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महाशिवरात्रि पर बांका के शिवालयों में उमड़ा आस्था का सैलाब, दिनभर गूंजता रहा हर- बिहार बांका) जिला में महाशिवरात्रि को लेकर विभिन्न शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। सुबह से ही भक्तों की लंबी कतार लगी रही। जलाभिषेक व पूजा-अर्चना के साथ पूरा माहौल भक्तिमय बना रहा। सुरक्षा व्यवस्था के बीच श्रद्धालुओं ने शांतिपूर्वक दर्शन किया। #वीडियोシ゚viralシfypシ゚viralシalシfollowers #BiharNews
Banka Today News
महाशिवरात्रि पर बांका के शिवालयों में उमड़ा आस्था का सैलाब, दिनभर गूंजता रहा हर- बिहार बांका) जिला में महाशिवरात्रि को लेकर विभिन्न शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। सुबह से ही भक्तों की लंबी कतार लगी रही। जलाभिषेक व पूजा-अर्चना के साथ पूरा माहौल भक्तिमय बना रहा। सुरक्षा व्यवस्था के बीच श्रद्धालुओं ने शांतिपूर्वक दर्शन किया। #वीडियोシ゚viralシfypシ゚viralシalシfollowers #BiharNews
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- गोड्डा, झारखंड में सियासत की नई इबारत, जो अखबार बांटते थे, वही साइकिल पर सवार होकर बने बदलाव की सबसे बड़ी सुर्खी !झारखंड की माटी में जब सियासत का बीज बोया जाता है, तो अक्सर उम्मीद की जाती है कि उसे सींचने के लिए नोटों की बारिश होगी, रसूख का खाद डलेगा और सफेद लग्जरी गाड़ियों का एक ऐसा अभेद्य किला खड़ा होगा जिसके भीतर झांकना भी आम आदमी के बस की बात नहीं होगी। हमारे इस राज्य में राजनीति का 'नेट' कुछ ऐसा बुना गया है कि यहाँ नेता वही कहलाता है जिसकी एक दहाड़ पर हूटर बजाती गाड़ियों का काफिला सड़कों की धूल उड़ा दे और जिसके रसूख की चमक देखकर गरीब अपनी आंखें चुराने पर मजबूर हो जाए। अमूमन माना यह जाता है कि जिसके पास पैसा है, रसूख है और बंद शीशों वाली बड़ी गाड़ियाँ हैं, वही सत्ता के सिंहासन का असली हकदार है, लेकिन गोड्डा जिले के महागामा नगर पंचायत में इस बार लोकतंत्र ने एक ऐसी करवट ली है कि इन तमाम 'हवा-हवाई' रसूखदारों के चश्मे का नंबर ही बदल गया है। यहाँ की फिजाओं में इन दिनों एक ऐसी संवेदनशील और दिल को छू लेने वाली खबर तैर रही है जो उन सफेदपोशों पर सबसे करारा व्यंग्य है जो राजनीति को अपनी जागीर समझते हैं। महागामा नगर पंचायत में पहली बार चुनाव होने जा रहा है और इस चुनावी समर में एक ऐसा चेहरा उभरा है जिसने रसूख के 'वीआईपी कल्चर' की हवा निकाल दी है। मिलिए दुर्गा सोरेन से, जो भूगोल शास्त्र में एम.ए. (MA) की डिग्री हाथ में लिए पिछले 20 सालों से महागामा की गलियों में अपनी पुरानी साइकिल की घंटी बजाकर 'अखबार' बांटने का काम कर रहे हैं। यह कितनी बड़ी विडंबना और व्यवस्था पर तीखा कटाक्ष है कि जो शख्स दो दशकों से लोगों की चौखट पर दुनिया भर की खबरें और बड़े-बड़े नेताओं के भाषण पहुंचाता था, आज वह खुद झारखंड की सबसे बड़ी 'सुर्खी' बन गया है। जब बड़े-बड़े प्रत्याशी अपने नामांकन के लिए गाड़ियों के लंबे रेले और धनबल का प्रदर्शन कर रहे थे, तब दुर्गा सोरेन ने अपनी उसी जर्जर साइकिल पर सवार होकर नामांकन कार्यालय पहुंचकर साबित कर दिया कि जनसेवा के लिए बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि जमीन से जुड़ाव चाहिए। उनके पीछे उमड़ा सैकड़ों समर्थकों का हुजूम किसी लालच या 'पेट्रोल-मुर्गा' के दम पर नहीं, बल्कि उस सादगी और मृदुभाषी स्वभाव के कारण खड़ा था जिसने महागामा के हर घर में अपनी जगह बनाई है। संवेदनशील पहलू यह है कि एम.ए. पास होने के बावजूद दुर्गा ने श्रम को छोटा नहीं समझा और आज भी हर सुबह 5 बजे उठकर तकरीबन 300 घरों में अखबार बांटते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि शहर की असली समस्याएं एसी कमरों में नहीं, बल्कि उन कीचड़ भरी गलियों में छिपी हैं जहाँ से उनकी साइकिल रोज गुजरती है। जिस दिन उन्होंने अपने ही बांटे हुए अखबार में पढ़ा कि महागामा की सीट एसटी (ST) के लिए आरक्षित हुई है, उसी दिन इस शिक्षित युवा ने ठान लिया कि अब दूसरों की खबरें बांटने के बजाय खुद अपनी और अपने समाज की बदहाल किस्मत बदलने का समय आ गया है। नक्षत्र न्यूज़ से बातचीत में दुर्गा का वह भोलापन और आत्मविश्वास उन नेताओं के लिए एक चेतावनी है जो समझते हैं कि जनता को केवल झूठे वादों के जाल में फंसाया जा सकता है। दुर्गा सोरेन की यह चुनावी जंग केवल एक पद की लड़ाई नहीं है, बल्कि उन रसूखदारों के खिलाफ एक आम आदमी का शंखनाद है जो विकास के नाम पर केवल अपनी तिजोरियां भरते आए हैं। महागामा की सड़कों पर दुर्गा की साइकिल का हर फेरा उन सफेदपोशों को यह याद दिला रहा है कि लोकतंत्र का असली मालिक वही है जो जनता के सुख-दुख की धूल में सना हुआ है। यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि क्या महागामा के लोग इस बार रसूख के 'पावर गेम' को धता बताकर एक अखबार वाले की सादगी पर अपनी मुहर लगाएंगे, लेकिन फिलहाल तो दुर्गा की इस 'साइकिल क्रांति' ने बड़े-बड़े सूरमाओं का पॉलिटिकल माइलेज पूरी तरह बिगाड़ दिया है।1
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