*विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना: सिलाई मशीन वितरण में दलालों की भूमिका और ट्रेनिंग शुल्क के सवाल* अंबेडकर नगर। उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना के तहत पारंपरिक कारीगरों और महिलाओं को सिलाई मशीन समेत टूलकिट वितरित किए जा रहे हैं। योजना का मकसद कारीगरों को कौशल प्रशिक्षण, मानदेय और आधुनिक उपकरण देकर आत्मनिर्भर बनाना है। लेकिन जनपद में हालिया वितरण के बाद एक गंभीर सवाल पूरे परिसर में कौतूहल और चर्चा का विषय बन गया है—क्या योजना का लाभ बिना दलालों के पकड़े संभव है, या इसमें विभाग के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की संलिप्तता है?स्थानीय लोगों और कुछ लाभार्थियों के बीच यह बात आम चर्चा में है कि सिलाई मशीन पाने के लिए कई जगहों पर दलाल सक्रिय रहे। आरोप है कि सही पात्रता रखने वाले लोग भी दलालों के माध्यम से ही आवेदन या चयन प्रक्रिया में आगे बढ़ पाए, जबकि सीधे विभाग से संपर्क करने वाले कई उम्मीदवारों को अड़चनें आईं। मीडिया के कैमरे और स्थानीय चर्चाओं में यह मुद्दा काफी हद तक दब गया, लेकिन जमीनी स्तर पर यह सवाल जिंदा है कि योजना के लाभ को पारदर्शी तरीके से आम आदमी तक पहुँचाने में दलालों की अहम भूमिका क्यों रही?जानकारी के अनुसार एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। योजना में 10 दिवसीय निःशुल्क प्रशिक्षण अनिवार्य बताया जाता है, जिसके बाद ही टूलकिट (सिलाई मशीन) दी जाती है। लेकिन स्थानीय स्तर पर यह जानकारी मिली है कि अगर कोई व्यक्ति ट्रेनिंग नहीं करना चाहता, तो उसे ट्रेनिंग सेंटर द्वारा तय किया गया अलग से शुल्क देना पड़ता है। यह शुल्क ट्रेनिंग सेंटर स्वयं निर्धारित करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आधिकारिक रूप से मुफ्त बताई गई योजना में यह अतिरिक्त शुल्क कैसे और किसके निर्देश पर वसूला जा रहा है? क्या यह भी दलालों या संबंधित अधिकारियों के सहयोग से चलने वाला अनौपचारिक सिस्टम है?योजना के प्रावधानों के अनुसार आवेदन ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से किए जाते हैं। पात्रता में उत्तर प्रदेश का निवासी होना, न्यूनतम आयु 18 वर्ष और संबंधित ट्रेड (जैसे दर्जी/सिलाई) में अनुभव शामिल है। प्रशिक्षण के बाद टूलकिट निःशुल्क दी जाती है। आधिकारिक तौर पर प्रक्रिया पारदर्शी बताई जाती है। फिर भी अंबेडकर नगर में यह आशंका जताई जा रही है कि कुछ अधिकारी या कर्मचारी दलालों के जरिए लाभ पहुँचा रहे होंगे। अगर यह सच है, तो पात्र गरीब कारीगर और महिलाएं योजना के वास्तविक लाभ से वंचित रह सकते हैं।यह मामला सिर्फ अफवाह या कौतूहल का विषय नहीं रहना चाहिए। जिला प्रशासन और उद्योग विभाग को चाहिए कि इस पर त्वरित और निष्पक्ष जांच करे। दलालों की भूमिका साबित होने पर सख्त कार्रवाई हो, और अगर अधिकारी संलिप्त पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ भी उचित कदम उठाए जाएं। ट्रेनिंग छोड़ने पर शुल्क वसूलने की प्रथा की भी जांच होनी चाहिए। साथ ही लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक की जाए और शिकायत तंत्र को मजबूत किया जाए, ताकि बिना किसी बिचौलिये के पात्र लोग आसानी से लाभ ले सकें।विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना कारीगरों को सशक्त बनाने का अच्छा माध्यम है। लेकिन अगर इसमें दलाल, अतिरिक्त शुल्क और भ्रष्टाचार घुस गए तो इसका उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। अंबेडकर नगर के लोग अब जवाब चाहते हैं—क्या बिना दलाल पकड़े और बिना अतिरिक्त शुल्क दिए योजना का लाभ मिलना सच में संभव है, या सिस्टम में कहीं गड़बड़ी है? प्रशासन को इन सवालों का संतोषजनक जवाब देना चाहिए, ताकि योजना का फायदा सही हकदारों तक पहुँचे। *विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना: सिलाई मशीन वितरण में दलालों की भूमिका और ट्रेनिंग शुल्क के सवाल* अंबेडकर नगर। उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना के तहत पारंपरिक कारीगरों और महिलाओं को सिलाई मशीन समेत टूलकिट वितरित किए जा रहे हैं। योजना का मकसद कारीगरों को कौशल प्रशिक्षण, मानदेय और आधुनिक उपकरण देकर आत्मनिर्भर बनाना है। लेकिन जनपद में हालिया वितरण के बाद एक गंभीर सवाल पूरे परिसर में कौतूहल और चर्चा का विषय बन गया है—क्या योजना का लाभ बिना दलालों के पकड़े संभव है, या इसमें विभाग के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की संलिप्तता है?स्थानीय लोगों और कुछ लाभार्थियों के बीच यह बात आम चर्चा में है कि सिलाई मशीन पाने के लिए कई जगहों पर दलाल सक्रिय रहे। आरोप है कि सही पात्रता रखने वाले लोग भी दलालों के माध्यम से ही आवेदन या चयन प्रक्रिया में आगे बढ़ पाए, जबकि सीधे विभाग से संपर्क करने वाले कई उम्मीदवारों को अड़चनें आईं। मीडिया के कैमरे और स्थानीय चर्चाओं में यह मुद्दा काफी हद तक दब गया, लेकिन जमीनी स्तर पर यह सवाल जिंदा है कि योजना के लाभ को पारदर्शी तरीके से आम आदमी तक पहुँचाने में दलालों की अहम भूमिका क्यों रही?जानकारी के अनुसार एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। योजना में 10 दिवसीय निःशुल्क प्रशिक्षण अनिवार्य बताया जाता है, जिसके बाद ही टूलकिट (सिलाई मशीन) दी जाती है। लेकिन स्थानीय स्तर पर यह जानकारी मिली है कि अगर कोई व्यक्ति ट्रेनिंग नहीं करना चाहता, तो उसे ट्रेनिंग सेंटर द्वारा तय किया गया अलग से शुल्क देना पड़ता है। यह शुल्क ट्रेनिंग सेंटर स्वयं निर्धारित करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आधिकारिक रूप से मुफ्त बताई गई योजना में यह अतिरिक्त शुल्क कैसे और किसके निर्देश पर वसूला जा रहा है? क्या यह भी दलालों या संबंधित अधिकारियों के सहयोग से चलने वाला अनौपचारिक सिस्टम है?योजना के प्रावधानों के अनुसार आवेदन ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से किए जाते हैं। पात्रता में उत्तर प्रदेश का निवासी होना, न्यूनतम आयु 18 वर्ष और संबंधित ट्रेड (जैसे दर्जी/सिलाई) में अनुभव शामिल है। प्रशिक्षण के बाद टूलकिट निःशुल्क दी जाती है। आधिकारिक तौर पर प्रक्रिया पारदर्शी बताई जाती है। फिर भी अंबेडकर नगर में यह आशंका जताई जा रही है कि कुछ अधिकारी या कर्मचारी दलालों के जरिए लाभ पहुँचा रहे होंगे। अगर यह सच है, तो पात्र गरीब कारीगर और महिलाएं योजना के वास्तविक लाभ से वंचित रह सकते हैं।यह मामला सिर्फ अफवाह या कौतूहल का विषय नहीं रहना चाहिए। जिला प्रशासन और उद्योग विभाग को चाहिए कि इस पर त्वरित और निष्पक्ष जांच करे। दलालों की भूमिका साबित होने पर सख्त कार्रवाई हो, और अगर अधिकारी संलिप्त पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ भी उचित कदम उठाए जाएं। ट्रेनिंग छोड़ने पर शुल्क वसूलने की प्रथा की भी जांच होनी चाहिए। साथ ही लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक की जाए और शिकायत तंत्र को मजबूत किया जाए, ताकि बिना किसी बिचौलिये के पात्र लोग आसानी से लाभ ले सकें।विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना कारीगरों को सशक्त बनाने का अच्छा माध्यम है। लेकिन अगर इसमें दलाल, अतिरिक्त शुल्क और भ्रष्टाचार घुस गए तो इसका उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। अंबेडकर नगर के लोग अब जवाब चाहते हैं—क्या बिना दलाल पकड़े और बिना अतिरिक्त शुल्क दिए योजना का लाभ मिलना सच में संभव है, या सिस्टम में कहीं गड़बड़ी है? प्रशासन को इन सवालों का संतोषजनक जवाब देना चाहिए, ताकि योजना का फायदा सही हकदारों तक पहुँचे।
*विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना: सिलाई मशीन वितरण में दलालों की भूमिका और ट्रेनिंग शुल्क के सवाल* अंबेडकर नगर। उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना के तहत पारंपरिक कारीगरों और महिलाओं को सिलाई मशीन समेत टूलकिट वितरित किए जा रहे हैं। योजना का मकसद कारीगरों को कौशल प्रशिक्षण, मानदेय और आधुनिक उपकरण देकर आत्मनिर्भर बनाना है। लेकिन जनपद में हालिया वितरण के बाद एक गंभीर सवाल पूरे परिसर में कौतूहल और चर्चा का विषय बन गया है—क्या योजना का लाभ बिना दलालों के पकड़े संभव है, या इसमें विभाग के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की संलिप्तता है?स्थानीय लोगों और कुछ लाभार्थियों के बीच यह बात आम चर्चा में है कि सिलाई मशीन पाने के लिए कई जगहों पर दलाल सक्रिय रहे। आरोप है कि सही पात्रता रखने वाले लोग भी दलालों के माध्यम से ही आवेदन या चयन प्रक्रिया में आगे बढ़ पाए, जबकि सीधे विभाग से संपर्क करने वाले कई उम्मीदवारों को अड़चनें आईं। मीडिया के कैमरे और स्थानीय चर्चाओं में यह मुद्दा काफी हद तक दब गया, लेकिन जमीनी स्तर पर यह सवाल जिंदा है कि योजना के लाभ को पारदर्शी तरीके से आम आदमी तक पहुँचाने में दलालों की अहम भूमिका क्यों रही?जानकारी के अनुसार एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। योजना में 10 दिवसीय निःशुल्क प्रशिक्षण अनिवार्य बताया जाता है, जिसके बाद ही टूलकिट (सिलाई मशीन) दी जाती है। लेकिन स्थानीय स्तर पर यह जानकारी मिली है कि अगर कोई व्यक्ति ट्रेनिंग नहीं करना चाहता, तो उसे ट्रेनिंग सेंटर द्वारा तय किया गया अलग से शुल्क देना पड़ता है। यह शुल्क ट्रेनिंग सेंटर स्वयं निर्धारित करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आधिकारिक रूप से मुफ्त बताई गई योजना में यह अतिरिक्त शुल्क कैसे और किसके निर्देश पर वसूला जा रहा है? क्या यह भी दलालों या संबंधित अधिकारियों के सहयोग से चलने वाला अनौपचारिक सिस्टम है?योजना के प्रावधानों के अनुसार आवेदन ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से किए जाते हैं। पात्रता में उत्तर प्रदेश का निवासी होना, न्यूनतम आयु 18 वर्ष और संबंधित ट्रेड (जैसे दर्जी/सिलाई) में अनुभव शामिल है। प्रशिक्षण के बाद टूलकिट निःशुल्क दी जाती है। आधिकारिक तौर पर प्रक्रिया पारदर्शी बताई जाती है। फिर भी अंबेडकर नगर में यह आशंका जताई जा रही है कि कुछ अधिकारी या कर्मचारी दलालों के जरिए लाभ पहुँचा रहे होंगे। अगर यह सच है, तो पात्र गरीब कारीगर और महिलाएं योजना के वास्तविक लाभ से वंचित रह सकते हैं।यह मामला सिर्फ अफवाह या कौतूहल का विषय नहीं रहना चाहिए। जिला प्रशासन और उद्योग विभाग को चाहिए कि इस पर त्वरित और निष्पक्ष जांच करे। दलालों की भूमिका साबित होने पर सख्त कार्रवाई हो, और अगर अधिकारी संलिप्त पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ भी उचित कदम उठाए जाएं। ट्रेनिंग छोड़ने पर शुल्क वसूलने की प्रथा की भी जांच होनी चाहिए। साथ ही लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक की जाए और शिकायत तंत्र को मजबूत किया जाए, ताकि बिना किसी बिचौलिये के पात्र लोग आसानी से लाभ ले सकें।विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना कारीगरों को सशक्त बनाने का अच्छा माध्यम है। लेकिन अगर इसमें दलाल, अतिरिक्त शुल्क और भ्रष्टाचार घुस गए तो इसका उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। अंबेडकर नगर के लोग अब जवाब चाहते हैं—क्या बिना दलाल पकड़े और बिना अतिरिक्त शुल्क दिए योजना का लाभ मिलना सच में संभव है, या सिस्टम में कहीं गड़बड़ी है? प्रशासन को इन सवालों का संतोषजनक जवाब देना चाहिए, ताकि योजना का फायदा सही हकदारों तक पहुँचे। *विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना: सिलाई मशीन वितरण में दलालों की भूमिका और ट्रेनिंग शुल्क के सवाल* अंबेडकर नगर। उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना के तहत पारंपरिक कारीगरों और महिलाओं को सिलाई मशीन समेत टूलकिट वितरित किए जा रहे हैं। योजना का मकसद कारीगरों को कौशल प्रशिक्षण, मानदेय और आधुनिक उपकरण देकर आत्मनिर्भर बनाना है। लेकिन जनपद में हालिया वितरण के बाद एक गंभीर सवाल पूरे परिसर में कौतूहल और चर्चा का विषय बन गया है—क्या योजना का लाभ बिना दलालों के पकड़े संभव है, या इसमें विभाग के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की संलिप्तता है?स्थानीय लोगों और कुछ लाभार्थियों के बीच यह बात आम चर्चा में है कि सिलाई मशीन पाने के लिए कई जगहों पर दलाल सक्रिय रहे। आरोप है कि सही पात्रता रखने वाले लोग भी दलालों के माध्यम से ही आवेदन या चयन प्रक्रिया में आगे बढ़ पाए, जबकि सीधे विभाग से संपर्क करने वाले कई उम्मीदवारों को अड़चनें आईं। मीडिया के कैमरे और स्थानीय चर्चाओं में यह मुद्दा काफी हद तक दब गया, लेकिन जमीनी स्तर पर यह सवाल जिंदा है कि योजना के लाभ को पारदर्शी तरीके से आम आदमी तक पहुँचाने में दलालों की अहम भूमिका क्यों रही?जानकारी के अनुसार एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। योजना में 10 दिवसीय निःशुल्क प्रशिक्षण अनिवार्य बताया जाता है, जिसके बाद ही टूलकिट (सिलाई मशीन) दी जाती है। लेकिन स्थानीय स्तर पर यह जानकारी मिली है कि अगर कोई व्यक्ति ट्रेनिंग नहीं करना चाहता, तो उसे ट्रेनिंग सेंटर द्वारा तय किया गया अलग से शुल्क देना पड़ता है। यह शुल्क ट्रेनिंग सेंटर स्वयं निर्धारित करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आधिकारिक रूप से मुफ्त बताई गई योजना में यह अतिरिक्त शुल्क कैसे और किसके निर्देश पर वसूला जा रहा है? क्या यह भी दलालों या संबंधित अधिकारियों के सहयोग से चलने वाला अनौपचारिक सिस्टम है?योजना के प्रावधानों के अनुसार आवेदन ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से किए जाते हैं। पात्रता में उत्तर प्रदेश का निवासी होना, न्यूनतम आयु 18 वर्ष और संबंधित ट्रेड (जैसे दर्जी/सिलाई) में अनुभव शामिल है। प्रशिक्षण के बाद टूलकिट निःशुल्क दी जाती है। आधिकारिक तौर पर प्रक्रिया पारदर्शी बताई जाती है। फिर भी अंबेडकर नगर में यह आशंका जताई जा रही है कि कुछ अधिकारी या कर्मचारी दलालों के जरिए लाभ पहुँचा रहे होंगे। अगर यह सच है, तो पात्र गरीब कारीगर और महिलाएं योजना के वास्तविक लाभ से वंचित रह सकते हैं।यह मामला सिर्फ अफवाह या कौतूहल का विषय नहीं रहना चाहिए। जिला प्रशासन और उद्योग विभाग को चाहिए कि इस पर त्वरित और निष्पक्ष जांच करे। दलालों की भूमिका साबित होने पर सख्त कार्रवाई हो, और अगर अधिकारी संलिप्त पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ भी उचित कदम उठाए जाएं। ट्रेनिंग छोड़ने पर शुल्क वसूलने की प्रथा की भी जांच होनी चाहिए। साथ ही लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक की जाए और शिकायत तंत्र को मजबूत किया जाए, ताकि बिना किसी बिचौलिये के पात्र लोग आसानी से लाभ ले सकें।विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना कारीगरों को सशक्त बनाने का अच्छा माध्यम है। लेकिन अगर इसमें दलाल, अतिरिक्त शुल्क और भ्रष्टाचार घुस गए तो इसका उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। अंबेडकर नगर के लोग अब जवाब चाहते हैं—क्या बिना दलाल पकड़े और बिना अतिरिक्त शुल्क दिए योजना का लाभ मिलना सच में संभव है, या सिस्टम में कहीं गड़बड़ी है? प्रशासन को इन सवालों का संतोषजनक जवाब देना चाहिए, ताकि योजना का फायदा सही हकदारों तक पहुँचे।
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- *विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना: सिलाई मशीन वितरण में दलालों की भूमिका और ट्रेनिंग शुल्क के सवाल* अंबेडकर नगर। उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना के तहत पारंपरिक कारीगरों और महिलाओं को सिलाई मशीन समेत टूलकिट वितरित किए जा रहे हैं। योजना का मकसद कारीगरों को कौशल प्रशिक्षण, मानदेय और आधुनिक उपकरण देकर आत्मनिर्भर बनाना है। लेकिन जनपद में हालिया वितरण के बाद एक गंभीर सवाल पूरे परिसर में कौतूहल और चर्चा का विषय बन गया है—क्या योजना का लाभ बिना दलालों के पकड़े संभव है, या इसमें विभाग के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की संलिप्तता है?स्थानीय लोगों और कुछ लाभार्थियों के बीच यह बात आम चर्चा में है कि सिलाई मशीन पाने के लिए कई जगहों पर दलाल सक्रिय रहे। आरोप है कि सही पात्रता रखने वाले लोग भी दलालों के माध्यम से ही आवेदन या चयन प्रक्रिया में आगे बढ़ पाए, जबकि सीधे विभाग से संपर्क करने वाले कई उम्मीदवारों को अड़चनें आईं। मीडिया के कैमरे और स्थानीय चर्चाओं में यह मुद्दा काफी हद तक दब गया, लेकिन जमीनी स्तर पर यह सवाल जिंदा है कि योजना के लाभ को पारदर्शी तरीके से आम आदमी तक पहुँचाने में दलालों की अहम भूमिका क्यों रही?जानकारी के अनुसार एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। योजना में 10 दिवसीय निःशुल्क प्रशिक्षण अनिवार्य बताया जाता है, जिसके बाद ही टूलकिट (सिलाई मशीन) दी जाती है। लेकिन स्थानीय स्तर पर यह जानकारी मिली है कि अगर कोई व्यक्ति ट्रेनिंग नहीं करना चाहता, तो उसे ट्रेनिंग सेंटर द्वारा तय किया गया अलग से शुल्क देना पड़ता है। यह शुल्क ट्रेनिंग सेंटर स्वयं निर्धारित करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आधिकारिक रूप से मुफ्त बताई गई योजना में यह अतिरिक्त शुल्क कैसे और किसके निर्देश पर वसूला जा रहा है? क्या यह भी दलालों या संबंधित अधिकारियों के सहयोग से चलने वाला अनौपचारिक सिस्टम है?योजना के प्रावधानों के अनुसार आवेदन ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से किए जाते हैं। पात्रता में उत्तर प्रदेश का निवासी होना, न्यूनतम आयु 18 वर्ष और संबंधित ट्रेड (जैसे दर्जी/सिलाई) में अनुभव शामिल है। प्रशिक्षण के बाद टूलकिट निःशुल्क दी जाती है। आधिकारिक तौर पर प्रक्रिया पारदर्शी बताई जाती है। फिर भी अंबेडकर नगर में यह आशंका जताई जा रही है कि कुछ अधिकारी या कर्मचारी दलालों के जरिए लाभ पहुँचा रहे होंगे। अगर यह सच है, तो पात्र गरीब कारीगर और महिलाएं योजना के वास्तविक लाभ से वंचित रह सकते हैं।यह मामला सिर्फ अफवाह या कौतूहल का विषय नहीं रहना चाहिए। जिला प्रशासन और उद्योग विभाग को चाहिए कि इस पर त्वरित और निष्पक्ष जांच करे। दलालों की भूमिका साबित होने पर सख्त कार्रवाई हो, और अगर अधिकारी संलिप्त पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ भी उचित कदम उठाए जाएं। ट्रेनिंग छोड़ने पर शुल्क वसूलने की प्रथा की भी जांच होनी चाहिए। साथ ही लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक की जाए और शिकायत तंत्र को मजबूत किया जाए, ताकि बिना किसी बिचौलिये के पात्र लोग आसानी से लाभ ले सकें।विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना कारीगरों को सशक्त बनाने का अच्छा माध्यम है। लेकिन अगर इसमें दलाल, अतिरिक्त शुल्क और भ्रष्टाचार घुस गए तो इसका उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। अंबेडकर नगर के लोग अब जवाब चाहते हैं—क्या बिना दलाल पकड़े और बिना अतिरिक्त शुल्क दिए योजना का लाभ मिलना सच में संभव है, या सिस्टम में कहीं गड़बड़ी है? प्रशासन को इन सवालों का संतोषजनक जवाब देना चाहिए, ताकि योजना का फायदा सही हकदारों तक पहुँचे। *विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना: सिलाई मशीन वितरण में दलालों की भूमिका और ट्रेनिंग शुल्क के सवाल* अंबेडकर नगर। उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना के तहत पारंपरिक कारीगरों और महिलाओं को सिलाई मशीन समेत टूलकिट वितरित किए जा रहे हैं। योजना का मकसद कारीगरों को कौशल प्रशिक्षण, मानदेय और आधुनिक उपकरण देकर आत्मनिर्भर बनाना है। लेकिन जनपद में हालिया वितरण के बाद एक गंभीर सवाल पूरे परिसर में कौतूहल और चर्चा का विषय बन गया है—क्या योजना का लाभ बिना दलालों के पकड़े संभव है, या इसमें विभाग के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों की संलिप्तता है?स्थानीय लोगों और कुछ लाभार्थियों के बीच यह बात आम चर्चा में है कि सिलाई मशीन पाने के लिए कई जगहों पर दलाल सक्रिय रहे। आरोप है कि सही पात्रता रखने वाले लोग भी दलालों के माध्यम से ही आवेदन या चयन प्रक्रिया में आगे बढ़ पाए, जबकि सीधे विभाग से संपर्क करने वाले कई उम्मीदवारों को अड़चनें आईं। मीडिया के कैमरे और स्थानीय चर्चाओं में यह मुद्दा काफी हद तक दब गया, लेकिन जमीनी स्तर पर यह सवाल जिंदा है कि योजना के लाभ को पारदर्शी तरीके से आम आदमी तक पहुँचाने में दलालों की अहम भूमिका क्यों रही?जानकारी के अनुसार एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। योजना में 10 दिवसीय निःशुल्क प्रशिक्षण अनिवार्य बताया जाता है, जिसके बाद ही टूलकिट (सिलाई मशीन) दी जाती है। लेकिन स्थानीय स्तर पर यह जानकारी मिली है कि अगर कोई व्यक्ति ट्रेनिंग नहीं करना चाहता, तो उसे ट्रेनिंग सेंटर द्वारा तय किया गया अलग से शुल्क देना पड़ता है। यह शुल्क ट्रेनिंग सेंटर स्वयं निर्धारित करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आधिकारिक रूप से मुफ्त बताई गई योजना में यह अतिरिक्त शुल्क कैसे और किसके निर्देश पर वसूला जा रहा है? क्या यह भी दलालों या संबंधित अधिकारियों के सहयोग से चलने वाला अनौपचारिक सिस्टम है?योजना के प्रावधानों के अनुसार आवेदन ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से किए जाते हैं। पात्रता में उत्तर प्रदेश का निवासी होना, न्यूनतम आयु 18 वर्ष और संबंधित ट्रेड (जैसे दर्जी/सिलाई) में अनुभव शामिल है। प्रशिक्षण के बाद टूलकिट निःशुल्क दी जाती है। आधिकारिक तौर पर प्रक्रिया पारदर्शी बताई जाती है। फिर भी अंबेडकर नगर में यह आशंका जताई जा रही है कि कुछ अधिकारी या कर्मचारी दलालों के जरिए लाभ पहुँचा रहे होंगे। अगर यह सच है, तो पात्र गरीब कारीगर और महिलाएं योजना के वास्तविक लाभ से वंचित रह सकते हैं।यह मामला सिर्फ अफवाह या कौतूहल का विषय नहीं रहना चाहिए। जिला प्रशासन और उद्योग विभाग को चाहिए कि इस पर त्वरित और निष्पक्ष जांच करे। दलालों की भूमिका साबित होने पर सख्त कार्रवाई हो, और अगर अधिकारी संलिप्त पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ भी उचित कदम उठाए जाएं। ट्रेनिंग छोड़ने पर शुल्क वसूलने की प्रथा की भी जांच होनी चाहिए। साथ ही लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक की जाए और शिकायत तंत्र को मजबूत किया जाए, ताकि बिना किसी बिचौलिये के पात्र लोग आसानी से लाभ ले सकें।विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना कारीगरों को सशक्त बनाने का अच्छा माध्यम है। लेकिन अगर इसमें दलाल, अतिरिक्त शुल्क और भ्रष्टाचार घुस गए तो इसका उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। अंबेडकर नगर के लोग अब जवाब चाहते हैं—क्या बिना दलाल पकड़े और बिना अतिरिक्त शुल्क दिए योजना का लाभ मिलना सच में संभव है, या सिस्टम में कहीं गड़बड़ी है? प्रशासन को इन सवालों का संतोषजनक जवाब देना चाहिए, ताकि योजना का फायदा सही हकदारों तक पहुँचे।1
- बुलडोजर का स्टेयरिंग अब भूमाफियाओं के हाथ -जबर्दस्त तांडव.. गरीबों पर बरपाया कहर -कई घर जमीदोंज अंबेडकर नगर के अकबरपुर थाना कोतवाली क्षेत्र अंतर्गत बरियावन बाजार में बीती रात कुछ भूमाफियाओं ने तीन जेसीबी के साथ आधा दर्जन से अधिक घरों को उजाड़ दिया । मौके पर पुलिस पहुंच चुकी है कार्रवाई जारी है ।1
- पंचायत में उठीं किसानों की समस्याएं, सीओ-एसडीएम ने सुना पक्ष शीघ्र समाधान का दिया आश्वासन भारतीय किसान यूनियन राष्ट्रवादी की ओर से सोमवार को तहसील जयसिंहपुर के बगल बाग में किसानों की पंचायत आयोजित की गई। पंचायत की अध्यक्षता जिला उपाध्यक्ष राज नारायण तिवारी ने की। पूर्व सूचना के बावजूद संबंधित विभागों के अधिकारियों और उपजिलाधिकारी के पंचायत में उपस्थित नहीं होने से किसान नाराज हो गए। आक्रोशित किसानों ने नारेबाजी करते हुए उपजिलाधिकारी कार्यालय का घेराव कर दिया। किसानों के आक्रोश की जानकारी मिलने पर उपजिलाधिकारी संदीप कुमार यादव किसानों के बीच पहुंचे। उन्होंने कहा कि उन्हें पंचायत की जानकारी नहीं थी। उन्होंने तत्काल संबंधित विभागों के अधिकारियों को बुलाकर किसानों की समस्याओं पर वार्ता कराने का आश्वासन दिया। इसके करीब 10 मिनट बाद उपजिलाधिकारी संदीप कुमार यादव, तहसीलदार मयंक मिश्रा, क्षेत्राधिकारी सुनील कुमार सिंह, विद्युत विभाग के अधिशासी अभियंता और खंड विकास अधिकारी जयसिंहपुर एसएन चतुर्वेदी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने किसानों की समस्याओं को बिंदुवार सुना और उनके निस्तारण को लेकर विस्तार से चर्चा की। किसानों ने क्षेत्राधिकारी सुनील कुमार सिंह और उपजिलाधिकारी संदीप कुमार यादव को विभिन्न समस्याओं से अवगत कराते हुए अपना मांगपत्र सौंपा। अधिकारियों ने किसानों को उनकी समस्याओं के शीघ्र निस्तारण का आश्वासन दिया। इसके बाद किसानों का आक्रोश शांत हुआ। बाबा संदीप श्रीवास्तव बने तहसील अध्यक्ष, कृष्णा वर्मा को मिली सचिव की जिम्मेदारी पंचायत के दौरान संगठनात्मक स्तर पर भी महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। जिला अध्यक्ष गौरी शंकर पांडे की मौजूदगी में सर्वसम्मति से बाबा संदीप श्रीवास्तव को तहसील अध्यक्ष जयसिंहपुर और कृष्णा वर्मा को तहसील सचिव मनोनीत किया गया। इस दौरान प्रदेश महासचिव रामकृपाल सिंह, जिला अध्यक्ष गौरी शंकर पांडे, जिला उपाध्यक्ष राज नारायण तिवारी व रमेश चंद्र दुबे, अरविंद चतुर्वेदी, तहसील प्रभारी कादीपुर कमालुद्दीन, तहसील उपाध्यक्ष लंभुआ अरविंद उपाध्याय, मोतिगरपुर ब्लॉक अध्यक्ष राम सुरेश यादव, सनी यादव, विशाल धुरिया, यशोदा, पिंकी दुबे, ए. गौतम पांडे, महेंद्र यादव, रामकिशन, बंसराज मौर्य, बड़े मिश्रा, सियाराम विश्वकर्मा, कृष्ण यादव, राजेश तिवारी सहित सैकड़ों पदाधिकारी और कार्यकर्ता मौजूद रहे।1
- पुराने केसीसी ऋण के बीच नया ऋण दर्ज होने से वृद्ध किसान ने उठाए सवाल, डीएम से जांच की घर पहुंचे बैंक अधिकारी, मोबाइल कब्जे में लेकर हस्ताक्षर कराने का आरोप पुराने केसीसी ऋण के बीच नया ऋण दर्ज होने से वृद्ध किसान ने उठाए सवाल, डीएम से जांच की मांग आलापुर (अंबेडकरनगर)। बैंक ऋण की वसूली के लिए ग्राहक के घर पहुंचना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यदि घर पर ही दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराकर नया ऋण दर्ज किए जाने का आरोप लगे और संबंधित ग्राहक को ऋण की पूरी जानकारी तक न दी जाए, तो मामला गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसा ही मामला रामनगर विकासखंड के अरमा गांव निवासी वृद्ध किसान प्रेम प्रकाश पांडे से जुड़ा सामने आया है। उन्होंने यूपी ग्रामीण बैंक ऑफ बड़ौदा की हुसेनपुर खुर्द शाखा के अधिकारियों पर घर पहुंचकर कथित रूप से दबाव बनाने, मोबाइल फोन अपने पास रखने और दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराने के बाद उनके नाम पर नया ऋण दर्ज किए जाने का आरोप लगाया है। किसान ने जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र देकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। साथ ही सीपी ग्राम पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज कराई है, जिसका पंजीकरण नंबर GOVUP/E/2026/0121998 है। प्रार्थना पत्र के मुताबिक, प्रेम प्रकाश पांडे का उक्त बैंक शाखा में वर्ष 2017 से किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) ऋण चल रहा है। ऋण खाते की संख्या 58220500000312 बताई गई है। आर्थिक कठिनाइयों के कारण वह पुराने ऋण की समय से अदायगी नहीं कर पा रहे थे। इसी बीच 18 सितंबर 2026 को शाखा प्रबंधक करीब तीन व्यक्तियों के साथ उनके घर पहुंचे। शिकायतकर्ता के अनुसार, साथ आए एक व्यक्ति को बैंक का डीसी/अधिकारी बताते हुए उसका नाम सर्वेश मिश्रा बताया गया। रिश्तेदार को फोन करने की कोशिश पर मोबाइल रखने का आरोप शिकायतकर्ता का आरोप है कि घर पर बैंक अधिकारियों से बातचीत के दौरान उन्होंने अपने रिश्तेदार से फोन पर संपर्क कर मामले की जानकारी देने का प्रयास किया। इसी दौरान कथित रूप से उनका मोबाइल फोन अपने पास रख लिया गया। उनका कहना है कि वह वृद्ध अवस्था में हैं और उस समय घर पर उनकी पत्नी के अलावा परिवार का कोई अन्य सदस्य मौजूद नहीं था। आरोप है कि ऐसी परिस्थितियां पैदा की गईं, जिनमें उन्हें कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने पड़े। यहीं से पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है कि यदि नया ऋण सामान्य बैंकिंग प्रक्रिया के तहत स्वीकृत किया गया था तो उसके आवेदन, शर्तों और दस्तावेजों की जानकारी ग्राहक को स्पष्ट रूप से क्यों नहीं दी गई? शिकायतकर्ता का कहना है कि उसे घर पर हस्ताक्षर कराए जाने के समय यह स्पष्ट नहीं बताया गया कि किन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर लिए जा रहे हैं और उनके नाम पर नया ऋण किस प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है। पुराने ऋण में रकम समायोजित करने की बताई गई बात प्रेम प्रकाश पांडे के अनुसार, हस्ताक्षर कराने के बाद उन्हें बताया गया कि उनके नाम पर एक और ऋण किया जा रहा है और उसकी धनराशि पुराने ऋण खाते में जमा कर दी जाएगी। हालांकि, उन्हें नए ऋण की पूरी जानकारी, ऋण खाता संख्या और संबंधित दस्तावेजों की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। अगले दिन 19 सितंबर को जब वह बैंक में ऋण की किस्त जमा करने पहुंचे तो उन्हें अपने नाम पर एक अन्य ऋण स्वीकृत/दर्ज होने की जानकारी हुई। इसके बाद उन्होंने नए ऋण की खाता संख्या और उससे संबंधित दस्तावेजों की जानकारी मांगी, लेकिन शिकायत के मुताबिक उन्हें स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। बैंक परिसर में नहीं, घर पर दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराने का दावा शिकायतकर्ता ने अपने प्रार्थना पत्र में एक अहम बिंदु उठाया है। उनका कहना है कि नए ऋण से संबंधित दस्तावेजों पर उन्होंने बैंक शाखा में जाकर हस्ताक्षर नहीं किए, बल्कि उनके घर पर ही हस्ताक्षर कराए गए। ऐसे में वह जानना चाहते हैं कि उनके नाम पर नया ऋण किस आवेदन के आधार पर स्वीकृत हुआ, किस अधिकारी ने उसे मंजूरी दी, ऋण की रकम कितनी थी और उसे पुराने ऋण खाते में किस आधार पर समायोजित किया गया। उन्होंने जिलाधिकारी से नए ऋण से संबंधित आवेदन पत्र, ऋण खाता संख्या, केवाईसी दस्तावेज, स्वीकृति पत्र, भुगतान/समायोजन विवरण तथा उनके हस्ताक्षर वाले सभी दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने की मांग की है। सीसीटीवी और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच की मांग मामले में शिकायतकर्ता ने बैंक के अभिलेखों के साथ डिजिटल रिकॉर्ड की जांच की मांग भी की है। उनका कहना है कि यदि बैंक परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों में संबंधित समय की रिकॉर्डिंग उपलब्ध है तो उसे सुरक्षित कराकर जांच में शामिल किया जाए। इसके अलावा ऋण स्वीकृति से संबंधित बैंक के डिजिटल रिकॉर्ड की भी जांच की जाए, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि आवेदन कब तैयार हुआ, किस स्तर से स्वीकृत हुआ और रकम किस खाते में तथा किस उद्देश्य से स्थानांतरित या समायोजित की गई। मोबाइल फोन रखने के आरोप की भी जांच की मांग प्रेम प्रकाश पांडे ने घर पर हस्ताक्षर कराने की परिस्थितियों के साथ ही अपना मोबाइल फोन बैंक अधिकारियों द्वारा अपने पास रखे जाने के आरोप की भी जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जांच में दबाव, अनुचित प्रभाव अथवा किसी अन्य अनियमित तरीके से हस्ताक्षर कराकर ऋण संबंधी कार्रवाई किए जाने की पुष्टि होती है तो संबंधित अधिकारियों और व्यक्तियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए। उन्होंने यह भी मांग की है कि जांच पूरी होने तक विवादित नए ऋण के संबंध में जबरन वसूली या किसी प्रकार की प्रतिकूल कार्रवाई न की जाए। फिलहाल शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। बैंक अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी। हालांकि, एक वृद्ध किसान के नाम पर पुराने ऋण के बीच नया ऋण दर्ज होने और उसके दस्तावेजों पर घर पर हस्ताक्षर कराए जाने के आरोप ने बैंकिंग प्रक्रिया और ग्राहक की सहमति से जुड़े सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह है कि प्रशासनिक जांच में दस्तावेज और बैंक रिकॉर्ड क्या तस्वीर सामने लाते हैं।1
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