएम प्रतिपाल सिंह चौहान ने बड़ी शान से वीडियो जारी कर कह दिया—'गैस की कोई कमी नहीं है।' लेकिन जनाब, क्या आपकी नजरें भानपुर स्थित उस गैस एजेंसी की दहलीज तक नहीं पहुँच पाईं, जहाँ पिछले पांच दिनों से आम जनता का पसीना सिलेंडर की आस में सूख रहा है? डिजिटल धोखाधड़ी या प्रशासनिक मिलीभगत? सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिलेंडर हाथ में नहीं, लेकिन मोबाइल पर 'डिलीवरी' का मैसेज किस जादू से पहुँच गया? क्या यह महज तकनीकी चूक है, या फिर कालाबाजारी का वह 'डिजिटल खेल', जिसमें गैस कागजों पर तो बिक जाती है, लेकिन रसोई तक नहीं पहुँचती? प्रशासन की यह 'वर्चुअल सप्लाई' उन घरों के लिए किसी मजाक से कम नहीं है, जहाँ चूल्हे खाली सिलेंडर के साथ ठंडे पड़े हैं। 'अफवाह' का पर्दा और सच्चाई की मार प्रशासन ने अपनी विफलता को छिपाने के लिए जनता की परेशानी को 'अफवाह' का नाम देकर पल्ला झाड़ लिया। लेकिन सच्चाई वीडियो की स्क्रिप्ट से नहीं, लाइन में लगे उन चेहरों से पूछिए जो अपनी मेहनत की कमाई का हिसाब मांग रहे हैं। अधिकारियों का वातानुकूलित कमरों में बैठकर आदेश देना और जनता का तपती धूप में दर-दर भटकना, यह इस बात का सबूत है कि प्रशासन पूरी तरह से 'जमीन' से कट चुका है। समय है जवाबदेही का हम प्रशासन से पूछते हैं: क्या आपकी मॉनिटरिंग सिस्टम केवल फाइलों तक सीमित है? क्या उन जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी जिन्होंने फर्जी मैसेज भेजकर जनता को गुमराह किया? एडीएम साहब का वह 'आश्वस्त' बयान किसके दबाव में था, या यह उनकी पूरी तरह से नाकामी? जनता को अब वादों और वीडियो के डोज नहीं, बल्कि समाधान चाहिए। अगर प्रशासन ने अपनी आंखों से यह 'पट्टी' नहीं उतारी, तो जनता का सब्र का बांध टूटना तय है। यह समय केवल लीपापोती का नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और दोषियों को बेनकाब करने का है।1