लातेहार व्यवहार न्यायालय में पदस्थापित अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वितीय संजय कुमार दुबे आज अपने पद से सेवानिवृत्त हो रहे हैं। त्वरित फैसले देने के लिए विख्यात रहे श्री दुबे को उनकी सेवानिवृत्ति से पहले, अंतिम कार्य दिवस शनिवार को न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा भावभीनी विदाई दी गई। श्री दुबे ने 11 सितंबर 2002 को झारखंड न्यायिक सेवा में सिविल जज के पद पर योगदान दिया था। न्यायिक सेवा में आने से पहले, वे 1990 से 2002 तक सर्वोच्च न्यायालय में एक अधिवक्ता के रूप में अभ्यास कर रहे थे। अपने पूरे कार्यकाल के दौरान, श्री दुबे ने किसी भी मामले को लंबित नहीं रखा। वे रिवीजन के कई मामलों में तो सीआईएस काउंटर से आते ही पहले ही दिन दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर फैसला सुना देते थे। यहाँ तक कि वे निर्णयों में विलंब से बचने के लिए स्टेनोग्राफर का इंतजार किए बिना, स्वयं ही फैसले लिखते थे। उन्हें पॉक्सो एक्ट का विशेष न्यायाधीश भी नियुक्त किया गया था। अपने कार्यकाल के अंतिम महीने में भी, उन्होंने 37 के लक्षित मामलों के बजाय कुल 51 मामलों की सुनवाई कर उनका निपटारा किया। वर्ष 2002 में सिमडेगा से अपनी न्यायिक सेवा शुरू करने के बाद, उन्होंने 2003 में जमशेदपुर, 2007 में हजारीबाग, 2010 में धनबाद, 2013 में बोकारो, 2017 में दुमका, और 2019 में साहिबगंज में अपनी सेवाएँ दीं, जिसके बाद 26 अप्रैल 2024 को उन्होंने लातेहार जजशिप में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में योगदान दिया था। श्री दुबे मूल रूप से पलामू प्रमंडल के गढ़वा जिला के कांडी थाना क्षेत्र के चोका गाँव के रहने वाले हैं। उन्होंने दिल्ली, रांची, कोलकाता और गुजरात में शिक्षा प्राप्त की, और एमपी यूनिवर्सिटी रोहतक से विधि स्नातक की पढ़ाई पूरी की, जिसमें वे गोल्ड मेडलिस्ट रहे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट, न्यू दिल्ली से कॉर्पोरेट लॉ और मैनेजमेंट लॉ में डिप्लोमा भी हासिल किया है। उन्हें एक मेधावी और न्यायिक सेवा के प्रति विशुद्ध रूप से समर्पित अधिकारी के तौर पर जाना जाता है। श्री दुबे की सेवानिवृत्ति के अवसर पर, जीपी समसुल कमर खान और वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील कुमार, नवीन कुमार गुप्ता, मिथिलेश कुमार, उपेंद्र कुमार, अमित कुमार गुप्ता, अमूल्य रंजन, अस्मिता एक्का सहित कई लोगों ने उनके दीर्घायु और उज्जवल भविष्य की कामना की है।
लातेहार व्यवहार न्यायालय में पदस्थापित अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वितीय संजय कुमार दुबे आज अपने पद से सेवानिवृत्त हो रहे हैं। त्वरित फैसले देने के लिए विख्यात रहे श्री दुबे को उनकी सेवानिवृत्ति से पहले, अंतिम कार्य दिवस शनिवार को न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा भावभीनी विदाई दी गई। श्री दुबे ने 11 सितंबर 2002 को झारखंड न्यायिक सेवा में सिविल जज के पद पर योगदान दिया था। न्यायिक सेवा में आने से पहले, वे 1990 से 2002 तक सर्वोच्च न्यायालय में एक अधिवक्ता के रूप में अभ्यास कर रहे थे। अपने पूरे कार्यकाल के दौरान, श्री दुबे ने किसी भी मामले को लंबित नहीं रखा। वे रिवीजन के कई मामलों में तो सीआईएस काउंटर से आते ही पहले ही दिन दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर फैसला सुना देते थे। यहाँ तक कि वे निर्णयों में विलंब से बचने के लिए स्टेनोग्राफर का इंतजार किए बिना, स्वयं ही फैसले लिखते थे। उन्हें पॉक्सो एक्ट का विशेष न्यायाधीश भी नियुक्त किया गया था। अपने कार्यकाल के अंतिम महीने में भी, उन्होंने 37 के लक्षित मामलों के बजाय कुल 51 मामलों की सुनवाई कर उनका निपटारा किया। वर्ष 2002 में सिमडेगा से अपनी न्यायिक सेवा शुरू करने के बाद, उन्होंने 2003 में जमशेदपुर, 2007 में हजारीबाग, 2010 में धनबाद, 2013 में बोकारो, 2017 में दुमका, और 2019 में साहिबगंज में अपनी सेवाएँ दीं, जिसके बाद 26 अप्रैल 2024 को उन्होंने लातेहार जजशिप में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में योगदान दिया था। श्री दुबे मूल रूप से पलामू प्रमंडल के गढ़वा जिला के कांडी थाना क्षेत्र के चोका गाँव के रहने वाले हैं। उन्होंने दिल्ली, रांची, कोलकाता और गुजरात में शिक्षा प्राप्त की, और एमपी यूनिवर्सिटी रोहतक से विधि स्नातक की पढ़ाई पूरी की, जिसमें वे गोल्ड मेडलिस्ट रहे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट, न्यू दिल्ली से कॉर्पोरेट लॉ और मैनेजमेंट लॉ में डिप्लोमा भी हासिल किया है। उन्हें एक मेधावी और न्यायिक सेवा के प्रति विशुद्ध रूप से समर्पित अधिकारी के तौर पर जाना जाता है। श्री दुबे की सेवानिवृत्ति के अवसर पर, जीपी समसुल कमर खान और वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील कुमार, नवीन कुमार गुप्ता, मिथिलेश कुमार, उपेंद्र कुमार, अमित कुमार गुप्ता, अमूल्य रंजन, अस्मिता एक्का सहित कई लोगों ने उनके दीर्घायु और उज्जवल भविष्य की कामना की है।
- बालूमाथ प्रखंड कार्यालय में एनटीपीसी द्वारा आयोजित पर्यावरण जनसुनवाई का विरोध करने के लिए स्थानीय ग्रामीण शंकर उरांव ने रविवार सुबह 11:00 बजे आह्वान किया है। जानकारी के अनुसार, बालूमाथ प्रखंड कार्यालय परिसर में 1 मई को एनटीपीसी की पर्यावरण जनसुनवाई आयोजित की गई है, जिसमें सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण भाग लेंगे। हालांकि, स्थानीय ग्रामीण और आजसू नेता शंकर उरांव ने अधिक से अधिक ग्रामीणों से इस जनसुनवाई का विरोध करने की अपील की है।1
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- नदी किनारे फिशिंग रॉड के साथ बैठे एक गाँव के लड़के ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है जिससे हर कोई हैरान है। उसकी मेहनत रंग लाई है क्योंकि उसने एक बहुत बड़ी मछली पकड़ी है, जिसे देखकर लोग बस देखते ही रह गए। यह आज का एक शानदार शिकार रहा, और जिसने भी इतनी विशाल मछली देखी, वह दंग रह गया। इस पल में, हाथ में फिशिंग रॉड और दिल में सुकून के साथ, यह शख्स बताता है कि बस यही ज़िंदगी है।1
- झारखंड के एक अति पिछड़े क्षेत्र में असुर भवन का निर्माण कार्य चल रहा है, लेकिन इस परियोजना पर काम कर रहे मजदूरों को उनका भुगतान नहीं दिया जा रहा है।1
- बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ किए जाने पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। यह स्थिति कई सवाल खड़े कर रही है, और इसे लेकर हैरानी के साथ-साथ गहन चिंता भी जताई जा रही है। इस गंभीर विषय पर अधिक ध्यान और चिंतन की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।1
- एम.के. इंटर कॉलेज के उन छात्रों के लिए एक शुभ समाचार सामने आया है, जो पहले परीक्षा देने से वंचित रह गए थे। जैक ने इस संबंध में सूचना जारी कर यह बताया है कि अब ऐसे सभी छात्रों की परीक्षा आयोजित की जाएगी।1
- लोहरदगा जिले के सेन्हा थाना क्षेत्र में भारी वाहनों के चालक प्रशासन द्वारा जारी गाइडलाइन का खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं। इन चालकों ने नियमों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, जिससे थाना क्षेत्र में दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि सोशल पुलिसिंग के लाभ के बावजूद, भारी वाहन चालक भयमुक्त होकर नियमों का लगातार उल्लंघन कर रहे हैं।1
- झारखंड के लातेहार जिले का कटिया गांव, जो वर्षों पहले नक्सलवाद के साये से बाहर आ चुका है, आज भी विकास की रोशनी से वंचित है। भले ही इसे नक्सल मुक्त होने का तमगा मिल गया हो, लेकिन गांव मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जी रहा है, जिससे ग्रामीणों में गहरा असंतोष व्याप्त है। गांव का एकमात्र प्राथमिक विद्यालय बंद पड़ा है, जिसे सरकार ने पास के दूसरे स्कूल में 'समायोजित' कर दिया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि छोटे बच्चों को पढ़ने के लिए अब 3-4 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, और कई बच्चों ने तो पढ़ाई ही छोड़ दी है। पीने के पानी की स्थिति भी दयनीय है; हैंडपंप खराब पड़े हैं और नल-जल योजना अब तक यहां नहीं पहुंची है। ग्रामीण आज भी दूषित 'चुआरी' का पानी पीने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब नक्सली थे, तब डर के मारे कोई अधिकारी या जनप्रतिनिधि गांव में नहीं आता था। अब जबकि नक्सली नहीं हैं, तो यह बहाना भी खत्म हो गया है, फिर भी कोई उनकी सुध लेने नहीं आता। न विधायक, न बीडीओ, न मुखिया, कोई भी उनके बीच नहीं पहुंचता। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। गांव में सड़क, अस्पताल और स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। नक्सलवाद खत्म होने के बाद भी जनप्रतिनिधि और अधिकारी इस गांव की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। कटिया गांव के लोग सरकार और प्रशासन से सवाल कर रहे हैं कि क्या केवल नक्सल मुक्त होना ही काफी है? क्या जीवन जीने के लिए सिर्फ शांति पर्याप्त है और सुविधाओं की कोई आवश्यकता नहीं? ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि जब तक इस गांव तक सरकार नहीं पहुंचेगी, तब तक उनकी यह 'मुक्ति' अधूरी ही रहेगी।3