logo
Shuru
Apke Nagar Ki App…
  • Latest News
  • News
  • Politics
  • Elections
  • Viral
  • Astrology
  • Horoscope in Hindi
  • Horoscope in English
  • Latest Political News
logo
Shuru
Apke Nagar Ki App…

घोषणापत्र बने अब कानून, ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे सरकार जन संवाद की सीधी मांग : चुनावी घोषणापत्र को कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाया जाए—हर वादे का हिसाब हो, समय-सीमा हो और जनता को जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी हो घोषणापत्र अब जुमलों का पुलिंदा नहीं चलेगा। घोषणापत्र अब कानून बनेगा। सरकार ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे घोषणापत्र बने अब कानून, ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे सरकार जन संवाद की सीधी मांग : चुनावी घोषणापत्र को कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाया जाए—हर वादे का हिसाब हो, समय-सीमा हो और जनता को जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी हो घोषणापत्र अब जुमलों का पुलिंदा नहीं चलेगा। घोषणापत्र अब कानून बनेगा। सरकार ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे। लोकतंत्र में जनता अपना वोट केवल भाषणों पर नहीं, राजनीतिक दलों द्वारा किए गए वादों और उनके घोषणापत्र पर भरोसा करके देती है। जब उन्हीं वादों के आधार पर सरकार बनती है तो फिर सत्ता में आने के बाद उन वादों की कोई जवाबदेही क्यों नहीं होनी चाहिए? यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता। चुनाव के समय रोजगार, किसान, युवा, महिला, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और विकास को लेकर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। जनता विश्वास करती है और अपना मत देती है। लेकिन पांच साल बाद जब हिसाब मांगने का समय आता है तो पुराने घोषणापत्र की चर्चा अक्सर गायब हो जाती है और फिर नए वादों की किताब जनता के सामने खोल दी जाती है। यह राजनीतिक सुविधा हो सकती है, लोकतांत्रिक जवाबदेही नहीं। वादे पर वोट मिला है तो हिसाब भी देना होगा हर चुनावी वादा कानूनन पूरा कराना संभव नहीं है। सरकारों के सामने आर्थिक संकट, प्राकृतिक आपदा, न्यायिक निर्णय और संवैधानिक सीमाएं जैसी परिस्थितियां हो सकती हैं। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि घोषणापत्र को पूरी तरह जवाबदेही से मुक्त कर दिया जाए। ‘वादा निभाओ कानून’ में कम से कम यह व्यवस्था होनी चाहिए कि प्रमुख चुनावी वादों के साथ उनकी अनुमानित लागत, वित्तीय स्रोत और समय-सीमा बताना अनिवार्य हो। सरकार बनने के बाद हर वर्ष सार्वजनिक रिपोर्ट जारी हो— कितने वादे पूरे हुए, कितने अधूरे हैं और जो पूरे नहीं हुए, उनके कारण क्या हैं। यही पारदर्शिता राजनीति में भरोसा बढ़ाएगी। झूठे वादों की राजनीति पर लगे लगाम किसी कंपनी के भ्रामक दावे पर कानून सवाल कर सकता है। फिर राजनीतिक दलों द्वारा किए गए अव्यावहारिक या भ्रामक चुनावी वादों पर सार्वजनिक जवाबदेही की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती? मुद्दा हर वादे को अदालत में ले जाने का नहीं है। मुद्दा यह है कि जनता को भ्रमित करके वोट लेने की राजनीति पर पारदर्शिता और जिम्मेदारी की सीमा तय हो। राजनीतिक दलों को जनता के सामने अपने वादों का वित्तीय और प्रशासनिक आधार बताना ही चाहिए। चुनाव सुधार भी इसी जवाबदेही का हिस्सा घोषणापत्र की जवाबदेही के साथ चुनाव सुधारों पर भी गंभीर बहस जरूरी है। Right to Recall यानी निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत जनता को अपने प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार दिया जाए या नहीं—इस पर संसद को विचार करना चाहिए। इसी तरह NOTA को प्रभावी बनाने पर भी बहस जरूरी है। यदि बड़ी संख्या में मतदाता सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करते हैं तो उनकी सामूहिक असहमति का चुनावी प्रक्रिया में कोई वास्तविक प्रभाव होना चाहिए या नहीं, इसका निर्णय भी लोकतांत्रिक विमर्श से होना चाहिए। लोकतंत्र में वोट के साथ हिसाब भी जरूरी है जनता पांच साल में केवल एक बार मतदाता नहीं है। वह पूरे कार्यकाल में सरकार से सवाल पूछने का अधिकार रखती है। इसलिए अब जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें चुनावी घोषणापत्र सत्ता हासिल करने का साधन भर न रह जाए, बल्कि सरकार के कामकाज का सार्वजनिक पैमाना बने। जन संवाद की मांग स्पष्ट है— घोषणापत्र को कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाया जाए। सरकार ‘वादा निभाओ कानून’ संसद में लाए और उसे पास करे। हर प्रमुख चुनावी वादे की लागत, समय-सीमा और प्रगति जनता के सामने रखी जाए। चुनाव में वादा करना राजनीतिक अधिकार है, लेकिन उस वादे का हिसाब देना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। अब जनता को सिर्फ नए वादे नहीं चाहिए। जनता को पुराने वादों का हिसाब चाहिए। घोषणापत्र जुमला नहीं—जनता के भरोसे का हलफनामा बने। — राजेश मिश्रा संपादक, जन संवाद

25 min ago
user_Rajesh mishra
Rajesh mishra
Local News Reporter बलौदा बाजार, बलौदा बाजार, छत्तीसगढ़•
25 min ago

घोषणापत्र बने अब कानून, ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे सरकार जन संवाद की सीधी मांग : चुनावी घोषणापत्र को कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाया जाए—हर वादे का हिसाब हो, समय-सीमा हो और जनता को जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी हो घोषणापत्र अब जुमलों का पुलिंदा नहीं चलेगा। घोषणापत्र अब कानून बनेगा। सरकार ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे घोषणापत्र बने अब कानून, ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे सरकार जन संवाद की सीधी मांग : चुनावी घोषणापत्र को कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाया जाए—हर वादे का हिसाब हो, समय-सीमा हो और जनता को जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी हो घोषणापत्र अब जुमलों का पुलिंदा नहीं चलेगा। घोषणापत्र अब कानून बनेगा। सरकार ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे। लोकतंत्र में जनता अपना वोट केवल भाषणों पर नहीं, राजनीतिक दलों द्वारा किए गए वादों और उनके घोषणापत्र पर भरोसा करके देती है। जब उन्हीं वादों के आधार पर सरकार बनती है तो फिर सत्ता में आने के बाद उन वादों की कोई जवाबदेही क्यों नहीं होनी चाहिए? यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता। चुनाव के समय रोजगार, किसान, युवा, महिला, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और विकास को लेकर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। जनता विश्वास करती है और अपना मत देती है। लेकिन पांच साल बाद जब हिसाब मांगने का समय आता है तो पुराने घोषणापत्र की चर्चा अक्सर गायब हो जाती है और फिर नए वादों की किताब जनता के सामने खोल दी जाती है। यह राजनीतिक सुविधा हो सकती है, लोकतांत्रिक जवाबदेही नहीं। वादे पर वोट मिला है तो हिसाब भी देना होगा हर चुनावी वादा कानूनन पूरा कराना संभव नहीं है। सरकारों के सामने आर्थिक संकट, प्राकृतिक आपदा, न्यायिक निर्णय और संवैधानिक सीमाएं जैसी परिस्थितियां हो सकती हैं। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि घोषणापत्र को पूरी तरह जवाबदेही से मुक्त कर दिया जाए। ‘वादा निभाओ कानून’ में कम से कम यह व्यवस्था होनी चाहिए कि प्रमुख चुनावी वादों के साथ उनकी अनुमानित लागत, वित्तीय स्रोत और समय-सीमा बताना अनिवार्य हो। सरकार बनने के बाद हर वर्ष सार्वजनिक रिपोर्ट जारी हो— कितने वादे पूरे हुए, कितने अधूरे हैं और जो पूरे नहीं हुए, उनके कारण क्या हैं। यही पारदर्शिता राजनीति में भरोसा बढ़ाएगी। झूठे वादों की राजनीति पर लगे लगाम किसी कंपनी के भ्रामक दावे पर कानून सवाल कर सकता है। फिर राजनीतिक दलों द्वारा किए गए अव्यावहारिक या भ्रामक चुनावी वादों पर सार्वजनिक जवाबदेही की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती? मुद्दा हर वादे को अदालत में ले जाने का नहीं है। मुद्दा यह है कि जनता को भ्रमित करके वोट लेने की राजनीति पर पारदर्शिता और जिम्मेदारी की सीमा तय हो। राजनीतिक दलों को जनता के सामने अपने वादों का वित्तीय और प्रशासनिक आधार बताना ही चाहिए। चुनाव सुधार भी इसी जवाबदेही का हिस्सा घोषणापत्र की जवाबदेही के साथ चुनाव सुधारों पर भी गंभीर बहस जरूरी है। Right to Recall यानी निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत जनता को अपने प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार दिया जाए या नहीं—इस पर संसद को विचार करना चाहिए। इसी तरह NOTA को प्रभावी बनाने पर भी बहस जरूरी है। यदि बड़ी संख्या में मतदाता सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करते हैं तो उनकी सामूहिक असहमति का चुनावी प्रक्रिया में कोई वास्तविक प्रभाव होना चाहिए या नहीं, इसका निर्णय भी लोकतांत्रिक विमर्श से होना चाहिए। लोकतंत्र में वोट के साथ हिसाब भी जरूरी है जनता पांच साल में केवल एक बार मतदाता नहीं है। वह पूरे कार्यकाल में सरकार से सवाल पूछने का अधिकार रखती है। इसलिए अब जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें चुनावी घोषणापत्र सत्ता हासिल करने का साधन भर न रह जाए, बल्कि सरकार के कामकाज का सार्वजनिक पैमाना बने। जन संवाद की मांग स्पष्ट है— घोषणापत्र को कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाया जाए। सरकार ‘वादा निभाओ कानून’ संसद में लाए और उसे पास करे। हर प्रमुख चुनावी वादे की लागत, समय-सीमा और प्रगति जनता के सामने रखी जाए। चुनाव में वादा करना राजनीतिक अधिकार है, लेकिन उस वादे का हिसाब देना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। अब जनता को सिर्फ नए वादे नहीं चाहिए। जनता को पुराने वादों का हिसाब चाहिए। घोषणापत्र जुमला नहीं—जनता के भरोसे का हलफनामा बने। — राजेश मिश्रा संपादक, जन संवाद

More news from छत्तीसगढ़ and nearby areas
  • घोषणापत्र बने अब कानून, ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे सरकार जन संवाद की सीधी मांग : चुनावी घोषणापत्र को कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाया जाए—हर वादे का हिसाब हो, समय-सीमा हो और जनता को जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी हो घोषणापत्र अब जुमलों का पुलिंदा नहीं चलेगा। घोषणापत्र अब कानून बनेगा। सरकार ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे घोषणापत्र बने अब कानून, ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे सरकार जन संवाद की सीधी मांग : चुनावी घोषणापत्र को कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाया जाए—हर वादे का हिसाब हो, समय-सीमा हो और जनता को जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी हो घोषणापत्र अब जुमलों का पुलिंदा नहीं चलेगा। घोषणापत्र अब कानून बनेगा। सरकार ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे। लोकतंत्र में जनता अपना वोट केवल भाषणों पर नहीं, राजनीतिक दलों द्वारा किए गए वादों और उनके घोषणापत्र पर भरोसा करके देती है। जब उन्हीं वादों के आधार पर सरकार बनती है तो फिर सत्ता में आने के बाद उन वादों की कोई जवाबदेही क्यों नहीं होनी चाहिए? यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता। चुनाव के समय रोजगार, किसान, युवा, महिला, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और विकास को लेकर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। जनता विश्वास करती है और अपना मत देती है। लेकिन पांच साल बाद जब हिसाब मांगने का समय आता है तो पुराने घोषणापत्र की चर्चा अक्सर गायब हो जाती है और फिर नए वादों की किताब जनता के सामने खोल दी जाती है। यह राजनीतिक सुविधा हो सकती है, लोकतांत्रिक जवाबदेही नहीं। वादे पर वोट मिला है तो हिसाब भी देना होगा हर चुनावी वादा कानूनन पूरा कराना संभव नहीं है। सरकारों के सामने आर्थिक संकट, प्राकृतिक आपदा, न्यायिक निर्णय और संवैधानिक सीमाएं जैसी परिस्थितियां हो सकती हैं। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि घोषणापत्र को पूरी तरह जवाबदेही से मुक्त कर दिया जाए। ‘वादा निभाओ कानून’ में कम से कम यह व्यवस्था होनी चाहिए कि प्रमुख चुनावी वादों के साथ उनकी अनुमानित लागत, वित्तीय स्रोत और समय-सीमा बताना अनिवार्य हो। सरकार बनने के बाद हर वर्ष सार्वजनिक रिपोर्ट जारी हो— कितने वादे पूरे हुए, कितने अधूरे हैं और जो पूरे नहीं हुए, उनके कारण क्या हैं। यही पारदर्शिता राजनीति में भरोसा बढ़ाएगी। झूठे वादों की राजनीति पर लगे लगाम किसी कंपनी के भ्रामक दावे पर कानून सवाल कर सकता है। फिर राजनीतिक दलों द्वारा किए गए अव्यावहारिक या भ्रामक चुनावी वादों पर सार्वजनिक जवाबदेही की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती? मुद्दा हर वादे को अदालत में ले जाने का नहीं है। मुद्दा यह है कि जनता को भ्रमित करके वोट लेने की राजनीति पर पारदर्शिता और जिम्मेदारी की सीमा तय हो। राजनीतिक दलों को जनता के सामने अपने वादों का वित्तीय और प्रशासनिक आधार बताना ही चाहिए। चुनाव सुधार भी इसी जवाबदेही का हिस्सा घोषणापत्र की जवाबदेही के साथ चुनाव सुधारों पर भी गंभीर बहस जरूरी है। Right to Recall यानी निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत जनता को अपने प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार दिया जाए या नहीं—इस पर संसद को विचार करना चाहिए। इसी तरह NOTA को प्रभावी बनाने पर भी बहस जरूरी है। यदि बड़ी संख्या में मतदाता सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करते हैं तो उनकी सामूहिक असहमति का चुनावी प्रक्रिया में कोई वास्तविक प्रभाव होना चाहिए या नहीं, इसका निर्णय भी लोकतांत्रिक विमर्श से होना चाहिए। लोकतंत्र में वोट के साथ हिसाब भी जरूरी है जनता पांच साल में केवल एक बार मतदाता नहीं है। वह पूरे कार्यकाल में सरकार से सवाल पूछने का अधिकार रखती है। इसलिए अब जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें चुनावी घोषणापत्र सत्ता हासिल करने का साधन भर न रह जाए, बल्कि सरकार के कामकाज का सार्वजनिक पैमाना बने। जन संवाद की मांग स्पष्ट है— घोषणापत्र को कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाया जाए। सरकार ‘वादा निभाओ कानून’ संसद में लाए और उसे पास करे। हर प्रमुख चुनावी वादे की लागत, समय-सीमा और प्रगति जनता के सामने रखी जाए। चुनाव में वादा करना राजनीतिक अधिकार है, लेकिन उस वादे का हिसाब देना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। अब जनता को सिर्फ नए वादे नहीं चाहिए। जनता को पुराने वादों का हिसाब चाहिए। घोषणापत्र जुमला नहीं—जनता के भरोसे का हलफनामा बने। — राजेश मिश्रा संपादक, जन संवाद
    1
    घोषणापत्र बने अब कानून, ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे सरकार

जन संवाद की सीधी मांग : चुनावी घोषणापत्र को कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाया जाए—हर वादे का हिसाब हो, समय-सीमा हो और जनता को जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी हो

घोषणापत्र अब जुमलों का पुलिंदा नहीं चलेगा।
घोषणापत्र अब कानून बनेगा।
सरकार ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे
घोषणापत्र बने अब कानून, ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे सरकार
जन संवाद की सीधी मांग : चुनावी घोषणापत्र को कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाया जाए—हर वादे का हिसाब हो, समय-सीमा हो और जनता को जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी हो
घोषणापत्र अब जुमलों का पुलिंदा नहीं चलेगा।
घोषणापत्र अब कानून बनेगा।
सरकार ‘वादा निभाओ कानून’ पास करे।
लोकतंत्र में जनता अपना वोट केवल भाषणों पर नहीं, राजनीतिक दलों द्वारा किए गए वादों और उनके घोषणापत्र पर भरोसा करके देती है। जब उन्हीं वादों के आधार पर सरकार बनती है तो फिर सत्ता में आने के बाद उन वादों की कोई जवाबदेही क्यों नहीं होनी चाहिए?
यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता।
चुनाव के समय रोजगार, किसान, युवा, महिला, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और विकास को लेकर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। जनता विश्वास करती है और अपना मत देती है। लेकिन पांच साल बाद जब हिसाब मांगने का समय आता है तो पुराने घोषणापत्र की चर्चा अक्सर गायब हो जाती है और फिर नए वादों की किताब जनता के सामने खोल दी जाती है।
यह राजनीतिक सुविधा हो सकती है, लोकतांत्रिक जवाबदेही नहीं।
वादे पर वोट मिला है तो हिसाब भी देना होगा
हर चुनावी वादा कानूनन पूरा कराना संभव नहीं है। सरकारों के सामने आर्थिक संकट, प्राकृतिक आपदा, न्यायिक निर्णय और संवैधानिक सीमाएं जैसी परिस्थितियां हो सकती हैं। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि घोषणापत्र को पूरी तरह जवाबदेही से मुक्त कर दिया जाए।
‘वादा निभाओ कानून’ में कम से कम यह व्यवस्था होनी चाहिए कि प्रमुख चुनावी वादों के साथ उनकी अनुमानित लागत, वित्तीय स्रोत और समय-सीमा बताना अनिवार्य हो।
सरकार बनने के बाद हर वर्ष सार्वजनिक रिपोर्ट जारी हो—
कितने वादे पूरे हुए, कितने अधूरे हैं और जो पूरे नहीं हुए, उनके कारण क्या हैं।
यही पारदर्शिता राजनीति में भरोसा बढ़ाएगी।
झूठे वादों की राजनीति पर लगे लगाम
किसी कंपनी के भ्रामक दावे पर कानून सवाल कर सकता है। फिर राजनीतिक दलों द्वारा किए गए अव्यावहारिक या भ्रामक चुनावी वादों पर सार्वजनिक जवाबदेही की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती?
मुद्दा हर वादे को अदालत में ले जाने का नहीं है। मुद्दा यह है कि जनता को भ्रमित करके वोट लेने की राजनीति पर पारदर्शिता और जिम्मेदारी की सीमा तय हो।
राजनीतिक दलों को जनता के सामने अपने वादों का वित्तीय और प्रशासनिक आधार बताना ही चाहिए।
चुनाव सुधार भी इसी जवाबदेही का हिस्सा
घोषणापत्र की जवाबदेही के साथ चुनाव सुधारों पर भी गंभीर बहस जरूरी है। Right to Recall यानी निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत जनता को अपने प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार दिया जाए या नहीं—इस पर संसद को विचार करना चाहिए।
इसी तरह NOTA को प्रभावी बनाने पर भी बहस जरूरी है। यदि बड़ी संख्या में मतदाता सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करते हैं तो उनकी सामूहिक असहमति का चुनावी प्रक्रिया में कोई वास्तविक प्रभाव होना चाहिए या नहीं, इसका निर्णय भी लोकतांत्रिक विमर्श से होना चाहिए।
लोकतंत्र में वोट के साथ हिसाब भी जरूरी है
जनता पांच साल में केवल एक बार मतदाता नहीं है। वह पूरे कार्यकाल में सरकार से सवाल पूछने का अधिकार रखती है।
इसलिए अब जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें चुनावी घोषणापत्र सत्ता हासिल करने का साधन भर न रह जाए, बल्कि सरकार के कामकाज का सार्वजनिक पैमाना बने।
जन संवाद की मांग स्पष्ट है—
घोषणापत्र को कानूनी जवाबदेही के दायरे में लाया जाए।
सरकार ‘वादा निभाओ कानून’ संसद में लाए और उसे पास करे।
हर प्रमुख चुनावी वादे की लागत, समय-सीमा और प्रगति जनता के सामने रखी जाए।
चुनाव में वादा करना राजनीतिक अधिकार है, लेकिन उस वादे का हिसाब देना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
अब जनता को सिर्फ नए वादे नहीं चाहिए।
जनता को पुराने वादों का हिसाब चाहिए।
घोषणापत्र जुमला नहीं—जनता के भरोसे का हलफनामा बने।
— राजेश मिश्रा
संपादक, जन संवाद
    user_Rajesh mishra
    Rajesh mishra
    Local News Reporter बलौदा बाजार, बलौदा बाजार, छत्तीसगढ़•
    25 min ago
  • मोहभट्टा बिल्हा का रहस्यमयी स्वयंभू शिव मंदिर, जिसका चर्चा PM नरेन्द्र मोदी ने भी किया था #mohbattabilha #swayambhushivmandir #pmmodi #bilhabilaspurnews मोहभट्टा बिल्हा का रहस्यमयी स्वयंभू शिव मंदिर, जिसका चर्चा PM नरेन्द्र मोदी ने भी किया था #mohbattabilha #swayambhushivmandir #pmmodi #bilhabilaspurnews
    1
    मोहभट्टा बिल्हा का रहस्यमयी स्वयंभू शिव मंदिर, जिसका चर्चा  PM नरेन्द्र 
मोदी ने भी किया था #mohbattabilha #swayambhushivmandir #pmmodi #bilhabilaspurnews
मोहभट्टा बिल्हा का रहस्यमयी स्वयंभू शिव मंदिर, जिसका चर्चा  PM नरेन्द्र 
मोदी ने भी किया था #mohbattabilha #swayambhushivmandir #pmmodi #bilhabilaspurnews
    user_News30live
    News30live
    Local News Reporter Bilha, Bilaspur•
    1 hr ago
  • छतौद में फैक्ट्री लगाने की कोशिश का ग्रामीणों ने किया जोरदार विरोध ग्राम सभा ने NOC देने से किया साफ इंकार, तहसीलदार को सौंपा ज्ञापन छतौद। ग्राम पंचायत छतौद में तारणी स्टील LLP द्वारा औद्योगिक प्लांट स्थापित करने के प्रयास का ग्रामीणों ने एकजुट होकर कड़ा विरोध किया है। कंपनी द्वारा गांव की लगभग 27 एकड़ भूमि में प्लांट स्थापित करने के लिए ग्राम पंचायत से NOC की मांग की गई थी, जिसके विरोध में ग्रामीणों ने ग्राम सभा में अपना स्पष्ट मत रखते हुए NOC नहीं देने का प्रस्ताव पारित किया। ग्राम सभा में ग्रामीणों ने दो टूक कहा कि गांव की जमीन केवल उद्योग लगाने के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों, कृषि एवं पशुधन के लिए सुरक्षित रहनी चाहिए। ग्रामीणों का कहना है कि उद्योग के नाम पर गांव की बेशकीमती जमीन को निजी कंपनियों के हवाले करने का निर्णय किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा। ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित होने के बाद पंचायत प्रतिनिधियों एवं ग्रामीणों ने तहसीलदार को ज्ञापन सौंपकर शासन-प्रशासन से मांग की कि छतौद में किसी भी प्रकार के औद्योगिक प्लांट अथवा फैक्ट्री की स्थापना की अनुमति न दी जाए। ग्रामीणों ने शासन को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि यदि ग्राम सभा के प्रस्ताव और ग्रामीणों की भावनाओं को दरकिनार कर छतौद में किसी फैक्ट्री की स्थापना अथवा भूमि का औद्योगिक उपयोग करने की कोशिश की गई, तो इसका व्यापक स्तर पर विरोध किया जाएगा। ग्रामीणों ने कहा कि उन्हें विकास से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन विकास के नाम पर गांव की जमीन, पर्यावरण और भविष्य से समझौता कतई मंजूर नहीं है। ग्रामीणों ने यह भी कहा कि छतौद में यदि शासन को कोई जनहितकारी निर्माण करना ही है तो अस्पताल, कॉलेज, स्कूल या अन्य सार्वजनिक उपयोग की सुविधा विकसित की जाए, जिसका लाभ पूरे क्षेत्र को मिले। लेकिन किसी निजी उद्योग के लिए गांव की जमीन और चारागाह को सुरक्षित रखने की मांग से पीछे नहीं हटेंगे। “ग्राम सभा का निर्णय सर्वोपरि है, छतौद की जमीन पर उद्योग नहीं लगने देंगे।” इस दौरान ग्रामवासी, पंचायत प्रतिनिधि, विधायक प्रत्याशी महेश साहू एवं जिला पंचायत प्रत्याशी अविराज साहू सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे और सभी ने एक स्वर में औद्योगिक प्लांट का विरोध किया। ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि छतौद की भूमि को भविष्य में औद्योगिक प्रयोजनों के लिए चिन्हित अथवा आवंटित न किया जाए और गांव की चारागाह एवं कृषि उपयोग की भूमि को स्थायी रूप से सुरक्षित रखा जाए। ग्रामीणों का स्पष्ट संदेश है— “विकास के नाम पर विनाश मंजूर नहीं, गांव की जमीन बिकने नहीं देंगे और ग्राम सभा के अधिकारों की अनदेखी नहीं होने देंगे।”
    4
    छतौद में फैक्ट्री लगाने की कोशिश का ग्रामीणों ने किया जोरदार विरोध
ग्राम सभा ने NOC देने से किया साफ इंकार, तहसीलदार को सौंपा ज्ञापन
छतौद। ग्राम पंचायत छतौद में तारणी स्टील LLP द्वारा औद्योगिक प्लांट स्थापित करने के प्रयास का ग्रामीणों ने एकजुट होकर कड़ा विरोध किया है। कंपनी द्वारा गांव की लगभग 27 एकड़ भूमि में प्लांट स्थापित करने के लिए ग्राम पंचायत से NOC की मांग की गई थी, जिसके विरोध में ग्रामीणों ने ग्राम सभा में अपना स्पष्ट मत रखते हुए NOC नहीं देने का प्रस्ताव पारित किया।
ग्राम सभा में ग्रामीणों ने दो टूक कहा कि गांव की जमीन केवल उद्योग लगाने के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों, कृषि एवं पशुधन के लिए सुरक्षित रहनी चाहिए। ग्रामीणों का कहना है कि उद्योग के नाम पर गांव की बेशकीमती जमीन को निजी कंपनियों के हवाले करने का निर्णय किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित होने के बाद पंचायत प्रतिनिधियों एवं ग्रामीणों ने तहसीलदार को ज्ञापन सौंपकर शासन-प्रशासन से मांग की कि छतौद में किसी भी प्रकार के औद्योगिक प्लांट अथवा फैक्ट्री की स्थापना की अनुमति न दी जाए।
ग्रामीणों ने शासन को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि यदि ग्राम सभा के प्रस्ताव और ग्रामीणों की भावनाओं को दरकिनार कर छतौद में किसी फैक्ट्री की स्थापना अथवा भूमि का औद्योगिक उपयोग करने की कोशिश की गई, तो इसका व्यापक स्तर पर विरोध किया जाएगा। ग्रामीणों ने कहा कि उन्हें विकास से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन विकास के नाम पर गांव की जमीन, पर्यावरण और भविष्य से समझौता कतई मंजूर नहीं है।
ग्रामीणों ने यह भी कहा कि छतौद में यदि शासन को कोई जनहितकारी निर्माण करना ही है तो अस्पताल, कॉलेज, स्कूल या अन्य सार्वजनिक उपयोग की सुविधा विकसित की जाए, जिसका लाभ पूरे क्षेत्र को मिले। लेकिन किसी निजी उद्योग के लिए गांव की जमीन और चारागाह को सुरक्षित रखने की मांग से पीछे नहीं हटेंगे।
“ग्राम सभा का निर्णय सर्वोपरि है, छतौद की जमीन पर उद्योग नहीं लगने देंगे।”
इस दौरान ग्रामवासी, पंचायत प्रतिनिधि, विधायक प्रत्याशी महेश साहू एवं जिला पंचायत प्रत्याशी अविराज साहू सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे और सभी ने एक स्वर में औद्योगिक प्लांट का विरोध किया।
ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि छतौद की भूमि को भविष्य में औद्योगिक प्रयोजनों के लिए चिन्हित अथवा आवंटित न किया जाए और गांव की चारागाह एवं कृषि उपयोग की भूमि को स्थायी रूप से सुरक्षित रखा जाए।
ग्रामीणों का स्पष्ट संदेश है—
“विकास के नाम पर विनाश मंजूर नहीं,
गांव की जमीन बिकने नहीं देंगे और ग्राम सभा के अधिकारों की अनदेखी नहीं होने देंगे।”
    user_Bhupendra tkahur CKS
    Bhupendra tkahur CKS
    Occupational safety and health टिल्डा, रायपुर, छत्तीसगढ़•
    1 hr ago
  • तिल्दा-नेवरा में शांति भंग करने वालों पर पुलिस की कार्रवाई, 3 जेल भेजे गए तिल्दा-नेवरा में सार्वजनिक स्थान पर वाद-विवाद और मारपीट कर शांति भंग करने वाले तीन लोगों के खिलाफ पुलिस ने प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की है। मामला 31 अगस्त का है। शासकीय अस्पताल के सामने मेन रोड पर दो पक्षों के बीच विवाद की सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और समझाइश देने का प्रयास किया। लेकिन समझाइश के बावजूद विवाद करने वाले लोग दोबारा मारपीट और शांति भंग करने पर उतारू हो गए। इसके बाद तिल्दा-नेवरा पुलिस ने धारा 170 बीएनएसएस के तहत कार्रवाई करते हुए तीनों को गिरफ्तार कर एसडीएम न्यायालय में पेश किया। न्यायालय से जेल वारंट जारी होने के बाद उपकार देवार, तुलसी बाई देवार और लोभी देवार को जेल भेज दिया गया। पुलिस का कहना है कि क्षेत्र में शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई लगातार जारी रहेगी।
    2
    तिल्दा-नेवरा में शांति भंग करने वालों पर पुलिस की कार्रवाई, 3 जेल भेजे गए
तिल्दा-नेवरा में सार्वजनिक स्थान पर वाद-विवाद और मारपीट कर शांति भंग करने वाले तीन लोगों के खिलाफ पुलिस ने प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की है।
मामला 31 अगस्त का है। शासकीय अस्पताल के सामने मेन रोड पर दो पक्षों के बीच विवाद की सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और समझाइश देने का प्रयास किया।
लेकिन समझाइश के बावजूद विवाद करने वाले लोग दोबारा मारपीट और शांति भंग करने पर उतारू हो गए। इसके बाद तिल्दा-नेवरा पुलिस ने धारा 170 बीएनएसएस के तहत कार्रवाई करते हुए तीनों को गिरफ्तार कर एसडीएम न्यायालय में पेश किया।
न्यायालय से जेल वारंट जारी होने के बाद उपकार देवार, तुलसी बाई देवार और लोभी देवार को जेल भेज दिया गया।
पुलिस का कहना है कि क्षेत्र में शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई लगातार जारी रहेगी।
    user_Pavan Baghel
    Pavan Baghel
    टिल्डा, रायपुर, छत्तीसगढ़•
    4 hrs ago
  • नगर पालिका बोदरी के पार्षद फिरतु बनवारे के पुत्र की सड़क दुर्घटना मे मौत नगर मे नगर पालिका बोदरी के पार्षद फिरतु बनवारे के पुत्र की सड़क दुर्घटना मे मौत नगर मे छाई शोक की लहर सोमवार की रात 10 बजे चकरभाठा पुलिस से मिली जानकारी अनुसार नाम मृतक जतिन बनवारे पिता फिरतु राम बनवारे उम्र 27 वर्ष पता चकरभाठा केम्प की सड़क दुर्घटना मे मौत हो गई है जिसके शव का सोमवार को पी एम के पश्चात अंतिम संस्कार किया गया है मिली जानकारी के अनुसार मृतक जतिन बनवारे रामवेली काॅलेनी मे एक साहब की कार चलाया करता था जो रविवार को बाइक से काम मे जाने को निकला था तभी एन एच सड़क पर एल सी आई टी कॉलेज बोदरी के पास पहुंचा था तभी एक अनियंत्रित कार ने उसे जोरदार टक्कर मार कर एक्सीडेंट कर फरार हो गया जिसकी वजह से जतिन बनवारे हवा मे उड़ कर सड़क पर गिरा तो उसके सिर हाथ पैर और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटे आई जिसे देखकर आसपास के लोगों ने उसे इलाज हेतु बिलासपुर के मंगला अस्पताल पहुंचाया जहां से उसे सोमवार को अपोलो अस्पताल बिलासपुर रिफर कर दिया था जहां जाते जाते रस्ते मे उसने दम तोड़ दिया जिसके बाद चकरभाठा पुलिस को अपोलो अस्पताल से मेमो प्राप्त होने पर चकरभाठा पुलिस अपोलो अस्पताल पहुंची जहां शव का मर्ग पंचनामा कार्यवाही कर शव को पी एम के बाद परिजनों को सौंप दिया है और मामले की जाँच जारी हैं मिली जानकारी के अनुसार मृतक के दोनों हाथ और एक पैर टूट चुके थे चेहरे सिर और शरीर के अन्य हिस्सों मे गंभीर चोट के निशान थे अत्यधिक चोट लगने की वजह से मृतक की मौत होना पाया गया है इस घटना के बाद सोमवार की देर शाम मृतक के शव का चकरभाठा के मुक्तिधाम मे अंतिम संस्कार किया गया इस घटना के बाद परिजनों और नगर मे शोक की लहर है
    1
    नगर पालिका बोदरी के पार्षद फिरतु बनवारे के पुत्र की सड़क दुर्घटना मे मौत नगर मे 
नगर पालिका बोदरी के पार्षद फिरतु बनवारे के पुत्र की सड़क दुर्घटना मे मौत नगर मे छाई शोक की लहर 
सोमवार की रात 10 बजे चकरभाठा पुलिस से मिली जानकारी अनुसार
नाम मृतक जतिन बनवारे पिता फिरतु राम बनवारे उम्र 27 वर्ष पता चकरभाठा केम्प  की सड़क दुर्घटना मे मौत हो गई है जिसके शव का सोमवार को पी एम के पश्चात अंतिम संस्कार किया गया है मिली जानकारी के अनुसार मृतक जतिन बनवारे रामवेली काॅलेनी मे एक साहब की कार चलाया करता था जो रविवार को बाइक से काम मे जाने को निकला था तभी एन एच सड़क पर एल सी आई टी कॉलेज बोदरी के पास पहुंचा था तभी एक अनियंत्रित कार ने उसे जोरदार टक्कर मार कर एक्सीडेंट कर फरार हो गया 
जिसकी वजह से जतिन बनवारे हवा मे उड़ कर सड़क पर गिरा तो उसके सिर हाथ पैर और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटे आई जिसे देखकर आसपास के लोगों ने उसे इलाज हेतु बिलासपुर के मंगला अस्पताल पहुंचाया जहां से उसे सोमवार को अपोलो अस्पताल बिलासपुर रिफर कर दिया था जहां जाते जाते रस्ते मे उसने दम तोड़ दिया जिसके बाद चकरभाठा पुलिस को अपोलो अस्पताल से मेमो प्राप्त होने पर चकरभाठा पुलिस अपोलो अस्पताल पहुंची जहां शव का मर्ग पंचनामा कार्यवाही कर शव को पी एम के बाद परिजनों को सौंप दिया है और मामले की जाँच जारी हैं 
मिली जानकारी के अनुसार मृतक के दोनों हाथ और एक पैर टूट चुके थे चेहरे सिर और शरीर के अन्य हिस्सों मे गंभीर चोट के निशान थे अत्यधिक चोट लगने की वजह से मृतक की मौत होना पाया गया है इस घटना के बाद सोमवार की देर शाम मृतक के शव का चकरभाठा के मुक्तिधाम मे अंतिम संस्कार किया गया इस घटना के बाद परिजनों और नगर मे शोक की लहर है
    user_Patrkar Sarthi
    Patrkar Sarthi
    Reporter Bilha, Bilaspur•
    5 hrs ago
  • अरपा सीवरेज पर हाईकोर्ट की सख्ती! 70 नाले, 6 STP,फिर भी अरपा क्यों बेहाल? बिलासपुर की जीवनदायिनी अरपा नदी में शहर का सीवरेज पहुंचने के मामले में हाईकोर्ट ने नगर निगम और राज्य सरकार से कई अहम सवालों के जवाब मांगे हैं। कोर्ट ने साफ तौर पर जानना चाहा है कि नगर निगम सीमा के सभी 70 नाले क्या छह सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट यानी एसटीपी से जुड़े हुए हैं। साथ ही यह भी पूछा गया है कि नालों से निकलने वाले सीवरेज को अरपा नदी में पहुंचने से पहले रोका, डायवर्ट और पूरी तरह ट्रीट किया जा रहा है या नहीं।
    1
    अरपा सीवरेज पर हाईकोर्ट की सख्ती!
70 नाले, 6 STP,फिर भी अरपा क्यों बेहाल?
बिलासपुर की जीवनदायिनी अरपा नदी में शहर का सीवरेज पहुंचने के मामले में हाईकोर्ट ने नगर निगम और राज्य सरकार से कई अहम सवालों के जवाब मांगे हैं। कोर्ट ने साफ तौर पर जानना चाहा है कि नगर निगम सीमा के सभी 70 नाले क्या छह सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट यानी एसटीपी से जुड़े हुए हैं। साथ ही यह भी पूछा गया है कि नालों से निकलने वाले सीवरेज को अरपा नदी में पहुंचने से पहले रोका, डायवर्ट और पूरी तरह ट्रीट किया जा रहा है या नहीं।
    user_Ziya khan
    Ziya khan
    Local News Reporter बिलासपुर, बिलासपुर, छत्तीसगढ़•
    24 min ago
  • बिलासपुर के चकरभाठा-सिरगिट्टी में 15 अवैध कबाड़ियों पर पुलिस की कार्रवाई बिलासपुर पुलिस ने अवैध कबाड़ कारोबार के खिलाफ विशेष अभियान चलाते हुए चकरभाठा और सिरगिट्टी थाना क्षेत्र में कार्रवाई की। पुलिस ने अवैध रूप से कबाड़ दुकान संचालित करने वाले कुल 15 कबाड़ियों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की। इनमें से सिरगिट्टी थाना क्षेत्र के 10 कबाड़ संचालकों को थाने लाया गया। पुलिस के अनुसार, जांच में सभी के अवैध कबाड़ कारोबार में संलिप्त होने की बात सामने आई।
    1
    बिलासपुर के चकरभाठा-सिरगिट्टी में 15 अवैध कबाड़ियों पर पुलिस की कार्रवाई
बिलासपुर पुलिस ने अवैध कबाड़ कारोबार के खिलाफ विशेष अभियान चलाते हुए चकरभाठा और सिरगिट्टी थाना क्षेत्र में कार्रवाई की। पुलिस ने अवैध रूप से कबाड़ दुकान संचालित करने वाले कुल 15 कबाड़ियों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की। इनमें से सिरगिट्टी थाना क्षेत्र के 10 कबाड़ संचालकों को थाने लाया गया। पुलिस के अनुसार, जांच में सभी के अवैध कबाड़ कारोबार में संलिप्त होने की बात सामने आई।
    user_द संक्षेप
    द संक्षेप
    Media company बिलासपुर, बिलासपुर, छत्तीसगढ़•
    9 hrs ago
  • धमनी जंगल का नाला उफान पर, धमनी बंगला पहुंच मार्ग दोनों ओर से बाधित धमनी जंगल का नाला उफान पर, धमनी बंगला पहुंच मार्ग दोनों ओर से बाधित लगातार बारिश से आवागमन ठप, वन प्रबंधन समिति ने स्थायी पुलिया निर्माण की मांग दोहराई धमनी, 1 सितंबर 2026। लगातार हो रही बारिश के चलते धमनी जंगल क्षेत्र में स्थित नाला तेज बहाव के साथ उफान पर आ गया है। इसके कारण धमनी बंगला पहुंचने वाला मुख्य मार्ग बाधित हो गया है। वहीं जोराडबरी से धमनी पहुंच मार्ग पर धमनी बंगला से करीब एक किलोमीटर पहले स्थित सड़क के बीच की पुलिया भी पानी के तेज बहाव के कारण प्रभावित हुई है। ऐसी स्थिति में वर्तमान में धमनी बंगला पहुंचने के दोनों प्रमुख मार्ग अवरुद्ध हो गए हैं। वन प्रबंधन समिति धमनी के अध्यक्ष रामनारायण यादव ने बताया कि बारिश के मौसम में धमनी बंगला पहुंच मार्ग के बाधित होने की समस्या अक्सर सामने आती है। नाले में पानी बढ़ने के बाद धमनी बंगला में तैनात चौकीदार से मोबाइल के माध्यम से ही संपर्क हो पाता है। कई बार जंगल के भीतर करीब दो किलोमीटर लंबे कीचड़ भरे रास्ते से होकर धमनी बंगला तक पहुंचना पड़ता है, जिससे आवागमन बेहद कठिन हो जाता है। ग्रामीणों एवं वन क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि बारिश के दौरान मार्ग बाधित होने से न केवल कर्मचारियों और चौकीदारों को परेशानी होती है, बल्कि वन क्षेत्र में आवश्यक कार्यों की निगरानी और आवागमन भी प्रभावित होता है। लगातार बारिश के दौरान यह समस्या और गंभीर हो जाती है। वन प्रबंधन समिति अध्यक्ष रामनारायण यादव ने बताया कि इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए पुलिया निर्माण की मांग पहले भी उठाई जा चुकी है। इस मांग को देखते हुए तत्कालीन वनमंडलाधिकारी, वनमंडल बलौदाबाजार द्वारा पुलिया निर्माण के कार्य को मंजूरी प्रदान किए जाने की जानकारी दी गई है। अब क्षेत्रवासियों को उम्मीद है कि स्वीकृत पुलिया का निर्माण जल्द शुरू होगा, जिससे बारिश के मौसम में बार-बार होने वाली मार्ग बाधा से स्थायी रूप से राहत मिल सके। वन प्रबंधन समिति ने संबंधित विभाग से मांग की है कि पुलिया निर्माण की प्रक्रिया में तेजी लाते हुए कार्य शीघ्र प्रारंभ कराया जाए, ताकि आगामी बारिश में धमनी बंगला का संपर्क मार्ग दोबारा बाधित न हो और क्षेत्र में सुचारु आवागमन सुनिश्चित किया जा सके। प्रेषक — रामनारायण यादव अध्यक्ष, वन प्रबंधन समिति धमनी दिनांक — 1 सितंबर 2026
    1
    धमनी जंगल का नाला उफान पर, धमनी बंगला पहुंच मार्ग दोनों ओर से बाधित
धमनी जंगल का नाला उफान पर, धमनी बंगला पहुंच मार्ग दोनों ओर से बाधित
लगातार बारिश से आवागमन ठप, वन प्रबंधन समिति ने स्थायी पुलिया निर्माण की मांग दोहराई
धमनी, 1 सितंबर 2026। लगातार हो रही बारिश के चलते धमनी जंगल क्षेत्र में स्थित नाला तेज बहाव के साथ उफान पर आ गया है। इसके कारण धमनी बंगला पहुंचने वाला मुख्य मार्ग बाधित हो गया है। वहीं जोराडबरी से धमनी पहुंच मार्ग पर धमनी बंगला से करीब एक किलोमीटर पहले स्थित सड़क के बीच की पुलिया भी पानी के तेज बहाव के कारण प्रभावित हुई है। ऐसी स्थिति में वर्तमान में धमनी बंगला पहुंचने के दोनों प्रमुख मार्ग अवरुद्ध हो गए हैं।
वन प्रबंधन समिति धमनी के अध्यक्ष रामनारायण यादव ने बताया कि बारिश के मौसम में धमनी बंगला पहुंच मार्ग के बाधित होने की समस्या अक्सर सामने आती है। नाले में पानी बढ़ने के बाद धमनी बंगला में तैनात चौकीदार से मोबाइल के माध्यम से ही संपर्क हो पाता है। कई बार जंगल के भीतर करीब दो किलोमीटर लंबे कीचड़ भरे रास्ते से होकर धमनी बंगला तक पहुंचना पड़ता है, जिससे आवागमन बेहद कठिन हो जाता है।
ग्रामीणों एवं वन क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि बारिश के दौरान मार्ग बाधित होने से न केवल कर्मचारियों और चौकीदारों को परेशानी होती है, बल्कि वन क्षेत्र में आवश्यक कार्यों की निगरानी और आवागमन भी प्रभावित होता है। लगातार बारिश के दौरान यह समस्या और गंभीर हो जाती है।
वन प्रबंधन समिति अध्यक्ष रामनारायण यादव ने बताया कि इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए पुलिया निर्माण की मांग पहले भी उठाई जा चुकी है। इस मांग को देखते हुए तत्कालीन वनमंडलाधिकारी, वनमंडल बलौदाबाजार द्वारा पुलिया निर्माण के कार्य को मंजूरी प्रदान किए जाने की जानकारी दी गई है। अब क्षेत्रवासियों को उम्मीद है कि स्वीकृत पुलिया का निर्माण जल्द शुरू होगा, जिससे बारिश के मौसम में बार-बार होने वाली मार्ग बाधा से स्थायी रूप से राहत मिल सके।
वन प्रबंधन समिति ने संबंधित विभाग से मांग की है कि पुलिया निर्माण की प्रक्रिया में तेजी लाते हुए कार्य शीघ्र प्रारंभ कराया जाए, ताकि आगामी बारिश में धमनी बंगला का संपर्क मार्ग दोबारा बाधित न हो और क्षेत्र में सुचारु आवागमन सुनिश्चित किया जा सके।
प्रेषक — रामनारायण यादव
अध्यक्ष, वन प्रबंधन समिति धमनी
दिनांक — 1 सितंबर 2026
    user_Rajesh mishra
    Rajesh mishra
    Local News Reporter बलौदा बाजार, बलौदा बाजार, छत्तीसगढ़•
    2 hrs ago
View latest news on Shuru App
Download_Android
  • Terms & Conditions
  • Career
  • Privacy Policy
  • Blogs
Shuru, a product of Close App Private Limited.