भरवारा पंचायत में नल-जल योजना का पानी सड़कों पर, कीचड़ से परेशान ग्रामीण नरसिंहपुर। रिपोर्ट: विकास सियारिया नरसिंहपुर तहसील क्षेत्र की भरवारा पंचायत में नल-जल योजना के क्रियान्वयन और सड़क व्यवस्था को लेकर ग्रामीणों की परेशानी सामने आई है। ग्रामीणों का आरोप है कि कई स्थानों पर नल-जल योजना का पानी सड़कों पर बह रहा है, जिससे रास्तों पर लगातार पानी और कीचड़ की स्थिति बनी हुई है। मौके के वीडियो और तस्वीरों में सड़क पर पानी बहता हुआ तथा कई स्थानों पर कीचड़ दिखाई दे रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक बारिश के दौरान स्थिति और भी खराब हो जाती है, जिससे पैदल चलने वाले लोगों और दोपहिया वाहन चालकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। सरपंच और सचिव से ग्रामीणों के सवाल ग्रामीणों का कहना है कि समस्या पंचायत के जिम्मेदारों के संज्ञान में होने के बावजूद इसका स्थायी समाधान नहीं किया गया है। ग्रामीण सरपंच मनोहर मेहरा और सचिव से सवाल कर रहे हैं कि सड़क, नाली और पानी निकासी जैसी मूलभूत व्यवस्थाओं में सुधार कब होगा। ग्रामीणों का यह भी सवाल है कि यदि पंचायत में विकास कार्यों के लिए पर्याप्त राशि उपलब्ध हुई है, तो सड़क और नाली की स्थिति अब तक क्यों नहीं सुधरी? वहीं यदि राशि उपलब्ध नहीं हुई है, तो इसके लिए जिम्मेदार विभाग से ग्रामीणों को स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं दी जा रही? नल-जल योजना के पानी की बर्बादी पर सवाल नल-जल योजना का उद्देश्य ग्रामीणों को घर-घर पानी उपलब्ध कराना है, लेकिन यदि पाइपलाइन या नल से निकलने वाला पानी सड़कों पर बहकर बर्बाद हो रहा है, तो व्यवस्था की निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ग्रामीणों की मांग है कि संबंधित विभाग मौके का निरीक्षण कर पानी के रिसाव, सड़क और नाली की स्थिति की जांच करे तथा आवश्यक सुधार कार्य कराए, ताकि पानी की बर्बादी भी रुके और लोगों को कीचड़ भरे रास्तों से राहत मिल सके। प्रशासन से जांच की मांग भरवारा पंचायत की स्थिति को लेकर ग्रामीण अब संबंधित अधिकारियों से जांच और कार्रवाई की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि पंचायत के जिम्मेदारों या संबंधित विभाग की ओर से इस मामले में आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। उनका पक्ष सामने आने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाना उचित होगा। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में मौके का निरीक्षण कर समस्या का समाधान कब तक कराता है और नल-जल योजना के पानी की बर्बादी रोकने के साथ-साथ सड़क एवं जल निकासी व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि भरवारा पंचायत में सड़क पर पानी बहने के कारण कीचड़ की स्थिति बनी हुई है और ग्रामीणों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
भरवारा पंचायत में नल-जल योजना का पानी सड़कों पर, कीचड़ से परेशान ग्रामीण नरसिंहपुर। रिपोर्ट: विकास सियारिया नरसिंहपुर तहसील क्षेत्र की भरवारा पंचायत में नल-जल योजना के क्रियान्वयन और सड़क व्यवस्था को लेकर ग्रामीणों की परेशानी सामने आई है। ग्रामीणों का आरोप है कि कई स्थानों पर नल-जल योजना का पानी सड़कों पर बह रहा है, जिससे रास्तों पर लगातार पानी और कीचड़ की स्थिति बनी हुई है। मौके के वीडियो और तस्वीरों में सड़क पर पानी बहता हुआ तथा कई स्थानों पर कीचड़ दिखाई दे रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक बारिश के दौरान स्थिति और भी खराब हो जाती है, जिससे पैदल चलने वाले लोगों और दोपहिया वाहन चालकों को
परेशानी का सामना करना पड़ता है। सरपंच और सचिव से ग्रामीणों के सवाल ग्रामीणों का कहना है कि समस्या पंचायत के जिम्मेदारों के संज्ञान में होने के बावजूद इसका स्थायी समाधान नहीं किया गया है। ग्रामीण सरपंच मनोहर मेहरा और सचिव से सवाल कर रहे हैं कि सड़क, नाली और पानी निकासी जैसी मूलभूत व्यवस्थाओं में सुधार कब होगा। ग्रामीणों का यह भी सवाल है कि यदि पंचायत में विकास कार्यों के लिए पर्याप्त राशि उपलब्ध हुई है, तो सड़क और नाली की स्थिति अब तक क्यों नहीं सुधरी? वहीं यदि राशि उपलब्ध नहीं हुई है, तो इसके लिए जिम्मेदार विभाग से ग्रामीणों को स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं दी जा रही? नल-जल
योजना के पानी की बर्बादी पर सवाल नल-जल योजना का उद्देश्य ग्रामीणों को घर-घर पानी उपलब्ध कराना है, लेकिन यदि पाइपलाइन या नल से निकलने वाला पानी सड़कों पर बहकर बर्बाद हो रहा है, तो व्यवस्था की निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ग्रामीणों की मांग है कि संबंधित विभाग मौके का निरीक्षण कर पानी के रिसाव, सड़क और नाली की स्थिति की जांच करे तथा आवश्यक सुधार कार्य कराए, ताकि पानी की बर्बादी भी रुके और लोगों को कीचड़ भरे रास्तों से राहत मिल सके। प्रशासन से जांच की मांग भरवारा पंचायत की स्थिति को लेकर ग्रामीण अब संबंधित अधिकारियों से जांच और कार्रवाई की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि पंचायत
के जिम्मेदारों या संबंधित विभाग की ओर से इस मामले में आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। उनका पक्ष सामने आने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाना उचित होगा। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में मौके का निरीक्षण कर समस्या का समाधान कब तक कराता है और नल-जल योजना के पानी की बर्बादी रोकने के साथ-साथ सड़क एवं जल निकासी व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि भरवारा पंचायत में सड़क पर पानी बहने के कारण कीचड़ की स्थिति बनी हुई है और ग्रामीणों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
- भरवारा पंचायत में नल-जल योजना का पानी सड़कों पर, कीचड़ से परेशान ग्रामीण नरसिंहपुर। रिपोर्ट: विकास सियारिया नरसिंहपुर तहसील क्षेत्र की भरवारा पंचायत में नल-जल योजना के क्रियान्वयन और सड़क व्यवस्था को लेकर ग्रामीणों की परेशानी सामने आई है। ग्रामीणों का आरोप है कि कई स्थानों पर नल-जल योजना का पानी सड़कों पर बह रहा है, जिससे रास्तों पर लगातार पानी और कीचड़ की स्थिति बनी हुई है। मौके के वीडियो और तस्वीरों में सड़क पर पानी बहता हुआ तथा कई स्थानों पर कीचड़ दिखाई दे रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक बारिश के दौरान स्थिति और भी खराब हो जाती है, जिससे पैदल चलने वाले लोगों और दोपहिया वाहन चालकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। सरपंच और सचिव से ग्रामीणों के सवाल ग्रामीणों का कहना है कि समस्या पंचायत के जिम्मेदारों के संज्ञान में होने के बावजूद इसका स्थायी समाधान नहीं किया गया है। ग्रामीण सरपंच मनोहर मेहरा और सचिव से सवाल कर रहे हैं कि सड़क, नाली और पानी निकासी जैसी मूलभूत व्यवस्थाओं में सुधार कब होगा। ग्रामीणों का यह भी सवाल है कि यदि पंचायत में विकास कार्यों के लिए पर्याप्त राशि उपलब्ध हुई है, तो सड़क और नाली की स्थिति अब तक क्यों नहीं सुधरी? वहीं यदि राशि उपलब्ध नहीं हुई है, तो इसके लिए जिम्मेदार विभाग से ग्रामीणों को स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं दी जा रही? नल-जल योजना के पानी की बर्बादी पर सवाल नल-जल योजना का उद्देश्य ग्रामीणों को घर-घर पानी उपलब्ध कराना है, लेकिन यदि पाइपलाइन या नल से निकलने वाला पानी सड़कों पर बहकर बर्बाद हो रहा है, तो व्यवस्था की निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ग्रामीणों की मांग है कि संबंधित विभाग मौके का निरीक्षण कर पानी के रिसाव, सड़क और नाली की स्थिति की जांच करे तथा आवश्यक सुधार कार्य कराए, ताकि पानी की बर्बादी भी रुके और लोगों को कीचड़ भरे रास्तों से राहत मिल सके। प्रशासन से जांच की मांग भरवारा पंचायत की स्थिति को लेकर ग्रामीण अब संबंधित अधिकारियों से जांच और कार्रवाई की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि पंचायत के जिम्मेदारों या संबंधित विभाग की ओर से इस मामले में आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। उनका पक्ष सामने आने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाना उचित होगा। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में मौके का निरीक्षण कर समस्या का समाधान कब तक कराता है और नल-जल योजना के पानी की बर्बादी रोकने के साथ-साथ सड़क एवं जल निकासी व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि भरवारा पंचायत में सड़क पर पानी बहने के कारण कीचड़ की स्थिति बनी हुई है और ग्रामीणों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।4
- महंगाई के विरोध में पिपरिया में कांग्रेस का धरना, पुतला दहन एवं रैली पिपरिया - ब्लॉक कांग्रेस कमेटी पिपरिया ग्रामीण, नगर कांग्रेस एवं मटकुली ब्लॉक कांग्रेस के संयुक्त तत्वावधान में बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार एवं सरकार की जनविरोधी नीतियों के विरोध में धरना प्रदर्शन किया गया तथा पुतला दहन कर विरोध दर्ज कराया गया । नगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष उदय सिंह राजपूत ने बताया कि धरना प्रदर्शन के पश्चात कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बाजार में रैली निकालकर आमजन के बीच बढ़ती महंगाई के मुद्दे को उठाया, कार्यकर्ताओं ने कहा कि लगातार बढ़ती महंगाई से आम आदमी का घरेलू बजट बिगड़ गया है खाद्य सामग्री, सब्जियों, तेल, पेट्रोल-डीजल, बिजली बिल, शिक्षा एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने आम परिवारों की परेशानियां बढ़ा दी हैं, रैली के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी करते हुए सरकार से आम जनता को राहत देने की मांग की । इस अवसर पर ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष ग्रामीण नरेंद्र दुबे, नगर अध्यक्ष उदय सिंह राजपूत, वरिष्ठ नेता अजय कटकवार, फहीम अब्दुल्ला, हरीश मालपानी, लक्ष्मी नारायण सोनी, अटल पटेल, पूर्व विधानसभा प्रत्याशी हरीश बेमन, मंडलम अध्यक्ष सुनील ठाकुर, मंडलम अध्यक्ष मनोज कुमार मीणा, मंडलम अध्यक्ष शिवनंदन रघुवंशी, जिला प्रवक्ता राजेन्द्र सोनिया, प्रभारी राघवेंद्र पटेल (राधे), किसान कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष देवेंद्र पटेल, सुनीत पुरोहित, अनुपम राय, ब्लॉक सेवादल अध्यक्ष विनोद नायक, नगर सेवादल अध्यक्ष अमित वर्मा, प्रदेश प्रशिक्षक परम गोस्वामी, राधेश्याम ठाकरे, श्रीमती गायत्री गिरी, कौशल महाराज, संजय राजपूत सहित कांग्रेस पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे ।4
- सरकारी इंटरनेट की केबल बार-बार चोरी, तहसील से लेकर लोकसेवा केंद्र तक काम ठप सरकारी इंटरनेट की केबल बार-बार चोरी, तहसील से लेकर लोकसेवा केंद्र तक काम ठप 27/8/2026 छगन कुशवाहा पिपरिया। शहर के सरकारी कार्यालयों को इंटरनेट सुविधा देने वाली केबल बार-बार चोरी होने से सरकारी कामकाज प्रभावित हो रहा है। हैरानी की बात यह है कि अज्ञात व्यक्ति एक ही स्थान यानी तहसील कार्यालय की छत से बार-बार केबल काटकर ले जा रहा है। अब तक चार-पांच बार केबल चोरी होने की बात सामने आई है। मामले में स्टेशन रोड थाने में शिकायत कर एफआईआर दर्ज कराई गई है, लेकिन इसके बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका है। केबल चोरी होने से तहसील कार्यालय, जनपद कार्यालय, एसडीएम कार्यालय, रजिस्ट्री कार्यालय, महिला एवं बाल विकास कार्यालय और लोकसेवा केंद्र सहित अन्य सरकारी कार्यालयों में इंटरनेट आधारित काम प्रभावित हैं। ऑनलाइन आवेदन, दस्तावेजों के आदान-प्रदान, रजिस्ट्रेशन और अन्य जरूरी सेवाओं से जुड़े कामों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। एक ही जगह से बार-बार चोरी, सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल इंटरनेट प्रभारी शैलेन्द्र ने बताया कि सरकारी इंटरनेट की केबल शहर के विभिन्न सरकारी कार्यालयों तक पहुंचती है। इसके बावजूद तहसील की छत से ही बार-बार केबल चोरी की जा रही है। अज्ञात व्यक्ति अब तक चार-पांच बार इसी तरह केबल ले जा चुका है। शिकायत के बाद भी चोरी की घटनाएं रुक नहीं रही हैं। काम बंद, लोगों को भी उठानी पड़ रही परेशानी इंटरनेट बंद होने से कार्यालयों में ऑनलाइन कामकाज प्रभावित होने के साथ आम लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सरकारी सेवाओं के लिए कार्यालय पहुंचने वाले लोगों को कई बार काम पूरा हुए बिना ही लौटना पड़ रहा है। लगातार केबल चोरी की घटनाओं से सरकारी व्यवस्था की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। अब सवाल यह है कि एक ही स्थान से बार-बार केबल चोरी करने वाला कौन है? पुलिस शिकायत दर्ज होने के बाद भी यदि घटनाएं जारी हैं तो तहसील परिसर की सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।1
- बढ़ती महंगाई भ्रष्टाचार और सरकार की जन नीतियों के विरोध में कांग्रेसियों ने पुतला दहन कर धरना दिया बढ़ती महंगाई भ्रष्टाचार और सरकार की जन नीतियों के विरोध में कांग्रेसियों ने मंगलवारा चौराहे पर पुतला दहन कर धरना दिया1
- रक्षाबंधन पर अनोखी पहल, सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में शुरू हुआ ‘बाघ रक्षा सूत्र अभियान’ रक्षाबंधन पर अनोखी पहल, सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में शुरू हुआ ‘बाघ रक्षा सूत्र अभियान’ रक्षाबंधन के अवसर पर सतपुड़ा टाइगर रिजर्व द्वारा ‘बाघ रक्षा सूत्र अभियान’ शुरू किया गया है। 27 से 29 अगस्त तक चलने वाले इस अभियान में बाघों और वन्यजीवों के संरक्षण का संकल्प दिलाया जा रहा है।आज गुरुवार को पहले दिनदोपहर बाद 12 बजे पीएम श्री हायर सेकेंडरी स्कूल कामती के 450, बागड़ा के 275 छात्र-छात्राओं सहित ग्राम सारंगपुर में 50 गाइड, जिप्सी चालकों और पर्यटकों को बाघ रक्षा सूत्र बांधकर बाघों की सुरक्षा का संकल्प दिलाया गया।अभियान के तहत तीन दिनों में करीब 11 हजार ग्रामीणों, विद्यार्थियों और आमजन को जागरूक करने का लक्ष्य रखा गया है।1
- पितृ स्मृति को सेवा से जोड़ा,, जरूरतमंदों को भी कराए गए स्वादिष्ट भोजन- सोहागपुर (नर्मदापुरम) "मारूपुरा निवासी की अनुकरणीय पहल" रामप्रसाद वार्ड (मारूपुरा) निवासी श्री शैलेंद्र कपरिया जी ने मानवता की मिसाल पेश की है। आज उन्होंने अपने पूज्य पिताजी, वन विभाग में रेंजर के पद पर सेवाएं दे चुके स्वर्गीय श्री ओमप्रकाश जी कपरिया की गंगाजली पूजन एवं 13वीं के अवसर पर अपने निजी कार्यक्रम के साथ-साथ सामाजिक दायित्व का भी निर्वहन किया। इस अवसर पर उन्होंने राम रहीम रोटी बैंक, सोहागपुर में माँ नर्मदा के परिक्रमावासियों, बेघर, बेसहारा एवं जरूरतमंद लोगों के लिए प्रेमपूर्वक स्वादिष्ट भोजन भिजवाकर सच्चे अर्थों में पुण्य लाभ अर्जित किया। यह कार्य इस बात का प्रतीक है कि हमारे बुजुर्गों की सच्ची श्रद्धांजलि भूखे को भोजन कराने से बढ़कर कुछ नहीं। स्व. ओमप्रकाश जी कपरिया को भावभीनी श्रद्धांजलि एवं शैलेंद्र जी के इस पुनीत सेवा कार्य को हृदय से साधुवाद।🙏1
- गाड़ी विभाग में लगी है तो हिसाब भी विभाग का होगा! प्राइवेट बोलेरो पर ‘मध्य प्रदेश शासन’, रात में ड्राइवर के हाथों दौड़ती गाड़ी ने खोली जल संसाधन विभाग की वाहन व्यवस्था की पोल! रितिक जैन पत्रकार बाड़ी, रायसेन। जल संसाधन विभाग बाड़ी की वाहन व्यवस्था को लेकर अब सवाल और भी गंभीर हो गए हैं। मामला बोलेरो वाहन क्रमांक MP 04 TB 2393 का है। वाहन निजी स्वामित्व का है, लेकिन वह सरकारी अनुबंध के तहत जल संसाधन/सिंचाई विभाग में लगाया गया है। वाहन पर बड़े अक्षरों में “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हुआ है और 27 अगस्त की शाम करीब 7:30 बजे बाड़ी बस स्टैंड के आसपास इसे ड्राइवर द्वारा चलाते हुए देखा गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय एसडीओ वाहन में मौजूद नहीं थीं। यानी सरकारी अनुबंध पर विभाग में लगा निजी वाहन अधिकारी की गैरमौजूदगी में ड्राइवर के हाथों सड़कों पर दौड़ रहा था। अब सवाल केवल इतना नहीं कि गाड़ी कहां गई। सवाल यह है कि सरकारी अनुबंध पर लगी निजी गाड़ी का उपयोग किस आदेश, किस काम और किस रिकॉर्ड के आधार पर किया जा रहा है? --- सरकारी अनुबंध है तो नियम और रिकॉर्ड भी होंगे यह बात स्पष्ट है कि निजी वाहन को सरकारी विभाग में अनुबंध के आधार पर लगाया जा सकता है। लेकिन जैसे ही कोई निजी वाहन सरकारी अनुबंध का हिस्सा बनता है, उसके उपयोग, चालक, ड्यूटी, भुगतान और निर्धारित शासकीय कार्य से जुड़े रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो जाते हैं। ऐसे में MP 04 TB 2393 को लेकर विभाग को यह बताना होगा कि वाहन किस आदेश के तहत लगाया गया है, उसकी अनुबंध अवधि क्या है और वाहन के उपयोग की निर्धारित शर्तें क्या हैं। यदि विभाग वाहन का किराया सरकारी मद से चुका रहा है, तो फिर सरकारी पैसे से चलने वाली गाड़ी के हर किलोमीटर का हिसाब भी विभागीय रिकॉर्ड में होना चाहिए। --- रात साढ़े सात बजे बस स्टैंड पर गाड़ी—अधिकारी कहां थीं? 27 अगस्त की शाम करीब 7:30 बजे बाड़ी बस स्टैंड के आसपास वाहन की मौजूदगी ने मामले को नया मोड़ दे दिया। वाहन में एसडीओ मौजूद नहीं थीं। स्टीयरिंग ड्राइवर के हाथ में थी। अब सीधा सवाल है—अगर वाहन एसडीओ के उपयोग के लिए विभाग में अनुबंधित है, तो अधिकारी की गैरमौजूदगी में ड्राइवर वाहन लेकर किस काम से निकला था? क्या वह विभागीय ड्यूटी पर था? अगर हां, तो उस ड्यूटी का आदेश कहां है? क्या लॉगबुक में उस समय की यात्रा दर्ज है? कहां से कहां तक वाहन गया? किस अधिकारी के निर्देश पर गया? और उस यात्रा का शासकीय उद्देश्य क्या था? --- ड्राइवर का जवाब बना सबसे बड़ा सवाल जब वाहन के ड्राइवर से इस संबंध में सवाल किया गया तो उसका जवाब था— “वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।” यहीं से मामले में सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है। अगर ड्राइवर का इशारा विभागीय अटैचमेंट या वाहन की स्थिति की ओर था, तो आखिर “हट गई” का मतलब क्या है? क्या वाहन विभागीय अनुबंध से हट चुका है? अगर नहीं हटा है तो ऐसी बात क्यों कही गई? और अगर हट चुका है तो फिर सरकारी अनुबंध के तहत लगी गाड़ी की स्थिति क्या है? सबसे बड़ा सवाल— अगर गाड़ी हट गई तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा? --- सरकारी पहचान लगी है तो जवाबदेही भी तय होगी वाहन निजी है, लेकिन उस पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हुआ है। सरकारी अनुबंध के तहत वाहन का उपयोग हो रहा है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वाहन पर यह पहचान किस प्रावधान/अनुमति के तहत प्रदर्शित की जा रही है और अनुबंध समाप्त होने की स्थिति में इसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है। क्योंकि सड़क पर चलने वाला ऐसा वाहन आम नागरिक को सरकारी वाहन जैसा दिखाई देता है। इसलिए यह सिर्फ लिखावट का मामला नहीं है। यह सरकारी पहचान, विभागीय नियंत्रण और वाहन के अधिकृत उपयोग का सवाल है। --- अवैध गतिविधियों की आशंका पर भी जांच क्यों जरूरी? इस मामले में अभी किसी अवैध गतिविधि का प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए किसी व्यक्ति या वाहन पर अवैध काम का सीधा आरोप लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन सवाल यह जरूर है कि सरकारी पहचान वाले अनुबंधित वाहन का उपयोग निर्धारित शासकीय कार्यों से बाहर तो नहीं हो रहा? यदि वाहन रात में अधिकारी की गैरमौजूदगी में घूम रहा है, तो विभागीय रिकॉर्ड से यह जांचना जरूरी है कि वह किस काम पर था। क्योंकि यदि वाहन सरकारी अनुबंध पर है और उसके किराये का भुगतान सरकारी धन से होता है, तो उसके उपयोग का उद्देश्य भी शासकीय कार्य से संबंधित और रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए। --- ईई के जवाब से भी नहीं थमा मामला जब इस मामले को लेकर जल संसाधन विभाग बाड़ी के कार्यपालन यंत्री (ईई) से बातचीत कर जानकारी मांगी गई तो उन्होंने कहा कि वे कार्यालय से जानकारी लेकर बताएंगे। अब यही जवाब कई सवाल छोड़ गया है। अगर वाहन विभाग के अनुबंध में है तो उसकी जानकारी विभागीय रिकॉर्ड में होनी चाहिए। अनुबंध है तो उसकी प्रति सामने आए। ड्यूटी है तो आदेश सामने आए। यात्रा है तो लॉगबुक सामने आए। भुगतान है तो बिल सामने आए। मामला जितना सीधा है, जवाब भी उतना ही सीधा होना चाहिए। --- सरकारी खजाने से भुगतान, तो हर किलोमीटर का हिसाब अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल सरकारी भुगतान का है। यदि MP 04 TB 2393 को जल संसाधन विभाग में अनुबंध के तहत लगाया गया है और उसके बदले सरकारी खजाने से प्रतिमाह भुगतान किया जा रहा है, तो विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि— वाहन का मासिक किराया कितना है? भुगतान किस मद से होता है? भुगतान किस अवधि से किया जा रहा है? वाहन की ड्यूटी किस अधिकारी के लिए निर्धारित है? प्रतिदिन कितने किलोमीटर चलने की अनुमति है? ईंधन का खर्च किसके जिम्मे है? लॉगबुक कौन प्रमाणित करता है? महीने के बिल का सत्यापन कौन करता है? वाहन के उपयोग की निगरानी कौन करता है? इन सवालों के जवाब आने के बाद ही पता चलेगा कि वाहन व्यवस्था वास्तव में कितनी पारदर्शी है। --- अब जांच सिर्फ गाड़ी की नहीं, पूरे रिकॉर्ड की होनी चाहिए मामले में केवल सड़क पर वाहन देखने से निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक जांच के लिए विभागीय दस्तावेज खंगालने होंगे। जांच के दायरे में होना चाहिए— 1. अनुबंध MP 04 TB 2393 किस निविदा/अनुबंध के तहत विभाग में लगा है? 2. अनुबंध अवधि वाहन की अनुबंध अवधि कब शुरू हुई और कब समाप्त होगी? 3. अधिकृत उपयोग वाहन किस अधिकारी अथवा कार्यालय के उपयोग के लिए निर्धारित है? 4. लॉगबुक 27 अगस्त की पूरी लॉगबुक और वाहन मूवमेंट रिकॉर्ड की जांच हो। 5. ड्राइवर ड्राइवर की नियुक्ति, अधिकृत ड्यूटी और उसे वाहन चलाने के निर्देश की जानकारी सामने आए। 6. भुगतान अब तक वाहन मालिक को सरकारी खजाने से कितना भुगतान किया गया? 7. वाहन की पहचान निजी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखने की अनुमति किस आधार पर है? 8. रात की ड्यूटी 27 अगस्त को शाम 7:30 बजे वाहन किस शासकीय कार्य पर था? 9. अधिकारी की मौजूदगी उस समय अधिकारी वाहन में क्यों मौजूद नहीं थीं और ड्राइवर किस निर्देश पर वाहन चला रहा था? 10. अनुबंध की शर्तें क्या वाहन का उपयोग केवल निर्धारित शासकीय कार्य के लिए किया जा सकता है और क्या उसके बाहर उपयोग की कोई अनुमति है? --- आरटीओ और विभागीय अधिकारियों के लिए भी सवाल मामला सामने आने के बाद परिवहन विभाग के स्तर पर भी वाहन के दस्तावेज और उसकी श्रेणी की स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। वहीं जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को यह देखना चाहिए कि अनुबंधित वाहन वास्तव में निर्धारित शर्तों के अनुसार ही संचालित हो रहा है या नहीं। अगर सब कुछ नियमों के तहत है तो विभाग के पास जवाब देने के लिए पर्याप्त दस्तावेज होने चाहिए। लेकिन यदि रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में अंतर निकलता है तो फिर जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। --- “सरकारी” लिख देने से कोई वाहन सरकारी नहीं हो जाता—लेकिन सवाल जरूर पैदा होते हैं यहां एक महत्वपूर्ण बात भी साफ होना जरूरी है। किसी निजी वाहन का सरकारी विभाग के साथ अनुबंधित होना उसे स्वामित्व की दृष्टि से सरकारी वाहन नहीं बना देता। इसलिए “प्राइवेट नंबर” और “सरकारी अनुबंध” दोनों एक साथ होना संभव है। लेकिन जब उसी वाहन पर “मध्य प्रदेश शासन” लिखा हो, तब उसकी अनुमति और उपयोग की स्थिति स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है। यही इस खबर का मूल सवाल है। --- अब जवाबदेही तय करने का समय मामला किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं है। मामला है सरकारी अनुबंध पर चल रहे वाहन के उपयोग और सरकारी पहचान की पारदर्शिता का। वीडियो में वाहन दिखाई देता है। समय करीब 7:30 बजे शाम का है। वाहन ड्राइवर चला रहा है। एसडीओ वाहन में मौजूद नहीं थीं। ड्राइवर से पूछताछ हुई। उसका जवाब सामने आया— “वो तो हट गई है, ये भी निकालना है।” और विभाग के ईई ने कार्यालय से जानकारी लेकर जवाब देने की बात कही। अब इससे आगे की कहानी दस्तावेज बताएंगे। --- सबसे बड़ा सवाल फिर वही— “अगर गाड़ी विभाग से हट गई है तो ‘मध्य प्रदेश शासन’ क्यों नहीं हटा?” और अगर गाड़ी अभी भी सरकारी अनुबंध पर विभाग में लगी है तो— “27 अगस्त की शाम 7:30 बजे एसडीओ की गैरमौजूदगी में ड्राइवर उसे किस शासकीय काम से चला रहा था?” अब नजर जल संसाधन विभाग के आधिकारिक जवाब, अनुबंध की शर्तों, वाहन की लॉगबुक और भुगतान रिकॉर्ड पर है। क्योंकि सरकारी अनुबंध पर लगी प्राइवेट बोलेरो हो सकती है, लेकिन सरकारी पैसे और सरकारी पहचान से जुड़े वाहन का हिसाब भी उतना ही साफ होना चाहिए। बाड़ी में उठे ये सवाल अब केवल एक बोलेरो तक सीमित नहीं हैं—ये सवाल जल संसाधन विभाग की पूरी वाहन व्यवस्था की पारदर्शिता और निगरानी पर हैं।3
- उल्टी दस्त से तीन बहनों की मौत बेटमा थाना क्षेत्र छत्तीसगढ़ की रहने वाली थी तीन मासूम बहनों की उलटी दस्त से मौत,दो की इंदौर में हुई मौत, एक ने इटारसी में तोड़ा दम1