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Gram panchayat mendrakhurd vikashkand ambikapur mai hue bharstachar ki sikayat media journlist se karte hue.khas report by himanshu raj patrkar ambikapur cg.7805838076.
Himanshu raj
Gram panchayat mendrakhurd vikashkand ambikapur mai hue bharstachar ki sikayat media journlist se karte hue.khas report by himanshu raj patrkar ambikapur cg.7805838076.
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- पुलिस आरक्षक ही निकले गांजा तस्कर: जशपुर में दो आरक्षकों समेत 4 गिरफ्तार, भारी मात्रा में गांजा जप्त जशपुर नगर के विवेकानंद कॉलोनी में पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए गांजा तस्करी के बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है। मुखबिर की सटीक सूचना पर थाना कोतवाली की टीम ने कॉलोनी में किराए के मकान में रह रहे रवि विश्वकर्मा के ठिकाने पर रेड मारी, जहाँ एक पेटी में छिपाकर रखे गए कुल 24 पैकेट अवैध गांजा बरामद किए गए। पूछताछ के दौरान आरोपी रवि ने खुलासा किया कि उसने यह खेप गोविंद उर्फ सुनील भगत के कहने पर और पैसों के लालच में अपने घर में रखी थी। इसके बाद पुलिस ने मुख्य आरोपी गोविंद को हिरासत में लेकर कड़ाई से पूछताछ शुरू की। इस मामले में सबसे सनसनीखेज खुलासा तब हुआ जब आरोपी गोविंद ने पुलिस विभाग के ही दो आरक्षकों की इस तस्करी में संलिप्तता की बात कबूली। जांच में पाया गया कि थाना तपकरा के आरक्षक क्रमांक 581 धीरेंद्र मधुकर (उम्र 37 वर्ष), पिता करताल सिंह और आरक्षक क्रमांक 392 अमित त्रिपाठी (उम्र 35 वर्ष), पिता स्वर्गीय राजदेव त्रिपाठी, इस अवैध कारोबार में तस्करों के साथ मिलकर काम कर रहे थे। विभाग के इन रक्षकों द्वारा ही कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए गांजा तस्करी को अंजाम दिया जा रहा था, जिसके पुख्ता प्रमाण मिलने पर पुलिस ने दोनों आरक्षकों को तत्काल गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने इस पूरे प्रकरण में रवि विश्वकर्मा, सुनील भगत और दोनों पुलिस आरक्षकों—धीरेंद्र मधुकर व अमित त्रिपाठी के विरुद्ध थाना जशपुर में अपराध क्रमांक 74/26 के तहत धारा 20 (B) एनडीपीएस (NDPS) एक्ट दर्ज किया है। जप्त किए गए 24 पैकेट गांजा और आरोपियों के बयानों के आधार पर सभी को न्यायालय में पेश किया गया, जहाँ से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा (जेल) में भेज दिया गया है। पुलिस विभाग के अपने ही कर्मचारियों की इस काली करतूत ने विभाग की छवि पर गहरा दाग लगा दिया है, जिससे महकमे में हड़कंप मचा हुआ है1
- 🎥 स्पेशल रिपोर्ट – धान खरीदी में जिम्मेदार कौनइंट्रो (तेज और सीधे सवाल): किसान धान लेकर खरीदी केंद्र पहुंचा… लेकिन नाम सूची में नहीं! टोकन नहीं कटा… धान नहीं बिका… और लाखों का नुकसान! अब बड़ा सवाल – आखिर जिम्मेदार कौन? 📌 मामला क्या है? ग्राम लहपटरा, जनपद लखनपुर के किसान देवप्रसाद का आरोप है कि 55 क्विंटल 60 किलो धान बेचने के लिए परेशान!! बावजूद सूची में नाम नहीं होने का हवाला देकर टोकन नहीं काटा गया। सरकारी दर 2100 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से लगभग ₹1,16,760 रुपये का भुगतान मिलना था। आरोप है कि संबंधित पटवारी भारत सिंह की भूमिका संदिग्ध है। 🎯 बड़ा सवाल – धान खरीदी में पटवारी का काम क्या? ❓ सवाल 1: क्या पटवारी सीधे धान खरीदता है? 👉 नहीं। धान की तौल और भुगतान समिति/खरीदी केंद्र करता है। ❓ सवाल 2: क्या पटवारी की भूमिका होती है? 👉 हाँ। जमीन और रकबे का सत्यापन किसान पंजीयन का मिलान खसरा रिकॉर्ड की पुष्टि सूची में नाम जोड़ने/सत्यापन में सहयोग ❓ सवाल 3: अगर सूची में नाम नहीं था तो जिम्मेदार कौन? 👉 अगर पंजीयन या रकबा सत्यापन में गलती है, तो पटवारी की भूमिका जांच के दायरे में आती है। 👉 अगर तकनीकी या समिति स्तर की त्रुटि है, तो खरीदी केंद्र प्रबंधन जिम्मेदार हो सकता है। 🎤 किसान का आरोप देवप्रसाद का कहना है कि समय पर पहुंचने के बावजूद टोकन नहीं कटा, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हुआ। उन्होंने एमडी न्यूज के माध्यम से निष्पक्ष जांच और मुआवजे की मांग की है। ⚖ अब प्रशासन से सवाल क्या किसान का पंजीयन सही था? सूची से नाम क्यों गायब था? किसकी लापरवाही से ₹1 लाख से ज्यादा का नुकसान हुआ? क्या जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई होगआउट्रो (दमदार): किसान की मेहनत से समझौता नहीं हो सकता। अब देखना होगा – जांच होगी या मामला दबेगा? कैमरामैन के साथ ________, एमडी न्यूज।1
- सूचना का अधिकार बनाम प्रशासनिक मानसिकता: मेन्द्राकला मंडी प्रकरण से उठते सवाल लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था का मूल तत्व है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 इसी उद्देश्य से अस्तित्व में आया था — ताकि नागरिक सरकार से प्रश्न पूछ सके और शासन जवाबदेह बने। परंतु जब स्वयं सार्वजनिक संस्थान सूचना देने से बचते दिखाई दें, तो यह केवल एक कार्यालय का मुद्दा नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था की सोच पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले, अंबिकापुर स्थित कृषि उपज मंडी समिति मेन्द्रा कला से जुड़ा हालिया प्रकरण इसी बहस को पुनः जीवित करता है। मुद्दा केवल 7230 रुपये का नहीं आरटीआई आवेदन के माध्यम से पिछले दो वर्षों के टेंडर, भुगतान, एमबी बुक, सब्सिडी एवं अन्य प्रशासनिक दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई। जवाब में कार्यालय ने 3615 पृष्ठों की प्रतिलिपि बताकर 7230 रुपये शुल्क जमा करने का निर्देश दिया। कानूनन प्रति पृष्ठ निर्धारित शुल्क लिया जा सकता है — यह व्यवस्था का हिस्सा है। परंतु प्रश्न यह है कि जब सूचना डिजिटल रूप में उपलब्ध कराई जा सकती है, तब केवल छायाप्रति के रूप में देने पर जोर क्यों? क्या यह तकनीकी सुविधा का अभाव है, या प्रक्रिया को जटिल बनाने की प्रवृत्ति? सूचना का अधिकार केवल कागजों का लेन-देन नहीं, बल्कि पारदर्शिता का माध्यम है। यदि सूचना देने की प्रक्रिया ही इतनी महंगी और बोझिल बना दी जाए कि आम नागरिक पीछे हट जाए, तो कानून का उद्देश्य कैसे पूरा होगा? धारा 4(1)(b) की आत्मा आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1)(b) सार्वजनिक प्राधिकरणों को कई जानकारियां स्वतः सार्वजनिक करने का निर्देश देती है। टेंडर, भुगतान, कार्यादेश और बैठकों के निर्णय — ये सभी ऐसी सूचनाएं हैं जिन्हें नियमित रूप से वेबसाइट या सूचना पट्ट पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यदि दो वर्षों की जानकारी 3615 पृष्ठों में फैली है, तो यह भी विचारणीय है कि क्या इनका नियमित डिजिटलीकरण और सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ? यदि नहीं, तो क्यों? प्रशासनिक प्रशिक्षण और संवेदनशीलता मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें अधिकारी द्वारा आरटीआई की धाराओं की जानकारी न होने संबंधी कथन सुनाई देता है। यदि ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रुटि नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और जवाबदेही की कमी का संकेत है। जन सूचना अधिकारी का दायित्व मात्र आवेदन स्वीकार करना नहीं, बल्कि अधिनियम की भावना को समझते हुए नागरिक को सहयोग देना है। “जैसा अधिकारी कहेगा वैसा होगा” जैसी मानसिकता पारदर्शी शासन के सिद्धांत से मेल नहीं खाती। बड़ा प्रश्न: क्या व्यवस्था पारदर्शिता से सहज है? यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध आरोप का विषय नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रश्न का संकेत है — क्या हमारी संस्थाएं पारदर्शिता को सहजता से स्वीकार कर पा रही हैं? यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हुई हैं, तो सूचना उपलब्ध कराने में संकोच क्यों? यदि टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी है, तो दस्तावेज साझा करने में हिचक क्यों? लोकतंत्र में विश्वास दस्तावेजों से बनता है, बयानों से नहीं। आगे क्या? ऐसे मामलों में आवश्यक है कि: विभागीय स्तर पर पारदर्शिता की समीक्षा हो डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली को अनिवार्य बनाया जाए जन सूचना अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण हो स्वप्रकाशन (Proactive Disclosure) को सख्ती से लागू किया जाए सूचना का अधिकार कोई एहसान नहीं, बल्कि नागरिक का विधिक अधिकार है। शासन की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह सवालों से कितना सहज है। मेन्द्राकला मंडी प्रकरण एक अवसर भी है — व्यवस्था आत्ममंथन करे और पारदर्शिता को कागजों से निकालकर व्यवहार में उतारे। कृषि उपज मंडी मेंड्राकलां अंबिकापुर सरगुजा छत्तीसगढ़ सचिव प्रभु दयाल सिंह कार्यकारी अभियंता ओबीएस टोप्पो6
- Post by Arvind tirkey1
- बैकुंठपुर /कोरिया मुख्यालय बैकुंठपुर में पुलिस अधीक्षक के निर्देशन पर आम जनता के सुरक्षा हेतु होली के पावन पर्व पर कोरिया पुलिस के द्वारा कई गाड़ियों में लदे पुलिस जवान बैकुंठपुर के एक-एक गली मोहल्ला समूचे पूरे कोरिया जिले में अस्त्र शस्त्र से तैनात होकर होली की त्यौहार शातिपूर्वक मनाने के लिए यह रैली शान्ति सद भावना की कोरिया पुलिस ने संदेश दिया आइये जानते है पुलिस की तैनाती रैली कैसी रही1
- Post by Sunil Gupta1
- अंबिकापुर में होली से पहले खेला खून की होली... पिता की हत्या कर खाया बिरयानी फिर बोला बाय मिस्टेक मार दिया.1
- केरजू समिति में 127 किसानों के फर्जी हस्ताक्षर कर 1.92 करोड़ का घोटाला: तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी, शाखा प्रबंधक और कैशियर सहित 8 पर FIR … अम्बिकापुर | आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित केरजू में फर्जी ऋण आहरण का एक बड़ा सनसनीखेज मामला उजागर हुआ है। जांच में 127 किसानों के नाम पर फर्जी हस्ताक्षर कर 1,92,82,006 रुपये (एक करोड़ बयानवे लाख बयासी हजार छह रुपये) का अवैध आहरण पाया गया है। इस वित्तीय अनियमितता की पुष्टि होने के बाद कलेक्टर अजीत वसंत ने तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारियों, शाखा प्रबंधक, सहायक लेखापाल और कंप्यूटर ऑपरेटर सहित कुल 8 संबंधितों के विरुद्ध एफआईआर (FIR) दर्ज करने के कड़े निर्देश दिए हैं। 127 किसानों के हक पर डाका: फर्जी हस्ताक्षर से निकाला पैसा अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) सीतापुर की अध्यक्षता में गठित संयुक्त जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि सहकारी समिति के भीतर एक सुनियोजित तरीके से किसानों के नाम पर कर्ज निकाला गया। रिकॉर्ड के अनुसार, कुल 127 किसानों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए और उनके खाते से करोड़ों रुपये की राशि निकाल ली गई। जांच प्रतिवेदन के आधार पर प्रशासन ने निम्नलिखित कर्मचारियों और अधिकारियों को सीधे तौर पर दोषी पाया है: मदन सिंह (तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी) जोगी राम (तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी) सैनाथ केरकेट्टा (वरिष्ठ सहकारी निरीक्षक एवं प्राधिकृत अधिकारी) भूपेन्द्र सिंह परिहार (तत्कालीन शाखा प्रबंधक) शिवशंकर सोनी (सहायक लेखापाल) ललिता सिन्हा (कैशियर) सुमित कुमार (सामान्य सहायक) दीपक कुमार चक्रधारी (कम्प्यूटर ऑपरेटर)1