बैतूल जिले के आठनेर मुख्यालय से दो किलोमीटर दूर ग्राम धामोरी में उस समय अफरातफरी मच गई जब मुख्य बस स्टैंड पर एक किंग कोबरा सांप दिखाई दिया। सड़क किनारे नजर आए इस विशालकाय सांप को देखकर मौके पर सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा हो गई। जैसे ही सांप खेतों की ओर जाने लगा, लोगों ने उसे छेड़ना शुरू कर दिया, जिसके बाद कोबरा अत्यधिक आक्रोशित हो गया। गुस्साए किंग कोबरा ने बचाव की मुद्रा अपनाते हुए लकड़ी पर फन फैलाकर जोर-जोर से फुंकार भरनी शुरू कर दी। सांप का यह आक्रामक रूप देखकर वहां मौजूद लोगों की सांसें फूलने लगीं। घंटों तक चले इस घटनाक्रम के दौरान कोबरा लगातार लोगों को डराता रहा और खुद को सुरक्षित रखने का प्रयास करता रहा। अंततः लोगों की भीड़ को वहां से हटाया गया, जिसके बाद वह सांप वापस खेतों की तरफ निकल गया। इस घटना के बाद जानकार लोगों ने आम नागरिकों को सलाह दी है कि इस तरह के जहरीले जीवों को न छेड़ें।
बैतूल जिले के आठनेर मुख्यालय से दो किलोमीटर दूर ग्राम धामोरी में उस समय अफरातफरी मच गई जब मुख्य बस स्टैंड पर एक किंग कोबरा सांप दिखाई दिया। सड़क किनारे नजर आए इस विशालकाय सांप को देखकर मौके पर सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा हो गई। जैसे ही सांप खेतों की ओर जाने लगा, लोगों ने उसे छेड़ना शुरू कर दिया, जिसके बाद कोबरा अत्यधिक आक्रोशित हो गया। गुस्साए किंग कोबरा ने बचाव की मुद्रा अपनाते हुए लकड़ी पर फन फैलाकर जोर-जोर से फुंकार भरनी शुरू कर दी। सांप का यह आक्रामक रूप देखकर वहां मौजूद लोगों की सांसें फूलने लगीं। घंटों तक चले इस घटनाक्रम के दौरान कोबरा लगातार लोगों को डराता रहा और खुद को सुरक्षित रखने का प्रयास करता रहा। अंततः लोगों की भीड़ को वहां से हटाया गया, जिसके बाद वह सांप वापस खेतों की तरफ निकल गया। इस घटना के बाद जानकार लोगों ने आम नागरिकों को सलाह दी है कि इस तरह के जहरीले जीवों को न छेड़ें।
- बैतूल जिले के आठनेर मुख्यालय से दो किलोमीटर दूर ग्राम धामोरी में उस समय अफरातफरी मच गई जब मुख्य बस स्टैंड पर एक किंग कोबरा सांप दिखाई दिया। सड़क किनारे नजर आए इस विशालकाय सांप को देखकर मौके पर सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा हो गई। जैसे ही सांप खेतों की ओर जाने लगा, लोगों ने उसे छेड़ना शुरू कर दिया, जिसके बाद कोबरा अत्यधिक आक्रोशित हो गया। गुस्साए किंग कोबरा ने बचाव की मुद्रा अपनाते हुए लकड़ी पर फन फैलाकर जोर-जोर से फुंकार भरनी शुरू कर दी। सांप का यह आक्रामक रूप देखकर वहां मौजूद लोगों की सांसें फूलने लगीं। घंटों तक चले इस घटनाक्रम के दौरान कोबरा लगातार लोगों को डराता रहा और खुद को सुरक्षित रखने का प्रयास करता रहा। अंततः लोगों की भीड़ को वहां से हटाया गया, जिसके बाद वह सांप वापस खेतों की तरफ निकल गया। इस घटना के बाद जानकार लोगों ने आम नागरिकों को सलाह दी है कि इस तरह के जहरीले जीवों को न छेड़ें।1
- मध्य प्रदेश के बैतूल जिले की भैंसदेही विकासखंड स्थित ग्राम पंचायत कोरडी के सालईढाना गांव में आजादी के 78 साल बाद भी ग्रामीण मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। गांव की विडंबना यह है कि यहां से मात्र 2 से 3 किलोमीटर की दूरी पर पवन चक्कियां बिजली उत्पादन कर रही हैं, लेकिन सालईढाना के 150 से अधिक ग्रामीण आज भी बिजली की रोशनी से दूर हैं। गांव में आज तक बिजली का एक भी खंभा नहीं लगा है और पिछले 5 वर्षों से निवासी एसबीआई द्वारा मिले सोलर पैनलों के सहारे रात गुजारने को मजबूर हैं। सूरज ढलते ही गांव में अंधेरा छा जाता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई पर गहरा असर पड़ रहा है। पेयजल और अन्य बुनियादी व्यवस्थाओं की स्थिति भी बदहाल है। ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने आज तक नल नहीं देखे हैं और वे गंदे नाले का पानी छानकर पीने के लिए मजबूर हैं, जिससे स्वास्थ्य का खतरा बना रहता है। आवागमन के लिए भी कोई पक्का रास्ता नहीं है; बारिश के दौरान गांव का संपर्क कट जाता है और जरूरी कार्यों के लिए ग्रामीणों को या तो 10-12 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है या 4 किलोमीटर का जोखिम भरा रास्ता चुनना पड़ता है जिसमें पहाड़ियां और बड़ी नदियां पार करनी होती हैं। शिक्षा के मामले में भी गांव में केवल कक्षा 1 से 5 तक ही स्कूल है, जिसके बाद आर्थिक तंगी के कारण बच्चों की पढ़ाई अक्सर बीच में ही छूट जाती है। ग्रामीणों का आरोप है कि आंगनवाड़ी सेवाएं भी ठप हैं और सरकारी अधिकारियों को गांव की स्थिति का अंदाजा तक नहीं है। जब वे अपनी समस्याओं को लेकर कार्यालयों के चक्कर काटते हैं, तो जिम्मेदारों को नक्शा देखकर गांव की स्थिति समझनी पड़ती है। इस लगातार उपेक्षा से आक्रोशित ग्रामीणों ने अब आगामी पंचायत चुनाव में मतदान बहिष्कार की चेतावनी दी है। यदि बिजली, सड़क, पानी और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हुईं, तो पूरा गांव चुनाव प्रक्रिया से दूर रहेगा।4
- बैतूल जिले के मुलताई थाना क्षेत्र में एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म और गर्भपात का गंभीर मामला सामने आया है। इस घटना के बाद आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपा गया है। पीड़ित पक्ष की ओर से उपजिलाधिकारी (एसडीएम) और मुलताई थाना प्रभारी को ज्ञापन देकर मामले के मुख्य आरोपी डॉक्टर और अन्य शामिल व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की गई है।1
- बैतूल जिले के आठनेर के पास स्थित धमोरी गांव में एक किसान के खेत में किंग कोबरा देखा गया है। यह दुर्लभ सांप खेत में रखी एक सूखी लकड़ी पर बैठा हुआ पाया गया, जिसने आसपास के लोगों के बीच कौतूहल पैदा कर दिया है।1
- मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के चिचोली में कांग्रेस पार्टी की ओर से उग्र प्रदर्शन किया गया। इस प्रदर्शन के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं ने जमकर अपना विरोध दर्ज कराया।1
- बैतूल जिले के आमला जनपद में शुक्रवार को कलेक्टर डॉ. सौरभ संजय सोनवणे ने भ्रमण के दौरान ग्राम देहलवाड़ा में ग्रामीणों की शिकायत पर शासकीय स्कूल भवन का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान स्कूल भवन की जर्जर और क्षतिग्रस्त स्थिति को देखकर कलेक्टर ने गहरी नाराजगी जताई। इस लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए, कलेक्टर ने संबंधित सरपंच को मध्यप्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम की धारा-40 के तहत नोटिस जारी करने के निर्देश दिए। इसके अलावा, उन्होंने संबंधित सचिव के विरुद्ध भी नियमानुसार सख्त कार्रवाई करने का आदेश दिया। भविष्य में बच्चों को सुरक्षित शैक्षणिक माहौल उपलब्ध कराने के लिए बीआरसी को निर्देश दिए गए हैं कि वे स्कूल के नवीन भवन निर्माण का प्रस्ताव तैयार कर जल्द से जल्द प्रस्तुत करें। इस निरीक्षण के दौरान एसडीएम शैलेंद्र बड़ोनिया समेत अन्य विभागीय अधिकारी उपस्थित रहे।4
- बैतूल के कलेक्टर डॉ. सौरभ संजय सोनवणे शुक्रवार को आमला विकासखंड के दौरे के दौरान एक अनोखे अंदाज में दिखाई दिए। निरीक्षण के दौरान उन्होंने स्वयं एक शिक्षक की भूमिका संभाली और कक्षा में विद्यार्थियों को जल चक्र तथा पर्यावरण संरक्षण का पाठ पढ़ाया।2
- भैंसदेही के सतपुड़ा के जंगलों के बीच कुकरू के कसई गांव में वर्ष 2005 में स्थापित देश का पहला ‘विलेज एनर्जी सिक्योरिटी’ मॉडल अब सरकारी उपेक्षा के कारण पूरी तरह विफल हो चुका है। तत्कालीन गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय और मध्यप्रदेश वन विभाग के सहयोग से शुरू की गई इस महत्वाकांक्षी परियोजना को ग्रामीण ऊर्जा क्रांति के प्रतीक के रूप में पेश किया गया था, जिसका उद्देश्य बायोमास गैसीफायर तकनीक के माध्यम से गांवों को आत्मनिर्भर बनाना था। परियोजना के तहत दो 10 किलोवाट क्षमता के बायोमास गैसीफायर स्थापित किए गए थे, जिनसे घरों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों तक बिजली पहुंचाने के साथ-साथ जल पंप और आटा चक्की जैसी सुविधाएं देने का लक्ष्य था। बायोमास की निरंतर उपलब्धता के लिए विशेष वृक्षारोपण भी किया गया था। हालांकि, 20 साल बाद आज यह प्लांट केवल एक खंडहर बनकर रह गया है, जहां उपकरण जंग खा चुके हैं या गायब हो गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि रखरखाव के अभाव और तकनीकी सहायता न मिलने के कारण यह सिस्टम धीरे-धीरे बंद हो गया। आज जब सरकारें हरित ऊर्जा और जैव ऊर्जा पर जोर दे रही हैं, तब इस परियोजना की विफलता पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीण और विशेषज्ञ इस बात की जवाबदेही मांग रहे हैं कि प्रशासनिक लापरवाही और तकनीकी कमियों के कारण करोड़ों रुपये की परिसंपत्तियां क्यों बर्बाद हो गईं। स्थानीय लोग अब इस ऐतिहासिक प्रोजेक्ट के तकनीकी मूल्यांकन और पुनरुद्धार की मांग कर रहे हैं, ताकि बीस साल से अधूरे पड़े इस वादे को पूरा कर ग्रामीणों को इसका लाभ मिल सके।3