एनटीपीसी में खेलकूद प्रतियोगिता का पुलिस अधीक्षक ने किया उद्घाटन बारां जिले के अंता एनटीपीसी में आयोजित 2 दिवसीय ग्रामीण विद्यालय खेलकूद प्रतियोगिता का पुलिस अधीक्षक अभिषेक अदांसु द्वारा आसमान में बेलून छोड़कर उद्घाटन किया गया । बता दे कि एथलेटिक सहित कबड्डी प्रतियोगिता में ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों की 23 टीमें भाग ले रहे ही जिसमें सीनियर ओर जूनियर टीमों के 850 बालक बालिकाएं शामिल हे । इस मौके पर पुलिस अधीक्षक अभिषेक अदांसु ने कहा कि खेलो के माध्यम से जहां शारीरिक स्वास्थ्य स्वस्थ रहता हे वहीं छिपी हुई प्रतिभाएं उभर कर सामने आती हे उन्होंने कहा कि खेल को खेल की भावना के साथ खेला जाना चाहिए़ वहीं हारने वाली टीम को कभी निराश नहीं होना चाहिए़ बल्कि आगे ओर अधिक मेहनत करनी चाहिए। इस अवसर पर एनटीपीसी महाप्रबंधक अनिल बवेजा द्वारा CSR के तहत क्षेत्र में कराए गए विकास कार्यों की जानकारी दी गई ।
एनटीपीसी में खेलकूद प्रतियोगिता का पुलिस अधीक्षक ने किया उद्घाटन बारां जिले के अंता एनटीपीसी में आयोजित 2 दिवसीय ग्रामीण विद्यालय खेलकूद प्रतियोगिता का पुलिस अधीक्षक अभिषेक अदांसु द्वारा आसमान में बेलून छोड़कर उद्घाटन किया गया । बता दे कि एथलेटिक सहित कबड्डी प्रतियोगिता में ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों की 23 टीमें भाग ले रहे ही जिसमें सीनियर ओर जूनियर टीमों के 850 बालक बालिकाएं शामिल हे । इस मौके पर पुलिस अधीक्षक अभिषेक अदांसु ने कहा
कि खेलो के माध्यम से जहां शारीरिक स्वास्थ्य स्वस्थ रहता हे वहीं छिपी हुई प्रतिभाएं उभर कर सामने आती हे उन्होंने कहा कि खेल को खेल की भावना के साथ खेला जाना चाहिए़ वहीं हारने वाली टीम को कभी निराश नहीं होना चाहिए़ बल्कि आगे ओर अधिक मेहनत करनी चाहिए। इस अवसर पर एनटीपीसी महाप्रबंधक अनिल बवेजा द्वारा CSR के तहत क्षेत्र में कराए गए विकास कार्यों की जानकारी दी गई ।
- Post by Sultan Pathan1
- सोशल मीडिया फ्रेंड ने जन्मदिन का बहाना बनाकर सूरत बुलाया, नशा देकर दुष्कर्म का आरोप, दो गिरफ्तार जिले की 21 वर्षीय युवती के साथ गुजरात के सूरत में दुष्कर्म का गंभीर मामला सामने आया है। पीड़िता का आरोप है कि उसे जन्मदिन मनाने के बहाने सूरत बुलाया गया और करीब 20 दिनों तक अलग-अलग होटलों में रखकर उसके साथ बार-बार दुष्कर्म किया गया। इस दौरान उसके साथ मारपीट, मानसिक प्रताड़ना और नशे के इंजेक्शन लगाने का भी आरोप लगाया गया है। पुलिस ने मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार कर उनका पुलिस रिमांड लिया है।1
- आज हम बात कर रहे हैं UGC के नए नियमों की, जिन्हें कई संगठन और छात्र “काला कानून” बता रहे हैं। आखिर इन नियमों में ऐसा क्या है, जिससे विरोध हो रहा है? और क्या ये नियम छात्रों के हित में हैं या नुकसानदायक? इन्हीं सवालों पर आज हम विशेषज्ञ से खास बातचीत कर रहे हैं।1
- राजस्थान के हाड़ौती अंचल की धरती पर बसे कोटा शहर के इतिहास में राजपूत शासकों से पहले एक ऐसा नाम आता है जिसे लोककथाएं आज भी गर्व से याद करती हैं वह नाम है वीर कोटिया भील का जिन्हें कई इतिहासकार और स्थानीय परंपराएं कोटा का पहला शासक मानती हैं कहा जाता है कि जब यह इलाका घने जंगलों, पहाड़ियों और नदी घाटियों से घिरा हुआ था तब भील समुदाय यहां स्वतंत्र रूप से रहता था और उसी समुदाय से उभरे कोटिया भील ने अपनी वीरता, नेतृत्व क्षमता और युद्ध कौशल के दम पर आसपास के क्षेत्रों को संगठित कर एक मजबूत गणराज्य जैसा शासन स्थापित किया था। लोककथाओं के अनुसार कोटिया भील न केवल योद्धा थे बल्कि न्यायप्रिय और प्रजा के रक्षक भी माने जाते थे वे शिकार, जंगल और जल स्रोतों की रक्षा को अपना धर्म समझते थे और बाहरी आक्रमणकारियों से अपने क्षेत्र को बचाने के लिए सदैव तैयार रहते थे कहा जाता है कि बाद में जब बूंदी के हाड़ा राजपूतों का विस्तार इस क्षेत्र तक हुआ तब संघर्ष की स्थिति बनी और अंततः युद्ध में कोटिया भील वीरगति को प्राप्त हुए किंतु उनकी स्मृति इस भूमि से कभी मिट नहीं सकी माना जाता है कि कोटा नाम भी कहीं न कहीं कोटिया भील के नाम से जुड़ा हुआ है और आज भी स्थानीय लोग उन्हें इस क्षेत्र का मूल स्वामी मानकर सम्मान देते हैं इतिहास की पुस्तकों में भले उनका उल्लेख सीमित हो लेकिन लोकगीतों, कथाओं और जनश्रुतियों में कोटिया भील आज भी जीवित हैं और उनकी कहानी आदिवासी शौर्य, स्वाभिमान और अपने भूभाग से अटूट जुड़ाव की मिसाल बनकर पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती रही है अपने क्षेत्र की सभी वायरल विडियोज के लिए डाउनलोड करें शुरू ऐप (Shuru App) 👇🏻1
- Post by VKH NEWS1
- कोटा जिले के थेकड़ा गांव में स्थित रकत्या का भैरुजी महाराज का प्राचीन मंदिर क्षेत्र की गहरी आस्था और लोकविश्वास का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। दूर-दराज़ से श्रद्धालु यहां दर्शन करने पहुंचते हैं और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए नारियल, ध्वजा और प्रसाद अर्पित करते हैं। रविवार को यहां बडी भीड़ पडती है। निसंतान यहा मुरादें लेकर आते हैं। भैरुजी के शराब की धार भी लगाई जाती है। यह आस्था का हिस्सा है। ग्रामीणों के अनुसार, भैरुजी महाराज गांव के रक्षक देवता माने जाते हैं। किसी भी शुभ कार्य से पहले यहां पूजा करने की परंपरा है। विवाह, नव निर्माण या नई फसल की शुरुआत हर अवसर पर लोग मंदिर पहुंचकर आशीर्वाद लेते हैं। भैरव अष्टमी और अन्य धार्मिक पर्वों पर मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना के साथ भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। इन दिनों आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय माहौल में डूब जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना यहां अवश्य फल देती है। यही वजह है कि भैरुजी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि गांव की सांस्कृतिक पहचान भी बन चुका है। भीड़भाड़ वाले दिनों में व्यवस्था बनाए रखने के लिए ग्रामीण स्वयंसेवक सक्रिय रहते हैं। साफ-सफाई और श्रद्धालुओं की सुविधा का विशेष ध्यान रखा जाता है, जिससे दर्शन व्यवस्था सुचारु बनी रहे। थेकड़ा के भैरुजी मंदिर की यह आस्था, परंपरा और सामुदायिक एकता की कहानी आज भी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े हुए है।1
- राजस्थान के हाड़ौती अंचल की धरती पर बसे कोटा शहर के इतिहास में राजपूत शासकों से पहले एक ऐसा नाम आता है जिसे लोककथाएं आज भी गर्व से याद करती हैं वह नाम है वीर कोटिया भील का जिन्हें कई इतिहासकार और स्थानीय परंपराएं कोटा का पहला शासक मानती हैं कहा जाता है कि जब यह इलाका घने जंगलों, पहाड़ियों और नदी घाटियों से घिरा हुआ था तब भील समुदाय यहां स्वतंत्र रूप से रहता था और उसी समुदाय से उभरे कोटिया भील ने अपनी वीरता, नेतृत्व क्षमता और युद्ध कौशल के दम पर आसपास के क्षेत्रों को संगठित कर एक मजबूत गणराज्य जैसा शासन स्थापित किया था लोककथाओं के अनुसार कोटिया भील न केवल योद्धा थे बल्कि न्यायप्रिय और प्रजा के रक्षक भी माने जाते थे वे शिकार, जंगल और जल स्रोतों की रक्षा को अपना धर्म समझते थे और बाहरी आक्रमणकारियों से अपने क्षेत्र को बचाने के लिए सदैव तैयार रहते थे कहा जाता है कि बाद में जब बूंदी के हाड़ा राजपूतों का विस्तार इस क्षेत्र तक हुआ तब संघर्ष की स्थिति बनी और अंततः युद्ध में कोटिया भील वीरगति को प्राप्त हुए किंतु उनकी स्मृति इस भूमि से कभी मिट नहीं सकी माना जाता है कि कोटा नाम भी कहीं न कहीं कोटिया भील के नाम से जुड़ा हुआ है और आज भी स्थानीय लोग उन्हें इस क्षेत्र का मूल स्वामी मानकर सम्मान देते हैं इतिहास की पुस्तकों में भले उनका उल्लेख सीमित हो लेकिन लोकगीतों, कथाओं और जनश्रुतियों में कोटिया भील आज भी जीवित हैं और उनकी कहानी आदिवासी शौर्य, स्वाभिमान और अपने भूभाग से अटूट जुड़ाव की मिसाल बनकर पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती रही है।1
- Post by VKH NEWS1
- Post by Sadbhavna sandesh news1