*सफलता की कहानी:* *छत्तीसगढ़ में धान खरीदीः भरोसे, सम्मान और आत्मनिर्भरता की कहानी* *धान की हर बाली में भरोसाः छत्तीसगढ़ की खरीदी व्यवस्था बनी किसानों की उम्मीद* *एमसीबी/15 दिसंबर 2025/* छत्तीसगढ़ की मिट्टी में जब धान की बालियाँ लहराती हैं, तो केवल फसल नहीं पकती-किसान के सपने, उसकी मेहनत और उसके परिवार की उम्मीदें भी साथ-साथ परिपक्व होती हैं। वर्षों तक मौसम की मार, बाजार की अनिश्चितता और भुगतान में देरी झेलने वाला किसान अक्सर असमंजस में रहता था। लेकिन खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में छत्तीसगढ़ की धान खरीदी व्यवस्था ने उस असमंजस को भरोसे में बदल दिया। यह केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि किसान के जीवन को छू लेने वाली भावनात्मक सफलता की कहानी है। *टोकन से लेकर तौल तक: व्यवस्था में दिखा सम्मान और भरोसा* इस वर्ष जब खरीदी केंद्र खुले, तो किसान के मन में एक अलग ही विश्वास था। सुबह-सुबह बैलगाड़ी, ट्रैक्टर या छोटे वाहन पर धान की बोरियाँ लादकर निकलने वाले किसान को पता था कि आज उसे घंटों लाइन में नहीं लगना पड़ेगा, अपमानजनक सौदेबाज़ी नहीं झेलनी होगी और न ही बार-बार दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ेंगे। टोकन प्रणाली ने उसे एक निश्चित समय दिया है, मानो व्यवस्था ने कहा हो आपका समय कीमती है। उपार्जन केंद्रों पर पहुंचते ही किसान को पहली बार यह महसूस हुआ कि व्यवस्था उसके लिए खड़ी है। छांव, पानी और बैठने की सुविधा ने थके कदमों को राहत दी। इलेक्ट्रॉनिक कांटे पर जब उसकी मेहनत का वजन सही-सही दर्ज हुआ, तो उसके चेहरे पर संतोष झलक उठा। यह केवल तौल नहीं थी, यह उस भरोसे की तौल थी जो वर्षों बाद लौटा था। *समय पर भुगतान और आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम* सबसे भावुक क्षण तब आता है, जब धान बेचने के कुछ ही दिनों में किसान के मोबाइल पर बैंक से संदेश आता है, कि राशि आपके खाते में जमा की गई। यह संदेश उसके लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता। उसी पल उसे अपने बच्चों की पढ़ाई, घर की मरम्मत और अगली फसल की तैयारी का रास्ता साफ दिखने लगता है। अब उसे साहूकार के दरवाजे पर नहीं जाना पड़ता, न ही ब्याज के बोझ से घबराना पड़ता है। यह आत्मनिर्भरता की पहली सीढ़ी है। कई गांवों में किसानों ने बताया कि समय पर भुगतान से गांव की तस्वीर बदलने लगी है। बाजारों में रौनक लौटी, दुकानों पर खरीदार बढ़े और छोटे व्यापारियों के चेहरे पर भी मुस्कान दिखी। किसान जब सम्मान के साथ अपनी कमाई खर्च करता है, तो पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जीवन का संचार होता है। *संवेदनशील प्रशासन और सख्त निगरानी से सुरक्षित हुआ किसान का हक* इस सफलता के पीछे प्रशासन की संवेदनशीलता भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही। कलेक्टर और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा नियमित निरीक्षण ने यह भरोसा दिलाया कि कोई किसान अकेला नहीं है। अवैध धान परिवहन और बिचौलियों पर की गई सख्त कार्रवाई ने ईमानदार किसानों के हक की रक्षा की। यह संदेश साफ था, सरकार किसान के साथ खड़ी है, न कि शोषण करने वालों के साथ। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे गहरा असर सम्मान का रहा। किसान ने पहली बार महसूस किया कि उसकी मेहनत को महत्व दिया जा रहा है। कर्मचारियों का सहयोगात्मक व्यवहार, स्पष्ट जानकारी और त्वरित समाधान ने किसान और व्यवस्था के बीच की दूरी को कम किया। यह वही सम्मान है, जिसकी कमी ने वर्षों तक किसान को हतोत्साहित किया था। धान खरीदी की यह कहानी केवल आंकड़ों की उपलब्धि नहीं है, यह उन आंखों की चमक है, जो भविष्य को लेकर आश्वस्त हुई हैं। यह उस मां की चिंता का अंत है, जो बच्चों की फीस को लेकर परेशान रहती थी, और उस बुज़ुर्ग किसान की संतुष्टि है, जिसने जीवन भर मेहनत की और अब उसे उसका उचित मूल्य मिला। आज छत्तीसगढ़ में धान खरीदी एक नई परंपरा गढ़ रही है, जहां किसान केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि सम्मानित भागीदार है। यह कहानी बताती है कि सही नीति, तकनीक और संवेदनशीलता मिलकर कैसे जीवन बदल सकती हैं। छत्तीसगढ़ की यह भावनात्मक सफलता पूरे देश के लिए संदेश है कि जब किसान खुशहाल होता है, तब ही राष्ट्र सशक्त बनता है।
*सफलता की कहानी:* *छत्तीसगढ़ में धान खरीदीः भरोसे, सम्मान और आत्मनिर्भरता की कहानी* *धान की हर बाली में भरोसाः छत्तीसगढ़ की खरीदी व्यवस्था बनी किसानों की उम्मीद* *एमसीबी/15 दिसंबर 2025/* छत्तीसगढ़ की मिट्टी में जब धान की बालियाँ लहराती हैं, तो केवल फसल नहीं पकती-किसान के सपने, उसकी मेहनत और उसके परिवार की उम्मीदें भी साथ-साथ परिपक्व होती हैं। वर्षों तक मौसम की मार, बाजार की अनिश्चितता और भुगतान में देरी झेलने वाला किसान अक्सर असमंजस में रहता था। लेकिन खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 में छत्तीसगढ़ की धान खरीदी व्यवस्था ने उस असमंजस को भरोसे में बदल दिया। यह केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि किसान के जीवन को छू लेने वाली भावनात्मक सफलता की कहानी है। *टोकन से लेकर तौल तक: व्यवस्था में दिखा सम्मान और भरोसा* इस वर्ष जब खरीदी केंद्र खुले, तो किसान के मन में एक अलग ही विश्वास था। सुबह-सुबह बैलगाड़ी, ट्रैक्टर या छोटे वाहन पर धान की बोरियाँ लादकर निकलने वाले किसान को पता था कि आज उसे घंटों लाइन में नहीं लगना
पड़ेगा, अपमानजनक सौदेबाज़ी नहीं झेलनी होगी और न ही बार-बार दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ेंगे। टोकन प्रणाली ने उसे एक निश्चित समय दिया है, मानो व्यवस्था ने कहा हो आपका समय कीमती है। उपार्जन केंद्रों पर पहुंचते ही किसान को पहली बार यह महसूस हुआ कि व्यवस्था उसके लिए खड़ी है। छांव, पानी और बैठने की सुविधा ने थके कदमों को राहत दी। इलेक्ट्रॉनिक कांटे पर जब उसकी मेहनत का वजन सही-सही दर्ज हुआ, तो उसके चेहरे पर संतोष झलक उठा। यह केवल तौल नहीं थी, यह उस भरोसे की तौल थी जो वर्षों बाद लौटा था। *समय पर भुगतान और आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम* सबसे भावुक क्षण तब आता है, जब धान बेचने के कुछ ही दिनों में किसान के मोबाइल पर बैंक से संदेश आता है, कि राशि आपके खाते में जमा की गई। यह संदेश उसके लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता। उसी पल उसे अपने बच्चों की पढ़ाई, घर की मरम्मत और अगली फसल की तैयारी का रास्ता साफ दिखने लगता
है। अब उसे साहूकार के दरवाजे पर नहीं जाना पड़ता, न ही ब्याज के बोझ से घबराना पड़ता है। यह आत्मनिर्भरता की पहली सीढ़ी है। कई गांवों में किसानों ने बताया कि समय पर भुगतान से गांव की तस्वीर बदलने लगी है। बाजारों में रौनक लौटी, दुकानों पर खरीदार बढ़े और छोटे व्यापारियों के चेहरे पर भी मुस्कान दिखी। किसान जब सम्मान के साथ अपनी कमाई खर्च करता है, तो पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जीवन का संचार होता है। *संवेदनशील प्रशासन और सख्त निगरानी से सुरक्षित हुआ किसान का हक* इस सफलता के पीछे प्रशासन की संवेदनशीलता भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही। कलेक्टर और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा नियमित निरीक्षण ने यह भरोसा दिलाया कि कोई किसान अकेला नहीं है। अवैध धान परिवहन और बिचौलियों पर की गई सख्त कार्रवाई ने ईमानदार किसानों के हक की रक्षा की। यह संदेश साफ था, सरकार किसान के साथ खड़ी है, न कि शोषण करने वालों के साथ। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे गहरा असर सम्मान का रहा। किसान ने
पहली बार महसूस किया कि उसकी मेहनत को महत्व दिया जा रहा है। कर्मचारियों का सहयोगात्मक व्यवहार, स्पष्ट जानकारी और त्वरित समाधान ने किसान और व्यवस्था के बीच की दूरी को कम किया। यह वही सम्मान है, जिसकी कमी ने वर्षों तक किसान को हतोत्साहित किया था। धान खरीदी की यह कहानी केवल आंकड़ों की उपलब्धि नहीं है, यह उन आंखों की चमक है, जो भविष्य को लेकर आश्वस्त हुई हैं। यह उस मां की चिंता का अंत है, जो बच्चों की फीस को लेकर परेशान रहती थी, और उस बुज़ुर्ग किसान की संतुष्टि है, जिसने जीवन भर मेहनत की और अब उसे उसका उचित मूल्य मिला। आज छत्तीसगढ़ में धान खरीदी एक नई परंपरा गढ़ रही है, जहां किसान केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि सम्मानित भागीदार है। यह कहानी बताती है कि सही नीति, तकनीक और संवेदनशीलता मिलकर कैसे जीवन बदल सकती हैं। छत्तीसगढ़ की यह भावनात्मक सफलता पूरे देश के लिए संदेश है कि जब किसान खुशहाल होता है, तब ही राष्ट्र सशक्त बनता है।
- Mehtab Khanकोटमा, अनूपपुर, मध्य प्रदेश👏on 7 January
- मनेन्द्रगढ़/एमसीबी: रंगों के पावन पर्व होली पर इस बार नई लेटरी वार्ड नंबर 9 का गणेश पंडाल भक्ति, उल्लास और लोकसंस्कृति की मधुर स्वर लहरियों से सराबोर हो उठा। वार्ड के पार्षद विकास दीवान के प्रयासों से आयोजित विशेष फगवा गीत कार्यक्रम ने पूरे नगर को एक भावनात्मक उत्सव में बांध दिया। मशहूर उधनापुर की फगवा गीत टीम जब मंच पर पहुंची तो ढोल-मंजीरे की थाप के साथ वातावरण में ऐसा रंग घुला कि हर चेहरा मुस्कान से खिल उठा। वहीं धरती माता टीम ने भगवा कर्मा और सैला गीतों की प्रस्तुति देकर लोक परंपरा की जीवंत झलक पेश की। उनके सुरों में मिट्टी की खुशबू और संस्कृति की आत्मा साफ झलक रही थी। नई लेटरी वार्ड नंबर 9 के गणेश पंडाल में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में नगरवासियों की भारी भीड़ उमड़ी। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई फगवा गीतों की मस्ती में झूमता नजर आया। तालियों की गड़गड़ाहट और “होली है” के उल्लासपूर्ण स्वर देर रात तक गूंजते रहे। यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज को एक सूत्र में पिरोने वाला भावनात्मक उत्सव बन गया। होली की इस मधुर संध्या ने यह साबित कर दिया कि जब लोकगीतों की धुन बजती है, तो दिलों की दूरियां अपने आप मिट जाती हैं और पूरा शहर एक परिवार की तरह रंगों में रंग जाता है।4
- मनेंद्रगढ़–चिरमिरी–भरतपुर जिला रिपोर्टर: मनोज श्रीवास्तव मनेंद्रगढ़–चिरमिरी–भरतपुर जिले के आदिवासी बहुल इलाकों में आज भी सदियों पुरानी परंपराएं जीवित हैं। होली पर्व से पहले जनकपुर क्षेत्र में बैगा समाज द्वारा निभाई जाने वाली निकारि प्रथा के जरिए गांव की सुरक्षा और खुशहाली की कामना की जाती है। ग्रामीणों का विश्वास है कि इस परंपरा से गांव आपदा और महामारी से सुरक्षित रहता है। भरतपुर विकासखंड के जनकपुर क्षेत्र में होली से पूर्व निकारि प्रथा पूरे विधि-विधान से निभाई जाती है। यह परंपरा बैगा समाज की आस्था से जुड़ी है, जिसे गांव की सामूहिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि इस अनुष्ठान से हैजा, कॉलरा जैसी गंभीर बीमारियों और नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश गांव में नहीं होता। जनकपुर निवासी पुजारी गरीबा मौर्य बताते हैं कि जब से गांव बसा है, तब से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है। होली से पहले और डांग न गढ़ने के पूर्व यह विशेष अनुष्ठान किया जाता है। गांव के प्रत्येक चौक-चौराहे पर यह प्रक्रिया पूरी की जाती है, जिसमें पूरे गांव की सहभागिता रहती है। निकारि प्रथा हमारे गांव की बहुत पुरानी परंपरा है। इसे करने से गांव में बीमारी नहीं फैलती और सब लोग सुरक्षित रहते हैं। हम सब मिलकर इसमें सहयोग करते हैं। निकारि प्रथा के तहत बैगा द्वारा मुर्गी चराई जाती है और बाद में उसे गांव की सीमा के बाहर, नदी के उस पार छोड़ दिया जाता है। मान्यता है कि इससे सारी विपत्तियां गांव से बाहर चली जाती हैं। इस दौरान ग्रामीण बैगा को अखत, झाड़ू और अन्य पूजन सामग्री प्रदान करते हैं। यह परंपरा गांव को आपदा और बीमारियों से बचाने के लिए की जाती है। यह सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि गांव की एकता और सामूहिक सुरक्षा का प्रतीक है।” ग्रामीणों का विश्वास है कि निकारि प्रथा से गांव में शांति, समृद्धि और निरोगी जीवन बना रहता है। जनकपुर क्षेत्र में आज भी परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसी लोक आस्थाएं समाज को एक सूत्र में बांधे हुए हैं। आस्था, परंपरा और सामूहिक विश्वास—निकारि प्रथा आज भी जनकपुर गांव की पहचान बनी हुई है।1
- बैकुंठपुर /कोरिया मुख्यालय बैकुंठपुर में पुलिस अधीक्षक के निर्देशन पर आम जनता के सुरक्षा हेतु होली के पावन पर्व पर कोरिया पुलिस के द्वारा कई गाड़ियों में लदे पुलिस जवान बैकुंठपुर के एक-एक गली मोहल्ला समूचे पूरे कोरिया जिले में अस्त्र शस्त्र से तैनात होकर होली की त्यौहार शातिपूर्वक मनाने के लिए यह रैली शान्ति सद भावना की कोरिया पुलिस ने संदेश दिया आइये जानते है पुलिस की तैनाती रैली कैसी रही1
- सूरजपुर, दिनांक 02 मार्च 2026 को सूरजपुर के मंगल भवन में आगामी माता कर्मा जयंती को लेकर सरगुजा संभाग के 6 जिले के सामाजिक बंधुओं को संबोधित करते हुए साहू समाज प्रदेश के मुखिया माननीय निरेंद्र साहू जी ने कहा कि हमारे समाज की आराध्य देवी माता कर्मा की प्रदेश स्तरीय जयंती सरगुजा संभाग में धूमधाम से मनाई जाएगी। प्रदेश ने निर्णय लिया है कि प्रदेश के सभी संभागों में साहू समाज के संत महात्माओं की जयंतियां अलग-अलग संभाग में मनाई जाएगी छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज के बाद सबसे बड़ा साहू समाज है जो पूरे छत्तीसगढ़ में फैला हुआ है मैं गांव-गांव में समाज के जागरूकता का संदेश लेकर जाऊंगा और अंतिम व्यक्ति तक समरसता एवं भाईचारा का संदेश देने का प्रयास करूंगा। समाज मैं व्याप्त कुरीतियों, नशा पान को जड़ से समूल नष्ट करना है जो सामाजिक बंधु इस कार्य में मेरा साथ देना चाहते हैं मेरे साथ चल सकते हैं। इस बैठक में जो जिलाध्यक्ष उपस्थित हैं वह इस जागरूकता के संदेश को कर्मा रथ के माध्यम से गांव-गांव में जाकर अलख जगाने का प्रयास करें। हमारे समाज को जो राजनीतिक पार्टियां आगे बढ़ाएंगी हमारा समाज उनका सहयोग करेगा अन्यथा सबक भी सिखाएंगे। संभाग से आए समस्त जनों का उन्होंने आभार व्यक्त किया। स्वागत भाषण देते हुए जिले के पूर्व जिला अध्यक्ष एवं वर्तमान साहू समाज के संरक्षक रामकृपाल साहू ने कहा जब से प्रदेश का नेतृत्व डॉक्टर निरेंद्र साहू जी संभाले हैं उन्होंने शादियों में प्री वेडिंग सूट को तत्काल प्रतिबंधित कर दिया है एवं हमारे समाज के महापुरुषों की जयंतियां प्रदेश के सभी संभागों में प्रदेश स्तरीय मनाने का निर्णय लिया है जिसके लिए उनकी सोच को मैं हृदय से धन्यवाद देता हूं इस प्रकार के कार्यक्रम करने से सुदूर क्षेत्रों में भी समाज के लोगों में जागरूकता एवं अपने इतिहास को जानने का अवसर प्राप्त होगा। प्रदेश स्तरीय कर्मा जयंती का आयोजन सूरजपुर जिले में तय करने के लिए उन्होंने संभाग के सभी जिला अध्यक्ष की सहमति एवं प्रदेश नेतृत्व को आभार व्यक्त किया और कहा की संभाग के सभी जिले से भारी संख्या में सामाजिक जन इस वृहद प्रदेश स्तरीय कर्मा जयंती कार्यक्रम में उपस्थित होंगे। कार्यक्रम को प्रदेश साहू संघ के डॉक्टर सुनील साहू ने संबोधित करते हुए कहा कि आज यह उपस्थित भीड़ सरगुजा संभाग में आयोजित कर्मा जयंती के कार्यक्रम को सफल बनाएगी ऐसा मुझे विश्वास है उन्होंने कहा हम प्रदेश अध्यक्ष जी के साथ प्रदेश के सभी जिलों में जाकर साहू समाज की एकजुटता का प्रयास कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ का नेतृत्व इस बात की चिंता कर रहा है कि हमारे समाज को संख्या के आधार पर राजनीतिक क्षेत्र में भी भागीदारी बढ़े। कार्यक्रम का सफल संचालन राजेश साहू ने किया एवं एवं सूरजपुर जिला अध्यक्ष राम लल्लू साहू ने उपस्थित सामाजिक बंधुओं को धन्यवाद दिया। इस अवसर पर सरगुजा के जिला अध्यक्ष केके गुप्ता, जशपुर के जिला अध्यक्ष सुरेंद्र गुप्ता, बलरामपुर के जिला अध्यक्ष बंसीधर गुप्ता, कोरिया के जिला अध्यक्ष जगदीश साहू, एमसी के जिला अध्यक्ष मनमोहन साहू, वरिष्ठ सामाजिक जनों में बनारसी लाल गुप्ता, रामविलास साहू, रामजतन साहू, लक्ष्मी गुप्ता, रामसेवक गुप्ता, मधुसूदन साहू, मार्तंड साहू, जोखनलाल साहू, गैबी नाथ साहू, सुभाष साहू, प्रयागराज साहू, डॉ मोहन साहू, रामकृपाल साहू रामू,प्रकाश साहू, सुरेश साहू, सुशील कुमार साहू, राम शिरोमणि साहू, उमाशंकर साहू, रामनिवास साहू, अशोक कुमार साहू, सौरभ साहू, मुकेश साहू छोटू, सुनील साहू, प्रदीप साहू, राम शिरोमणि साहू, राम प्राण साहू, बिरजा राम साहू, राजपाल साहू, रमेश कुमार साहू, बंसीलाल साहू, राजेश कुमार साहू, जिला मीडिया से सौरभ साहू मोंटू, जिला मीडिया से सुरेंद्र साहू, संदीप साहू, राजेश साहू, कमलेश साहू, सत्यम साहू, संतोष साहू, वीरेंद्र साहू, अर्चना साहू, विजय साहू मनीष दीपक साहू,आदित्य नारायण साहू, चंद्रभूषण साहू, अनिल साहू, रामकरण साहू, विष्णु साहू, जनक लाल गुप्ता, दिनेश साहू,महेंद्र साहू, उपेंद्र गुप्ता, प्रदेश से गोपाल साहू, जयप्रकाश साहू, सहित समाज के भारी संख्या में लोग उपस्थित रहे।1
- Post by द कहर न्यूज़ एजेंसी1
- सूचना का अधिकार बनाम प्रशासनिक मानसिकता: मेन्द्राकला मंडी प्रकरण से उठते सवाल लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था का मूल तत्व है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 इसी उद्देश्य से अस्तित्व में आया था — ताकि नागरिक सरकार से प्रश्न पूछ सके और शासन जवाबदेह बने। परंतु जब स्वयं सार्वजनिक संस्थान सूचना देने से बचते दिखाई दें, तो यह केवल एक कार्यालय का मुद्दा नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था की सोच पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले, अंबिकापुर स्थित कृषि उपज मंडी समिति मेन्द्रा कला से जुड़ा हालिया प्रकरण इसी बहस को पुनः जीवित करता है। मुद्दा केवल 7230 रुपये का नहीं आरटीआई आवेदन के माध्यम से पिछले दो वर्षों के टेंडर, भुगतान, एमबी बुक, सब्सिडी एवं अन्य प्रशासनिक दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई। जवाब में कार्यालय ने 3615 पृष्ठों की प्रतिलिपि बताकर 7230 रुपये शुल्क जमा करने का निर्देश दिया। कानूनन प्रति पृष्ठ निर्धारित शुल्क लिया जा सकता है — यह व्यवस्था का हिस्सा है। परंतु प्रश्न यह है कि जब सूचना डिजिटल रूप में उपलब्ध कराई जा सकती है, तब केवल छायाप्रति के रूप में देने पर जोर क्यों? क्या यह तकनीकी सुविधा का अभाव है, या प्रक्रिया को जटिल बनाने की प्रवृत्ति? सूचना का अधिकार केवल कागजों का लेन-देन नहीं, बल्कि पारदर्शिता का माध्यम है। यदि सूचना देने की प्रक्रिया ही इतनी महंगी और बोझिल बना दी जाए कि आम नागरिक पीछे हट जाए, तो कानून का उद्देश्य कैसे पूरा होगा? धारा 4(1)(b) की आत्मा आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1)(b) सार्वजनिक प्राधिकरणों को कई जानकारियां स्वतः सार्वजनिक करने का निर्देश देती है। टेंडर, भुगतान, कार्यादेश और बैठकों के निर्णय — ये सभी ऐसी सूचनाएं हैं जिन्हें नियमित रूप से वेबसाइट या सूचना पट्ट पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यदि दो वर्षों की जानकारी 3615 पृष्ठों में फैली है, तो यह भी विचारणीय है कि क्या इनका नियमित डिजिटलीकरण और सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ? यदि नहीं, तो क्यों? प्रशासनिक प्रशिक्षण और संवेदनशीलता मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें अधिकारी द्वारा आरटीआई की धाराओं की जानकारी न होने संबंधी कथन सुनाई देता है। यदि ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रुटि नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और जवाबदेही की कमी का संकेत है। जन सूचना अधिकारी का दायित्व मात्र आवेदन स्वीकार करना नहीं, बल्कि अधिनियम की भावना को समझते हुए नागरिक को सहयोग देना है। “जैसा अधिकारी कहेगा वैसा होगा” जैसी मानसिकता पारदर्शी शासन के सिद्धांत से मेल नहीं खाती। बड़ा प्रश्न: क्या व्यवस्था पारदर्शिता से सहज है? यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध आरोप का विषय नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रश्न का संकेत है — क्या हमारी संस्थाएं पारदर्शिता को सहजता से स्वीकार कर पा रही हैं? यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हुई हैं, तो सूचना उपलब्ध कराने में संकोच क्यों? यदि टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी है, तो दस्तावेज साझा करने में हिचक क्यों? लोकतंत्र में विश्वास दस्तावेजों से बनता है, बयानों से नहीं। आगे क्या? ऐसे मामलों में आवश्यक है कि: विभागीय स्तर पर पारदर्शिता की समीक्षा हो डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली को अनिवार्य बनाया जाए जन सूचना अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण हो स्वप्रकाशन (Proactive Disclosure) को सख्ती से लागू किया जाए सूचना का अधिकार कोई एहसान नहीं, बल्कि नागरिक का विधिक अधिकार है। शासन की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह सवालों से कितना सहज है। मेन्द्राकला मंडी प्रकरण एक अवसर भी है — व्यवस्था आत्ममंथन करे और पारदर्शिता को कागजों से निकालकर व्यवहार में उतारे। कृषि उपज मंडी मेंड्राकलां अंबिकापुर सरगुजा छत्तीसगढ़ सचिव प्रभु दयाल सिंह कार्यकारी अभियंता ओबीएस टोप्पो6
- 🎥 स्पेशल रिपोर्ट – धान खरीदी में जिम्मेदार कौनइंट्रो (तेज और सीधे सवाल): किसान धान लेकर खरीदी केंद्र पहुंचा… लेकिन नाम सूची में नहीं! टोकन नहीं कटा… धान नहीं बिका… और लाखों का नुकसान! अब बड़ा सवाल – आखिर जिम्मेदार कौन? 📌 मामला क्या है? ग्राम लहपटरा, जनपद लखनपुर के किसान देवप्रसाद का आरोप है कि 55 क्विंटल 60 किलो धान बेचने के लिए परेशान!! बावजूद सूची में नाम नहीं होने का हवाला देकर टोकन नहीं काटा गया। सरकारी दर 2100 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से लगभग ₹1,16,760 रुपये का भुगतान मिलना था। आरोप है कि संबंधित पटवारी भारत सिंह की भूमिका संदिग्ध है। 🎯 बड़ा सवाल – धान खरीदी में पटवारी का काम क्या? ❓ सवाल 1: क्या पटवारी सीधे धान खरीदता है? 👉 नहीं। धान की तौल और भुगतान समिति/खरीदी केंद्र करता है। ❓ सवाल 2: क्या पटवारी की भूमिका होती है? 👉 हाँ। जमीन और रकबे का सत्यापन किसान पंजीयन का मिलान खसरा रिकॉर्ड की पुष्टि सूची में नाम जोड़ने/सत्यापन में सहयोग ❓ सवाल 3: अगर सूची में नाम नहीं था तो जिम्मेदार कौन? 👉 अगर पंजीयन या रकबा सत्यापन में गलती है, तो पटवारी की भूमिका जांच के दायरे में आती है। 👉 अगर तकनीकी या समिति स्तर की त्रुटि है, तो खरीदी केंद्र प्रबंधन जिम्मेदार हो सकता है। 🎤 किसान का आरोप देवप्रसाद का कहना है कि समय पर पहुंचने के बावजूद टोकन नहीं कटा, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हुआ। उन्होंने एमडी न्यूज के माध्यम से निष्पक्ष जांच और मुआवजे की मांग की है। ⚖ अब प्रशासन से सवाल क्या किसान का पंजीयन सही था? सूची से नाम क्यों गायब था? किसकी लापरवाही से ₹1 लाख से ज्यादा का नुकसान हुआ? क्या जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई होगआउट्रो (दमदार): किसान की मेहनत से समझौता नहीं हो सकता। अब देखना होगा – जांच होगी या मामला दबेगा? कैमरामैन के साथ ________, एमडी न्यूज।1
- एमसीबी जिले के भरतपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत घटई में अवैध रेत उत्खनन के खिलाफ ग्रामीणों का गुस्सा आज सड़कों पर दिखाई दिया। वर्षों से चल रहे गैरकानूनी उत्खनन से परेशान ग्रामीणों ने एकजुट होकर खदान स्थल पर उग्र आंदोलन करने पहुंचे लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया गया और खदान को बंद करा दिया। मनेंद्रगढ़–चिरमिरी–भरतपुर जिला के भरतपुर विकासखंड की ग्राम पंचायत घटई नदी में अवैध रेत उत्खनन को लेकर ग्रामीणों का आक्रोश फूट पड़ा। बड़ी संख्या में ग्रामीण खदान स्थल पर पहुंचे और तत्काल कार्रवाई की मांग करते हुए काम बंद करा दिया। ग्रामीणों ने जिला पंचायत सदस्य एवं कृषि स्थायी समिति की सभापति श्रीमती सुखमंती सिंह को मौके पर बुलाया। साथ ही ग्राम पंचायत घटई के सरपंच विजय सिंह और पंच भी घटनास्थल पर पहुंचे। निरीक्षण के दौरान खुलासा हुआ कि बिना वैध अनुमति के नदी में पोकलेन मशीन उतारकर रेत उत्खनन किया जा रहा था। मौके पर किसी भी प्रकार के वैध दस्तावेज मौजूद नहीं थे। अनियमितताएं सामने आने के बाद सरपंच विजय सिंह ने तत्काल कार्रवाई करते हुए प्रति हाइवा वाहन पर 10 हजार रुपये और पोकलेन मशीन पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। साथ ही सभी वाहनों को ग्राम पंचायत परिसर में खड़ा कराने का आदेश दिया गया। सरपंच ने पोकलेन चालक को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि बिना अनुमति नदी में मशीन डालना पूरी तरह अवैध है और नियमों का उल्लंघन किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मामले की सूचना माइनिंग अधिकारी, एसडीएम और जनकपुर थाना प्रभारी को दी गई। सूचना मिलते ही कुंवारपुर पुलिस चौकी प्रभारी रविनंद सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया। जिला पंचायत सदस्य सुखमंती सिंह ने वाहनों को पुलिस के सुपुर्द करने की बात कही और ग्रामीणों से शांति बनाए रखने की अपील की। अवैध रेत उत्खनन से नदी का स्वरूप बिगड़ रहा है, पर्यावरण को नुकसान हो रहा है।1