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अंबेडकर नगर में बवाल: विरोध कर रहीं महिलाओं पर पुलिस का लाठीचार्ज, वीडियो वायरल उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर में उस समय तनाव बढ़ गया जब बाबा साहेब की मूर्ति पर कालिख पोतने की घटना के विरोध में महिलाओं ने प्रदर्शन शुरू किया। देखते ही देखते हालात बिगड़ गए और मौके पर मौजूद पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए लाठीचार्ज कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, इस दौरान कई महिलाओं को भी पुलिस के डंडों का सामना करना पड़ा। खास बात यह रही कि कार्रवाई में पुरुष पुलिसकर्मी भी शामिल थे, जिस पर अब सवाल उठने लगे हैं। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसके बाद पुलिस की कार्यशैली पर बहस छिड़ गई है। फिलहाल प्रशासन की ओर से मामले की जांच की बात कही जा रही है।
Mangesh ray
अंबेडकर नगर में बवाल: विरोध कर रहीं महिलाओं पर पुलिस का लाठीचार्ज, वीडियो वायरल उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर में उस समय तनाव बढ़ गया जब बाबा साहेब की मूर्ति पर कालिख पोतने की घटना के विरोध में महिलाओं ने प्रदर्शन शुरू किया। देखते ही देखते हालात बिगड़ गए और मौके पर मौजूद पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए लाठीचार्ज कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, इस दौरान कई महिलाओं को भी पुलिस के डंडों का सामना करना पड़ा। खास बात यह रही कि कार्रवाई में पुरुष पुलिसकर्मी भी शामिल थे, जिस पर अब सवाल उठने लगे हैं। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसके बाद पुलिस की कार्यशैली पर बहस छिड़ गई है। फिलहाल प्रशासन की ओर से मामले की जांच की बात कही जा रही है।
- Arvind ShrivastavJalalabad, Shahjahanpurइनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए7 hrs ago
- Darshan Singh masterबहेड़ी, बरेली, उत्तर प्रदेशकैसा कानून चल रहा है महिलाओ के अधिकार के लिए कोई नहीं है7 hrs ago
- Sharvan KumarBarharwa, Sahebganjyahi hai bharat ka kanun7 hrs ago
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- Post by India news 37 ( वैभव सिंह ब्यूरो चीफ) अंबेडकर नगर1
- अंबेडकर नगर में बवाल: विरोध कर रहीं महिलाओं पर पुलिस का लाठीचार्ज, वीडियो वायरल उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर में उस समय तनाव बढ़ गया जब बाबा साहेब की मूर्ति पर कालिख पोतने की घटना के विरोध में महिलाओं ने प्रदर्शन शुरू किया। देखते ही देखते हालात बिगड़ गए और मौके पर मौजूद पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए लाठीचार्ज कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, इस दौरान कई महिलाओं को भी पुलिस के डंडों का सामना करना पड़ा। खास बात यह रही कि कार्रवाई में पुरुष पुलिसकर्मी भी शामिल थे, जिस पर अब सवाल उठने लगे हैं। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसके बाद पुलिस की कार्यशैली पर बहस छिड़ गई है। फिलहाल प्रशासन की ओर से मामले की जांच की बात कही जा रही है।1
- बंपर धमाका सस्ते दाम पर ई रिक्शा स्कूटी लाए घर1
- Post by Deepak.kumar1
- अजीत मिश्रा (खोजी) संपादकीय: हरदोई के कछौना थाने से आई शर्मनाक तस्वीरें हरदोई। "पुलिस मित्र" - यह स्लोगन अक्सर थानों की दीवारों पर चमकता हुआ दिखाई देता है, लेकिन वास्तविकता की धरातल पर यह कितना खोखला है, इसकी बानगी हरदोई जिले के कछौना थाने में देखने को मिली। जब अपनी जमीन के विवाद की गुहार लेकर एक बुजुर्ग, राजेश, न्याय की चौखट पर पहुँचे, तो उन्हें न्याय की जगह 'मां-बहन की गालियाँ' और 'धक्के' मिले। दरोगा की दबंगई और मानवता का कत्ल सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा वीडियो दिल दहला देने वाला है। एक जिम्मेदार पद पर बैठा दरोगा, एक बुजुर्ग के प्रति अपशब्दों की बौछार कर रहा है। गालियाँ ऐसी कि रूह कांप जाए। क्या खाकी वर्दी का उद्देश्य केवल अपनी शक्ति का प्रदर्शन असहायों पर करना रह गया है? वीडियो में साफ दिख रहा है कि किस तरह बुजुर्ग को धक्के मारकर थाने से बाहर निकाला जा रहा है, मानो वह कोई अपराधी हो। व्यवस्था पर सवालिया निशान उत्तर प्रदेश सरकार कानून-व्यवस्था और 'मिशन शक्ति' जैसे अभियानों की बात करती है, लेकिन कछौना जैसी घटनाएँ प्रशासन के दावों की पोल खोल देती हैं। सवाल यह है: क्या एक बुजुर्ग को अपनी बात रखने का हक नहीं है? सवाल यह भी: क्या वर्दी पहनने के बाद किसी को मर्यादा लांघने का लाइसेंस मिल जाता है? देर आए, पर क्या दुरुस्त आए? मामला गरमाने और वीडियो वायरल होने के बाद दरोगा को निलंबित (Suspend) कर दिया गया है। लेकिन क्या निलंबन काफी है? निलंबन एक अस्थायी प्रक्रिया है। असली न्याय तब होगा जब ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कठोर विभागीय और कानूनी कार्रवाई हो, ताकि भविष्य में कोई दूसरा 'वर्दीधारी' किसी गरीब या बुजुर्ग की पगड़ी उछालने से पहले सौ बार सोचे। निष्कर्ष पुलिस विभाग को आत्मचिंतन की आवश्यकता है। यदि जनता का पुलिस पर से विश्वास उठ गया, तो समाज में अराजकता फैलने में देर नहीं लगेगी। हरदोई की यह घटना केवल एक बुजुर्ग का अपमान नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का अपमान है जिसे हम 'न्याय' कहते हैं। वक्त आ गया है कि खाकी की गरिमा को गालियों से बचाने के लिए सख्त कदम उठाए जाएं।1
- Post by हरिशंकर पांडेय1
- स्कूल चलो अभियान के तहत निकली जागरूकता रैली, शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल1
- अजीत मिश्रा (खोजी) बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश। साहब, अगर आप सोच रहे हैं कि आप ज़िंदा हैं क्योंकि आप सांस ले रहे हैं, तो रुकिए! अपनी धड़कन नहीं, जरा सरकारी कागज़ चेक कीजिए। क्योंकि बस्ती के राजस्व विभाग ने वह कर दिखाया है जो बड़े-बड़े तांत्रिक नहीं कर पाए—उन्होंने एक चलते-फिरते इंसान को जीते-जी 'भूत' बना दिया। साहब मैं ज़िंदा हूँ... सबूत? ये कफ़न देख लीजिए! मामला हमारे सेवानिवृत्त कर्मचारी इशहाक अली साहब का है। बेचारे 2019 में अस्पताल से रिटायर हुए, लेकिन राजस्व विभाग के रजिस्टर में तो वो 2012 में ही 'स्वर्गवासी' हो चुके थे। अब इसे विभाग की फुर्ती कहें या लेखपाल साहब की 'दिव्य दृष्टि', कि उन्होंने 7 साल पहले ही इशहाक अली का परलोक गमन तय कर दिया। जब दफ्तरों के चक्कर काट-काट कर पैर घिस गए, तो थक-हारकर इशहाक अली को कफ़न ओढ़कर डीएम कार्यालय पहुंचना पड़ा। शायद उन्हें लगा कि 'मुर्दा' बनकर ही इस 'मुर्दा व्यवस्था' को जगाया जा सकता है। लेखपाल की 'जादुई कलम' का कमाल इस पूरी पटकथा के असली डायरेक्टर हैं हमारे 'लेखपाल साहब'। उनकी कलम में वो ताकत है कि: एक झटके में ज़िंदा आदमी को मृत घोषित कर दिया। और उससे भी बड़ा चमत्कार—उनकी पैतृक जमीन एक महिला के नाम 'दाखिल-खारिज' भी कर दी। इसे भ्रष्टाचार कहें या कलाकारी? ज़मीन हड़पने का ऐसा 'क्रिएटिव' तरीका कि न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। जब कागजों में इंसान ही मर गया, तो ज़मीन पर हक किसका? 7 साल का वनवास और पहचान की जंग हैरानी की बात यह है कि इशहाक अली पिछले 7 सालों से चीख-चीख कर कह रहे हैं कि "हुजूर, मैं यहीं हूँ, ज़िंदा हूँ", लेकिन सरकारी फाइलों के कान नहीं होते। फाइलों के लिए तो वही सच है जो लेखपाल की स्याही ने लिख दिया। एक सरकारी कर्मचारी, जिसने पूरी उम्र सिस्टम की सेवा की, आज उसी सिस्टम के सामने खुद के 'अस्तित्व' की भीख मांग रहा है। व्यवस्था पर बड़ा सवाल यह सिर्फ़ एक ज़मीन का विवाद नहीं है, यह हमारी प्रशासनिक व्यवस्था पर करारा तमाचा है। क्या ऊपर के अधिकारियों की आँखों पर पट्टी बंधी है? क्या एक रिपोर्ट लगाने से पहले वेरिफिकेशन की कोई ज़रूरत नहीं समझी गई? निष्कर्ष: बस्ती का यह मामला बताता है कि यहाँ 'यमराज' भैंसे पर नहीं, बल्कि सरकारी बाइक पर चलते हैं और हाथ में गदा नहीं, लेखपाल का बस्ता रखते हैं। इशहाक अली जी, आप कफ़न ओढ़कर सही जगह पहुंचे हैं, क्योंकि यह सिस्टम सालों से गहरी नींद में सोया हुआ है। दुआ कीजिए कि साहब की नींद खुले, वरना कागजों की दुनिया में तो आप कब के 'स्वर्ग' सिधार चुके हैं!1