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कुशलगढ़ जिला बांसवाड़ा राजस्थान रिपोर्टर धर्मेन्द्र कुमार सोनी मोहकमपुरा में जलती होली देखने उमड़ा जनसैलाब राजस्थान के बांसवाड़ा जिले सहित ग्रामीण अंचलों में रिति रिवाज संस्कृति अध्यात्म के साथ हुआं होलीका का दहन बांसवाड़ा जिले के कुशलगढ़ उप खंड क्षेत्र के खेड़ा धरती घाटा क्षेत्र के मध्यप्रदेश की सिमा से सटे बड़ी सरवा, पाटन,छोटी सरवा व मोहकमपुरा में होलीका दहन को देखने जन सैलाव उमड़ा इतना ही नहीं मोहकमपुरा में जब होलीका दहन हो रहा था तब गांव के लोग फागुन के गीत गाते हुए इस पवित्र त्योहार को मना कर खुशी का इजहार कर रहे थे
Dharmendra Soni
कुशलगढ़ जिला बांसवाड़ा राजस्थान रिपोर्टर धर्मेन्द्र कुमार सोनी मोहकमपुरा में जलती होली देखने उमड़ा जनसैलाब राजस्थान के बांसवाड़ा जिले सहित ग्रामीण अंचलों में रिति रिवाज संस्कृति अध्यात्म के साथ हुआं होलीका का दहन बांसवाड़ा जिले के कुशलगढ़ उप खंड क्षेत्र के खेड़ा धरती घाटा क्षेत्र के मध्यप्रदेश की सिमा से सटे बड़ी सरवा, पाटन,छोटी सरवा व मोहकमपुरा में होलीका दहन को देखने जन सैलाव उमड़ा इतना ही नहीं मोहकमपुरा में जब होलीका दहन हो रहा था तब गांव के लोग फागुन के गीत गाते हुए इस पवित्र त्योहार को मना कर खुशी का इजहार कर रहे थे
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- कुशलगढ़ जिला बांसवाड़ा राजस्थान रिपोर्टर धर्मेन्द्र कुमार सोनी मोहकमपुरा में जलती होली देखने उमड़ा जनसैलाब राजस्थान के बांसवाड़ा जिले सहित ग्रामीण अंचलों में रिति रिवाज संस्कृति अध्यात्म के साथ हुआं होलीका का दहन बांसवाड़ा जिले के कुशलगढ़ उप खंड क्षेत्र के खेड़ा धरती घाटा क्षेत्र के मध्यप्रदेश की सिमा से सटे बड़ी सरवा, पाटन,छोटी सरवा व मोहकमपुरा में होलीका दहन को देखने जन सैलाव उमड़ा इतना ही नहीं मोहकमपुरा में जब होलीका दहन हो रहा था तब गांव के लोग फागुन के गीत गाते हुए इस पवित्र त्योहार को मना कर खुशी का इजहार कर रहे थे1
- बांसवाड़ा जिले के बोडीगामा कस्बे में होली पर इस बार अनूठा और उत्साहपूर्ण माहौल देखने को मिला। ग्राम पंचायत बोडीगामा के गौड़ बंजारा समाज के पुरुषों ने पारंपरिक होली गीत गाते हुए शानदार लोकनृत्य प्रस्तुत किया। फागण गीतों की मधुर गूंज के साथ समाजजनों ने वर्षों पुरानी परंपरा का निर्वहन किया। रंग, उमंग और लोक संस्कृति से सराबोर यह आयोजन बड़ी धूमधाम और उल्लास के साथ संपन्न हुआ।1
- यह हेडफोन की हालत क्या हुई है कोई यात्री वाहन वाले पानी पीने के लिए तरसते हैं परेशान हो रहे हैं माही वालों ने यह क्या किया है रहती काफी डाल दी है तुमको काफी ज्यादा लोग परेशान है पूरा हेडफोन तोड़ दिया है1
- *विनय पंचाल, पिटोल।* देशभर में होली के रंग फीके पड़ते ही झाबुआ के आदिवासी अंचल में आस्था की एक अनोखी परंपरा जीवंत हो उठती है। धुलेंडी के दिन भील समुदाय सदियों पुरानी गल परंपरा का निर्वाह करता है। इस परंपरा के तहत मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु 20 से 30 फीट ऊंचे खंभे से बंधकर हवा में परिक्रमा करते हैं। गांव के किसी प्रमुख स्थान पर एक ऊंचा लकड़ी का खंभा स्थापित किया जाता है। खंभे के नीचे विधि-विधान से पूजन-पाठ किया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इसी स्थान को “गल” कहा जाता है और यहां गल देवता की पूजा की जाती है। श्रद्धालु पहले पूजा-अर्चना कर देवता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, इसके बाद अनुष्ठान की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। खंभे के शीर्ष पर आड़ी लकड़ी या बांस बांधा जाता है। जिस व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण होती है, वह “मन्नतधारी” कहलाता है—स्थानीय बोली में उसे “लाड़ा” कहा जाता है। रस्सियों और कपड़ों की सहायता से लाड़ा को सुरक्षित रूप से उल्टा लटकाकर बांधा जाता है। नीचे खड़े लोग संरचना को घुमाते हैं, जिससे लाड़ा लगभग 30 फीट की ऊंचाई पर हवा में गोल-गोल परिक्रमा करता है। उल्टे लटककर किया जाने वाला यह अनुष्ठान पूरे गांव के लिए आस्था, साहस और वचन-पालन का चरम दृश्य बन जाता है। *मन्नत और बलि की परंपरा* आदिवासी समाज में गल देवता से संतान प्राप्ति, परिवार के स्वास्थ्य, बीमारी से मुक्ति, जमीन-जायदाद के विवाद या अन्य कठिनाइयों से राहत के लिए मन्नत ली जाती है। श्रद्धालु संकल्प लेते हैं कि इच्छा पूर्ण होने पर वे गल पर घूमकर सार्वजनिक रूप से देवता का आभार व्यक्त करेंगे। परंपरा के अनुसार प्रत्येक मन्नतधारी अपने साथ एक बकरा लेकर आता है। गल परिक्रमा पूर्ण होने के बाद बकरे की बलि दी जाती है, जिसे मन्नत-पूर्ति और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। *भगोरिया से गल तक: सात दिन की साधना* गल अनुष्ठान की तैयारी होली से एक सप्ताह पूर्व प्रारंभ होती है। इसी दौरान झाबुआ जिले में पारंपरिक भगोरिया मेले आयोजित होते हैं। कई मन्नतधारी इन सात दिनों में विभिन्न भगोरिया मेलों में शामिल होते हैं और व्रत व अनुशासन का पालन करते हैं। इसे उनकी आध्यात्मिक साधना का हिस्सा माना जाता है। इन सात दिनों के दौरान मन्नतधारी एक समय भोजन करते हैं, शरीर पर हल्दी का लेप लगाते हैं, लाल वस्त्र और पगड़ी धारण करते हैं तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए धार्मिक अनुशासन का कड़ाई से निर्वाह करते हैं। धुलेंडी के दिन उन्हें दूल्हे की तरह हल्दी लगाई जाती है। *ढोल-मांदल की थाप और मेले का उत्सव* अनुष्ठान के दिन लाड़ा परिवारजनों और इष्ट-मित्रों के साथ जुलूस के रूप में गल स्थल तक पहुंचता है। ढोल-मांदल की थाप, नृत्य और जयकारों के बीच पूरा वातावरण उत्सव में बदल जाता है। पिटोल क्षेत्र इस परंपरा का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहां दो दर्जन से अधिक आसपास के छोटे-बड़े गांवों के लोग एक स्थान पर एकत्रित होते हैं। इस अवसर पर मेले जैसा दृश्य बन जाता है—दुकानें सजती हैं, झूले और चकरी लगती हैं, और बड़ी संख्या में लोग इस अनुष्ठान को देखने के लिए पहुंचते हैं। झाबुआ के आदिवासी समाज के लिए गल केवल एक रस्म नहीं—यह परंपरा, पहचान और सामुदायिक विश्वास का जीवंत प्रतीक है। धुलेंडी के दिन जब ‘लाड़ा’ 30 फीट ऊपर उल्टा लटककर हवा में परिक्रमा करता है, तब आस्था सचमुच आसमान को छूती दिखाई देती है।1
- सभी जिम्मेदार व्यक्ति (अधिकारीयो) को समस्या की सूचना देने के बावजूद भी कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है ऐसी स्थिति में ग्रामीण जनों को आने जाने में बहुत दिक्कत परेशानियां आ रही है4
- Post by Mukesh1
- ग्राम सालमगढ मे होलिका दहन बडे धूमधाम से किया गया बस स्टैंड पिपलीचोक पर विधि-विधान पूर्वक होलिका कि पूजन कर होलिका दहन किया गया उसके बाद होलिका कि महिलाओं व पुरुषों व बच्चों द्वारा परिक्रमा लगाई गई1
- कुशलगढ़ में ठेकेदार संगठन की महत्वपूर्ण बैठक सेठिया आवास पर आयोजित हुई, जिसमें निर्माण कार्यों में एम-सेंट (M-Sand) के उपयोग को लेकर उत्पन्न स्थिति पर गंभीर चर्चा की गई। ठेकेदारों ने बताया कि राज्य एवं केंद्र सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण के तहत एम-सेंट के उपयोग के स्पष्ट निर्देश हैं, फिर भी स्थानीय सार्वजनिक निर्माण विभाग के कुछ अधिकारियों द्वारा आपत्ति जताई जा रही है, जिससे असंतोष का माहौल है। सचिव राहुल भटेवरा ने कहा कि सरकार आधुनिक तकनीक को बढ़ावा दे रही है, लेकिन स्थानीय स्तर पर विरोधाभासी निर्देशों से परेशानी हो रही है। संगठन मंत्री विजय सिंह खड़िया ने एम-सेंट को समय की आवश्यकता बताते हुए अधिकारियों से सकारात्मक निर्णय की मांग की। वरिष्ठ ठेकेदार नारायण लाल शर्मा ने आर्थिक व मानसिक नुकसान पर चिंता जताई। बैठक के बाद प्रतिनिधिमंडल अध्यक्ष करणी सिंह राठौड़ से मिला। करणी सिंह राठौड़ ने अधिशासी अभियंता से वार्ता कर शीघ्र समाधान का आश्वासन दिया। इस दौरान राजू भाई प्रजापत, कल सिंह डामोर, मनोज सेठ, हितेश नायक, जितेंद्र राठौड़, ललित गोलेछा, नारायण लाल शर्मा, राहुल भटेवरा एवं विजय सिंह खड़िया सहित कई सदस्य उपस्थित रहे। सभी ने समाधान तक एकजुट संघर्ष का संकल्प लिया।1