डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा शहर के गामाठावाड़ा क्षेत्र में एक भूखंड और निर्माण कार्य को लेकर विवाद सामने आया है। इस मामले में राजेंद्र कुमार वशिष्ठ ने मंगलेश वाडेल पर उनके निर्माण कार्य में बाधा डालने और मानसिक रूप से परेशान करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। राजेंद्र कुमार वशिष्ठ के अनुसार, उन्होंने वर्ष 1998 में बैंक ऑफ बड़ौदा के पास एक मकान खरीदा था। उनका दावा है कि उन्होंने इसके समीप स्थित भूमि पर 'प्रशासन शहरों के संग अभियान' के तहत नगर पालिका से आवश्यक अनुमति और पट्टा प्राप्त करने के बाद ही निर्माण कार्य शुरू करने की प्रक्रिया अपनाई थी। वशिष्ठ का आरोप है कि इसी दौरान मंगलेश वाडेल ने संबंधित भूमि को लेकर न्यायालय का रुख किया और स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया। हालांकि, वशिष्ठ का कहना है कि बाद में न्यायालय से उन्हें राहत मिल गई, लेकिन इसके बावजूद उनके निर्माण कार्य में लगातार बाधाएं उत्पन्न की जा रही हैं। उन्होंने बताया कि जब भी वे निर्माण का प्रयास करते हैं, उन्हें रोका जाता है, जिससे वे मानसिक रूप से बहुत परेशान हैं। इस संबंध में, नगर पालिका के अधिकारी जितेंद्र शर्मा ने बताया कि राजेंद्र कुमार वशिष्ठ ने निर्माण संबंधी प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया है। उन्होंने यह भी बताया कि इस पर मंगलेश वाडेल की ओर से आपत्ति दर्ज करवाई गई है। अधिकारी के अनुसार, मामले की नियमानुसार जांच की जा रही है और जांच के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल, यह भूमि और निर्माण संबंधी मामला प्रशासनिक प्रक्रिया में है, तथा संबंधित पक्षों के दावों और आपत्तियों की जांच जारी है। मामले में अंतिम स्थिति जांच पूरी होने और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा शहर के गामाठावाड़ा क्षेत्र में एक भूखंड और निर्माण कार्य को लेकर विवाद सामने आया है। इस मामले में राजेंद्र कुमार वशिष्ठ ने मंगलेश वाडेल पर उनके निर्माण कार्य में बाधा डालने और मानसिक रूप से परेशान करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। राजेंद्र कुमार वशिष्ठ के अनुसार, उन्होंने वर्ष 1998 में बैंक ऑफ बड़ौदा के पास एक मकान खरीदा था। उनका दावा है कि उन्होंने इसके समीप स्थित भूमि पर 'प्रशासन शहरों के संग अभियान' के तहत नगर पालिका से आवश्यक अनुमति और पट्टा प्राप्त करने के बाद ही निर्माण कार्य शुरू करने की प्रक्रिया अपनाई थी। वशिष्ठ का आरोप है कि इसी दौरान मंगलेश वाडेल ने संबंधित भूमि को लेकर न्यायालय का रुख किया और स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया। हालांकि, वशिष्ठ का कहना है कि बाद में न्यायालय से उन्हें राहत मिल गई, लेकिन इसके बावजूद उनके निर्माण कार्य में लगातार बाधाएं उत्पन्न की जा रही हैं। उन्होंने बताया कि जब भी वे निर्माण का प्रयास करते हैं, उन्हें रोका जाता है, जिससे वे मानसिक रूप से बहुत परेशान हैं। इस संबंध में, नगर पालिका के अधिकारी जितेंद्र शर्मा ने बताया कि राजेंद्र कुमार वशिष्ठ ने निर्माण संबंधी प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया है। उन्होंने यह भी बताया कि इस पर मंगलेश वाडेल की ओर से आपत्ति दर्ज करवाई गई है। अधिकारी के अनुसार, मामले की नियमानुसार जांच की जा रही है और जांच के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल, यह भूमि और निर्माण संबंधी मामला प्रशासनिक प्रक्रिया में है, तथा संबंधित पक्षों के दावों और आपत्तियों की जांच जारी है। मामले में अंतिम स्थिति जांच पूरी होने और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
- डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा शहर के गामाठावाड़ा क्षेत्र में एक भूखंड और निर्माण कार्य को लेकर विवाद सामने आया है। इस मामले में राजेंद्र कुमार वशिष्ठ ने मंगलेश वाडेल पर उनके निर्माण कार्य में बाधा डालने और मानसिक रूप से परेशान करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। राजेंद्र कुमार वशिष्ठ के अनुसार, उन्होंने वर्ष 1998 में बैंक ऑफ बड़ौदा के पास एक मकान खरीदा था। उनका दावा है कि उन्होंने इसके समीप स्थित भूमि पर 'प्रशासन शहरों के संग अभियान' के तहत नगर पालिका से आवश्यक अनुमति और पट्टा प्राप्त करने के बाद ही निर्माण कार्य शुरू करने की प्रक्रिया अपनाई थी। वशिष्ठ का आरोप है कि इसी दौरान मंगलेश वाडेल ने संबंधित भूमि को लेकर न्यायालय का रुख किया और स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया। हालांकि, वशिष्ठ का कहना है कि बाद में न्यायालय से उन्हें राहत मिल गई, लेकिन इसके बावजूद उनके निर्माण कार्य में लगातार बाधाएं उत्पन्न की जा रही हैं। उन्होंने बताया कि जब भी वे निर्माण का प्रयास करते हैं, उन्हें रोका जाता है, जिससे वे मानसिक रूप से बहुत परेशान हैं। इस संबंध में, नगर पालिका के अधिकारी जितेंद्र शर्मा ने बताया कि राजेंद्र कुमार वशिष्ठ ने निर्माण संबंधी प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया है। उन्होंने यह भी बताया कि इस पर मंगलेश वाडेल की ओर से आपत्ति दर्ज करवाई गई है। अधिकारी के अनुसार, मामले की नियमानुसार जांच की जा रही है और जांच के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल, यह भूमि और निर्माण संबंधी मामला प्रशासनिक प्रक्रिया में है, तथा संबंधित पक्षों के दावों और आपत्तियों की जांच जारी है। मामले में अंतिम स्थिति जांच पूरी होने और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।1
- राजस्थान के डूंगरपुर जिले के कॉल खंडा खास में आयोजित एक शिविर के दौरान ग्रामीण सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। इस शिविर में कई ग्रामीणों को उनके जमीन के पट्टे वितरित किए गए। साथ ही, गोद भराई का कार्यक्रम भी संपन्न हुआ, जिससे लोगों में खुशी का माहौल देखा गया। इसके अतिरिक्त, जमीन संबंधी कई विवादों का निपटारा भी एक ही छत के नीचे सफलतापूर्वक किया गया, जिससे ग्रामीणों को बड़ी राहत मिली।1
- जनजाति क्षेत्र के एक पुलिस थाने की तस्वीर सामने आई है, जिसमें एक महिला कांस्टेबल अपने पैरों पर पैर चढ़ाकर और पैर फैलाकर मेज पर बैठी दिखाई दे रही है। यह दृश्य एक 'पिता तुल्य बुजुर्ग' के सामने का है, जिसे देखकर ऐसा लगता है मानो यह पुलिसकर्मी अपने ही घर में बैठी हो। इस तस्वीर पर टिप्पणी करते हुए, समाज सेवी दिनेश चंद्र अहारी ने कहा कि यह घटना जनजाति क्षेत्र में हमारे नेताओं के कमजोर नेतृत्व को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। उनके अनुसार, यह स्थिति इस बात का प्रमाण है कि जनजाति क्षेत्र में प्रजातंत्र पर नौकरशाही कितनी हावी हो चुकी है। अहारी ने नेताओं से आग्रह किया है कि वे इस पर गंभीरता से ध्यान दें और अपने प्रोटोकॉल तथा अपनी ताकत को समझें। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ऐसा नहीं किया गया, तो 'मालिक जनता' का इसी तरह शोषण होता रहेगा, जो उन्हें मालिक बनाती है।1
- डूंगरपुर के राजकीय आयुर्विज्ञान महाविद्यालय एवं संबद्ध चिकित्सालय से सेवामुक्त किए गए लगभग 100 नर्स ग्रेड-द्वितीय (नर्सिंग ऑफिसर) कार्मिकों ने अपनी सेवाओं को पुनः बहाल करने की मांग को लेकर पूर्व राज्यमंत्री एवं भाजपा के पूर्व प्रदेश महामंत्री सुशील कटारा को मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन सौंपा है। इस ज्ञापन में नर्सिंग कर्मियों ने सेवा समाप्ति के आदेश को निरस्त कर उन्हें पुनः नियुक्त करने और टीएसपी क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए नियमित पदों पर भर्ती की मांग उठाई है। ज्ञापन में बताया गया कि डूंगरपुर के राजकीय आयुर्विज्ञान महाविद्यालय एवं संबद्ध चिकित्सालय में प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से कार्यरत इन लगभग 100 नर्स ग्रेड-द्वितीय कार्मिकों की सेवाएं 22 जून 2026 को समाप्त कर दी गई हैं। ये कर्मी कई वर्षों से अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहे थे और कोविड-19 महामारी सहित विभिन्न विषम परिस्थितियों में स्वास्थ्य सेवाओं को सुचारू बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। उन्होंने आईसीयू, एनआईसीयू, पीआईसीयू, आपातकालीन इकाई तथा विभिन्न वार्डों में लगातार सेवाएं प्रदान कर मरीजों को गुणवत्तापूर्ण उपचार उपलब्ध कराने में योगदान दिया है। इन सेवाओं के अचानक समाप्त होने से लगभग 100 परिवारों के समक्ष आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। नर्सिंग कर्मियों ने अपने ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया है कि राजस्थान कॉन्ट्रैक्चुअल हायरिंग टू सिविल पोस्ट्स रूल्स-2022 के तहत 242 नर्सिंग कार्मिकों को नियुक्ति दी गई थी, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार इनमें से केवल 138 कार्मिकों ने ही कार्यग्रहण किया है। ऐसे में अस्पताल में 100 से अधिक पद रिक्त रहने की संभावना है। कर्मियों का तर्क है कि जब अस्पताल में नर्सिंग स्टाफ की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है, तब अनुभवी कार्मिकों की सेवाएं समाप्त करना स्वास्थ्य सेवाओं के हित में उचित नहीं है। उन्होंने वागड़ संभाग और टीएसपी क्षेत्र की स्वास्थ्य आवश्यकताओं पर जोर देते हुए कहा कि डूंगरपुर मेडिकल कॉलेज एवं संबद्ध अस्पताल पूरे आदिवासी क्षेत्र का प्रमुख चिकित्सा संस्थान है और यहां अनुभवी नर्सिंग स्टाफ की कमी होने पर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है, जिससे दूरस्थ एवं जनजातीय क्षेत्रों से आने वाले मरीजों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। नर्सिंग कर्मियों ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि सेवा समाप्ति आदेश को तत्काल निरस्त किया जाए, सभी सेवामुक्त नर्स ग्रेड-द्वितीय कार्मिकों की सेवाएं बहाल की जाएं, रिक्त एवं संभावित रिक्त पदों पर अनुभवी कार्मिकों को प्राथमिकता दी जाए, प्रभावित कर्मचारियों के हितों की रक्षा की जाए और अस्पताल की आवश्यकताओं को देखते हुए उनकी सेवाएं जारी रखी जाएं। इसके अतिरिक्त, ज्ञापन में टीएसपी क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने के लिए नर्सिंग ऑफिसर के लगभग 3000 नियमित पद पृथक रूप से स्वीकृत करने, राजस्थान चिकित्सा सेवा नियम, 1965 के तहत मेरिट एवं बोनस अंक आधारित भर्ती प्रक्रिया शीघ्र प्रारंभ करने तथा अनुभवी नर्सिंग कार्मिकों को उनके कार्यानुभव का लाभ देने की भी मांग की गई है। नर्सिंग कर्मियों ने उम्मीद जताई है कि राज्य सरकार जनहित, स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता तथा आदिवासी क्षेत्र की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेगी। ज्ञापन सौंपते समय बड़ी संख्या में प्रभावित नर्स ग्रेड-द्वितीय कार्मिक उपस्थित थे।4
- राजस्थान के गनोड़ा तहसील के ग्राम तख्ताजी का टांडा में जोगी समाज की श्मशान भूमि पर देवीलाल यादव और काना खराड़ी द्वारा अवैध कब्जा करने का मामला सामने आया है। इस संबंध में जोगी समाज ने पंचायत से लेकर तहसीलदार, पुलिस थाना और जिला कलेक्टर तक शिकायतें दर्ज कराई हैं, लेकिन अब तक इस मामले में कोई उचित कार्रवाई नहीं हुई है। जोगी समाज का आरोप है कि उचित कार्रवाई न होने के बजाय, प्रशासन ने कब्जाधारियों के पक्ष में रुख अपनाया है। तहसीलदार ने जोगी समाज की शव दफनाने की पीढ़ियों पुरानी प्रथा पर अशोभनीय टिप्पणियां करते हुए उन्हें कब्जाधारियों से 'भिड़ जाओ तुम लोगों में दम हो तो लाड़ो' जैसे गैर-जिम्मेदाराना बयान दिए हैं। पुलिस प्रशासन ने भी कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं की, जिससे जोगी समाज में भारी असंतोष है। अब तक की सरकारी कार्रवाई को देखते हुए जोगी समाज ने प्रशासन पर सवाल उठाए हैं, और इस पूरे मामले में कहीं न कहीं इन सबकी मिलीभगत का अंदेशा जताया है।4
- बांसवाड़ा नगर निगम ने धरोहर कोचिंग सेंटर के खिलाफ कार्रवाई की है। इस कार्रवाई के तहत कोचिंग सेंटर को सील कर दिया गया।1
- डुंगरपुर जिला कलक्टर ने गलियाकोट उपखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत गरियाता में आयोजित ग्रामीण सेवा शिविर का अवलोकन किया। इस दौरान उन्होंने विभिन्न विभागों द्वारा किए जा रहे कार्यों की विस्तृत जानकारी ली और संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश प्रदान किए। इस शिविर में ग्रामीणों को आवासीय भूमि के पट्टे, खातेदारी भूमि के पट्टे और वृद्धावस्था पेंशन के स्वीकृति पत्र वितरित कर लाभान्वित किया गया। इस अवसर पर गलियाकोट के निवर्तमान प्रधान जयप्रकाश पारंगी, उपखंड अधिकारी संजय सरपोटा, तहसीलदार, ब्लॉक विकास अधिकारी सहित अन्य विभागीय अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।3
- डूंगरपुर जिले में जर्जर स्कूल भवनों की समस्या डेढ़ साल बाद भी जस की तस बनी हुई है। हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार, कुल 194 स्कूल भवन बच्चों के लिए असुरक्षित पाए गए हैं, जिनमें 169 जर्जर और 25 अति जर्जर श्रेणी के हैं। बताया गया है कि झालावाड़ में हुए हादसे के बाद जिले में कुल 209 जर्जर स्कूल भवन चिन्हित किए गए थे। हालांकि, इतने समय बाद भी अब तक केवल 13 स्कूलों के पुनर्निर्माण को ही स्वीकृति मिल पाई है। शिक्षा विभाग ने इन जर्जर भवनों के पुनर्निर्माण के लिए राज्य सरकार को 154 करोड़ रुपये से अधिक का एक नया प्रस्ताव भेजा है। इस बीच, कई स्कूलों के छात्र आज भी वैकल्पिक भवनों में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। यह गंभीर स्थिति इशारा करती है कि जर्जर स्कूलें किसी और बड़े झालावाड़ जैसे हादसे का इंतजार कर रही हैं, और सरकार कब इस मामले में नींद से जागेगी।1