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जशपुर पुलिस कि अपील...🙏 त्योहार मनाएं शांति, सुरक्षा और जिम्मेदारी के साथ… वरना होली थाने में भी मन सकती है। जिला पुलिस जशपुर (छ.ग.) आपकी सेवा एवं सुरक्षा में सदैव तत्पर त्योहार मनाएं शांति, सुरक्षा और जिम्मेदारी के साथ… वरना होली थाने में भी मन सकती है जोश में होश न खोएं। सड़क, सार्वजनिक स्थान और सोशल मीडिया — हर जगह कानून लागू है। कानून तोड़ा तो कार्यवाही और गिरफ्तारी निश्चित है। सुरक्षित, सौहार्दपूर्ण एवं उल्लासपूर्ण होली के लिए इन जरूरी बातों का रखें ध्यान।

10 hrs ago
user_क्राइम कण्ट्रोल न्यूज़ सी.सी.एफ
क्राइम कण्ट्रोल न्यूज़ सी.सी.एफ
Media company सन्ना, जशपुर, छत्तीसगढ़•
10 hrs ago

जशपुर पुलिस कि अपील...🙏 त्योहार मनाएं शांति, सुरक्षा और जिम्मेदारी के साथ… वरना होली थाने में भी मन सकती है। जिला पुलिस जशपुर (छ.ग.) आपकी सेवा एवं सुरक्षा में सदैव तत्पर त्योहार मनाएं शांति, सुरक्षा और जिम्मेदारी के साथ… वरना होली थाने में भी मन सकती है जोश में होश न खोएं। सड़क, सार्वजनिक स्थान और सोशल मीडिया — हर जगह कानून लागू है। कानून तोड़ा तो कार्यवाही और गिरफ्तारी निश्चित है। सुरक्षित, सौहार्दपूर्ण एवं उल्लासपूर्ण होली के लिए इन जरूरी बातों का रखें ध्यान।

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  • *नारे 'पढ़ेगा इंडिया' के, काम 'मजदूरी' के चैनपुर के स्कूलों में पढ़ाई छोड़ मिड-डे मील बना रहे मासूम* चैनपुर: सरकार एक तरफ 'पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया' जैसे नारों पर करोड़ों रुपये खर्च कर शिक्षा का स्तर सुधारने का दावा कर रही है, वहीं चैनपुर प्रखंड में धरातल पर हकीकत बेहद शर्मनाक है। यहाँ के दो विद्यालयों राजकीय उत्क्रमिक उच्च विद्यालय भठौली और राजकीयकृत मध्य विद्यालय सिलफरी में शिक्षा के अधिकार की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। रसोइया संयोजिका का हड़ताल जाते ही। बच्चों से खाना बनवाया जा रहा है । *कलम छोड़ चूल्हा फूंक रहे नौनिहा* ताजा मामले के अनुसार, रसोइया संयोजिका के अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने के बाद विद्यालय प्रबंधन ने कोई वैकल्पिक व्यवस्था करने के बजाय मासूम बच्चों को ही रसोई के काम में झोंक दिया है। जिस उम्र में बच्चों को क्लासरूम में होना चाहिए, वहां वे धुएं के बीच मिड-डे मील तैयार करते नजर आए। *मीडिया को देख मची अफरा-तफरी, सच छिपाने की कोशिश* जब मीडिया की टीम विद्यालय पहुंची, तो वहां का नजारा देख प्रबंधन के हाथ-पांव फूल गए। कैमरे को देखते ही आनन-फानन में बच्चों को रसोई घर से बाहर निकाला गया। सूत्रों के अनुसार, शिक्षकों ने बच्चों को मीडिया के सामने मुँह न खोलने की सख्त हिदायत भी दी, जो स्पष्ट रूप से मामले को रफा-दफा करने की कोशिश दर्शाता है।हैरानी की बात यह है कि विद्यालय प्रशासन अपनी गलती मानने के बजाय इसे 'मदद' का नाम दे रहा है।म.वि. सिलफरी शिक्षिका नीलप्रभा इनका कहना है कि बच्चों से खाना नहीं बनवाया जा रहा था, बल्कि केवल "सहायता" ली जा रही थी।भठौली की शिक्षिका का तर्क था कि ब्रेक के दौरान बच्चों को केवल कुछ काम के लिए बुलाया गया था।
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    *नारे 'पढ़ेगा इंडिया' के, काम 'मजदूरी' के चैनपुर के स्कूलों में पढ़ाई छोड़ मिड-डे मील बना रहे मासूम* 
चैनपुर: सरकार एक तरफ 'पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया' जैसे नारों पर करोड़ों रुपये खर्च कर शिक्षा का स्तर सुधारने का दावा कर रही है, वहीं चैनपुर प्रखंड में धरातल पर हकीकत बेहद शर्मनाक है। यहाँ के दो विद्यालयों राजकीय उत्क्रमिक उच्च विद्यालय भठौली और राजकीयकृत मध्य विद्यालय सिलफरी में शिक्षा के अधिकार की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। रसोइया संयोजिका का हड़ताल जाते ही। बच्चों से खाना बनवाया जा रहा है ।
*कलम छोड़ चूल्हा फूंक रहे नौनिहा* 
ताजा मामले के अनुसार, रसोइया संयोजिका के अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने के बाद विद्यालय प्रबंधन ने कोई वैकल्पिक व्यवस्था करने के बजाय मासूम बच्चों को ही रसोई के काम में झोंक दिया है। जिस उम्र में बच्चों को क्लासरूम में होना चाहिए, वहां वे धुएं के बीच मिड-डे मील तैयार करते नजर आए।
*मीडिया को देख मची अफरा-तफरी, सच छिपाने की कोशिश* 
जब मीडिया की टीम विद्यालय पहुंची, तो वहां का नजारा देख प्रबंधन के हाथ-पांव फूल गए। कैमरे को देखते ही आनन-फानन में बच्चों को रसोई घर से बाहर निकाला गया। सूत्रों के अनुसार, शिक्षकों ने बच्चों को मीडिया के सामने मुँह न खोलने की सख्त हिदायत भी दी, जो स्पष्ट रूप से मामले को रफा-दफा करने की कोशिश दर्शाता है।हैरानी की बात यह है कि विद्यालय प्रशासन अपनी गलती मानने के बजाय इसे 'मदद' का नाम दे रहा है।म.वि. सिलफरी शिक्षिका नीलप्रभा  इनका कहना है कि बच्चों से खाना नहीं बनवाया जा रहा था, बल्कि केवल "सहायता" ली जा रही थी।भठौली की शिक्षिका का तर्क था कि ब्रेक के दौरान बच्चों को केवल कुछ काम के लिए बुलाया गया था।
    user_चैनपुर अपडेट
    चैनपुर अपडेट
    Classified ads newspaper publisher चैनपुर, गुमला, झारखंड•
    3 hrs ago
  • Post by Sunil Gupta
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    Post by Sunil Gupta
    user_Sunil Gupta
    Sunil Gupta
    सीतापुर, सरगुजा, छत्तीसगढ़•
    18 hrs ago
  • नगर में लंबी बाइक रैली निकाली गई। ढोल-ताशों, कर्मा नृत्य और “जय जूदेव” के नारों से पूरा कांसाबेल गूंज उठा। दुर्गा मंदिर में दर्शन के बाद भाजपा कार्यालय में उनका विधिवत स्वागत किया गया। सभा को संबोधित करते हुए श्री जूदेव ने कहा – “आप लोगों के लिए आधी रात भी जरूरत पड़े तो मैं उपस्थित रहूंगा।” कार्यक्रम में भाजपा, युवा मोर्चा, महिला मोर्चा सहित अनेक पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की गरिमामयी उपस्थिति रही। 👉 ऐसी ही राजनीतिक और स्थानीय खबरों के लिए जुड़े रहें Jashpur Times – सच सब तक #VijayAdityaSinghJudev #BJYM #Kansabel #Jashpur #JashpurTimes
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    नगर में लंबी बाइक रैली निकाली गई। ढोल-ताशों, कर्मा नृत्य और “जय जूदेव” के नारों से पूरा कांसाबेल गूंज उठा।
दुर्गा मंदिर में दर्शन के बाद भाजपा कार्यालय में उनका विधिवत स्वागत किया गया। सभा को संबोधित करते हुए श्री जूदेव ने कहा –
“आप लोगों के लिए आधी रात भी जरूरत पड़े तो मैं उपस्थित रहूंगा।”
कार्यक्रम में भाजपा, युवा मोर्चा, महिला मोर्चा सहित अनेक पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की गरिमामयी उपस्थिति रही।
👉 ऐसी ही राजनीतिक और स्थानीय खबरों के लिए जुड़े रहें Jashpur Times – सच सब तक
#VijayAdityaSinghJudev
#BJYM
#Kansabel
#Jashpur
#JashpurTimes
    user_Ibnul khan
    Ibnul khan
    Media house कांसबेल, जशपुर, छत्तीसगढ़•
    21 hrs ago
  • शंकरगढ़ वन परिक्षेत्र में ग्रामीणों ने किया अवैध कब्जा वन परिक्षेत्र के भूमि पर जंगलों को काटकर किया अतिक्रमण तो वही मकान भी हुआ निर्माण
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    शंकरगढ़ वन परिक्षेत्र में ग्रामीणों ने किया अवैध कब्जा  वन परिक्षेत्र के  भूमि पर जंगलों को काटकर किया अतिक्रमण तो वही मकान भी हुआ निर्माण
    user_Vijay Singh
    Vijay Singh
    बलरामपुर, बलरामपुर, छत्तीसगढ़•
    56 min ago
  • बलरामपुर जिले के रामानुजगंज थाना क्षेत्र से मारपीट का एक मामला सामने आया है। 1 मार्च को लरंगसाय चौक स्थित एक फल दुकान पर हुए विवाद का सीसीटीवी फुटेज अब सामने आया है, जिसमें एक व्यक्ति महिला दुकान संचालक के साथ हाथापाई और धक्का-मुक्की करता दिखाई दे रहा है। पीड़ित महिला अंजली गुप्ता ने थाने में शिकायत दर्ज कराई है। उनका आरोप है कि मारपीट के दौरान आरोपी ने गलत नीयत से उन्हें पकड़ने की भी कोशिश की। महिला का कहना है कि घटना अचानक हुई और वह इससे काफी आहत हैं। बताया जा रहा है कि मारपीट करने वाले व्यक्ति का नाम संजय केसरी है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, पूरा मामला उधारी के पैसे के लेन-देन से जुड़ा हुआ है। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद बढ़ा, जो बाद में मारपीट में बदल गया। घटना का वीडियो सामने आने के बाद स्थानीय लोगों में भी चर्चा तेज हो गई है। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामले की जांच शुरू कर दी है और सीसीटीवी फुटेज को साक्ष्य के रूप में लिया गया है। अब देखना होगा कि जांच के बाद पुलिस क्या कार्रवाई करती है।
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    बलरामपुर जिले के रामानुजगंज थाना क्षेत्र से मारपीट का एक मामला सामने आया है। 1 मार्च को लरंगसाय चौक स्थित एक फल दुकान पर हुए विवाद का सीसीटीवी फुटेज अब सामने आया है, जिसमें एक व्यक्ति महिला दुकान संचालक के साथ हाथापाई और धक्का-मुक्की करता दिखाई दे रहा है।
पीड़ित महिला अंजली गुप्ता ने थाने में शिकायत दर्ज कराई है। उनका आरोप है कि मारपीट के दौरान आरोपी ने गलत नीयत से उन्हें पकड़ने की भी कोशिश की। महिला का कहना है कि घटना अचानक हुई और वह इससे काफी आहत हैं।
बताया जा रहा है कि मारपीट करने वाले व्यक्ति का नाम संजय केसरी है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, पूरा मामला उधारी के पैसे के लेन-देन से जुड़ा हुआ है। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद बढ़ा, जो बाद में मारपीट में बदल गया।
घटना का वीडियो सामने आने के बाद स्थानीय लोगों में भी चर्चा तेज हो गई है। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामले की जांच शुरू कर दी है और सीसीटीवी फुटेज को साक्ष्य के रूप में लिया गया है।
अब देखना होगा कि जांच के बाद पुलिस क्या कार्रवाई करती है।
    user_Balrampur
    Balrampur
    Local News Reporter बलरामपुर, बलरामपुर, छत्तीसगढ़•
    1 hr ago
  • पुलिस आरक्षक ही निकले गांजा तस्कर: जशपुर में दो आरक्षकों समेत 4 गिरफ्तार, भारी मात्रा में गांजा जप्त जशपुर नगर के विवेकानंद कॉलोनी में पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए गांजा तस्करी के बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है। मुखबिर की सटीक सूचना पर थाना कोतवाली की टीम ने कॉलोनी में किराए के मकान में रह रहे रवि विश्वकर्मा के ठिकाने पर रेड मारी, जहाँ एक पेटी में छिपाकर रखे गए कुल 24 पैकेट अवैध गांजा बरामद किए गए। पूछताछ के दौरान आरोपी रवि ने खुलासा किया कि उसने यह खेप गोविंद उर्फ सुनील भगत के कहने पर और पैसों के लालच में अपने घर में रखी थी। इसके बाद पुलिस ने मुख्य आरोपी गोविंद को हिरासत में लेकर कड़ाई से पूछताछ शुरू की। इस मामले में सबसे सनसनीखेज खुलासा तब हुआ जब आरोपी गोविंद ने पुलिस विभाग के ही दो आरक्षकों की इस तस्करी में संलिप्तता की बात कबूली। जांच में पाया गया कि थाना तपकरा के आरक्षक क्रमांक 581 धीरेंद्र मधुकर (उम्र 37 वर्ष), पिता करताल सिंह और आरक्षक क्रमांक 392 अमित त्रिपाठी (उम्र 35 वर्ष), पिता स्वर्गीय राजदेव त्रिपाठी, इस अवैध कारोबार में तस्करों के साथ मिलकर काम कर रहे थे। विभाग के इन रक्षकों द्वारा ही कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए गांजा तस्करी को अंजाम दिया जा रहा था, जिसके पुख्ता प्रमाण मिलने पर पुलिस ने दोनों आरक्षकों को तत्काल गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने इस पूरे प्रकरण में रवि विश्वकर्मा, सुनील भगत और दोनों पुलिस आरक्षकों—धीरेंद्र मधुकर व अमित त्रिपाठी के विरुद्ध थाना जशपुर में अपराध क्रमांक 74/26 के तहत धारा 20 (B) एनडीपीएस (NDPS) एक्ट दर्ज किया है। जप्त किए गए 24 पैकेट गांजा और आरोपियों के बयानों के आधार पर सभी को न्यायालय में पेश किया गया, जहाँ से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा (जेल) में भेज दिया गया है। पुलिस विभाग के अपने ही कर्मचारियों की इस काली करतूत ने विभाग की छवि पर गहरा दाग लगा दिया है, जिससे महकमे में हड़कंप मचा हुआ है
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    पुलिस आरक्षक ही निकले गांजा तस्कर: जशपुर में दो आरक्षकों समेत 4 गिरफ्तार, भारी मात्रा में गांजा जप्त
जशपुर नगर के विवेकानंद कॉलोनी में पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए गांजा तस्करी के बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है। मुखबिर की सटीक सूचना पर थाना कोतवाली की टीम ने कॉलोनी में किराए के मकान में रह रहे रवि विश्वकर्मा के ठिकाने पर रेड मारी, जहाँ एक पेटी में छिपाकर रखे गए कुल 24 पैकेट अवैध गांजा बरामद किए गए। पूछताछ के दौरान आरोपी रवि ने खुलासा किया कि उसने यह खेप गोविंद उर्फ सुनील भगत के कहने पर और पैसों के लालच में अपने घर में रखी थी। इसके बाद पुलिस ने मुख्य आरोपी गोविंद को हिरासत में लेकर कड़ाई से पूछताछ शुरू की।
इस मामले में सबसे सनसनीखेज खुलासा तब हुआ जब आरोपी गोविंद ने पुलिस विभाग के ही दो आरक्षकों की इस तस्करी में संलिप्तता की बात कबूली। जांच में पाया गया कि थाना तपकरा के आरक्षक क्रमांक 581 धीरेंद्र मधुकर (उम्र 37 वर्ष), पिता करताल सिंह और आरक्षक क्रमांक 392 अमित त्रिपाठी (उम्र 35 वर्ष), पिता स्वर्गीय राजदेव त्रिपाठी, इस अवैध कारोबार में तस्करों के साथ मिलकर काम कर रहे थे। विभाग के इन रक्षकों द्वारा ही कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए गांजा तस्करी को अंजाम दिया जा रहा था, जिसके पुख्ता प्रमाण मिलने पर पुलिस ने दोनों आरक्षकों को तत्काल गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस ने इस पूरे प्रकरण में रवि विश्वकर्मा, सुनील भगत और दोनों पुलिस आरक्षकों—धीरेंद्र मधुकर व अमित त्रिपाठी के विरुद्ध थाना जशपुर में अपराध क्रमांक 74/26 के तहत धारा 20 (B) एनडीपीएस (NDPS) एक्ट दर्ज किया है। जप्त किए गए 24 पैकेट गांजा और आरोपियों के बयानों के आधार पर सभी को न्यायालय में पेश किया गया, जहाँ से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा (जेल) में भेज दिया गया है। पुलिस विभाग के अपने ही कर्मचारियों की इस काली करतूत ने विभाग की छवि पर गहरा दाग लगा दिया है, जिससे महकमे में हड़कंप मचा हुआ है
    user_Jarif Khan
    Jarif Khan
    अंबिकापुर, सरगुजा, छत्तीसगढ़•
    1 hr ago
  • आकांक्षी प्रखंड डुमरी के मॉडल ग्राम हुटाप में पीवीटीजी परिवारों को बकरी पालन से मिलेगी नई पहचान डुमरी (गुमला): आकांक्षी प्रखंड डुमरी के मॉडल ग्राम हुटाप के औरापाठ क्षेत्र में नीति आयोग द्वारा पोषित एवं गुमला जिला प्रशासन के नेतृत्व में संचालित “पहल (पाथ टू एडवांसमेंट एंड हॉलिस्टिक एक्शन फॉर लाइवलीहुड इन औरापाठ)” परियोजना के तहत सोमवार को पीवीटीजी परिवारों के बीच जीविकोपार्जन वृद्धि के उद्देश्य से बकरियों का वितरण किया गया। यह वितरण आईएसडीजी रिसर्च फाउंडेशन के माध्यम से किया गया। प्रथम बैच में नौ पीवीटीजी परिवारों को ब्लैक बंगाल नस्ल की एक-एक यूनिट बकरी (चार बकरी और एक बकरा) प्रदान की गई। परियोजना के अंतर्गत कुल चौंतीस पीवीटीजी परिवारों को बकरी पालन के व्यवसाय से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस पहल का उद्देश्य विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करना तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। बकरी पालन के माध्यम से परिवारों की नियमित आय सुनिश्चित करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। मौके पर आईएसडीजी रिसर्च फाउंडेशन के कार्यकर्ता नीरज गोप, आलोक मिश्रा, पीवीटीजी समुदाय के कार्यकर्ता रमेश कोरवा, संदीप यादव सहित अन्य ग्रामीण उपस्थित थे।
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    आकांक्षी प्रखंड डुमरी के मॉडल ग्राम हुटाप में पीवीटीजी परिवारों को बकरी पालन से मिलेगी नई पहचान
डुमरी (गुमला): आकांक्षी प्रखंड डुमरी के मॉडल ग्राम हुटाप के औरापाठ क्षेत्र में नीति आयोग द्वारा पोषित एवं गुमला जिला प्रशासन के नेतृत्व में संचालित “पहल (पाथ टू एडवांसमेंट एंड हॉलिस्टिक एक्शन फॉर लाइवलीहुड इन औरापाठ)” परियोजना के तहत सोमवार को पीवीटीजी परिवारों के बीच जीविकोपार्जन वृद्धि के उद्देश्य से बकरियों का वितरण किया गया।
यह वितरण आईएसडीजी रिसर्च फाउंडेशन के माध्यम से किया गया। प्रथम बैच में नौ पीवीटीजी परिवारों को ब्लैक बंगाल नस्ल की एक-एक यूनिट बकरी (चार बकरी और एक बकरा) प्रदान की गई। परियोजना के अंतर्गत कुल चौंतीस पीवीटीजी परिवारों को बकरी पालन के व्यवसाय से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
इस पहल का उद्देश्य विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करना तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। बकरी पालन के माध्यम से परिवारों की नियमित आय सुनिश्चित करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
मौके पर आईएसडीजी रिसर्च फाउंडेशन के कार्यकर्ता नीरज गोप, आलोक मिश्रा, पीवीटीजी समुदाय के कार्यकर्ता रमेश कोरवा, संदीप यादव सहित अन्य ग्रामीण उपस्थित थे।
    user_चैनपुर अपडेट
    चैनपुर अपडेट
    Classified ads newspaper publisher चैनपुर, गुमला, झारखंड•
    20 hrs ago
  • सूचना का अधिकार बनाम प्रशासनिक मानसिकता: मेन्द्राकला मंडी प्रकरण से उठते सवाल लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था का मूल तत्व है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 इसी उद्देश्य से अस्तित्व में आया था — ताकि नागरिक सरकार से प्रश्न पूछ सके और शासन जवाबदेह बने। परंतु जब स्वयं सार्वजनिक संस्थान सूचना देने से बचते दिखाई दें, तो यह केवल एक कार्यालय का मुद्दा नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था की सोच पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले, अंबिकापुर स्थित कृषि उपज मंडी समिति मेन्द्रा कला से जुड़ा हालिया प्रकरण इसी बहस को पुनः जीवित करता है। मुद्दा केवल 7230 रुपये का नहीं आरटीआई आवेदन के माध्यम से पिछले दो वर्षों के टेंडर, भुगतान, एमबी बुक, सब्सिडी एवं अन्य प्रशासनिक दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई। जवाब में कार्यालय ने 3615 पृष्ठों की प्रतिलिपि बताकर 7230 रुपये शुल्क जमा करने का निर्देश दिया। कानूनन प्रति पृष्ठ निर्धारित शुल्क लिया जा सकता है — यह व्यवस्था का हिस्सा है। परंतु प्रश्न यह है कि जब सूचना डिजिटल रूप में उपलब्ध कराई जा सकती है, तब केवल छायाप्रति के रूप में देने पर जोर क्यों? क्या यह तकनीकी सुविधा का अभाव है, या प्रक्रिया को जटिल बनाने की प्रवृत्ति? सूचना का अधिकार केवल कागजों का लेन-देन नहीं, बल्कि पारदर्शिता का माध्यम है। यदि सूचना देने की प्रक्रिया ही इतनी महंगी और बोझिल बना दी जाए कि आम नागरिक पीछे हट जाए, तो कानून का उद्देश्य कैसे पूरा होगा? धारा 4(1)(b) की आत्मा आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1)(b) सार्वजनिक प्राधिकरणों को कई जानकारियां स्वतः सार्वजनिक करने का निर्देश देती है। टेंडर, भुगतान, कार्यादेश और बैठकों के निर्णय — ये सभी ऐसी सूचनाएं हैं जिन्हें नियमित रूप से वेबसाइट या सूचना पट्ट पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यदि दो वर्षों की जानकारी 3615 पृष्ठों में फैली है, तो यह भी विचारणीय है कि क्या इनका नियमित डिजिटलीकरण और सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ? यदि नहीं, तो क्यों? प्रशासनिक प्रशिक्षण और संवेदनशीलता मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें अधिकारी द्वारा आरटीआई की धाराओं की जानकारी न होने संबंधी कथन सुनाई देता है। यदि ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रुटि नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और जवाबदेही की कमी का संकेत है। जन सूचना अधिकारी का दायित्व मात्र आवेदन स्वीकार करना नहीं, बल्कि अधिनियम की भावना को समझते हुए नागरिक को सहयोग देना है। “जैसा अधिकारी कहेगा वैसा होगा” जैसी मानसिकता पारदर्शी शासन के सिद्धांत से मेल नहीं खाती। बड़ा प्रश्न: क्या व्यवस्था पारदर्शिता से सहज है? यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध आरोप का विषय नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रश्न का संकेत है — क्या हमारी संस्थाएं पारदर्शिता को सहजता से स्वीकार कर पा रही हैं? यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हुई हैं, तो सूचना उपलब्ध कराने में संकोच क्यों? यदि टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी है, तो दस्तावेज साझा करने में हिचक क्यों? लोकतंत्र में विश्वास दस्तावेजों से बनता है, बयानों से नहीं। आगे क्या? ऐसे मामलों में आवश्यक है कि: विभागीय स्तर पर पारदर्शिता की समीक्षा हो डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली को अनिवार्य बनाया जाए जन सूचना अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण हो स्वप्रकाशन (Proactive Disclosure) को सख्ती से लागू किया जाए सूचना का अधिकार कोई एहसान नहीं, बल्कि नागरिक का विधिक अधिकार है। शासन की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह सवालों से कितना सहज है। मेन्द्राकला मंडी प्रकरण एक अवसर भी है — व्यवस्था आत्ममंथन करे और पारदर्शिता को कागजों से निकालकर व्यवहार में उतारे। कृषि उपज मंडी मेंड्राकलां अंबिकापुर सरगुजा छत्तीसगढ़ सचिव प्रभु दयाल सिंह कार्यकारी अभियंता ओबीएस टोप्पो
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    सूचना का अधिकार बनाम प्रशासनिक मानसिकता: मेन्द्राकला मंडी प्रकरण से उठते सवाल
लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था का मूल तत्व है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 इसी उद्देश्य से अस्तित्व में आया था — ताकि नागरिक सरकार से प्रश्न पूछ सके और शासन जवाबदेह बने। परंतु जब स्वयं सार्वजनिक संस्थान सूचना देने से बचते दिखाई दें, तो यह केवल एक कार्यालय का मुद्दा नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था की सोच पर प्रश्नचिह्न बन जाता है।
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले, अंबिकापुर स्थित
कृषि उपज मंडी समिति मेन्द्रा कला
से जुड़ा हालिया प्रकरण इसी बहस को पुनः जीवित करता है।
मुद्दा केवल 7230 रुपये का नहीं
आरटीआई आवेदन के माध्यम से पिछले दो वर्षों के टेंडर, भुगतान, एमबी बुक, सब्सिडी एवं अन्य प्रशासनिक दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई। जवाब में कार्यालय ने 3615 पृष्ठों की प्रतिलिपि बताकर 7230 रुपये शुल्क जमा करने का निर्देश दिया।
कानूनन प्रति पृष्ठ निर्धारित शुल्क लिया जा सकता है — यह व्यवस्था का हिस्सा है। परंतु प्रश्न यह है कि जब सूचना डिजिटल रूप में उपलब्ध कराई जा सकती है, तब केवल छायाप्रति के रूप में देने पर जोर क्यों? क्या यह तकनीकी सुविधा का अभाव है, या प्रक्रिया को जटिल बनाने की प्रवृत्ति?
सूचना का अधिकार केवल कागजों का लेन-देन नहीं, बल्कि पारदर्शिता का माध्यम है। यदि सूचना देने की प्रक्रिया ही इतनी महंगी और बोझिल बना दी जाए कि आम नागरिक पीछे हट जाए, तो कानून का उद्देश्य कैसे पूरा होगा?
धारा 4(1)(b) की आत्मा
आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1)(b) सार्वजनिक प्राधिकरणों को कई जानकारियां स्वतः सार्वजनिक करने का निर्देश देती है। टेंडर, भुगतान, कार्यादेश और बैठकों के निर्णय — ये सभी ऐसी सूचनाएं हैं जिन्हें नियमित रूप से वेबसाइट या सूचना पट्ट पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
यदि दो वर्षों की जानकारी 3615 पृष्ठों में फैली है, तो यह भी विचारणीय है कि क्या इनका नियमित डिजिटलीकरण और सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ? यदि नहीं, तो क्यों?
प्रशासनिक प्रशिक्षण और संवेदनशीलता
मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें अधिकारी द्वारा आरटीआई की धाराओं की जानकारी न होने संबंधी कथन सुनाई देता है। यदि ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रुटि नहीं, बल्कि प्रशिक्षण और जवाबदेही की कमी का संकेत है।
जन सूचना अधिकारी का दायित्व मात्र आवेदन स्वीकार करना नहीं, बल्कि अधिनियम की भावना को समझते हुए नागरिक को सहयोग देना है। “जैसा अधिकारी कहेगा वैसा होगा” जैसी मानसिकता पारदर्शी शासन के सिद्धांत से मेल नहीं खाती।
बड़ा प्रश्न: क्या व्यवस्था पारदर्शिता से सहज है?
यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध आरोप का विषय नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रश्न का संकेत है —
क्या हमारी संस्थाएं पारदर्शिता को सहजता से स्वीकार कर पा रही हैं?
यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हुई हैं, तो सूचना उपलब्ध कराने में संकोच क्यों?
यदि टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी है, तो दस्तावेज साझा करने में हिचक क्यों?
लोकतंत्र में विश्वास दस्तावेजों से बनता है, बयानों से नहीं।
आगे क्या?
ऐसे मामलों में आवश्यक है कि:
विभागीय स्तर पर पारदर्शिता की समीक्षा हो
डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली को अनिवार्य बनाया जाए
जन सूचना अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण हो
स्वप्रकाशन (Proactive Disclosure) को सख्ती से लागू किया जाए
सूचना का अधिकार कोई एहसान नहीं, बल्कि नागरिक का विधिक अधिकार है। शासन की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह सवालों से कितना सहज है।
मेन्द्राकला मंडी प्रकरण एक अवसर भी है —
व्यवस्था आत्ममंथन करे और पारदर्शिता को कागजों से निकालकर व्यवहार में उतारे। 
कृषि उपज मंडी मेंड्राकलां  अंबिकापुर सरगुजा छत्तीसगढ़ सचिव प्रभु दयाल सिंह 
कार्यकारी अभियंता ओबीएस टोप्पो
    user_SUMIT KUMAR
    SUMIT KUMAR
    Newspaper publisher सरगुजा, सरगुजा, छत्तीसगढ़•
    9 hrs ago
  • 🎥 स्पेशल रिपोर्ट – धान खरीदी में जिम्मेदार कौनइंट्रो (तेज और सीधे सवाल): किसान धान लेकर खरीदी केंद्र पहुंचा… लेकिन नाम सूची में नहीं! टोकन नहीं कटा… धान नहीं बिका… और लाखों का नुकसान! अब बड़ा सवाल – आखिर जिम्मेदार कौन? 📌 मामला क्या है? ग्राम लहपटरा, जनपद लखनपुर के किसान देवप्रसाद का आरोप है कि 55 क्विंटल 60 किलो धान बेचने के लिए परेशान!! बावजूद सूची में नाम नहीं होने का हवाला देकर टोकन नहीं काटा गया। सरकारी दर 2100 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से लगभग ₹1,16,760 रुपये का भुगतान मिलना था। आरोप है कि संबंधित पटवारी भारत सिंह की भूमिका संदिग्ध है। 🎯 बड़ा सवाल – धान खरीदी में पटवारी का काम क्या? ❓ सवाल 1: क्या पटवारी सीधे धान खरीदता है? 👉 नहीं। धान की तौल और भुगतान समिति/खरीदी केंद्र करता है। ❓ सवाल 2: क्या पटवारी की भूमिका होती है? 👉 हाँ। जमीन और रकबे का सत्यापन किसान पंजीयन का मिलान खसरा रिकॉर्ड की पुष्टि सूची में नाम जोड़ने/सत्यापन में सहयोग ❓ सवाल 3: अगर सूची में नाम नहीं था तो जिम्मेदार कौन? 👉 अगर पंजीयन या रकबा सत्यापन में गलती है, तो पटवारी की भूमिका जांच के दायरे में आती है। 👉 अगर तकनीकी या समिति स्तर की त्रुटि है, तो खरीदी केंद्र प्रबंधन जिम्मेदार हो सकता है। 🎤 किसान का आरोप देवप्रसाद का कहना है कि समय पर पहुंचने के बावजूद टोकन नहीं कटा, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हुआ। उन्होंने एमडी न्यूज के माध्यम से निष्पक्ष जांच और मुआवजे की मांग की है। ⚖ अब प्रशासन से सवाल क्या किसान का पंजीयन सही था? सूची से नाम क्यों गायब था? किसकी लापरवाही से ₹1 लाख से ज्यादा का नुकसान हुआ? क्या जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई होगआउट्रो (दमदार): किसान की मेहनत से समझौता नहीं हो सकता। अब देखना होगा – जांच होगी या मामला दबेगा? कैमरामैन के साथ ________, एमडी न्यूज।
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    🎥 स्पेशल रिपोर्ट – धान खरीदी में जिम्मेदार कौनइंट्रो (तेज और सीधे सवाल):
किसान धान लेकर खरीदी केंद्र पहुंचा… लेकिन नाम सूची में नहीं!
टोकन नहीं कटा… धान नहीं बिका… और लाखों का नुकसान!
अब बड़ा सवाल – आखिर जिम्मेदार कौन?
📌 मामला क्या है?
ग्राम लहपटरा, जनपद लखनपुर के किसान देवप्रसाद का आरोप है कि 55 क्विंटल 60 किलो धान बेचने के लिए परेशान!! बावजूद सूची में नाम नहीं होने का हवाला देकर टोकन नहीं काटा गया।
सरकारी दर 2100 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से लगभग ₹1,16,760 रुपये का भुगतान मिलना था।
आरोप है कि संबंधित पटवारी भारत सिंह की भूमिका संदिग्ध है।
🎯 बड़ा सवाल – धान खरीदी में पटवारी का काम क्या?
❓ सवाल 1: क्या पटवारी सीधे धान खरीदता है?
👉 नहीं। धान की तौल और भुगतान समिति/खरीदी केंद्र करता है।
❓ सवाल 2: क्या पटवारी की भूमिका होती है?
👉 हाँ।
जमीन और रकबे का सत्यापन
किसान पंजीयन का मिलान
खसरा रिकॉर्ड की पुष्टि
सूची में नाम जोड़ने/सत्यापन में सहयोग
❓ सवाल 3: अगर सूची में नाम नहीं था तो जिम्मेदार कौन?
👉 अगर पंजीयन या रकबा सत्यापन में गलती है, तो पटवारी की भूमिका जांच के दायरे में आती है।
👉 अगर तकनीकी या समिति स्तर की त्रुटि है, तो खरीदी केंद्र प्रबंधन जिम्मेदार हो सकता है।
🎤 किसान का आरोप
देवप्रसाद का कहना है कि समय पर पहुंचने के बावजूद टोकन नहीं कटा, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हुआ।
उन्होंने एमडी न्यूज के माध्यम से निष्पक्ष जांच और मुआवजे की मांग की है।
⚖ अब प्रशासन से सवाल
क्या किसान का पंजीयन सही था?
सूची से नाम क्यों गायब था?
किसकी लापरवाही से ₹1 लाख से ज्यादा का नुकसान हुआ?
क्या जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई होगआउट्रो (दमदार):
किसान की मेहनत से समझौता नहीं हो सकता।
अब देखना होगा – जांच होगी या मामला दबेगा?
कैमरामैन के साथ ________, एमडी न्यूज।
    user_Himanshu raj
    Himanshu raj
    Social Media Manager अंबिकापुर, सरगुजा, छत्तीसगढ़•
    9 hrs ago
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