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मध्य प्रदेश के सीधी जिले के कमर्जी थाना प्रभारी पर हुए हमले के मामले में पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। यह गिरफ्तारी एक नई रणनीति के तहत की गई है।
Avi Standing with the truth
मध्य प्रदेश के सीधी जिले के कमर्जी थाना प्रभारी पर हुए हमले के मामले में पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। यह गिरफ्तारी एक नई रणनीति के तहत की गई है।
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- मध्य प्रदेश के सीधी जिले के कमर्जी थाना प्रभारी पर हुए हमले के मामले में पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। यह गिरफ्तारी एक नई रणनीति के तहत की गई है।1
- मध्य प्रदेश के सिरमौर तहसील के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत पड़री में दलित और आदिवासी किसान परिवारों की सैकड़ों एकड़ भूमि का सीमांकन करने में राजस्व विभाग के कर्मचारी असमर्थ दिख रहे हैं। बताया गया है कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में इन गरीब परिवारों को 5-5 एकड़ भूमि आवंटित की गई थी, जिस पर वे खेती-बाड़ी कर अपना जीवन यापन करते थे। यूथ कांग्रेस के अनुसार, वर्तमान भाजपा सरकार के कार्यकाल में इन परिवारों से उनकी जमीन छीनी जा रही है। यूथ कांग्रेस की टीम इस अन्याय के खिलाफ है और उसने जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए निरंतर प्रयास जारी रखने का संकल्प लिया है।1
- मध्य प्रदेश के रीवा में किशोर न्यायालय के बालबंदी गृह के प्रभारी पर गंभीर आरोप लगे हैं। बताया जा रहा है कि प्रभारी न्यायालय के आदेशों का पालन नहीं करते हैं। एक पीड़ित के अनुसार, प्रभारी ने उससे कहा कि ₹1500 देने पर ही उसे बालबंदी गृह से बाहर जाने दिया जाएगा। प्रभारी कथित तौर पर यह भी कहते हैं कि 'यहां पर मैं ही सब कुछ हूं'।1
- Post by लाला2
- मध्य प्रदेश के रीवा जिले में चाकघाट के सरकारी कार्यालय में रिश्वत मांगने के आरोप में एक बाबू को निलंबित कर दिया गया है। लोकायुक्त पुलिस द्वारा बाबू के खिलाफ जांच अभी भी जारी है।1
- रीवा जिले की सेमरिया विधानसभा के बहुरीबांध गाँव से ताल्लुक रखने वाली कल्पना प्रजापति ने असिस्टेंट लोको पायलट (ALP) बनकर एक मिसाल कायम की है। साधारण परिवार में जन्मी कल्पना ने बचपन बिना माँ के गुजारा और दो साल पहले उनके पिता का साया भी उठ गया। रिश्तेदारों के सहारे और घर के काम संभालते हुए भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी, और बड़े सपने देखना नहीं छोड़ा। रेलवे की असिस्टेंट लोको पायलट (ALP) भर्ती देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक मानी जाती है, जिसमें टेक्निकल पेपर, साइको टेस्ट और मेडिकल जैसे चरण होते हैं, जो बिजली, मैकेनिकल और फिजिक्स जैसे विषयों की गहन समझ मांगते हैं। गाँव में कोचिंग की सुविधा न होने के कारण कल्पना ने मोबाइल के माध्यम से पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र (PYQ) देखे और रात-रात भर जागकर पढ़ाई की, जिसका परिणाम उनके चयन के रूप में सामने आया और पूरे परिवार की आँखें भर आईं। उनके चयन की खबर मिलते ही युवा समाजसेवी संजय द्विवेदी कल्पना के घर पहुँचे। उन्होंने कल्पना को अपनी बहन मानकर श्रीफल और गणेश जी की प्रतिमा भेंट कर सम्मानित किया। इसके बाद, कल्पना के हाथों से उनकी माँ और पिता के नाम पर एक-एक पेड़ भी लगवाया गया। इस प्रतीक का चुनाव इसलिए किया गया ताकि ये पेड़ वैसे ही जड़ें जमाएँ जैसे कल्पना ने अपने हौसले की जड़ें जमा ली हैं। कल्पना की यह जीत सेमरिया के लिए एक बड़ी प्रेरणा है, जहाँ की लड़कियाँ अब कह सकेंगी कि 'कल्पना दीदी बन सकती हैं तो हम क्यों नहीं'। असिस्टेंट लोको पायलट के तौर पर कल्पना अब हजारों यात्रियों की जान की जिम्मेदारी संभालेंगी, जिसमें इंजन की कमान, सिग्नल की समझ और रात-दिन की ड्यूटी शामिल है। यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि भले ही साधन कम हों, लेकिन हौसला कभी कम नहीं होना चाहिए। बहुरीबांध की गलियों से निकली यह बेटी अब देश की रेल पटरियों पर देश को चलाएगी।1
- मध्य प्रदेश के रीवा जिले की जवा तहसील के चटेह गांव में किसानों के साथ कथित तौर पर भ्रष्टाचार और घोटाला किए जाने का मामला सामने आया है। तहसीलदार, एसडीएम जवा, हल्का पटवारी और राजस्व निरीक्षक जैसे अधिकारियों पर यह आरोप लगाया गया है। किसानों के पास पट्टा और इस्लाबी ऋण पुस्तिका होने के बावजूद, उन्हें दर-दर भटकना पड़ रहा है। बताया गया है कि कंप्यूटर में खसरा-खतौनी और नक्शा नहीं चढ़ाया जा रहा है, जिससे गरीब किसान अत्यधिक परेशान हैं। युवा समाजसेवी और एडवोकेट दयानाथ दिलजीत ने यह जानकारी देते हुए आरोप लगाया है कि पटवारी, राजस्व निरीक्षक, तहसीलदार जवा और एसडीएम जवा द्वारा किसानों की कोई सुनवाई नहीं की जा रही है।1
- मध्य प्रदेश के रीवा जिले के ग्रामीण इलाकों में एक चिंताजनक स्थिति सामने आई है, जहाँ छोटे-छोटे बच्चे, जिनकी उम्र स्कूल जाने की है, खुद को उत्तर प्रदेश के बरगढ़ क्षेत्र का बताकर गाँव-गाँव में गठिया और वात रोग की दवाएं बेचते हुए दिख रहे हैं। इन बच्चों के साथ कौन लोग जुड़े हैं, वे किस कंपनी या संस्था की दवा बेच रहे हैं, और इन दवाओं की गुणवत्ता व वैधता का सत्यापन हुआ है या नहीं, इसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। न ही इन बच्चों के पास कोई लाइसेंस, अनुमति या स्वास्थ्य विभाग की स्वीकृति होने की बात सामने आई है। यह स्थिति आम जनता के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है, खासकर ऐसे समय में जब बड़ी संख्या में बुजुर्ग वात और गठिया से पीड़ित हैं और बिना किसी चिकित्सकीय परीक्षण या सरकारी निगरानी के ये दवाएं बेची जा रही हैं। आश्चर्य की बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग, पुलिस प्रशासन और बाल संरक्षण से जुड़े विभाग इस मामले में कोई सक्रियता नहीं दिखा रहे हैं, जबकि ठगी, चोरी और संदिग्ध गतिविधियों के बढ़ते मामलों के बीच ऐसे प्रकरणों की जांच और सत्यापन अत्यंत आवश्यक है। जनता प्रशासन से मांग कर रही है कि इन बच्चों, उनके संचालकों और उनके द्वारा बेची जा रही दवाओं की तत्काल जांच की जाए। यह मामला बाल श्रम से भी जुड़ा है, जहाँ बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, लेकिन वे दवाएं बेचने के लिए सड़कों पर घूम रहे हैं। बाल अधिकारों की रक्षा का दावा करने वाला बाल आयोग भी इस विषय पर मौन है, जिस पर सवाल उठाए जा रहे हैं।1