फतेहगढ़ में विश्वकर्मा पूजन पर लोक संस्कृति ने बांधा समां डीजे और सोशल मीडिया की चकाचौंध के बीच पारंपरिक लोकगीत-नृत्यों ने दिलाई अपनी जड़ों की याद फतेहगढ़/गुना। भगवान विश्वकर्मा पूजन दिवस के अवसर पर फतेहगढ़ में निकले भव्य चल समारोह में इस बार धार्मिक आस्था के साथ-साथ भारतीय लोक संस्कृति और पारंपरिक लोकगीत-नृत्यों की मनमोहक झलक देखने को मिली। आधुनिक दौर में जहां डीजे और सोशल मीडिया की चमक-दमक ने पारंपरिक लोक कलाओं को पीछे धकेल दिया है, वहीं विश्वकर्मा पूजन के अवसर पर समाजजनों ने लोकगीत और लोकनृत्य के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया। फतेहगढ़ स्थित सिद्ध झिरिया आश्रम विश्वकर्मा मंदिर से भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना के बाद चल समारोह प्रारंभ हुआ। ढोल की थाप, पारंपरिक गीतों और लोकनृत्य के साथ निकला जुलूस नगर के प्रमुख मार्गों और चौराहों से होकर गुजरा। समारोह में महिलाएं, बच्चे, युवा और बुजुर्ग बड़ी संख्या में शामिल हुए। आधुनिकता के दौर में लोक संस्कृति के संरक्षण की जरूरत भारतीय संस्कृति में लोकगीत और लोकनृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामूहिक जीवन की पहचान रहे हैं। गांवों में होने वाले धार्मिक एवं सामाजिक आयोजनों में लोकगीतों और पारंपरिक नृत्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन बदलते समय के साथ मनोरंजन के साधन भी तेजी से बदले हैं। डीजे, मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और आधुनिक संगीत की बढ़ती लोकप्रियता के बीच कई पारंपरिक लोकगीत और लोकनृत्य नई पीढ़ी से दूर होते जा रहे हैं। कई लोक कलाएं आज संरक्षण और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की चुनौती का सामना कर रही हैं। विश्वकर्मा समारोह बना संस्कृति का मंच फतेहगढ़ में आयोजित विश्वकर्मा पूजन समारोह में पारंपरिक लोकनृत्य और गीतों ने इस बदलाव के बीच अलग ही रंग भर दिया। समाज की महिलाओं और युवाओं ने पारंपरिक अंदाज में प्रस्तुति देकर न केवल समारोह में उत्साह बढ़ाया, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का संदेश भी दिया। चल समारोह के दौरान नगर में जगह-जगह लोगों ने जुलूस का स्वागत किया। धार्मिक आस्था के साथ लोक संस्कृति का यह संगम लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा। बच्चों और युवाओं ने भी पारंपरिक प्रस्तुतियों को देखा और उनका आनंद लिया। सिर्फ आयोजन नहीं, संस्कृति बचाने की पहल विश्वकर्मा पूजन के अवसर पर हुए इस आयोजन ने यह संदेश भी दिया कि आधुनिकता के साथ आगे बढ़ना जरूरी है, लेकिन अपनी लोक परंपराओं को भूलना नहीं चाहिए। लोकगीत और लोकनृत्य हमारी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। इन्हें केवल किसी विशेष अवसर तक सीमित रखने के बजाय स्कूलों, सामाजिक कार्यक्रमों और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी से जोड़ने की जरूरत है। फतेहगढ़ का यह आयोजन इसी सांस्कृतिक विरासत की एक खूबसूरत झलक बनकर सामने आया, जहां भगवान विश्वकर्मा की भक्ति के साथ भारतीय लोक संस्कृति की परंपरा भी कदमताल करती नजर आई।
फतेहगढ़ में विश्वकर्मा पूजन पर लोक संस्कृति ने बांधा समां डीजे और सोशल मीडिया की चकाचौंध के बीच पारंपरिक लोकगीत-नृत्यों ने दिलाई अपनी जड़ों की याद फतेहगढ़/गुना। भगवान विश्वकर्मा पूजन दिवस के अवसर पर फतेहगढ़ में निकले भव्य चल समारोह में इस बार धार्मिक आस्था के साथ-साथ भारतीय लोक संस्कृति और पारंपरिक लोकगीत-नृत्यों की मनमोहक झलक देखने को मिली। आधुनिक दौर में जहां डीजे और सोशल मीडिया की चमक-दमक ने पारंपरिक लोक कलाओं को पीछे धकेल दिया है, वहीं विश्वकर्मा पूजन के अवसर पर समाजजनों ने लोकगीत और लोकनृत्य के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया। फतेहगढ़ स्थित सिद्ध झिरिया आश्रम विश्वकर्मा मंदिर से भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना के बाद चल समारोह प्रारंभ हुआ। ढोल की थाप, पारंपरिक गीतों और लोकनृत्य के साथ निकला जुलूस नगर के प्रमुख मार्गों और चौराहों से होकर गुजरा। समारोह में महिलाएं, बच्चे, युवा और बुजुर्ग बड़ी संख्या में शामिल हुए। आधुनिकता के दौर में लोक संस्कृति के संरक्षण की जरूरत भारतीय संस्कृति में लोकगीत और लोकनृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामूहिक जीवन की पहचान रहे हैं। गांवों में होने वाले धार्मिक एवं सामाजिक आयोजनों में लोकगीतों और पारंपरिक नृत्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन बदलते समय के साथ मनोरंजन के साधन भी तेजी से बदले हैं। डीजे, मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और आधुनिक संगीत की बढ़ती लोकप्रियता के बीच कई पारंपरिक लोकगीत और लोकनृत्य नई पीढ़ी से दूर होते जा रहे हैं। कई लोक कलाएं आज संरक्षण और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की चुनौती का सामना कर रही हैं। विश्वकर्मा समारोह बना संस्कृति का मंच फतेहगढ़ में आयोजित विश्वकर्मा पूजन समारोह में पारंपरिक लोकनृत्य और गीतों ने इस बदलाव के बीच अलग ही रंग भर दिया। समाज की महिलाओं और युवाओं ने पारंपरिक अंदाज में प्रस्तुति देकर न केवल समारोह में उत्साह बढ़ाया, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का संदेश भी दिया। चल समारोह के दौरान नगर में जगह-जगह लोगों ने जुलूस का स्वागत किया। धार्मिक आस्था के साथ लोक संस्कृति का यह संगम लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा। बच्चों और युवाओं ने भी पारंपरिक प्रस्तुतियों को देखा और उनका आनंद लिया। सिर्फ आयोजन नहीं, संस्कृति बचाने की पहल विश्वकर्मा पूजन के अवसर पर हुए इस आयोजन ने यह संदेश भी दिया कि आधुनिकता के साथ आगे बढ़ना जरूरी है, लेकिन अपनी लोक परंपराओं को भूलना नहीं चाहिए। लोकगीत और लोकनृत्य हमारी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। इन्हें केवल किसी विशेष अवसर तक सीमित रखने के बजाय स्कूलों, सामाजिक कार्यक्रमों और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी से जोड़ने की जरूरत है। फतेहगढ़ का यह आयोजन इसी सांस्कृतिक विरासत की एक खूबसूरत झलक बनकर सामने आया, जहां भगवान विश्वकर्मा की भक्ति के साथ भारतीय लोक संस्कृति की परंपरा भी कदमताल करती नजर आई।
- फतेहगढ़ में विश्वकर्मा पूजन पर लोक संस्कृति ने बांधा समां डीजे और सोशल मीडिया की चकाचौंध के बीच पारंपरिक लोकगीत-नृत्यों ने दिलाई अपनी जड़ों की याद फतेहगढ़/गुना। भगवान विश्वकर्मा पूजन दिवस के अवसर पर फतेहगढ़ में निकले भव्य चल समारोह में इस बार धार्मिक आस्था के साथ-साथ भारतीय लोक संस्कृति और पारंपरिक लोकगीत-नृत्यों की मनमोहक झलक देखने को मिली। आधुनिक दौर में जहां डीजे और सोशल मीडिया की चमक-दमक ने पारंपरिक लोक कलाओं को पीछे धकेल दिया है, वहीं विश्वकर्मा पूजन के अवसर पर समाजजनों ने लोकगीत और लोकनृत्य के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया। फतेहगढ़ स्थित सिद्ध झिरिया आश्रम विश्वकर्मा मंदिर से भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना के बाद चल समारोह प्रारंभ हुआ। ढोल की थाप, पारंपरिक गीतों और लोकनृत्य के साथ निकला जुलूस नगर के प्रमुख मार्गों और चौराहों से होकर गुजरा। समारोह में महिलाएं, बच्चे, युवा और बुजुर्ग बड़ी संख्या में शामिल हुए। आधुनिकता के दौर में लोक संस्कृति के संरक्षण की जरूरत भारतीय संस्कृति में लोकगीत और लोकनृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामूहिक जीवन की पहचान रहे हैं। गांवों में होने वाले धार्मिक एवं सामाजिक आयोजनों में लोकगीतों और पारंपरिक नृत्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन बदलते समय के साथ मनोरंजन के साधन भी तेजी से बदले हैं। डीजे, मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और आधुनिक संगीत की बढ़ती लोकप्रियता के बीच कई पारंपरिक लोकगीत और लोकनृत्य नई पीढ़ी से दूर होते जा रहे हैं। कई लोक कलाएं आज संरक्षण और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की चुनौती का सामना कर रही हैं। विश्वकर्मा समारोह बना संस्कृति का मंच फतेहगढ़ में आयोजित विश्वकर्मा पूजन समारोह में पारंपरिक लोकनृत्य और गीतों ने इस बदलाव के बीच अलग ही रंग भर दिया। समाज की महिलाओं और युवाओं ने पारंपरिक अंदाज में प्रस्तुति देकर न केवल समारोह में उत्साह बढ़ाया, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का संदेश भी दिया। चल समारोह के दौरान नगर में जगह-जगह लोगों ने जुलूस का स्वागत किया। धार्मिक आस्था के साथ लोक संस्कृति का यह संगम लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा। बच्चों और युवाओं ने भी पारंपरिक प्रस्तुतियों को देखा और उनका आनंद लिया। सिर्फ आयोजन नहीं, संस्कृति बचाने की पहल विश्वकर्मा पूजन के अवसर पर हुए इस आयोजन ने यह संदेश भी दिया कि आधुनिकता के साथ आगे बढ़ना जरूरी है, लेकिन अपनी लोक परंपराओं को भूलना नहीं चाहिए। लोकगीत और लोकनृत्य हमारी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं। इन्हें केवल किसी विशेष अवसर तक सीमित रखने के बजाय स्कूलों, सामाजिक कार्यक्रमों और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी से जोड़ने की जरूरत है। फतेहगढ़ का यह आयोजन इसी सांस्कृतिक विरासत की एक खूबसूरत झलक बनकर सामने आया, जहां भगवान विश्वकर्मा की भक्ति के साथ भारतीय लोक संस्कृति की परंपरा भी कदमताल करती नजर आई।1
- भुजरिया तालाब पर हुआ बड़े उत्साह पूर्वक मोर विसर्जन का कार्यक्रम गुना लक्ष्मी नारायण मंदिर भूजरिया तालाब पर हुआ मोहर विसर्जन। विवाह होने के बाद परंपरा अनुसार तालाब पर मोर विसर्जन बड़ी धूमधाम से महिलाएं गाजेबाजे के साथ मोहर का विसर्जन करने भुजरिया तालाब पर पहुंची जहां पर प्रशासन का कोई भी इंतजाम देखने को नहीं मिला भुजरिया तालाब मंदिर महंत राघवेंद्र दास ने बताया कि प्रशासन का कोई भी इंतजाम यहां पर नहीं है मंदिर की तरफ से कुछ लडको को पैसे देकर के तालाब में अंदर खड़े किया गया जो पानी में तैरना जानते थे जिससे किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना ना घटित हो भुजरिया ताला सबसे पुराना घाट है हजारों की संख्या में महिलाएं मोर विसर्जन करने के लिए पहुंचते हैं2
- पारदी बदमाशों की गतिविधियों पर गुना पुलिस की सतत निगरानी पारदी बदमाशों की गतिविधियों पर गुना पुलिस की सतत निगरानी केंट थाना पुलिस ने अवैध कच्ची शराब सहित पारदी बदमाश किया गिरफ्तार, 60 लीटर अवैध कच्ची शराब जप्त आबकारी एक्ट के एक अन्य प्रकरण में आरोपी के विरूद्ध जारी स्थाई वारंट में भी पुलिस को थी आरोपी की तलाश* गुना पुलिस अधीक्षक श्रीमती हितिका वासल के कुशल नेतृत्व में गुना पुलिस द्वारा जिले में विभिन्न अवैध एवं अनैतिक गतिविधियों में संलिप्त माफियाओं, कारोबारियों, तस्करों आदि के विरूद्ध सतत एवं प्रभावी कार्यवाहियां की जा रहीं हैं । इसी तारतम्य में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्री प्रशांत सिंह सुमन के मार्गदर्शन एवं प्रभारी सीएसपी गुना श्री आनंद राय के पर्यवेक्षण में केंट थाना प्रभारी निरीक्षक अनूप कुमार भार्गव और उनकी टीम द्वारा अवैध शराब बेचने की फिराक में एक पारदी बदमाश को गिरफ्तार किया है । उल्लेखनीय है कि बिगत रोज केंट थाना पुलिस को मुखबिर से सूचना प्राप्त हुई थी कि सिंगवासा तालाब के पास एक व्यक्ति प्लास्टिक की बड़ी-बड़ी दो कैनों में अवैध कच्ची शराब लेकर उसे बेचने के उद्देश्य से खड़ा है । थाना क्षेत्र में अवैध शराब बिक्रय की सूचना के मिलते ही सूचना की तस्दीक और कार्यवाही हेतु केंट थाने से तत्काल पुलिस की एक टीम रवाना हुई । टीम द्वारा तुरंत सिंगवासा तालाब के पास मुखबिर की बताई जगह पर पहुंचकर देखा तो वहां पर मुखबिर के बताए हुलिए का एक व्यक्ति खड़ा दिखा, पुलिस ने सतर्कता दिखाते हुए उसे भागने का मौका न देते हुए घेराबंदी कर पकड़ लिया गया, जिसने पूछताछ पर अपना नाम मोहित पुत्र केवल पारदी उम्र 25 साल निवासी जगनपुर चक हड्डीमील गुना हाल पटेलनगर थाना केंट गुना का बताया एवं उसके कब्जे से बरामद कैनों की जांच करने पर उनमें हाथ भट्टी पर निर्मित कुल 60 लीटर अवैध कच्ची शराब भरी हुई पाई गई, जिसे पुलिस ने विधिवत जप्त कर आरोपी को गिरफ्तार किया और उसके विरुद्ध केंट थाने में अप.क्र. 806/26 धारा 34(2) आबकारी अधिनियम के तहत अपराध दर्ज कर विवेचना में लिया गया है । अवैध शराब के साथ गिरफ्तार शुदा आरोपी मोहित पारदी के पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड की जांच करने पर उसके विरूद्ध वर्ष 2021 में गुना कोतवाली थाने में आबकारी एक्ट का एक अन्य प्रकरण दर्ज होना पाया गया, उक्त प्रकरण में आरोपी के न्यायालयीन कार्यवाही से लंबे समय से फरार रहने पर माननीय न्यायालय से न्यायालयीन प्रकरण क्रमांक 1244/21 में आरोपी के विरूद्ध स्थाई वारंट जारी किया गया था, जिसमें भी पुलिस द्वारा आरोपी की गिरफ्तारी की विधिवत कार्यवाही की गई । केंट थाना पुलिस की अवैध शराव के विरुद्ध इस कार्यवाही में थाना प्रभारी निरीक्षक अनूप कुमार भार्गव, सउनि गिर्राज जाटव, प्रधान आरक्षक लक्ष्मीनारायण पारस एवं आरक्षक रवि जाट की सराहनीय भूमिका रही है ।1
- today news | मेधावी विद्यार्थियों को ई-स्कूटी वितरण योजना |#breakingnews मेधावी विद्यार्थियों को ई-स्कूटी वितरण योजना राज्य सरकार ने स्कूल शिक्षा और उच्च शिक्षा में उत्कृष्ट अंक हासिल करने वाले छात्र-छात्राओं को प्रोत्साहन देने के लिए ई-स्कूटी योजना के नए चरण की घोषणा की है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 19 सितंबर को राज्य स्तरीय समारोह में चयनित मेधावी विद्यार्थियों के खातों में ई-स्कूटी क्रय की राशि डिजिटल ट्रांसफर करेंगे। इस पहल का उद्देश्य युवाओं को हरित ऊर्जा और आत्मनिर्भरता से जोड़ना है।1
- प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर छीपाबड़ौद में जला ‘आशीर्वाद का दीया’ प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर छीपाबड़ौद में जला ‘आशीर्वाद का दीया’ छीपाबड़ौद / बारां छीपाबड़ौद में विधायक सिंघवी के आवास पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर गुरुवार को ‘एक दिया आशीर्वाद का’ कार्यक्रम के तहत छीपाबड़ौद में दीप प्रज्वलित कर प्रधानमंत्री के प्रति शुभकामनाएं एवं मंगलकामनाएं व्यक्त की गईं। भाजपा द्वारा प्रधानमंत्री के जन्मदिन से ‘सेवा संकल्प अभियान’ की शुरुआत की गई है। इस अवसर पर माननीय विधायक *प्रताप सिंह सिंघवी* के मार्गदर्शन में क्षेत्रवासियों एवं कार्यकर्ताओं ने दीप प्रज्वलित कर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के स्वस्थ, दीर्घायु एवं यशस्वी जीवन की कामना की। इस दौरान छबड़ा प्रधान *हरिओम नागर*, मण्डल अध्यक्ष *हितेश वैष्णव*, नगर अध्यक्ष *अशोक पारिक*, राजेश सुमन, शिवनारायण नामदेव, अर्जुन सोनी और आशिक अहमद आदि भाजपा कार्यकर्ता उपस्थित रहे।2
- गुना में खाद नहीं मिलने की शिकायत लेकर पहुंचे किसानः बोले-'जिंदगी हो गई माला पहनाते-पहनाते'; सिंधिया ने कलेक्टर से कहा- पेन-पैड निकालिए, नाम-नंबर नोट करिए1
- कस्बाथाना में अव्यवस्थाओं के बीच बदहाल पड़ा कस्बाथाना का श्मशान घाट कस्बाथाना में हॉस्पिटल के पीछे स्थित श्मशान घाट इन दिनों बदहाली का शिकार है। श्मशान घाट परिसर में जगह-जगह घनी झाड़ियां और खरपतवार उगे हुए हैं। इससे अंतिम संस्कार के लिए आने वाले लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। खास बात यह है कि कस्बे के बाजार क्षेत्र के कई लोग भी अंतिम संस्कार के दौरान इसी श्मशान घाट पर पहुंचते हैं, ऐसे में यहां साफ-सफाई और बेहतर व्यवस्थाएं होना जरूरी है।1
- कलेक्टर से मिलने पहुँचे सेकड़ो किसान, मुलाकात नही होने से कुत्ते के गले मे टांगा आवेदन कलेक्टर से मिलने पहुंचे सैकड़ों किसान, नहीं हुई मुलाकात तो कुत्ते के गले में टांग दिया ज्ञापन; VIDEO वायरल खंडवा। मध्य प्रदेश के खंडवा में किसानों ने अपनी मांगों को लेकर अनोखे अंदाज में विरोध प्रदर्शन किया। राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के नेतृत्व में बड़ी संख्या में किसान किसान अधिकार रैली निकालकर कलेक्ट्रेट पहुंचे और कलेक्टर से मुलाकात कर अपनी समस्याओं का ज्ञापन सौंपना चाहते थे। रिपोर्टों के मुताबिक, रैली मंगलवार को दोपहर करीब 3 बजे सब्जी मंडी से शुरू हुई और शाम करीब 4 बजे कलेक्ट्रेट पहुंची। किसानों ने वहां नारेबाजी करते हुए कलेक्टर से मुलाकात की मांग की। बताया गया कि उस समय कलेक्टर ऋषव गुप्ता टीएल बैठक में मौजूद थे और किसानों की उनसे मुलाकात नहीं हो सकी। कुत्ते के गले में बांध दिया ज्ञापन काफी देर इंतजार के बाद किसानों ने विरोध का अनोखा तरीका अपनाया। प्रदर्शनकारियों ने कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद एक श्वान के गले में गमछे की मदद से ज्ञापन टांग दिया। इस दौरान किसानों ने प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी भी की। घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। चार गुना मुआवजा और विस्थापितों के पुनर्वास की मांग किसानों ने नेशनल हाईवे के लिए अधिग्रहित जमीन के बदले चार गुना मुआवजा देने की मांग उठाई। इसके अलावा इंदिरा सागर बांध के डूब प्रभावित और विस्थापित परिवारों के मुआवजे, पुनर्वास तथा मूलभूत सुविधाओं से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए। किसानों का कहना है कि इन समस्याओं को लेकर लंबे समय से प्रशासन से कार्रवाई की मांग की जा रही है। बाद में सिटी मजिस्ट्रेट को सौंपा ज्ञापन रिपोर्ट के अनुसार, किसानों ने बाद में सिटी मजिस्ट्रेट बजरंग बहादुर सिंह को अपना ज्ञापन सौंपा। किसान नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को आगे बढ़ाया जाएगा। नोट: “कलेक्टर ने किसानों का ज्ञापन लेने से इनकार किया” कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा; उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार कलेक्टर उस समय टीएल बैठक में थे और किसानों की उनसे मुलाकात नहीं हो सकी, जिसके बाद किसानों ने प्रतीकात्मक विरोध किया।1