पहाड़ी कोरवा के जमिन पर बाहरी लोगो का अवैध कब्ज़ा समान ने दिया चेतावनी.. एंकर..आदिवासी क्षेत्र होने के बावजूद, आदिवासी समाज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है… खासकर पहाड़ी कोरवा जनजाति, जिन्हें राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र के रूप में पहचान मिली है… आज अपने ही अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं… पीढ़ियों से अपनी जमीन पर जीवन यापन करने वाले इन परिवारों की जमीनें अब बाहरी लोगों द्वारा हड़पी जा रही हैं… अवैध अतिक्रमण और जबरन कब्जे की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं… चार पीढ़ियों से जिन जमीनों पर इनका जीवन टिका था… आज वही जमीन इनके हाथों से फिसलती नजर आ रही है… बलरामपुर से महज 10 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत तरकाखाड़ में हालात और भी गंभीर हैं… जहां खुलेआम आदिवासियों की जमीन पर कब्जा किया जा रहा है… कई मामले कोर्ट में वर्षों से लंबित हैं… लेकिन न्याय की धीमी प्रक्रिया ने पीड़ितों की उम्मीदें लगभग तोड़ दी हैं… सरकार आदिवासी विकास के नाम पर हर साल करोड़ों का बजट और बड़ी-बड़ी योजनाओं की घोषणा करती है… लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है… विकास कागजों तक सीमित है… और आदिवासी आज भी अपने हक और मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं… पीड़ित पहाड़ी कोरवा समाज का कहना है कि उनके पूर्वजों ने जंगल की जमीन को उपजाऊ बनाकर जीवन बसाया था… लेकिन अब बाहरी लोग और कुछ प्रभावशाली वर्ग उनकी जमीन पर कब्जा कर रहे हैं… यहां तक कि अधिकारियों द्वारा समझौता कर आधी जमीन छोड़ने का दबाव भी बनाया जा रहा है… जिसे आदिवासी समाज सिरे से खारिज कर रहा है… सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष बसंत कुजूर ने साफ कहा है कि यह सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं… बल्कि पूरे जिले में पहाड़ी कोरवा समाज इसी दर्द से गुजर रहा है… उन्होंने शासन-प्रशासन से मांग की है कि वर्षों से काबिज लोगों को कानूनी दस्तावेज दिए जाएं… वन अधिकार पट्टा जारी किया जाए… और भूमाफियाओं पर सख्त कार्रवाई हो… चेतावनी भी दी गई है… कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए… तो यह समाज अपनी जमीन और पहचान दोनों खो देगा… और अगर किसी तरह की अप्रिय घटना घटती है… तो इसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी… अब सवाल ये है… कि आखिर कब तक आदिवासी अपने ही हक के लिए संघर्ष करते रहेंगे… और कब उन्हें मिलेगा उनका अधिकार…?
पहाड़ी कोरवा के जमिन पर बाहरी लोगो का अवैध कब्ज़ा समान ने दिया चेतावनी.. एंकर..आदिवासी क्षेत्र होने के बावजूद, आदिवासी समाज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है… खासकर पहाड़ी कोरवा जनजाति, जिन्हें राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र के रूप में पहचान मिली है… आज अपने ही अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं… पीढ़ियों से अपनी जमीन पर जीवन यापन करने वाले इन परिवारों की जमीनें अब बाहरी लोगों द्वारा हड़पी जा रही हैं… अवैध अतिक्रमण और जबरन कब्जे की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं… चार पीढ़ियों से जिन जमीनों पर इनका जीवन टिका था… आज वही जमीन इनके हाथों से फिसलती नजर आ रही है… बलरामपुर से महज 10 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत तरकाखाड़ में हालात और भी गंभीर हैं… जहां खुलेआम आदिवासियों की जमीन पर कब्जा किया जा रहा है… कई मामले कोर्ट में वर्षों से लंबित हैं… लेकिन न्याय की धीमी प्रक्रिया ने पीड़ितों की उम्मीदें लगभग तोड़ दी हैं… सरकार आदिवासी विकास के नाम पर हर साल करोड़ों का बजट और बड़ी-बड़ी योजनाओं की घोषणा करती है… लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है… विकास कागजों तक सीमित है… और आदिवासी आज भी अपने हक और मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं… पीड़ित पहाड़ी कोरवा समाज का कहना है कि उनके पूर्वजों ने जंगल की जमीन को उपजाऊ बनाकर जीवन बसाया था… लेकिन अब बाहरी लोग और कुछ प्रभावशाली वर्ग उनकी जमीन पर कब्जा कर रहे हैं… यहां तक कि अधिकारियों द्वारा समझौता कर आधी जमीन छोड़ने का दबाव भी बनाया जा रहा है… जिसे आदिवासी समाज सिरे से खारिज कर रहा है… सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष बसंत कुजूर ने साफ कहा है कि यह सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं… बल्कि पूरे जिले में पहाड़ी कोरवा समाज इसी दर्द से गुजर रहा है… उन्होंने शासन-प्रशासन से मांग की है कि वर्षों से काबिज लोगों को कानूनी दस्तावेज दिए जाएं… वन अधिकार पट्टा जारी किया जाए… और भूमाफियाओं पर सख्त कार्रवाई हो… चेतावनी भी दी गई है… कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए… तो यह समाज अपनी जमीन और पहचान दोनों खो देगा… और अगर किसी तरह की अप्रिय घटना घटती है… तो इसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी… अब सवाल ये है… कि आखिर कब तक आदिवासी अपने ही हक के लिए संघर्ष करते रहेंगे… और कब उन्हें मिलेगा उनका अधिकार…?
- एंकर..आदिवासी क्षेत्र होने के बावजूद, आदिवासी समाज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है… खासकर पहाड़ी कोरवा जनजाति, जिन्हें राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र के रूप में पहचान मिली है… आज अपने ही अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं… पीढ़ियों से अपनी जमीन पर जीवन यापन करने वाले इन परिवारों की जमीनें अब बाहरी लोगों द्वारा हड़पी जा रही हैं… अवैध अतिक्रमण और जबरन कब्जे की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं… चार पीढ़ियों से जिन जमीनों पर इनका जीवन टिका था… आज वही जमीन इनके हाथों से फिसलती नजर आ रही है… बलरामपुर से महज 10 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत तरकाखाड़ में हालात और भी गंभीर हैं… जहां खुलेआम आदिवासियों की जमीन पर कब्जा किया जा रहा है… कई मामले कोर्ट में वर्षों से लंबित हैं… लेकिन न्याय की धीमी प्रक्रिया ने पीड़ितों की उम्मीदें लगभग तोड़ दी हैं… सरकार आदिवासी विकास के नाम पर हर साल करोड़ों का बजट और बड़ी-बड़ी योजनाओं की घोषणा करती है… लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है… विकास कागजों तक सीमित है… और आदिवासी आज भी अपने हक और मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं… पीड़ित पहाड़ी कोरवा समाज का कहना है कि उनके पूर्वजों ने जंगल की जमीन को उपजाऊ बनाकर जीवन बसाया था… लेकिन अब बाहरी लोग और कुछ प्रभावशाली वर्ग उनकी जमीन पर कब्जा कर रहे हैं… यहां तक कि अधिकारियों द्वारा समझौता कर आधी जमीन छोड़ने का दबाव भी बनाया जा रहा है… जिसे आदिवासी समाज सिरे से खारिज कर रहा है… सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष बसंत कुजूर ने साफ कहा है कि यह सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं… बल्कि पूरे जिले में पहाड़ी कोरवा समाज इसी दर्द से गुजर रहा है… उन्होंने शासन-प्रशासन से मांग की है कि वर्षों से काबिज लोगों को कानूनी दस्तावेज दिए जाएं… वन अधिकार पट्टा जारी किया जाए… और भूमाफियाओं पर सख्त कार्रवाई हो… चेतावनी भी दी गई है… कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए… तो यह समाज अपनी जमीन और पहचान दोनों खो देगा… और अगर किसी तरह की अप्रिय घटना घटती है… तो इसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी… अब सवाल ये है… कि आखिर कब तक आदिवासी अपने ही हक के लिए संघर्ष करते रहेंगे… और कब उन्हें मिलेगा उनका अधिकार…?1
- Post by Sunil singh1
- चिनियां प्रखंड क्षेत्र के हेताड खुर्द गांव में कल्याण विभाग द्वारा निर्मित धूमकुड़िया भवन का शुक्रवार दोपहर करीब 2:00 बजे पंचायत सचिव ने निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने भवन में उपलब्ध मूलभूत सुविधाओं का बारीकी से जायजा लिया। निरीक्षण के क्रम में शौचालय, पेयजल व्यवस्था एवं जल मीनार सहित अन्य सुविधाओं की स्थिति देखी गई, जिसे संतोषजनक पाया गया। पंचायत सचिव ने कहा कि भवन का निर्माण और व्यवस्था सरकार की मंशा के अनुरूप है और इसका लाभ स्थानीय ग्रामीणों को जरूर मिलेगा। उन्होंने बताया कि सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना ग्रामीण क्षेत्र के सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से संचालित की जा रही है। धूमकुड़िया भवन ऐसे आयोजनों और गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। यदि इसी तरह निगरानी और रखरखाव जारी रहा, तो यह भवन ग्रामीण विकास का एक बेहतरीन उदाहरण बन सकता है। जरूरत है कि स्थानीय लोग भी इसकी देखरेख में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें, ताकि सुविधा लंबे समय तक सुचारू रूप से चलती रहे।1
- #viral सलाह देने में और साथ देने में फर्क होता है?💯✅1
- रामप्रवेश गुप्ता प्रकृति पर्व सरहुल महुआडांड में आदिवासी समाज द्वारा पूरे पारंपरिक उत्साह और भव्यता के साथ मनाया गया। इस अवसर पर अनुमंडल सह प्रखंड सनातन सरना समिति और वनवासी कल्याण केंद्र महुआडांड (लातेहार) के संयुक्त तत्वावधान में विशाल शोभायात्रा निकाली गई। फुलवार बगीचा से प्रारंभ होकर यह शोभायात्रा बिरसा मुंडा चौक, रामपुर चौक, डीपाटोली, पकरीमुहल्ला, मुख्य बाजार और शास्त्री चौक होते हुए वापस फुलवार बगीचा पहुंची। हजारों की संख्या में पारंपरिक वेशभूषा और वाद्ययंत्रों के साथ शामिल हुए लोगों के 'जय सरना' और 'भारत माता की जय' के नारों से पूरा क्षेत्र गुंजायमान हो उठा। *सांस्कृतिक संगम और विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति* सांस्कृतिक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में जशपुर नगर पालिका परिषद के उपाध्यक्ष यश प्रताप सिंह जुदेव शामिल हुए। विशिष्ट अतिथियों में सरहुल समिति जशपुर के जिला उपाध्यक्ष मनीजर राम नगेसिया, अखिल भारतीय सह श्रद्धा जागरण प्रमुख महरंग उरांव, अनुमंडल सांसद प्रतिनिधि संजय जायसवाल, पश्चिमी हिंदू महासभा के अध्यक्ष रामदत्त प्रसाद, बजरंग दल के पलामू विभाग संयोजक सूरज साहू, मुखिया ओरसा अमृता देवी, मुखिया चटकपुर रेखा नगेसिया, पूनम बडाईक, डा. ए.के. शाह, आरपीएस पब्लिक स्कूल के निदेशक सत्यानंद वर्मा, आरपीएस सेवा संस्थान के संयोजक जशवन्त यादव, जितेंद्र यादव, राम जायसवाल आदि सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। विभिन्न गांवों से आई मंडलियों ने आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। इससे पूर्व सुबह बैगा-पाहन द्वारा महादेव सरना में सामूहिक पूजा-अर्चना संपन्न की गई। कार्यक्रम को सफल बनाने मे वनवासी कल्याण केन्द्र के जिलाध्यक्ष अजय उरांव, अनुमंडल सह प्रखंड सनातन सरना समिती के अध्यक्ष कामेश्वर मुण्डा, जनजाति सुरक्षा मंच के संयोजक बालेश्वर बड़ाईक, वनवासी कल्याण केन्द्र के प्रखण्ड प्रमुख संजय कुमार सिंह, सरना समिति के प्रखण्ड उपाध्यक्ष विनय उरांव, ईश्वर मुण्डा,धनकुंवर मुण्डा, सुरेश उरांव, कृष्णा मुण्डा, सुखपाल नगेसिया, जनजाति सुरक्षा मंच के प्रखण्ड अध्यक्ष ललकु सिंह, जिला महिला संयोजक पानपति देवी आदि का योगदान सराहनीय रहा। *बजरंग दल द्वारा सेवा कार्य और जनसहयोग* महोत्सव के दौरान सेवा की मिसाल पेश करते हुए महुआडांड बजरंग दल द्वारा शोभायात्रा में शामिल श्रद्धालुओं के बीच चना, चूड़ा और गुड़ का वितरण किया गया। बजरंग दल के इस कार्य की स्थानीय लोगों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की। इस सेवा कार्य में सूरज साहू, पंकज दास बाबू और उज्ज्वल धनुष की सक्रिय भूमिका रही। *सरना आदिवासी विकास एकता मंच द्वारा भी निकाली गई शोभायात्रा* सरहुल महोत्सव को लेकर सरना आदिवासी विकास एकता मंच द्वारा भी शोभायात्रा निकाली गई। ये शोभायात्रा रेंज ऑफिस के समीप स्थित सरना भवन से निकल कर पुरे बाजार का भ्रमण करते हुए वापस सरना भवन स्थल पहुंच कर जनसभा मे तब्दील हो गई। जंहा लोगों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। *कार्यक्रम में शामिल हुए लोकप्रिय विधायक रामचंद्र सिंह।* सरहुल महोत्सव को लेकर सरना आदिवासी विकास एकता मंच द्वारा आयोजित कार्यक्रम में लोकप्रिय विधायक रामचंद्र सिंह, महुआडांड एसडीएम बिपिन कुमार दुबे, बीडीओ सह सीओ संतोष कुमार बैठा, थाना प्रभारी मनोज कुमार, कांग्रेस के वरिये नेता मो. इफ्तेखार अहमद, रामनरेश ठाकुर, अजीत पाल कुजूर आदि शामिल हुए एवं हार्दिक बधाई दी।4
- Post by दैनिक भास्कर डंडई1
- 21/03/2026 इस वर्ष धान और सब्जियों की कीमतों में गिरावट का मुख्य कारण अत्यधिक उत्पादन, अनियमित मानसून के कारण एक साथ फसल तैयार होना (Over-supply), और कोल्ड स्टोरेज की कमी है। इससे स्थानीय मंडियों में सप्लाई बढ़ गई लेकिन मांग नहीं, जिससे किसानों को औने-पौने दामों में फसल बेचनी पड़ रही है। फसल की दर कम होने के मुख्य कारण: अत्यधिक आपूर्ति (Over-supply): एक ही समय पर कई किसानों द्वारा धान या सब्जी की फसल की कटाई करने से बाजार में आपूर्ति की बाढ़ आ जाती है, जिससे कीमतें गिर जाती हैं। बेमौसम बारिश/मौसम का असर: अनियमित मानसून के कारण फसल का कैलेंडर बिगड़ा है, जिससे उत्पादकता और गुणवत्ता प्रभावित हुई है। खराब लॉजिस्टिक्स और भंडारण: कोल्ड स्टोरेज की कमी और खराब परिवहन के कारण फसल जल्द खराब होने के डर से किसान कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं। मध्यस्थों की भूमिका: स्थानीय मंडियों में बिचौलियों के दबदबे के कारण किसानों को सही MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) नहीं मिल पाता है। व्यापार नीति: कुछ मामलों में निर्यात कम होने से भी घरेलू बाजार में कीमतें गिर जाती हैं। किसान भाई इन समस्याओं से बचने के लिए क्या आप फसलों के विविधीकरण (जैसे कि पारंपरिक के बजाय नकदी फसलें) पर विचार कर रहे हैं?1
- रामप्रवेश गुप्ता महुआडांड़ (लातेहार) सरकारी स्कूलों की बदहाली की जो तस्वीर महुआडांड़ के बंदुआ विद्यालय से सामने आई है, वह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि पूरे सिस्टम के सड़ जाने का सबूत है। यहां शिक्षा नहीं, खुला तमाशा चल रहा है—शिक्षक गायब, बच्चे बेसहारा और अधिकारी पूरी तरह खामोश!राजकीय कृत प्राथमिक विद्यालय, बंदुआ में पदस्थापित जावेद सर पर गंभीर आरोप लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे हफ्तों तक स्कूल नहीं आते, लेकिन उनकी उपस्थिति और नौकरी दोनों चालू है। बड़ा सवाल—जब शिक्षक ही गायब हैं तो बच्चों को पढ़ाएगा कौन? और विभाग आखिर किसे बचा रहा है?जब जिला परिषद सदस्य इस्टेला नागेसिया और प्रमुख कंचन कुजूर मौके पर पहुंचे, तो जो नजारा सामने आया उसने सबको हिला कर रख दिया। स्कूल से जावेद सर गायब! बच्चे बिना शिक्षक के इधर-उधर बैठे थे, जैसे स्कूल नहीं बल्कि कोई छोड़ा हुआ भवन हो।लेकिन असली ‘बवाल’ तो तब खुला जब पता चला कि पढ़ाई के नाम पर बच्चों को “बालवीर” फिल्म दिखाकर दिन काटा जा रहा है। यानी स्कूल को पढ़ाई की जगह सिनेमा हॉल बना दिया गया है! सरकार शिक्षा पर पैसा बहा रही है और यहां बच्चों को फिल्म दिखाकर भविष्य के साथ मजाक किया जा रहा है।प्राचार्य की चुप्पी ने पूरे मामले को और संदिग्ध बना दिया। उन्होंने एक शब्द बोलना तक जरूरी नहीं समझा। ग्रामीणों का गुस्सा अब फट पड़ा है। लोगों का साफ कहना है कि यह सब बिना विभागीय मिलीभगत के संभव नहीं। बीआरसी से लेकर ऊपर तक सबको जानकारी है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ चुप्पी—यानी पूरा सिस्टम सेट है!ग्रामीणों ने उपायुक्त उत्कर्ष गुप्ता से सख्त कार्रवाई की मांग की है और साफ चेतावनी दी है3